लघुकथा- पराई (Short Story- Parai)

लघुकथा- पराई (Short Story- Parai)

बुआ ने कहा, “तो आओ, सुनो वो जो बैठे हैं ना, वो देखो, गौर से… सुनो सबका नाम ले रहे हैं तुम्हारे पापा का, चाचा का, सारे चचेरे भाई-बहनों का. दो बार, तीन बार, पर मेरा एक बार भी नहीं.”
सुमि ने पूछा, “क्यों?”
तो जवाब किसी बुज़ुर्ग महिला के कंठ से निकला और पूरे कमरे में गूंजा.

बुआ को देखते ही आठ साल की सुमि उसके पास गई और लिपट गई.
बोली, “बुआ, कल रात दादी आपको ख़ूब याद करके दुनिया से चली गई.” फिर कुछ रुक कर बोली, “और हां बुआ, आप सुनो, ये पूजाघर मत छूना और वो प्याज़-लहसुन है ना वो भी मत खाना.”
सब सुनकर बुआ बोली, “सुमि, यह नियम मेरे लिए बिल्कुल भी नहीं हैं. मैं इस घर की नहीं.”


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“हैं… क्यों बुआ?” सुमि हैरत से देखने लगी.
बुआ ने कहा, “तो आओ, सुनो वो जो बैठे हैं ना, वो देखो, गौर से… सुनो सबका नाम ले रहे हैं तुम्हारे पापा का, चाचा का, सारे चचेरे भाई-बहनों का. दो बार, तीन बार, पर मेरा एक बार भी नहीं.”
सुमि ने पूछा, “क्यों?”
तो जवाब किसी बुज़ुर्ग महिला के कंठ से निकला और पूरे कमरे में गूंजा.
“बेटी तो पराई है. वो कभी अपनी नहीं होती, इसलिए यहां शोकवाले नियम उसके लिए कतई नहीं.”
सुमि ने यह सुनकर बुआ का हाथ और ज़ोर से थाम लिया. वो महज़ आठ साल की थी, पर इतनी भी छोटी नहीं थी कि अपना भविष्य न भांप सके.


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एक सेकंड में वो अपने आनेवाले बीस साल बाद का दृश्य याद करके सिहर उठी.

– पूनम पांडे

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