लघुकथा- निश्छल प्रेम (Short Stor...

लघुकथा- निश्छल प्रेम (Short Story- Nischhal Prem)

दादी और ज़्यादा ग़ुस्से में बोली, “ज़माना ख़राब है. अनु की मां, समय रहते संभल जाओ, वरना कुछ भी हो सकता है.”
अनु की मां ने हंसते हुए खिड़की खोल दी, “वो रही अनु. वो देखिए.” अनु की मां ने संकेत किया.

एक आवाज़ जैसे ही कानों में सुनाई दी दादी का माथा ठनका और दादी मां की त्यौरियां चढ़ गईं.
“अनु की मां! अरे कोई है, जो इस घर में मेरी सुनता है. इधर आओ, मैने अभी कुछ सुना…”
“क्या हुआ, क्या सुना, कहां सुना?”
“वो सुनो, उधर से अनु की आवाज़ आ रही है. बाहर बगीचे में है. पता है, बार बार कह रही है, “आई लव यू ओ माई वैलेंटाइन…” अनु की मां अब दादी मां के सामने आ गई थी.


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दादी और ज़्यादा ग़ुस्से में बोली, “ज़माना ख़राब है. अनु की मां, समय रहते संभल जाओ, वरना कुछ भी हो सकता है.”
अनु की मां ने हंसते हुए खिड़की खोल दी, “वो रही अनु. वो देखिए.” अनु की मां ने संकेत किया.
बिल्ली ने बच्चे दिए थे. बिल्ली को गरम शाल में लिटाकर अनु उसे गरम दूध दे रही थी. अनु कहती जा रही थी, “आई लव यू…”
“ओह, तो यह बात है.”
“हां जी.” अब दादी मां से न तो हंसा जा रहा था और न कुछ कहा जा रहा था. वो समझ गईं कि इस दुनिया का हर बंधन एक पवित्र प्यार से बना होता है. अगर प्यार न हो, तो ज़िंदगी में ख़ुशियां नहीं हो सकती.


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इस प्यार के रूप-रंग भी अनगिनत है. यह कभी नारी या पुरुष से ही आपस में नहीं किया जाता, प्यार बिन बोले ही बयाँ हो जाता है. यह बिल्ली से प्यार का एहसास है, जिसमें अगर दादी भी शामिल हो जाएं, तो अनु को दुख नहीं सुख ही होगा. प्यार तो लगाव और परवाह की एक ऐसी महक है, जिसे बस महसूस कर सकते है, जिसे शब्दों में पिरोना आसान नही.

हरीशचंद्र पांडे

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