"... ज़िंदगी के इस मोड़ पर मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता, क्योंकि मैं जानता हूं जो कुछ उसने किया है उसके लिए मैं ही ज़िम्मेदार था और फिर, तुम जो मुझे आज बता रही हो वो अमेरिका में उसके इलाज के दौरान ही मैं जान गया था..."
अमृता प्रीतम के उपन्यास के छह-सात पन्नों को बड़ी तेजी से पढ़ लेने के बाद नेहा को आभास हुआ कि वो महज़ पढ़ ही रही है, समझ कुछ भी नहीं पा रही. खीझ के साथ पुस्तक को सोफे पर पटकते हुए वो मामी के पास खिसक आई. स्नेह भरी मुस्कुराहट के साथ मामी के स्वेटर बुनते हाथ रुक गए. सलाइयों को बगल में रखते हुए उन्होंने नेहा के सिर पर हाथ रख दिया. नन्हीं मुन्नी बच्ची की तरह नेहा मामी की गोद में गई और फूट-फूटकर रो पड़ी.
"रोते नहीं पगली..." नेहा के बालों को हाथों से समेटकर पीछे की ओर करते हुए मामी ने उसके माथे को चूम लिया.
"मामी..." सिसकियों में डूबे स्वर के साथ ने नेहा ने पूछा, "क्या तुम्हारा निर्णय अटल है?"
"निर्णय मेरा नहीं नेहा, तुम्हारी मां का है. तुम मेरे पास उसकी अमानत थी. अब अगर वो तुम्हें ले जाना चाहती हैं तो मैं मना नहीं कर सकती."
"अगर मना नहीं कर सकतीं तो मुझे ज़हर दे दो."
"ये क्या कह रही हो नेहा?"
"ठीक ही कह रही हूं मामी. उस चुड़ैल के साथ रहने से तो अच्छा है कि मैं मर जाऊं."
"नेहा..." क्रोध भरे स्वर में मामी बोली, "अपनी मां के लिए ऐसे शब्द का इस्तेमाल न करो. वो तुम्हें इतना प्यार करती हैं और तुम... ये उसकी ममता ही है, जो उसे अमेरिका से यहां खींच कर ला रही है."
"ममता नहीं स्वार्थ कहो मामी स्वार्थ..." मामी के ग़ुस्से की परवाह किए बिना नेहा बोली, "अगर उसे कोई बच्चा हो जाता तो शायद वो कभी मुझे लेने नहीं आती. बच्चा नहीं हुआ तो अपना अभाव पूरा करने के लिए मुझे ले जा रही हैं, वरना उसे अपने पति से जो दस सालों से फ़ुर्सत नहीं मिली अब कैसे मिल गई?"
अपनी बात पूरी करने के बाद वो बड़ी तेज़ी से कमरे से बाहर निकल गई. मामी के चेहरे पर आए भावों को देखने की उसकी हिम्मत ही नहीं हुई.
मामी से जो कुछ उसने कहा था वो उसके दिल की भड़ास थी, जो नफ़रत का रूप लिए सालों से उसके हृदय में दबी पड़ी थी. आज हृदय से उबलकर निकले शब्दों से नेहा को राहत होने लगी.
नेहा तब बहुत छोटी थी. साल भर की रही होगी जब पापा की कार दुर्घटना से मौत हो गई थी. नेहा को पापा की तो याद तक नहीं थी. पर मां की लोरियों की गूंज, अपने हाथों से खाना खिलाने, खेलने के अंदाज़ों और प्यार से बालों को गूंथते हाथों की धुंधली सी छवि आज भी उसके दिमाग़ में अंकित थी.
अपनी मां की शादी का दृश्य तो उसे पूरी तरह से याद था. तब आठ-नौ साल की रही होगी नेहा जब पहली बार उसने मां को लाल साड़ी में देखा था. माथे पर बिंदिया, हाथों में लाल चूडियां, मांग में सिन्दूर और पैरों में महावर रचाए हुई मां उसे बड़ी अच्छी लगी थी. वो तो चाहती ही थी कि मां ख़ूब सजे, सबकी मां से ज़्यादा सुंदर लगे.
मामी ने बताया था कि मां कि शादी हो रही है तो मारे ख़ुशी के झूम उठी थी नेहा. अपनी सहेलियों के साथ पूरे आंगन में भागते-दौड़ते हुए उसने अपनी ख़ुशी का प्रदर्शन किया था.
मां की शादी की हर रस्म को उसने बड़े शौक से देखा था. शादी के वक़्त मां की आंखों में आंसू देखकर हर बार की तरह उस रोज़ नेहा उदास नहीं हुई थी. हर ख़ुशी के मौक़े पर मां को रोते देखने की नन्हीं सी नेहा को आदत जो हो गई थी.
जब मामी ने उसे नए पापा की गोद में बिठा दिया था तब नेहा को बहुत अच्छा लगा. उसकी सहेलियों की तरह आज उसे भी एक पापा मिल गए थे.
पर शादी के बाद जब मां पापा के साथ जाने लगीं तब नेहा ख़ूब रोई थी. उसे तो लगा था वो भी मां और नए पापा के साथ रहेगी. पर मां को छोड़कर रहना तो उसके लिए असंभव था. तब मामी ने उसे सीने से लिपटाकर रोते हुए कहा था.
"अपनी मां को जाने दे बेटी. अब तू मेरे साथ रहेगी."
पर नेहा नहीं मानी थी, मां के साथ जाने की ज़िद की थी. मां का आंचल पकड़कर खींचा भी था, तब नए पापा ने मां का आंचल छुड़ाकर उन्हें अपने साथ कार में बिठा लिया था. रोती हुई मां चली गई थी.
हाथ-पैर पटकते हुए नेहा बहुत रोई तो मामी ने कहा था, "मां जल्दी लौट आएगी और फिर तुम्हें भी अपने साथ ले जाएगी."
"सच मामी." रोते-रोते नेहा ने पूछा था.
"हां बेटी, बिल्कुल सच." मामी ने उसे अपने आंचल में छुपा लिया था.
उस रोज़ के बाद मामी ने कई बार कहा, मां आएगी कभी दिवाली में, कभी होली में तो कभी उसके जन्मदिन पर. लेकिन हर बार नेहा के कोमल मन को ठेस लगती जब मामी के कहे अनुसार मां नहीं आती.
धीरे-धीरे नेहा समझने लगी कि मामी सिर्फ़ उसे बहलाने के लिए ऐसा कहती है वरना मां तो अमेरिका में जाकर बस गई थी.
नेहा को मां की चिट्ठी मिलती थी. उसके जन्मदिन में वो तोहफे भी भेजती थी, पर नेहा कभी संतुष्ट नहीं हुई थी.
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नेहा के हृदय में मां के लिए जो चाहत थी उसकी जगह कब नफ़रत ने ले ली वो जान ही नहीं पाई. नेहा की नज़र में मां एक स्वार्थी औरत थी जिसने अपनी ख़ुशी के लिए अपनी बेटी का त्याग कर दिया था.
नेहा के लिए अब मामी ही सब कुछ थी. मामी की दोनों बेटियां अलका और सुमन नेहा की हमउम्र थीं.
जवानी के दौर में पहुंचते ही जब नेहा स्त्री-पुरुष के संबंधों के बारे में समझने लगी तब उसके हृदय में मां की नफ़रत और गहरा गई. अब उसे लगने लगा कि मां का स्वार्थ वासनात्मक था.
जब कभी मां की याद आती तो नेहा अपने आपको कहीं और उलझाने का प्रयास करती. जब कभी मां के स्नेह को जी तड़पता तो मामी की गोद में छुप जाती. मामी का प्यार भरा स्पर्श नेहा की पीड़ा को दूर कर देता.
मामा-मामी के छोटे से परिवार में संतुष्ट होकर जीने लगी थी नेहा कि मां के आने की ख़बर आई. मां ने मामी को लिखा था कि कई साल इलाज करवाने के बाद भी वो मां नहीं बन पाई है इसलिए नेहा को अपने साथ अमेरिका ले जाना चाहती हैं.
मामी के इंकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता था. पिछले पन्द्रह दिनों में नेहा ने कई बार मामी को समझाने का प्रयास किया था, पर हर बार मामी ने अपनी असमर्थता प्रकट की. मामा तो चाहते थे कि नेहा न जाए, पर मामी ने विरोध करते हुए कहा था, "दीपा का तो सोचिए, उसने अमेरिका में अच्छे से अच्छे डाक्टरों से इलाज करवाया होगा पर मां नहीं बन सकी. ऐसे में वो नेहा को अपने साथ ले जाना चाहती है तो क्या ग़लती करती है.
मैं जानती हूं अगर मैं नेहा को भेजने से इंकार कर दूं तो वह मुझसे बहस नहीं करेगी. पर बेटी के रहते वो ममता को तरसे तो क्या ठीक होगा. नेहा के बिना मैं कैसे जिऊंगी नहीं जानती, पर, उसे दीपा से नहीं छीनूंगी." कहते हुए मामी फूट-फूटकर रोई थीं. तब मामी के कंधे से लगकर नेहा भी बहुत रोई थी.
रोते-रोते नेहा ने अपनी मां को बहुत कोसा, जो सुखी परिवार में आग लगाने आ रही थी.
दूसरे ही दिन मां और नए पापा आ गए. जब वे टैक्सी से उतरे तब नेहा अलका और सुमन के साथ छत पर खड़ी थी. नेहा ने देखा, मां सलवार सूट पहने हुए थी. बाल कटे थे. चेहरे पर हल्का-सा मेकअप था और मां हील वाली चप्पल पहने हुई थी. पापा के बाल सफ़ेद हो गए थे. वे सफ़ेद सफारी सूट पहने हुए थे. नेहा को लगा मां पहले से ज़्यादा आकर्षक हो गई हैं.
मामी को बरामदे में खड़े देखकर मां दौड़ती हुई गई और उनसे लिपटकर रो पड़ी. मामी भी रो रही थीं. अलका और सुमन नीचे दौड़े तो नेहा को भी साथ जाना पड़ा.
'पहचानो तो तुम्हारी बेटी कौन सी है?" मामी ने तीनों को साथ देखकर मां से पूछा तो अपलक नेहा को ताकती हुई मां बोली थी, "अपनी बेटी को लाखों में पहचान लूंगी भाभी." नेहा को बुरा लगा था. वो तो चाहती थी मां उसे पहचाने ही नहीं.
"मां के पैर छुओ बेटी..." मामी ने कहा तो नेहा मां के पैरों पर झुक गई और इससे पहले कि मां उसे छूने का भी प्रयास करती वो तेज़ी से पीछे हट गई. मां के बड़े हाथ वैसे ही रह गए.
दिनभर में मां ने पता नहीं कितने बार नेहा के पास आने का प्रयास किया था, पर हर बार नेहा मां से बचकर निकल जाती.
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रात के खाने के बाद जब मां सभी के लिए लाए तोहफ़े निकाल रही थीं, नेहा जाकर मामी के पीछे खड़ी हो गई. सुमन और अलका के लिए ढेर सारी ड्रेसेस, मामी के लिए साड़ियां, मामा के लिए सूट का कपड़ा, घड़ी और नेहा के लिए तो जैसे मां पूरा बाज़ार ही उठा लाई थी. कानों के टॉप्स, चप्पल, सोने की चूड़ियों, हार और ढेर सारे कपड़े, पर नेहा को कुछ भी अच्छा नहीं लगा.
नेहा के चेहरे पर कोई भाव ने देखकर मां का चेहरा भी उतर गया था.
"क्या तुम्हें कुछ पसंद नहीं आया नेहा?" मां ने पूछा.
"पसंद क्यों नहीं आएगा..." नेहा की जगह मामी बोलीं. "चलो नेहा अपना सामान उठाओ और अपने कमरे में रख आओ." मामी का आदेश भरा स्वर सुनकर नेहा ने अपना समान उठाया और अपने कमरे में लाकर बिस्तर पर पटक दिया.
दूसरे दिन पिकनिक का प्रोग्राम बना. मां ने ज़िद करके मामी को अपना सलवार सूट पहना दिया था जिसे देखकर नेहा जल-भुनकर खाक हो गई. मामा ने हंसते हुए कहा था, "बिल्कुल सोलह साल की लग रही हो. लगता है, अब हमें भी बालों को रंगना होगा वरना लोग सोचेंगे अपने बाबूजी के साथ जा रही हो."
"चुप भी करो जी. बच्चों के सामने कैसा मज़ाक करते हो." मामी का चेहरा लाल हो उठा था.
नेहा को अपनी प्यारी मामी के शरीर पर स्वार्थी मां के कपड़े ऐसे लग रहे थे जैसे चंदन के वृक्ष पर लिपटा सर्प, वह बोली, "मामी तुम पर ये कपड़े अच्छे नहीं लगते. तुम तो साड़ी में ही अच्छी लगती हो. प्लीज़ मामी ये कपड़े उतार दो."
"ठीक है बेटी अगर तू नहीं चाहती है तो न सही." कहते हुए मामी कपड़े बदलकर आ गई. नेहा ने देखा, मां बिल्कुल चुप, ऐसे खड़ी थी जैसे कोई गहरा आघात लगा हो. नेहा को अच्छा लगा.
साड़ी में मामी को देख कर नेहा उनके गले से लग बोली, "तुम ऐसे ही अच्छी लगती हो मामी. बहुत सुंदर, बहुत प्यारी और बहुत ममतामयी."
नेहा ने फिर मां की तरफ़ देखा. इस बार मां सबसे नज़र बचाकर आंखें पोंछ रही थीं.
पिकनिक पर बड़ा मज़ा आ रहा था. हरियाली से भरे पूरे दृश्य वाले इस पिकनिक स्थल में एक नदी बहती थी जिसके आसपास बड़ी-बड़ी चट्टानें थीं.
नए पापा ने टेप रिकॉर्डर पर पाश्चत्य संगीत की धुन छेड़ दी थी, जिस पर नेहा, सुमन और अलका नृत्य करते रहे. मामा भी उछल-उछलकर नाच रहे थे जिसे देखकर मामी पेट पकड़कर हंसे जा रही थीं और जब सब थक कर चूर हो गए तो मामी को घेरकर बैठ गए.
अलका और सुमन के ज़िद करने पर नए पापा और मां डांस करने उठे. उन्होंने एक-दूसरे की कमर में हाथ डाला और थिरकने लगे,
नेहा का मन कसैला हो गया और जब उससे यह दृश्य देखा नहीं गया तो वह धीरे से उठकर पास वाली नदी के किनारे एक चट्टान पर जाकर बैठ गई.
एक बार नेहा को लगा भी कि उसके इस तरह उठकर आ जाने से पता नहीं मां क्या सोचती होगी. पर अपने और मामा-मामी के बीच वो नए पापा और मां को सहन ही नहीं कर पा रही थी.

'मां नए पापा के साथ नृत्य करते हुए कैसी प्रसन्न लग रही थीं! नेहा सोच रही थी, 'काश, उन्हें एक अपना बच्चा हो जाता तो नेहा उनके बंधनों से मुक्त हो जाती.
नेहा को अपने भाग्यं पर क्रोध आ रहा था. जब वो मां के साथ जाना चाहती थी तब मां उसे नहीं ले गई और अब जब वो मां से नफ़रत करने लगी है तो मां उसे ले जाने को आ गई है.
"बेटी चलो, सब लंच पर तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं..." मां की आवाज़ पर चौंक गई नेहा. चुपचाप उठ गई.
"नेहा, तुमसे कुछ पूछना चाहती हूं." नेहा के आगे बढ़ते ही मां ने उसे रोक दिया.
"पूछिए."
"अपनी मामी को बहुत प्यार करती हो तुम."
"हां."
"और मुझे?" मां ने पूछा.
नेहा चुप रही.
"अच्छा नेहा, यह तो बताओ मुझ पर सलवार सूट अच्छा लगता है या साड़ी?"
"कुछ भी नहीं." अनायास ही नेहा के मुंह से निकल गया, उसने देखा मां की आंखें भर आई थीं. इस बार नेहा को अपने कड़े शब्दों पर दुख हुआ पर अब क्या किया जा सकता था.
"मैं बहुत बुरी हूं ना?" मां ने भरयि स्वर में पूछा. नेहा से कोई जवाब देते न बना तो वह बड़ी तेजी से आगे बढ़ गई.
"रुको नेहा." कहते हुए मां ने उतनी ही तेजी से आगे आकर नेहा की बांहों को पकड़कर उसे रोक दिया. सालों बाद मां का स्पर्श नेहा को विचलित कर गया. आंखों में आंसू भर आए जिसे मां से छुपाने का प्रयास करने लगी वो.
"नेहा, तुम शायद इसलिए मुझसे नफ़रत करती होगी, क्योंकि मैंने शादी की, पर शादी करना मेरी विवशता थी. मैं हमेशा के लिए भैया-भाभी पर बोझ नहीं बनना चाहती थी. शादी से पहले तुम्हारे पापा ने वचन दिया था कि वो मेरे साथ-साथ तुम्हें भी अपनाएंगे पर शादी होते ही उन्होंने तुम्हें साथ ले चलने से इंकार कर दिया. तुम्हें अपने साथ न रख पाने की पीड़ा ने मुझे तोड़कर रख दिया. बदले की भावना में भरकर मैंने निश्चय किया कि मैं कभी मां नहीं बनूंगी. अमेरिका में मैं गर्भ निरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती रही थी. तुम्हारे पापा को धोखा देने को मैं मजबूर हो गई थी, क्योंकि तुम्हें पाने का और कोई रास्ता नहीं था. कुछ दिनों तक तुम्हारे पापा ने मेरा इलाज भी करवाया और परेशान भी रहे, लेकिन उनकी भावनाओं की परवाह किए बिना मैं सिर्फ़ तुम्हें पाने के लिए दृढ़ संकल्प रही."
मां क्षण भर के लिए रुकीं फिर बोलीं, "यहां आई, तो तुम्हारे व्यवहार से मैं समझ गई कि तुम मुझसे नफ़रत करने लगी हो. तुम्हारा नफ़रत करना भी स्वाभाविक है, क्योंकि मैंने तुम्हें कुछ नहीं दिया. पर बेटी तुम्हें पाने के लिए मैं बहुत तड़पी हूं, बहुत..." कहते-कहते मां रो पड़ी. नेहा ने मां का हाथ थाम लिया और आगे बढ़ गई.
अब नेहा की व्याकुलता और बढ़ गई. पहले तो उसे लगा था कि वो मां से स्पष्ट कह देगी कि वो उनके साथ अमेरिका नहीं आना चाहती. पर सच्चाई जानने के बाद इंकार करना नेहा के लिए असंभव हो गया था. मां के प्रति जो मैल नेहा के हृदय में था वो तो धुल गया, लेकिन वो फिर भी ख़ुश नहीं हो पाई.
नेहा को लगता था नए पापा ज़रूर मां के ज़िद पर ही नेहा को साथ ले जाने को राजी हुए होंगे. उसे नए पापा के घर एक अजनबी की तरह जाकर रहने की बात अच्छी नहीं लगी.
सारी रात वो करवट बदलती रही. मां का त्याग उसे व्याकुल करता और नए पापा का एहसान लेने से वो कतराती. नेहा को लगा वो मां और सिर्फ़ मां के साथ ही रह सकती है, पापा के साथ कदापि नहीं.
आख़िर नेहा मां और नए पापा को अलग करने का उपाय सोचने लगी और उपाय सुझ भी गया. नेहा ने निश्चय किया कि वो पापा को बता देगी कि मां ने उन्हें धोखा दिया है. इतने बड़े धोखे की बात सुनकर पापा निश्चय ही मां को तलाक़ दे देंगे और अमेरिका भी नहीं ले जाएंगे. नेहा मां को अपने पास रख लेगी. उन्हें कोई दुख नहीं होने देगी,
मां तो मामा-मामी पर बोझ नहीं बनना चाहेगी तब वह मां को लेकर अलग रहेगी. नौकरी करेगी और एक सम्मानपूर्ण जीवन जिएगी.
सबेरे उठते ही नेहा नए पापा को मुंबई की सैर कराने को ले चली. जुहु बीच, चौपाटी, गेट वे ऑफ इंडिया, हैंगिंग गार्डन सभी जगह घूम-घूम नेहा पापा पर अपनी मीठी-मीठी बातों का जाल डालती रही. नए पापा भी नेहा से बहुत खुल गए थे.
"पापा आप भारत में ही क्यों नहीं बस जाते?"
"नहीं बेटे, भारत मुझे अच्छा तो लगता है, पर मैं यहां हमेशा के लिए नहीं रह सकता. अमेरिका में जैसी ज़िंदगी मैं जी रहा हूं शायद उसकी मुझे आदत हो चली है."
"पर पापा, क्या आपको नहीं लगता कि वहां के जीवन में एक दिखावा है और यहां के लोग निष्कपट और आदर्श है."
"ये तुम कैसे कह सकती हो?"
"मां में आए फ़र्क़ को देखकर."
"क्या फ़र्क़ आया है तुम्हारी मां में?" पापा ने हंसते हुए पूछा.
"पहले मां कितनी अच्छी लगती थीं जब उनके बाल लंबे थे. वो साड़ी पहनती थीं. पर अब बाल कटवाकर, ड्रेसेस पहनकर वो बिलकुल अजीब सी लगती हैं..."
"तुम ठीक कहती हो. पर बेटी पहनावे से किसी के गुण नहीं बदलते. तुम्हारी मां अब भी आदर्श और पूरी भारतीय नारी ही है."
"पापा... आप कितने भोले-भाले हैं और मम्मी..."कहते-कहते नेहा रो पड़ी.
"मम्मी क्या?"
"आपको धोखा देती रही हैं."
"धोखा... ये तुम क्या कह रही हो नेहा?"
"पापा वो मुझे अपने साथ रखने के लिए आपकी भावनाओं से खिलवाड़ करती रहीं. आपका कोई बच्चा न हो इसलिए गर्भ निरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती रहीं. आपको तो ऐसी बेवफ़ा महिला से तलाक़ ले लेना चाहिए." नेहा ने रोने का नाटक करते हुये अपनी बात पूरी की.
"तलाक़..." कहते हुए पापा ज़ोरों से हंस पड़े. बोले, "नहीं नेहा, ज़िंदगी के इस मोड़ पर मैं उसे अकेला नहीं छोड़ सकता, क्योंकि मैं जानता हूं जो कुछ उसने किया है उसके लिए मैं ही ज़िम्मेदार था और फिर, तुम जो मुझे आज बता रही हो वो अमेरिका में उसके इलाज के दौरान ही मैं जान गया था. डॉक्टर ने ही मुझे बताया था कि दीपा जान-बूझकर मां नहीं बन रही है."
"तो क्या आप पहले से ही जानते थे?"
"हां बेटी, जानता था."
"फिर आपने मां से कुछ पूछा नहीं?"
"नहीं, क्योंकि मैं जानता था कि अपनी चोरी पकड़े जाने से वो और भी ज़्यादा दुखी होंगी. वो बहुत भावुक हैं, शायद इस शर्मिन्दगी को आसानी से सह नहीं पाएंगी."
नेहा आश्चर्य से नए पापा की ओर देखती रही. सचमुच वो ख़ुशकिस्मत है जिसे इतने अच्छे पापा-मम्मी मिले हैं. नेहा सन्तुष्ट हो गई. अब अमेरिका जाने में उसे कोई संकोच नहीं होगा.
- निर्मला सुरेंद्रन
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