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कहानी- सच्चा समपर्ण (Short Story- Sachcha Samarparn)

वैसे भी अरेंज मैरिज में होता भी तो यही है, दो अजनबियों को मां-बाप एक ही छत के नीचे ताउम्र रहने को बांध देते हैं. एक घर, एक ही छत शेयर करने तक तो ठीक है, फिर तुरंत ही एक ही बिस्तर शेयर करना... और फिर तुरंत ही बच्चा...? Hindi Short Story हद हो गई...! कल तक जो लोग शर्मोहया को लड़की का गहना... और न जाने क्या-क्या कहते थे, वो ही आज लड़की को बेशरमी का पाठ पढ़ा रहे हैं! क्या है इस दोगलेपन की वजह? क्यों पैदा होते ही लड़की को मार नहीं देते थे लोग...? मेरे ये आक्रोश भरे शब्द क़लम से नहीं भीतर कहीं हृदय से निकल रहे हैं, जहां ज्वालामुखी सुलग रहा है. उसी का लावा शब्द बनकर फूट रहा है. अभी हाथों की मेहंदी को छूटे महीनाभर ही हुआ था कि ख़ुशख़बरी की फ़रमाइशें होने लगीं, “भाभी, हमारे घर नन्हा-मुन्ना कब आएगा?” “अब देर नहीं, भले ही दूसरा बच्चा पांच साल बाद कर लेना.” मांजी उम्मीद भरी आवाज़ में कहतीं. मैं सकुचा कर पैर के अंगूठे से ज़मीन कुरेदती रह जाती. इतनी जल्दी...? अभी तो साहिल को ठीक तरह से जान भी नहीं पाई हूं मैं. वैसे भी अरेंज मैरिज में होता भी तो यही है, दो अजनबियों को मां-बाप एक ही छत के नीचे ताउम्र रहने को बांध देते हैं. एक घर, एक ही छत शेयर करने तक तो ठीक है, फिर तुरंत ही एक ही बिस्तर शेयर करना... और फिर तुरंत ही बच्चा...? मेरी कड़वाहट का एहसास घर भर में स़िर्फ साहिल को है. सगाई और शादी के बीच मात्र पन्द्रह दिनों का अन्तराल, उसमें स़िर्फ दो बार फ़ोन पर हुई औपचारिक बातचीत क्या किसी को इतना क़रीब ला सकते हैं? इतना क़रीब, जहां से सृजन की कल्पना की जा सके? यूं भी मैं विवाह पूर्व इसी रिश्ते से भयभीत रहती थी, क्योंकि बेहद संकोची स्वभाव, किसी के इस तरह अंतरंग होने की कल्पना भर से ही सिहर उठता था, किंतु मेरी क़िस्मत अच्छी निकली. विवाह की पहली रात ही अपनी समझदारी का परिचय देते हुए कहा था साहिल ने, “मैं तुम्हारे डर से वाकिफ़ हूं. पहले तुमसे दोस्ती करना चाहता हूं, क्योंकि मैं जानता हूं तुम बचपन से ही लड़कों से दूर रही हो, इसलिए सामाजिक मान्यताओं पर मत जाना. मेरी ओर से तुम पर कभी कोई प्रतिबंध नहीं होगा. तुमसे गहरा भावनात्मक संबंध कायम करना चाहता हूं. जब ख़ुद को तुम्हारे भरोसे के क़ाबिल महसूस करने लगूंगा, तभी तुम्हें हाथ लगाऊंगा. अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके एक हृदयविहीन तन को जीतना न प्रेम होता है, न ही पौरुष! तुम्हें जितना व़क़्त लगे मैं प्रतीक्षा करने को तैयार हूं, मगर प्लीज़, कभी भी बेमन से या डर से समर्पण मत करना आभा. मैं तुम्हारे सच्चे प्रेम का इच्छुक हूं. मन की दहलीज़ पार किए बिना मैं कोई दूसरा रिश्ता कायम नहीं करना चाहता.” यह भी पढ़ेशादी से पहले ज़रूरी है इन 17 बातों पर सहमति (17 Things Every Couple Must Talk About Before Getting Marriage) मैं आश्‍चर्यचकित हो गई. भाभी, दीदी और सहेलियों ने जो पति के बारे में समझाया था, उससे सर्वथा अलग और मेरे मन के व्यक्ति से मेल खाता पति पाकर मैं धन्य हो गई. और फिर दो ही दिन बाद मैं मायके आ गई. यहां भी ससुराल से संबंधित प्रश्‍नों में पहला प्रश्‍न यही होता, “पति कैसे हैं?” मैं आशय समझकर जान-बूझकर रहस्यमयी मुस्कान फेंक देती. जानती थी कि ये फलसफ़ा किसी के गले नहीं उतरेगा कि हृदयविहीन तन के नहीं, हृदययुक्त, बल्कि प्रेमयुक्त समपर्ण के इच्छुक हैं पतिदेव. दो-चार दिन बीते ही थे कि पापा के मुंह से निकल पड़ा, “अब तो मुझे भी नानाजी पुकारनेवाला कोई जल्दी ही आए भगवान!” मैं सोचती रह जाती, लड़की को कुंवारेपन में सात तालों में बंद रखने वाले माता-पिता शादी होते ही ये कैसी मानसिकता ओढ़ लेते हैं. जहां पहले किसी लड़के से बात तक करना नागवार गुज़रता था, वहीं अब किसी लड़के के साथ इतनी घनिष्ठता की कामना करना... स़िर्फ इसलिए कि उस लड़के ने सात फेरे लिए हैं उस लड़की से? क्या सात फेरे ही किसी शर्मीली लड़की की शर्मोहया के सातों द्वार खोलने के लिए काफ़ी होते हैं?... और किसी अनजान ‘पति’ नामक व्यक्ति को अपनाने की शक्ति प्रदान करते हैं? मैं जब-तब अपनी भड़ास डायरी में निकालती रहती. चाहे पूरी दुनिया मुझे अजीब समझे, मगर साहिल की नज़रों में मैं सही थी और वह मुझे तथा मेरी भावनाओं को पूरा सम्मान देते थे. मुझे मेरे खोल से बाहर निकालने के लिए साहिल बहुत प्रयास कर रहे थे. धीरे-धीरे मुझे बहुत अच्छा महसूस होने लगा. उनके सानिध्य में ख़ुद को निश्‍चिंत और सुरक्षित महसूस करती थी. उनमें मेरे प्रति किसी प्रकार के उतावलेपन को न पाकर मैं इतनी प्रसन्न हो जाती कि बरबस लिख बैठती. ‘अभी भी दुनिया में ऐसे लोग बाकी हैं, जो रिश्तों को ढोते या निभाते नहीं, बल्कि जीते हैं, अपनी शर्तों पर और अपने तरी़के से...’ मैं अब साहिल के साथ बहुत ख़ुश रहने लगी थी. अभी मैं वहां रमने ही लगी थी कि मां का मनुहार भरा आमंत्रण आ गया. “तीन महीने हो चुके हैं विवाह हुए. एक बार आकर मिल जा बेटी, तुझे देखे बिना मन बेचैन हो रहा है.” मां के आग्रह और प्रेम ने मेरे मन में भी जाने की इच्छा पैदा कर दी, मगर साहिल का उदास चेहरा भी बार-बार घूम रहा था आंखों के आगे. अब भावनात्मक लगाव की नींव पड़ चुकी थी दोनों के हृदय धरा पर. उससे दूर जाने का मन नहीं हो रहा था और मेरे जाने के नाम पर उसकी उदास आंखें जैसे कह रही हों, कैसे गुज़रेगा तुम्हें देखे बिना एक ह़फ़्ता....?  शारीरिक प्रेम से पहले जिस प्रेम की कामना मैंने सच्चे हृदय से की थी, वो हमारे बीच कायम हो चुका था और मन के तारों का जुड़ाव मैं साफ़ महसूस कर रही थी. ‘तो यूं कोई अच्छा लगते-लगते इस क़दर भा जाता है कि उससे बेइंतहा प्यार हो जाता है और उसका साथ अनिवार्य लगने लगता है...' अब मेरी डायरी में इन सब बातों का समावेश होने लगा. ख़ैर, ह़फ़्ताभर की इज़ाज़त ले मां से मिलने आ पहुंची. शाम को चाय और पकौड़ों के बीच मां पूछ बैठी, “बेटा तीन महीने हो गए विवाह को, कोई नई ख़बर.....?” मेरा मन ज़रा खिन्न हो गया. “क्यों मां, शादी होते ही यही पहली उम्मीद लगाकर बैठना उचित है? क्या ये सब नहीं पूछोगी... हम दोनों कैसे हैं? आपस में मेल- जोल कैसा है? वगैरह-वगैरह..?” इस पर मां हंस पड़ी, “तुझे देखते ही समझ में आ गया कि तू सुखी है वहां पर, फिर और क्या पूछूं और शादी-ब्याह का मतलब ही क्या है, वंशबेल आगे बढ़ाने के लिए ही तो माता-पिता बेटे का विवाह करते हैं, ये अरमान तेरे सास-ससुर के मन में भी तो होगा. वैसे तेरे मन में क्या चल रहा है? अगर फैमिली प्लानिंग का भूत हो तो एक के बाद ही अपनाना वो सब चोंचले.” यह भी पढ़ेलघु उद्योग- चॉकलेट मेकिंग- छोटा इन्वेस्टमेंट बड़ा फायदा (Small Scale Industry- Chocolate Making- Small Investment Big Returns) मां के इस वाक्य पर मैं चिढ़ गई, “बस करो मां... अभी हमने कुछ भी प्लान नहीं किया है. अभी तो हमारे रिश्ते की शुरुआत है...” कहते-कहते मैं रुक गई तो मां की सशंकित नज़रों को भांप कर भाभी मुझे ठेलते हुए कमरे में ले गई और कोने में ले जाकर पूछा, “सच बताना दीदी, अभी तक?” मेरे इन्कार में सिर हिलाने पर वो लगभग बदहवास होकर कहने लगी, “क्या? मगर क्यों, क्या ये शादी उनकी मर्ज़ी से नहीं हुई? क्या आप उन्हें पसंद नहीं?” मैं अवाक रह गई, “ये सब आप क्या समझ रही हैं भाभी... हम दोनों एक-दूसरे से बिल्कुल अजनबी थे. क्या क़रीब आने के लिए थोड़ा व़क़्त नहीं लेना चाहिए.” “थोड़ा व़क़्त, तीन महीने थोड़ा व़क़्त होता है दीदी?” ओह, इसका मतलब भाभी भी इसी मानसिकता की हैं, सोचते-सोचते मैं कह उठी. “ये मुझ अकेले का नहीं, साहिल का भी निर्णय है.” फिर मेरे शर्मीलेपन को देखते हुए साहिल ने पहली बार मुझसे जो कुछ कहा उसे अक्षरश: दोहरा दिया. पर इस बात से तो जैसे वहां कोहराम ही मच गया. मेरे शर्मीलेपन को कोसते-कोसते बात साहिल के पुरुष न होने तक पहुंच गई. मां कह रही थी, “अजीब लड़का है, अरे इसने कहा और उसने मान लिया.” “अरे कमी है उसमें तभी तो मान गया, वरना ऐसा हो सकता है क्या कभी? पुरुष होकर उसकी इस कायरता के पीछे जाने कौन-सी सच्चाई छिपी है...” ये दीदी के शब्द थे, “कहीं और किसी से तो उसके संबंध...?” मैं हतप्रभ-हैरान मुंह फाड़े कभी इसकी, तो कभी उसकी बातें सुनती जा रही थी. साहिल की शराफ़त को उसकी कायरता, बीमारी चरित्रहीनता-जाने क्या-क्या कहा जा रहा था और मैं अंदर-ही-अंदर उबल रही थी. तभी दीदी ने एक और विस्फोट किया, “तुमने कभी पहल करने की कोशिश नहीं की आभा?” तो मेरे सब्र का बांध टूट गया और मैं चीख पड़ी, “बंद करो आप सब लोग ये बकवास... क्या दोहरी मानसिकता है, शादी से पहले जिस लड़की को सदैव लड़कों से दूर रहना सिखाया जाता है, उसी लड़की को शादी होते ही कौन-से बेशरमी के पंख लग जाते हैं कि उसे ऐसा करना चाहिए?” मैं बुरी तरह थक गई थी. उस बहस को मैंने दो वाक्यों में समाप्त किया. “ये हमारा नितान्त निजी मामला है और इसमें बोलने का हक़ मैं किसी को नहीं देती.” मेरे तीखे तेवर और शब्दों को सुनकर सभी चुप हो गए. मेरे जीवन की ये सबसे कड़वी याद है, जिसे मैं ज़ेहन से जितना निकालना चाहती हूं, उतनी ही ये मेरे मस्तिष्क में चिपक-सी जाती है. आज विवाह के पच्चीस साल बाद डायरी में मैंने इस बात का ज़िक्र किया है, क्योंकि आज यही सवाल मेरी बेटी मुझसे कर रही है. “ममा, नीलेश और मैं एक-दूसरे से बिलकुल अन्जान हैं, मगर मैं जानती हूं कि आपने उसे मेरे लिए चुना है, तो ज़रूर कुछ सोचकर ही चुना होगा. मुझे आपके निर्णय पर कोई ऐतराज़ नहीं, मगर मुझे शादी से थोड़ा-सा डर लगता है.” कहते-कहते उसकी पलकें झुक गईं. मैं समझ गई कि मेरी बेटी भी वहीं पर खड़ी है, जहां पच्चीस साल पहले मैं खड़ी थी. पढ़ाई-लिखाई में अव्वल रहनेवाली मेरी बेटी प्यार-मुहब्बत और लड़कों से सदा दूरी रखनेवाली मेरी ही तरह संकोची है. लेकिन नीलेश भी कम समझदार नहीं, उसकी समझदारी की वजह से ही मैंने और साहिल ने उसे अपनी बेटी के लिए पसंद किया है. उसके डर को भांपकर ही मैंने ये डायरी जान-बूझकर उसके कमरे में छोड़ी है, जो उसके डर से बाहर निकालने में उसकी मदद कर सके. और एक बार साहिल को भी खुलकर नीलेश से बात करनी होगी. बाकी कोई कुछ भी कहे... मेरी बेटी को भी सच्चे प्यार का सुख मिले, थोथी और खोखली मान्यताओं का बोझ नहीं... ये सब सोचते हुए मैं उसके कमरे से बाहर निकल आई.

- वर्षा सोनी

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