कहानी- प्रतिध्वनि (Short Story- ...

कहानी- प्रतिध्वनि (Short Story- Pratidhwani)

‘‘नहीं जीजी, मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है. आपने मुझे ज़रा भी समझा होगा, तो आपको पता होगा कि मैं हमेशा से ही रिश्तों से कोई अपेक्षा नहीं रखती, क्योंकि रिश्तों में अक्सर दूरियां इन्हीं अपेक्षाओं के कारण ही आती हैं. रिश्तों में अपेक्षाएं न हो, तो उसकी घनिष्ठता और सुंदरता बढ़ जाती हैं…”

कहते है हम अपने जीवन में जो भी अच्छे-बुरे कर्म करते है वह प्रतिध्वनि बन देर-सबेर वापस लौट ही आता हैं. मंजरी को भी अब इस बात का पूरा विश्वास हो गया था कि उसका जीवन उसके सासू मां के जीवन की प्रतिध्वनि बन कर रह गई है. उसके कारण, जो उसकी सासू मां भारती देवी कभी झेली थीं, वह कुछ ज़्यादा ही घातक बन कर लौटा था. फिर से उस घर में पुरातन समय दुहराई जा रही थी और वह अपनी सासू मां की तरह ही विवश-सी हो गई थी. चाह कर भी कुछ कर नहीं पा रही थी.
अब उसे अच्छी तरह से समझ में आ गया था कि वक़्त कहां बदला है? बस आदमी की जगह बदल जाती हैं. बहू अब सास बन गई थी. एक बार फिर बहू द्वारा सास के जीवन मूल्यों के छीजने की कहानी दुहराई जा रही थी. इस बार चोट मंजरी झेल रही थी. कभी जिस धन संपत्ति को उसने अपना सर्वस्व माना था, पैसों के लिए सासू मां से भी प्रपंच किए थे, आज उसकी निरर्थकता उसे शिद्दत से महसूस हो रही थी. हमेशा अपनी ग़लतियों को भी अपने छल-बल से सही साबित कर अपने आपको महान समझने का जो व्यर्थ का अहंकार मन में पाले रखी थी और जिसकी उसे आदत-सी हो गई थी. अब अपनी ही बहू नेहा के हाथों उसने ऐसी शिकस्त पाई थी कि उसका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया था और वह एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई थी, जहां से साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा था कि कभी उसने भी अपनी सासू मां को ऐसे ही इस्तेमाल किया था.
उसका अतीत उसके स्मृतिपटल पर चलचित्र की भांति घूम रहा था. अपनी सारी उम्र मंजरी ने अपनी सासू मां को अपनी स्वतंत्रता में बाधक मान उन्हें अपनी देवरानी बानी के पास पटना में ही छोड़े रही. लेकिन जब भी पटना आती, तो सब के सामने भारती जी को ही ग़लत ठहराते हुए कहती, ‘‘ अम्मा जी, को पटना छोड़ कर बाहर मन ही नही लगता है. मैं चाहती हूं कि वह मेरे पास रहे, पर उनकी इच्छा को देखते हुए मैं ज़िद नहीं करती.’’


‘‘जब भी पटना आती दो-चार मंहगी साड़ियां और कुछ खाने-पीने का समान उन्हें पकड़ा अपने कर्तव्यों का इतिश्री कर देती और बानी के सारे किए कराए पर पानी फेर देती, क्योंकि बानी भले ही अपनी सासू मां का हर तरह से ख़्याल रखती, पर उनके लिए न ही मंहगी साड़ी ख़रीद पाती, न ही मंजरी की तरह बानी में वाकपटुता थी, जिससे वह अपनी सासू मां को प्रभावित कर पाती.
नमन एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था. उसकी आय बहुत कम थी. हमेशा पैसों की खींचा-तानी लगी रहती. दोनों पति-पत्नी शांत, कम बोलने वाले पर अच्छे इंसान थे. जबकी मंजरी किसी मंजे हुए डिप्लोमैट की तरह अपनी लच्छेदार भाषा से पल भर में लोगों को प्रभावित कर लेती थी. अक्सर लोग उसकी बातों के क़ायल हो जाते थे. हर मौक़े के लिए तैयार उसके चुटकुले और शायरी लोगों को ख़ुश कर देते. उसकी मज़ेदार बातों के बीच उसकी सारी कुटीलता छुप जाती. जब रांची जाने लगती कुछ गिफ्ट रिश्तेदारों में बांट और देवरानी को अम्मा जी के देखभाल के लिए ढेरों नसीहते थमा निकल जाती.

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ज़्यादा दिनों तक साथ रहने से अक्सर अधिकांश रिश्तों के बीच थोड़ी-सी कटुता आ ही जाती है. यही कारण था कि भारती देवी, बानी को चिढ़ाने के लिए मंजरी का उदाहरण उसके सामने रखते रहतीं. हालांकि भारती देवी, नमन की अच्छाइयों से अनजान नहीं थीं. अपने काफ़ी कठिनाई से कमाए पैसों का अधिकांश भाग वह भारती देवी पर ही ख़र्च करता था, जिसका एहसास भारती देवी को था, पर उससे ज़्यादा उन्हें अपने बड़े बेटा नवीन के उच्च पद और संपन्नता पर गर्व था.
भारती देवी का यह गर्व तब भूमिसात हो गया, जब वह एक बार रांची गईं. वह यह सोचकर गई थीं कि मंजरी बहू बार-बार बुलाती है, वहां जाएगी, तो वह उन्हें देखकर बहुत ख़ुश होगी. पर वहां जाकर उनका यह भ्रम भी टूट गया. जो मंजरी पटना आने पर उनके हर बात का ख़्याल रखने के लिए सबको हिदायत देती रहती थी, उनकी वही मंजरी बहू रांची में उनके लिए अजनबी-सी हो गई थी. सुबह उठने पर नौकर चाय दे दिया तो ठीक, वरना उन्हें ख़ुद ही बनाना पड़ता. बहू तो जिम चली जाती. वह अपने सारे काम ख़ुद करती रहतीं, पर मंजरी किसी को भी उनका ख़्याल रखने के लिए नहीं कहती, न ख़ुद ही उनके कामों में मदद करती. हमेशा उन्हें अनदेखा कर कभी मोबाइल पर व्यस्त रहती, तो कभी बालकनी में खड़ी पड़ोसन से गप्पे लड़ाते रहती, जिससे भारती देवी को काफ़ी अकेलापन महसूस होता.
मंजरी का पूरा घर बड़े ही करीने से सजा हुआ था. ग़लती से भी किसी क़ीमती सजावटी समान को हाथ लग जाता, तो वह घबरा जातीं. बहू बोलती कुछ नहीं थी, पर अपनी आंखों और हावभाव से नाराज़गी जता उन्हें सहमा देती. वहां उन्हें कुछ भी अपना नहीं लगता. जब नवीन ऑफिस से आता, तो ज़रूर कहता, ‘‘अम्मा, आप ठीक तो हैं. मन लग रहा है न. किसी चीज़ की ज़रूरत हो, तो बता दीजिएगा.’’
फिर भी महीना भर रहने गई भारती जी सिर्फ़ 10 दिनों में ही उसी बानी के पास आने के लिए छटपटा उठी थीं, जिसे वे अक्सर मंजरी का उदाहरण देती रहती थीं. अब अपनी उसी आर्दश बहू मंजरी के पास आकर उनका यह हाल था कि सोफे के कोने में दिनभर डरी-सहमी बैठी रहती थीं. किसी तरह पंद्रह दिनों का काला पानी काट कर पटना लौट आईं, तो दुबारा वहां कभी जाने का नाम नहीं ली और न ही कभी मंजरी का उदाहरण बानी को दी.
एक दिन अचानक भारती देवी की तबीयत बहुत ज़्यादा ख़राब हो गई, जिससे बहुत ज़्यादा पैसों की ज़रूरत आन पड़ी. इतने अधिक पैसों का इंतज़ाम करना नमन के बस में नहीं था. तब भारती देवी मन मार कर नीवन को पैसों के लिए फोन करवाई, तो पता चला वह विदेश गया हुआ था. मंजरी पैसा भेजने के बदले फोन पर तरह-तरह के बहाने बनाती रही और उनके बीमारी के विषय में नवीन को सूचित करना भी ज़रूरी नहीं समझी.
नमन ने कर्ज़ लेकर और पत्नी के गहने बेच कर जितना हो सका, मां का इलाज करवाया, पर मां को बचा नहीं पाया. भारती जी के मरते ही मंजरी ने पति को उनके मृत्यु की सूचना दी और सपिरवार प्लेन से पटना आ गई बड़े बेटा-बहू का फर्ज़ निभाने. आते ही लोगों के सामने रो-रो कर अंतिम समय में सासू मां की सेवा नहीं कर पाने का दुख जताती रही. नवीन के विदेश में होने का हवाला दे बड़ी कुशलता से लोगों को समझा दी कि वे लोग क्यों नहीं आ पाए. तेरहवीं तक सभी कामों में सहयोग करती रही. तेरहवीं के बाद पटना से जाने के पहले भारती जी के बक्से खुलवा कर बचे-खुचे गहनों में से अपना आधा हिस्सा, सासू मां की अंतिम निशानी रखने के लिए साथ लेे गई. जाते-जाते मकान के आधे हिस्से में ताला लगाना भी नहीं भूली.
प्रत्येक स्त्री चाहे वह पढ़ी-लिखी हो या अनपढ़ उसकी दुर्बलता का केन्द्र उसकी संतान ही होती है. भले ही वह अपनी सासू मां के मन को नहीं समझ सकी और उनके साथ धूर्ततापूर्ण व्यवहार करती रही, फिर भी हमेशा आशावान रही कि उसके बच्चे उसकी भावनाओं को समझेंगे और श्रवण पुत्र की तरह उसका ख़्याल रखेंगे. देखते-देखते उसके दोनों बेटे अनुज और अंकित बड़े हो गए. अनुज बैंक में अधिकारी बना और अंकित सिविल सर्विसेज में सेलेक्ट होकर आई.टी.ओ बन गया.
एक अच्छी लड़की देख अनुज की शादी कर दी. अनुज की पत्नी भूमिका सीधी-सादी घरेलू लड़की थी, जो अपनी सास का हर बात मानती थी और उनका पूरा ख़्याल रखती थी, पर मंजरी का कुटील दिमाग़ बहू को हर समय बेटा से अलग करने में लगा रहता. इसलिए बहू के साथ भी अपना छल विद्या शुरू कर दी. वह बेटा के सामने मीठी बनी रहती और बहू का जीना हराम किए रहती. उन्हीं दिनों अचानक हार्ट अटैक से नीवन जी की मृत्यु हो गई. पति के इस तरह अचानक खो देने से कुछ दिनों तक मंजरी सदमे की हालत में रही. फिर धीरे-धीरे वह सामान्य हुईं, तो रिश्तेदारों और पड़ेासियों की सहानुभूति पाने के लिए छोटी-छोटी बातों में बहू को अपराधी बनाने लगी और बात-बात पर वृद्धाआश्रम जाने की धमकी देने लगी. बेटा तो मां के नस-नस से परिचित था ही वह अपना ट्रांसफर रांची से दूर मुंबई में करवा लिया और मंजरी देवी को अंकित के पास कानपुर, यह कहकर भेज दिया कि अंकित अकेले है उसे अभी आपकी ज़रूरत है.
कानपुर में अंकित के घर उसकी प्राइवेट सेक्रेटरी रमा आती-जाती थी. बातूनी और हंसमुख रमा, मंजरी को अच्छी लगती थी. फिर भी उसने सपने में भी रमा को अपनी बहू बनाने की कल्पना नहीं की थी, पर एक दिन जब अचानक अंकित कोर्ट में शादी कर रमा को घर ले आया, मंजरी पर जैसे वज्रपात हो गया. यह सब उसके नाक के नीचे हुआ और उसे भनक तक नहीं लगी.

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इतिहास की पुनरावृति तो होनी ही थी, जिसके लिए परिस्थिति का निर्माण हो रहा था. कभी वह भी नीवन जी के पड़ोस में रहती थी और अपनी सासू मां को मूर्ख बना उनकी बहू बन कर आ गई थी. रमा के बहू बन कर आने से मंजरी का दिल चाहे कितना भी आहत क्यों न हुआ हो, पर वह अपना दर्द किसी के सामने बयां नहीं की. दिल के चोट को दिल में दबा एक अच्छी सास बनने का ढोंग कर रमा को अपनी बहू नहीं बेटी कहने लगी, पर इस बेटी पर उसका कोई जादू नहीं चल सका. रमा भी सास की तरह ही ज़ुबान की मीठी थी, पर दिल में कपट भरा था. ऊपर से भले ही मां कहती, पर मन ही मन सासू मां को अपना प्रतिद्वंदी मानती थी. मौका मिलते ही सासू मां को नीचा दिखाने का एक भी मौक़ा नहीं चूकती. जब-तब अपनी मीठी छुरी चला देती. कभी-कभी तो मंजरी की बातों में उसे ही लपेट कर ऐसा पटखनी देती की मंजरी हक्की-बक्की रह जाती. ज़िंदगीभर दांव-पेंच लड़ाने वाली मंजरी के सारे दांव बहू के समाने बेकार हो गए थे. उसके सारे हथियार कुंद पड़ गए थे. फिर भी रमा अपनी सासू मां की लाड़ली बनने का नाटक कर उससे कभी चाय बनवाती, तो कभी सब्ज़ी.
जब कभी बाहर घूमने-फिरने जाने की बात होती तो, रमा को कभी उनके घुटने के दर्द की चिंता होती, तो कभी उनके बेहद कमज़ोर होने की चिंता और उन्हें घर पर ही आराम करने के लिए छोड़ देती. मन मार कर मंजरी को घर पर ही रहना पड़ता. धीरे-धीरे सास-बहू के बीच चलने वाले सांप-नेवले के खेल से वह पूरी तरह थक गई थीं, पर अब वह कहां जाती? रांची का घर दोनों बेटाओं ने उससे सलाह कर पहले ही बेच दिया था, तब उसे कहां अंदाज़ा था कि वह बहू के सामने इतनी कमज़ोर पड़ जाएंगी. जब वह अनुज के पास जाना चाहती, तो उसके गोरखधंधे से पहले से ही परेशान अनुज तरह-तरह के बहाने बना मां को अंकित के पास ही रहने को बाध्य कर देता था. अंकित आंख मूंद कर अपने पापा की तरह अपनी पत्नी के बातों पर ही भरोसा करता था. वह काम में भी इतना उलझा रहता कि पत्नी के पैंतरेबाज़ी समझने का उसके पास समय ही नहीं था.
तभी उनके देवर नमन का पटना से फोन आया कि उसकी सबसे छोटी बेटी पूजा की शादी थी, जिसमें वह चाहता था मंजरी एक महीना पहले से ही पटना आ जाए. घर के माहौल से परेशान मंजरी तुरंत पटना जाने के लिए तैयार हो गईं.
बहुत दिनों बाद पटना आकर मंजरी को बहुत शांति और राहत महसूस हो रहा था. बानी ने भी अपनी जेठानी का स्वागत बहुत ही प्रेम और अपनेपन से किया. उसके रहने का इंतज़ाम अपने सासू मां के कमरे में करवा, मंजरी से बोली, ‘‘जीजी, यह कमरा इस घर के मालकिन का कमरा है. आप इस घर की सबसे बड़ी हैं, इसलिए मैंने यह कमरा आपके लिए ठीक करवाया है. आप इस कमरे में रहेंगी, तो इस घर पर बड़ों की क्षत्रछाया बनी रहेगी.’’
‘‘सिर्फ़ शादी तक ही नहीं, उसके बाद भी अगर मैं हमेशा के लिए इस कमरे में यही रह जाना चाहूं, तब तुम क्या कहोगी?’’
जेठानी के व्यंग्यात्मक लहज़े को नज़रअंदाज़ कर बानी बोली, ’’मुझे तो बहुत ख़ुशी होगी कि आप हम लोगों को अपने साथ रहने लायक समझती हैं.’’


‘‘मेरे इतने सारे स्वार्थपूर्ण फ़ैसलो और छलपूर्ण नीतियों के बाद भी क्या तुम यह बात दिल से कह रही हो? मुझे तो विश्वास नहीं होता. मेरे साथ रहने से तुम्हें आख़िर क्या फ़ायदा होगा? क्या तुम्हें नहीं लगता कि मुझसे दूर रहने में ही तुम सबों की भलाई है?‘‘ बोलते-बोलते मंजरी की आंखें भर आई थीं.
‘‘नहीं जीजी, मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है. आपने मुझे ज़रा भी समझा होगा, तो आपको पता होगा कि मैं हमेशा से ही रिश्तों से कोई अपेक्षा नहीं रखती, क्योंकि रिश्तों में अक्सर दूरियां इन्हीं अपेक्षाओं के कारण ही आती हैं. रिश्तों में अपेक्षाएं न हो, तो उसकी घनिष्ठता और सुंदरता बढ़ जाती हैं.
‘जहां तक फ़ायदे की बात है, तो रिश्ता एक-दूसरे का ख़्याल रखने के लिए होता है, न कि फ़ायदा उठाने के लिए. हम सभी जानते हैं जीजी कि हम एक-दूसरे के बिना अस्तित्वविहीन है, इसलिए मुझे, मेरे जितने भी रिश्ते है सब को संभालने और निभाने हैं. उन्हें जीवनभर सहेजकर रखने हैं.”
‘‘क़रीब-क़रीब हम सभी के बच्चें परिस्थितिवश दूर-दूर जा बसे हैं, तो हमें ही एक-दूसरे का साथ देना होगा. एक-दूसरे का ख़्याल रखना होगा, इसलिए सब बिसार कर एक नई शुरूआत करनी ही होगी.’’
मंजरी की आंखों में आंसू देख बानी उठकर अपने आंचल से उसकी आंखों के आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘लगता है आपके किसी अपने ने गहरी चोट दी है, पर चिंता की कोई बात नहीं, मलहम भी आपका अपना ही कोई लगाएगा.’’
‘‘हां बानी, आदमी भले ही सारा जग जीत ले, पर हमेशा हारता है अपने संतान के हाथों ही. अपने ही संतान की चोट ने मुझे मेरी ग़लतियों का एहसास करा दिया है. अब मैंने तुम्हारी बातें सुनकर फ़ैसला लिया है कि मैं तुम लोगों के साथ ही रहूंगी. किसी का फ़ायदा उठाने के लिए नहीं, बल्कि अपने जीवन का अंतिम पड़ाव शांति और सुकून से बिताने के लिए.
निंरतर छल-प्रपंच का जीवन जीते-जीते मेरा अतंस् खोखला हो गया है. मैंने सारी उम्र सिर्फ़ लोगों का इस्तेमाल करना ही सीखा है, पर अब जब मैं जीवन के अंतिम पड़ाव पर हूं, तब मुझे लगता है कि धन-संपत्ति को सहेजने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है अपने रिश्ते-नातों को सहेजना, दूसरों के लिए कुछ अच्छा करना, इसलिए मैंने फ़ैसला किया है कि अपनी बाकी के जीवन और धन ज़रूरतमंदों की मदद करने में लगा दूंगी. बच्चे अपने जीवन में जहां रहें, सुखी रहें, ख़ुश रहें और हम अपने जीवन में. अब आगे इस काम में तुम मेरी मदद करोगी. ये लो चाभियां और उन सभी कमरों के ताले खोल दो, जिन्हें कभी मैंने बंद किया था, ताकि कमरों का सही उपयोग हो सके.
’’जो हुकूम मेरी जेठानीजी.’’ हाथ बढ़ाकर चाभी संभालते हुए बानी हंस पड़ी.

रीता कुमारी
रीता कुमारी

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