"मां, बच्चों को रिश्तों की मर्यादा समझनी चाहिए, मैं भी यही समझाती हूं, लेकिन आजकल बच्चों को संबोधन के लिए टोकना..."
"बिल्कुल टोकना चाहिए. रिश्ते ऐसे ही निभाए जाते हैं... अब तुम मां-बेटी ना मानो मेरी बात..."
"मुझे समझ नहीं आती ये दोस्ती-वोस्ती... अरे! तुमसे बड़ा है, भइया बोलो."
बहुत दिनों से मां के मन में दबी बात निकल ही आई.
"क्या नानी! अब ऐसे तो बिल्डिंग में रहने वाले हर लड़के-लड़की को भइया-दीदी बोलूं... सुमित बस दोस्त है, दूसरे दोस्तों-सहेलियों की तरह."
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"सिम्मी, नहाकर आओ पहले, पानी जाने वाला है." बेटी को बहाने से भेजकर मैं मां के पास खिसक आई.
"मां, बच्चों को रिश्तों की मर्यादा समझनी चाहिए, मैं भी यही समझाती हूं, लेकिन आजकल बच्चों को संबोधन के लिए टोकना..."
"बिल्कुल टोकना चाहिए. रिश्ते ऐसे ही निभाए जाते हैं... अब तुम मां-बेटी ना मानो मेरी बात..." मां उठकर जाने लगीं.
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"मां!.. रुबी आंटी का बेटा भी तो मुझे दीदी कहता था! उस दिन जब आप बाज़ार गईं थीं, घर में मैं अकेली थी, उसने मेरे साथ जो... वो आप भूल कैसे गईं?"
- लकी राजीव

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