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कहानी- समय की क़ीमत (Short Story- Samay Ki Keemat)

"... हम सबको अपने-अपने समय की परवाह है, मैं ऑफिस देर से नहीं जाना चाहती, आप ठाकुर जी की पूजा में देर करना नहीं चाहतीं. पापा जी को भी बिल्कुल वक़्त पर चाय-नाश्ता चाहिए होता है. तो फिर इन सुधा जैसे लोगों के वक़्त की क़ीमत क्यों नहीं हमें? क्या इनका घर नहीं, परिवार नहीं, इनके समय की कोई क़ीमत नहीं?''

सुधा आज जल्दी-जल्दी हाथ चलाकर हमारे घर का काम ख़त्म करके सोसाइटी के अन्य घरों में काम करने को जाने लगी तो मांजी ने उसे टोकते हुए कहा, ''सुधा! आज तुम घर के सारे पंखे साफ़ करके ही जाओगी, रोज़-रोज़ ज़ल्दबाज़ी में काम ख़त्म करके चली जाती हो.''

तभी संकोच भरे शब्दों में वह बोली, ''मांजी, झाड़ू-पोंछे के बाद पंखा साफ़ करुंगी तो घर फिर से गंदा हो जाएगा, कल ध्यान से आते ही पहले नम्बर सारे पंखे साफ़ कर दूंगी.''

''बहाने बनाना तो कोई तुम कामवालियों से सीखे. ख़ैर! जाने से पहले बगीचे में पेड़ों को पानी ही दे आओ या उसमें भी कोई बहाना है.''

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उनकी बात पर मौन रहकर सुधा बगीचे की ओर चल दी. मैं ऑफिस के लिए अपना लंच पैक करती हुई सब देख-सुन रही थी. पापा!जी ने कुछ ही देर पहले पेड़ों में पानी डाला था इसलिए अभी पेड़-पौधों को पानी की आवश्यकता नहीं थी. पंखों में भी अभी इतनी धूल जमा नहीं हुई थी. फिर भी मांजी न जाने क्यों? सुधा को रोके रहना चाहती थीं. मैं उनका यह व्यवहार देखकर उनसे बोली, ''मांजी, सुधा को जाने दीजिए दूसरे घरों के लोग भी उसका इंतज़ार कर रहे होंगें.''

"तो मैं कौन सा उसे सारे दिन के लिए पकड़कर रख रही हूं. बहू, तुम नहीं जानती इन कामवालियों को, इनसे समय-समय पर अतिरिक्त काम लेते रहना चाहिए, वरना ये काम चोरी करने लगती हैं.''

मुझे उनकी इस सोच पर दुख हुआ. सुधा बड़े सरल और मेहनती स्वभाव की थी. कोरोना में बेचारी का अच्छा-खासा कामकाजी पति गुज़र गया था इसलिए वह घर-घर काम कर रही थी वरना दूसरे घरों का झाड़ू-पोंछा,बर्तन वग़ैरह कोई आनन्द से तो नहीं करता. 

सुधा के प्रति मांजी के यह कड़वे बोल सुनकर मुझसे रहा ना गया तो मैं उनसे बोली, ''मांजी, माना की कुछ कामवालियां ऐसी होती होंगीं पर सुधा ऐसी बिल्कुल नहीं है. वह तो आगे से बढ़कर काम क़रती है. उसकी मदद की वजह से ही मैं अपनी नौकरी पर समय से जा पाती हूं, उसके लिए कामचोर जैसे शब्दों का प्रयोग करना ठीक नहीं है.''

''बहू तुम ज़्यादा उसकी पैरवी मत करो, सोसाइटी के जिन-जिन घरों में वह जाती है सब उससे ऐसे ही काम कराते हैं.''

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''मांजी, कामवालियों के प्रति इस सोसाइटी का रवैया मुझे पता है, पर सुधा के प्रति उनका यह व्यवहार ग़लत है. आपको पता है कल सुधा को मिथिला आंटी के यहां काम पर जाने में दो मिनट की देरी क्या हुई, वे तो उस पर बरस ही पड़ीं, जबकि उन्हें पता था कि इन दिनों सुधा की बेटी की तबियत ख़राब है, फिर भी सब उससे जल्दी आने और देर से जाने की अपेक्षा रखते हैं.

हम सबको अपने-अपने समय की परवाह है, मैं ऑफिस देर से नहीं जाना चाहती, आप ठाकुर जी की पूजा में देर करना नहीं चाहतीं. पापा जी को भी बिल्कुल वक़्त पर चाय-नाश्ता चाहिए होता है. तो फिर इन सुधा जैसे लोगों के वक़्त की क़ीमत क्यों नहीं हमें? क्या इनका घर नहीं, परिवार नहीं, इनके समय की कोई क़ीमत नहीं?''

कहते हुए मैं जल्दी-जल्दी नाश्ता कर ही रही थी कि तभी मेरा फोन बज पड़ा लाउडस्पीकर पर फोन रखकर मैंने, ''हेलो सर, बस निकल ही रही हूं. सॉरी सर ज़रा सी देर हो गई आज.'' कहा तो वहां से नाराज़गी भरे स्वर में बॉस बोले, ''ऐसे रोज़ देर करना हो तो ऑफिस छोड़कर घर पर बैठो.'' उनका फोन रखते ही मैं ज़ल्दबाज़ी में उठकर चल दी.

मेरी बात सुनकर मांजी बगीचे की ओर जाकर सुधा से बोलीं, ''सुधा, अब तुम जाओ, तुम्हें भी देर हो रही होगी."

मैं जाते हुए उन्हें देखकर मुस्कुराई वे शायद समझ गई थीं कि काम छोटा हो या बड़ा सबकी अपने-अपने समय की क़ीमत होती है.

 

पूर्ति खरे

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