मैं सन्न रह गई. ऐसी दुर्गति की मुझे कल्पना भी नहीं थी. मुझे अपनी रचनाधर्मिता एवं नौकरी के प्रस्ताव का गर्व था कि मैं बेसहारा इंसान के सहारे नहीं थी. इनके धुएं के पार भी मुझे एक क्षितिज साफ़ दिख रहा था.
"बीबीजी कोई आया है." मैं एकदम चौंक पड़ी. शान्ति की आवाज़ बर्तन के गिरने सी तैर गई. कलम रखते हुए मैंने पूछा, "कौन है? नाम पूछा?"
"कोई बूढ़ा आदमी है."
"अरे किससे काम है, मुझसे कि इनसे... ये तो बाहर गए हैं, कुछ पूछो तो..."
"बोल रहे हैं, जो भी हो उसे भेजो."
मेरे माथे पर बल पड़ गए, कौन हो सकता है? कोई बूढ़ा आदमी मेरी स्मृति में नहीं था? ज़रूर कोई इनसे मिलने आया होगा. मिलने में हर्ज क्या है? मानसिक रूप से मैंने अपने को तैयार किया. काग़ज़-पत्र समेटकर एक तरफ़ रखे. साड़ी ठीक की और बाहर आई, देखा दादाजी थे. आंखें ख़ुशी से एकाएक चमक उठीं, दादाजी ने याद तो किया. मैंने झट से साड़ी का पल्लू थोड़ा ऊपर किया. संतोष था कि इस समय मैं गाउन में नहीं थी, नहीं तो क्या सोचते? मैं उन्हें अच्छी तरह जानती हूं एक लंबा समय गुज़रा उनके समीप रहते.
"आप कब आए... अंदर आइए न... ये तो दिल्ली गए हैं." मैं एक सांस में कह गई. बदन में एक अजीब सी हड़बड़ाहट पैदा हो गई थी.
"नन्दू दिल्ली गया... कब?" आश्चर्य से उन्होंने पूछा.
"चार-पांच दिन हो गए, आज आ जाएंगे."
वे आहिस्ते से चलते हुए ड्रॉइंगरूम में आए और सोफे पर धंस गए. मैं सोच उठी पैदल चलकर आए होंगे थक गए, सोचा होगा क्वॉर्टर पास ही है चल लेंगे. लेकिन ये गांव की पगडंडियां थोड़े ही हैं कि जहां चलते-चलते थकान नहीं उभरती. ये शहर की चौड़ी-सकरी सड़कें, जहां वाहनों का जंगल सा उमड़ा रहता है, सावधानी बरतते आदमी थक ही जाता है.
"दादाजी चाय तो चलेगी?" मैंने पूछा. वे चुप ही रहे. आंखें मूंदे बैठे रहे. तभी मुझे लगा मैंने कुछ ग़लत तो नहीं कहा. ये क्या पूछना... चाय तो पीएंगे ही. थके-मांदे हैं. मैं जल्दी से किचन में गई, गैस पर चाय की केतली चढ़ा दी. शांति को इधर-उधर खोजा कि उन्हें पानी दे आए. जब कहीं न दिखी तो मैं ही पानी लेकर गई, लेकिन ध्यान चाय पर ही रहा कहीं उफन न जाए. शांति पर बड़ा गुस्सा आया, वह कहां चली गई, बता कर नहीं जाती, अजीब महरी है, किचन की सफ़ाई भी नहीं की.
पानी का ग्लास मुंह से लगाते ही वे बोले, "बहुत ठंडा पानी है, फ्रिज का है शायद."
"यह तो मेरे गले से नहीं उतरेगा." ग्लास लौटाते हुए उन्होंने कहा.
मैं ग्लास लेकर तुरंत किचन में आ गई. चाय खौल गई थी. झट से गैस बंद किया. तुरंत उन्हें घड़े का पानी दे आई, फिर चाय छानकर ले गई. वे फूंक-फूंक कर प्लेट से चाय पीने लगे. मैंने गौर से उन्हें देखा, पहले से बहुत कमज़ोर हो गए हैं. चेहरे पर झुर्रियां पड़ गई हैं. आंखें सिकुड़ सी गई हैं. नहीं तो उनका शरीर कितना रौबदार था, ऐंठी हुई मूंछे, गठीला बदन और सफ़ेद झकाझक धोती-कुर्ता व गले में पड़ी सोने की चेन. एकाध इत्र का फाहा भी उनके कान में खुसा रहता था. आज धूल-पसीने की मटीली गंध ही उनके जेहन से उठ रही थी.
"आनंद से हो न बेटी?" एक डकार लेते हुए उन्होंने कहा.
"हां." मैंने संक्षिप्त सा उत्तर दिया.
दादाजी वैसे रिश्ते से मेरे ससुर हैं, लेकिन मेरे लिए पिता तुल्य हैं. मैं बचपन से उनके क़रीब रही हूं. उनके आंगन में खेली हूं. मेरे डैडी से उनकी प्रगाढ़ मित्रता थी. दोनों रात-रात भर बातों में मशगूल रहते थे. कहीं घूमने निकलते तो साथ-साथ, कहीं दावत में जाते तो साथ-साथ. डैडी उनके लड़के नंदकिशोर से प्रभावित थे.
उनके गुणों की प्रशंसा घर-परिवार में करते रहते थे. मेरे ही कॉलेज में पढ़ता था नंदकिशोर, कॉलेज में सभी उसे किशोर ही कहते थे. घर में वह नंदू के नाम से बुलाया जाता था. मैं भी किशोर ही कहती थी. वह सदैव मैरिट में आता. कॉलेज के हर उत्सव में उसका नाम गूंजता था, क्योंकि उसकी आवाज़ बहुत ही मधुर थी, किशोर कुमार से मिलती-जुलती थी. मैं भी अनायास उसकी प्रशंसक हो गई और उसके सपने बुनने लगी.
एक दिन डैडी की तबीयत अकस्मात गंभीर हो गई. ब्लड प्रेशर के वे मरीज़ थे. पलंग पर ऐसे जा पड़े कि उठ न सके. तभी उन्होंने किशोर से मेरी शादी करने की इच्छा दादाजी से व्यक्त की. दादाजी सब जानते थे. मेरे प्रेम को पता नहीं उन्होंने कैसे सूंघ लिया था. उन्होंने तुरंत हामी भर दी. हालांकि उनकी परिस्थिति डैडी से कमज़ोर थी, दयनीय थी, फिर भी वे डैडी को मना नहीं कर सके.
डैडी ने कभी पैसे को महत्व नहीं दिया, वे मानवीय संबंधों को मानते थे. इंसानियत को पूजते थे. वे अक्सर दादाजी के यहां दावत लेने की बात किया करते थे. आत्मीय ख़ुशी मिलती थी उन्हें दादाजी की दावत में. बिल्कुल सादा भोजन बनता था दादाजी के यहां. आम की चटनी की तारीफ़ करते वे अघाते नहीं थे.
मेरी शादी किशोर के साथ सम्पन्न करने के एक हफ़्ते बाद ही डैडी का स्वर्गवास हो गया. हमारे परिवार पर वज्राघात हुआ. मैं किशोर के साथ महानगर चली आई. यहां आकर मैंने जाना कि मैं जितनी आकर्षित किशोर से थी, वह उतना मुझसे नहीं था. एक दूरी वह बराबर रखे रहा. उसने क्यों मुझसे शादी की? क्यों मुझे बंधन में बांधा... यह मैं आज तक नहीं समझ पाई.
मैं अक्सर महसूस करती कि मेरे साथ उठते-बैठते उसे आत्मीय ख़ुशी नहीं होती थी. चेहरे से वह भले ही मुस्कुराता, लेकिन ऐसा लगता जैसे एक कांटा उसके अंदर गड़ रहा है. प्यार वह मुझसे जताने की कोशिश करता, लेकिन नज़रें कहीं और डूबी लगतीं जैसे देख वह मुझे रहा हो और खोया कहीं और हो. उसके चेहरे पर सुकून की रेखाएं मुझे कभी नज़र नहीं आईं.
काश! मुझे उसकी भावनाओं का पहले एहसास हो गया होता या वह मुझे नकार देता तो शायद यह खालीपन न चुभता. तभी कॉलबेल की टनटनाहट मेरे कानों में पड़ी, देखा तो पोस्टमैन खड़ा था. डाक लेकर मैं अंदर आ गई. भारतीय ज्ञानपीठ का पत्र देखकर मन पुलकित हो गया कि दादाजी के आते ही एक ख़ुशख़बरी मिली.
"क्या बात है बेटी बहुत ख़ुश दिख रही हो." दादाजी ने गौर से मुझे देखते हुए पूछा.
"ज्ञानपीठ ने मेरा कहानी संग्रह स्वीकार कर लिया है." ख़ुशी से झूमती मैं बोल पड़ी.
"बहुत अच्छा, तुम ऐसे माहौल में कहानियां लिख लेती हो? तुमको लिखने का समय मिल जाता है यहां?"
"निकाल लेती हूं. दूर कहीं जा भी तो नहीं सकती."
"क्यों, पहाड़ पर जाकर तुम अच्छा लिख सकती हो."
"इन्हें यह सब पसंद नहीं."
यह सुनकर वे ख़ामोश रह गए और पारखी नज़रों से मुझे तौलने लगे. मैं उनकी दृष्टि के समक्ष अधिक देर तक नहीं टिक सकी और मैंने अपनी नज़र झुका ली. शायद बहुत कुछ पढ़ लिया था. उन्होंने मेरे चेहरे से, तभी तो वे बोले "क्या नंदू अब भी वैसा ही है?"
"हां अब तो फासला और बढ़ गया है, जब से मैनेजर हुए हैं."
"हां... हां..." समझ गया, क्लब जाता होगा, देरी से घर आता होगा, पार्टियां चलती होंगी."
मैं चुप ही रही, इन पर कीचड़ नहीं उछालना चाहती थी. हालांकि दादाजी को शादी के बाद मालूम पड़ गया था, कि ये मुझे पसंद नहीं करते. लेकिन वे आश्वस्त थे. कहते थे, "जब घर-गृहस्थी का बोझ सिर पर पड़ेगा तब अक्ल दुरुस्त हो जाएगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. दिन पर दिन ये मुझसे किनारा काटते गए. मेरी इच्छाओं की इन्होंने कभी परवाह नहीं की. यह तो अच्छा था कि मुझे लिखने-पढ़ने का शौक था. इसलिए मेरा समय कट जाता, नहीं तो एक पल काटना भी मुश्किल हो जाता.
ख़ामोशी को तोड़ते हुए दादाजी बोले, "अनूप के यहां भी यही होता रहता है, जब से इन्कम टैक्स ऑफीसर बना, अपनी जड़ ही भूल गया है. बहू भी पीती है."
मैं अवाक रह गई, दादाजी के गिरे स्वास्थ्य का कारण अब मेरी समझ में आ गया.
"आप मैगजीन देखिए, मैं नाश्ता बनाकर लाती हूं." इतना कहकर मैं किचन में चली आई. अनूप का चेहरा आंखों में झिलमिला गया. वह तो बहुत सीधा-सादा लड़का था, पान-सुपारी तक नहीं खाता था. ये लत उसे कैसे लग गई? दादाजी ने अपने दोनों लड़कों के लिए क्या नहीं किया? मामूली मुंशी की नौकरी से ही एम.ए. तक पढ़ाया, नौकरी लगवाई, शादी की और वे अपनी परंपरा भूल गए.
मुझे याद हो आए वे दिन, जब मैं दादाजी के घर जाती थी. चप्पल बाहर ही उतारनी पड़ती थी. आंगन लिपा-पुता रहता था. अगरबत्ती की ख़ुशबू से बैठकखाना गमका रहता था. शुद्ध, पवित्र वातावरण था. दादाजी को हिन्दी व संस्कृत का बहुत ज्ञान था. शास्त्री तो थे ही, वेद-उपनिषद के भी ज्ञाता थे. मैं उनसे संस्कृत पढ़ने जाया करती थी. उसी समय किशोर-अनूप मिल जाते. थोड़ा हंसी मज़ाक़ हो जाता.
बचपन की अपनी अलग ही ज़िन्दगी थी. इस घर में कभी बहु बनकर आने का सोचा भी नहीं था. कैसे बंध जाते हैं नाम, कैसे छूट जाता है घर... आंखें नम हो आईं. तभी ध्यान कड़ाही पर गया, गर्म हो गई थी. जल्दी से उसमें चिवड़ा छोड़ा, तला और प्लेट में सजाकर ड्राइंगरूम में ले आई. देखा दादाजी वैसे ही एकाग्रचित्त बैठे थे. भीतर ही भीतर मैं छलक गई कि जिनके समीप रह कर मैंने शिक्षा ग्रहण की, दुनिया के मायने समझे, धर्म-कर्म की बातें सीखीं, वे मेरे घर तो आए.
पोर-पोर से ख़ुशी टपक गई, लेकिन एक बात मुझे अनायास ही चीर गई कि उन्हें देने लायक मेरे पास है क्या... ये अंग्रेज़ी बिसात का सामान, ये फैंसी आइटम... कोई भी कलात्मक वस्तु नहीं मेरे पास, जिसे मैं उन्हें भेंट कर कृतकृत्य हो सकती.
नाश्ता कर वे नहाने चले गए. मैं घर के काम निबटाती रही, कब दो बज गया कुछ पता हो नहीं चला. मैं दादाजी की आवश्यकता जानने आई ही थी कि कॉलबेल टनटना उठी, देखा तो ये थे. दिन में ही पी कर आ गए थे. दरवाज़ा खोलते ही मुझे गंध आ गई, इनके एक हाथ में जलती सिगरेट थी. दूसरे में अटैची.
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ड्रॉइंगरूम में दादाजी को देखते ही ये हतप्रभ रह गए. तुरंत सिगरेट को जूते से मसलते हुए बहके-बहके स्वर में बोले, "दादा... कब आए... आने की कोई... कुछ ख़बर नहीं दी." इनके पैर लड़खड़ा रहे थे. आंखें नशे से भारी थीं. (पिताजी को दादाजी ही बोलते हैं). मैं इनके हाव-भाव देखकर शर्म से गड़ गई. क्या सोचते होंगे दादाजी? यह उनका खून है? यह उनके त्याग बलिदान का प्रतिफल है. बड़ी घुटन सी हुई.
दादाजी बोले, "तुमको जब अपनी ख़बर नहीं, तो दूसरों की ख़बर क्या लोगे? ख़ूब नाम रोशन किया बेटा. मैं तो यह कहने आया था कि बीस तारीख को बबली की शादी है, छुट्टी लेकर आ जाना. वह बेचारी बहुत याद करती है तुमको... भैया नहीं आए और एक तुम हो. दो वर्ष से एक पत्र भी नहीं दिया... हां क्यों दोगे, मैनेजर हो गए न?"
"दादाजी क्या कह रहे हैं आप... मैं बबली की शादी में न आऊं. अरे वो धूमधाम से शादी होगी, कि सब देखते रह जाएंगे."
"हां, ख़ूब. आज कौन सी तारीख़ है. पन्द्रह यानी पांच दिन शेष है और धूमधाम से शादी करोगे तुम. तुम्हारे पास समय ही कहां?"
"हां दादा मुझे बहुत काम है यहां. ऐसा कीजिए पांच हज़ार ले जाइए, मैं बीस तारीख को पहुंच जाऊंगा."
"बेटा मेरा बैंक एकाउंट अभी खाली नहीं हुआ है. यह पैसा तुम्हारे काम आएगा, मुझे ज़रूरत नहीं. अच्छा मैं चलता हूं. मुझे वहां बहुत से काम पड़े हैं."
"अभी कैसे? रुकिए... छाया दादाजी ने भोजन किया कि नहीं?" ये मेरी तरफ़ मुखातिब हो कर बोले.
"भोजन बन रहा है."
"तुम घर में क्या करती रहती हो? दो बज गए अभी तक खाना नहीं बना." अब ये मेरे ऊपर बरस पड़े.
"बेटा तू बैंक मैनेजर हो गया, घर में एक नौकर नहीं लगा सकता. पानी भरने को सिर्फ़ एक महरी है. सब काम उसे ही करना पड़ता है." "दादाजी नौकर बहुत लगाए, लेकिन यहां टिकते नहीं. छाया टिकने दे तब..."
मेरे मन में आया कि इनकी कलई खोल दूं. कितना झूठ बोलते हैं लेकिन चुप रही. जानती थी कि ये अभी होश में नहीं है, गाली-गलौज़ पर उतर आएंगे.
तभी दादाजी एकाएक उठ खड़े हुए और बोले, "अच्छा चलता हूं. अठारह तारीख़ को पहुंच जाना, मंडप है उस दिन, उन्नीस को मातृ पूजन और बीस को द्वारचार."
" रुक जाइए दादाजी कल सुबह चले जाना." इन्होंने झूमते हुए कहा. नशा और चढ़ गया था.
"नहीं मुझे वहां काम है. अभी चार बजे की बस मिल जाएगी. रात तक घर पहुंच जाऊंगा." इतना कहकर उन्होंने झोला उठाया और आगे बढ़ गए. मैं दौड़ कर उनके कदमों में गिर पड़ी, "दादाजी इतनी बड़ी सज़ा मत दो मुझे. कृपया खाना खाकर जाइए, नहीं तो ज़िन्दगीभर कहने को हो जाएगा." मैं गिड़गिड़ा उठी.
उन्होंने कुछ सोचकर मुझे ऊपर उठाया. सिर पर हाथ रखा और रुक ग,ए. मैंने अंदर स्टोर से लगे कमरे में उनका पलंग लगा दिया, झोला खूंटी से टांग दिया. वे आराम करने लगे. मैं खाना बनाने में जुट गई.
शाम ढलते ही इनके कई दोस्त आ धमके. ये भूल गए कि दादाजी ठहरे हुए हैं. कम से कम एक दिन ठहर जाते, पर नहीं, दोस्तों के शोर-शराबे में शामिल हो गए, व्हिस्की की बोतल खुली. ग्लासों के खनखनाने की आवाज़ अंदर तक आई. मैं दादाजी के पास ही रही. इन्होंने पता नहीं किस ज़रूरत से मुझे आवाज़ दी, लेकिन मैंने अनसुनी कर दी और दादाजी की सेवा में लगी रही.
रात गहराते-गहराते इनके कहकहे बहुत तेज़ हो गए. स्टीरियो की कर्कश धुने कान फाड़ने लगी. दादाजी को अब एक-एक पल काटना मुश्किल हो गया. वे बेचैनी से इधर-उधर टहलने लगे. दुखी स्वर से मुझसे बोले, "बेटी इसीलिए तो मैं जा रहा था. मुझे यह शोर-शराबा पसंद नहीं." "दादाजी अब जाएंगे कैसे, अब तो कोई बस भी नहीं?" दुख मुझे भी था कि व्यर्थ मैंने उन्हें रोका. "क्या ज़माना आ गया, आदमी अपनी जड़ ही काटने लग गया." एक दीर्घ निःश्वास लेते हुए उन्होंने कहा.
मैं अंदर ही अंदर सिसक उठी, कुछ जवाब नहीं दे पाई. यही दुख लगातार सालता रहा, इनको इसी समय अपने दोस्तों को पार्टी देनी थी... टाल भी सकते थे.
दादाजी का क्रोथ उफन रहा था. वे लगातार लताड़े जा रहे थे, "खूब प्रगति की इसने, अपनी मर्यादा को भी भूल गया, बीयर-व्हिस्की की पार्टी देने लगा. मांस-मच्छी भी खाता होगा, पूरा धर्म चौपट कर दिया."
मैं सिर नीचे किए सब सुनती रही. दादाजी बोलते रहे, "ये पाश्चात्य संस्कृति की चमक-दमक युवकों को बर्बाद कर देगी. इससे किसी का भला नहीं होने वाला, जब परंपराएं छिन्न-भिन्न हो जाएंगी तब प्रगति कैसी?"

मैं अपने कमरे में आ गई. बोलने को मेरे पास कुछ था नहीं. रात काफ़ी देर तक हो-हल्ला होता रहा. मुझे नींद कब लगी मुझे पता नहीं. सुबह जब देखा तो दादाजी नहीं थे, न उनका झोला था. वे कब चले गए, कुछ पता नहीं चला. ये अभी सो रहे हैं दस के पहले क्या उठेंगे, मुझे विरक्ति सी हुई. इन्हें ज़रा भी चिन्ता नहीं. उधर बहन की शादी है, इधर ये अपनी मौज में मग्न हैं. अपने कर्तव्य को भी भूल गए. घर-परिवार के प्रति संतान का क्या दायित्व होता है, इन्हें ज़रा भी बोध नहीं. मेरे क़रीब तो एक मिनट नहीं ठहरते. पता नहीं मेरी कौन सी आदत इनको अप्रिय है, यही कि मैं इनके साथ क्लब नहीं जाती, ताश नहीं खेलती, बीयर-व्हिस्की नहीं पीती. इन्हें शायद ऐसी पत्नी की आवश्यकता है, जो पार्टी में इनके साथ चहके, अत्याधुनिक ड्रेस पहने और व्हिस्की में इनका साथ दे. जीवन को ये मौज ही समझ बैठे हैं. इसके आगे भी कुछ है, इसका इन्हें कुछ ध्यान नहीं. जीवन की कितनी ग़लत परिभाषा लगा बैठे ये. धर्म संस्कार को ताक में रख दिया.
भला मैं कैसे ख़ुश रह सकती हूं उन संस्कारों को त्याग कर, जहां मेरा सृजन हुआ, रचनाधर्मिता मुझे मिली, जब रास्ते ही अलग-अलग हैं, तो क्यों बोझ बनूं मैं इन पर. सब कुछ करके तो देख लिया, अब क्या-क्या सहन करूं, अब सहन भी तो नहीं होता, दूर रहना ही बेहतर है. इन्होंने तो मां-पिता को बिल्कुल बिसार दिया, बहन की शादी में जाना भी इनका असंदिग्ध है, यदि मैं नहीं पहुंची, तो दादाजी पर क्या बीतेगी? एक मेरा ही भरोसा है उन्हें. मैं इसे टूटने नहीं दूंगी. यह सोचकर मैंने तुरंत कपड़े बदले, बालों को संवारा और अटैची लगाकर कमरे के बाहर हुई कि ये आ गए.
"कहां जा रही हो... दादाजी कहां है?"
"दादाजी चले गए."
"कब... तुमने मुझे बताया नहीं."
"मुझे भी कहां पता चला."
"तुम कहां जा रही हो?"
"बबली की शादी में."
"बिना मुझसे पूछे."
"तुम अपने दोस्तों को घर में बीयर की पार्टी देते हो तो मुझसे पूछते हो?"
"छाया अपनी सीमा में रहो, नहीं तो..."
"नहीं तो क्या... बोलो... जो बाकी रह गया है उसे भी पूरा कर लो. लेकिन मैंने सोच लिया, मैं जाऊंगी और तुम मुझे नहीं रोक सकते."
"यदि तुम गई तो इस घर के दरवाज़े तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे."
"मैं जानती थी तुम यही कहोगे, लेकिन मुझे इसकी चिंता नहीं. मैंने प्रबंध कर लिया है. सब-एडीटर की नौकरी का ऑफर मेरे पास है. बबली की शादी के बाद मैं यह नौकरी ज्वाइन कर लूंगी. तुम्हे तो खुश होना चाहिए, तुम्हारा एक बोझ उतर जाएगा."
ये विस्फारित नेत्रों से मुझे देखते रह गए. मैं अपनी अटैची उठाकर बाहर चली आई. मेरी समर्थता ने ऐसा करारा प्रहार किया था इन पर कि इनकी बोलती बंद हो गई.
शादी में मैं शरीक हुई, धूमधाम से शादी हुई. बिदा के अंतिम क्षणों तक मेरी आंखें इन्हें खोजती रहीं कि ये आ जाते और अपनी बहन से दो शब्द बोल लेते. अनूप अपनी बीवी के साथ सम्मिलित हो गया था, एक इनकी ही कमी रही.
एक हफ़्ते बाद ये थके हारे से पहुंचे. मैं इनको देखती रह गई. चेहरा कुम्हला सा गया था, आंखें रीती थीं. कपड़े अस्त-व्यस्त थे. ऐसी हालत में मैंने इन्हें आज तक नहीं देखा था.
इन्हें देखते ही दादाजी बरस पड़े, "अब क्या लेने आया है यहां? बबली तो चली गई."
"दादाजी मुझे माफ़ कर दो." ये दादाजी के कदमों में गिर पड़े, "मैं बर्बाद हो गया."
"मैं तो उसी दिन समझ गया था जब तू मेरे सामने दोस्तों के साथ मौज-मस्ती कर रहा था." "मुझे और शर्मिंदा मत कीजिए दादाजी. मैं बहुत दुखी हूं. मेरी नौकरी चली गई."
"क्या..?" दादाजी ने उखड़ी सांस से पूछा.
"मेरे बैंक में दस लाख का घोटाला हो गया. मेरे दोस्तों ने ही मुझे फंसा दिया." इतना कहकर ये ज़ोर से सिसक पड़े.
मैं सन्न रह गई. ऐसी दुर्गति की मुझे कल्पना भी नहीं थी. मुझे अपनी रचनाधर्मिता एवं नौकरी के प्रस्ताव का गर्व था कि मैं बेसहारा इंसान के सहारे नहीं थी. इनके धुएं के पार भी मुझे एक क्षितिज साफ़ दिख रहा था.
- योगेश दीक्षित
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