"आप सोच रही होंगी, कैसा वहशी हूं मैं. एक जानवर, लेकिन यही मेरा सच है. नंदी की ज़िंदगी रेल की पटरियों पर चलने वाली गाड़ी जैसी है. ज़रा सी चूक हुई नहीं कि सब कुछ ख़त्म हो सकता है. वहां कोई क्षमा नहीं. कोई दया नहीं. ये सब जानकर वह कभी नहीं मानेगी कि मैं प्यार उससे ही करता हूं. हृदय पर मेरे वही विराजती है. श्यामा तो मेरे लिए केवल मात्र एक भूख थी. भूखे को जो भी मिले, स्वादिष्ट ही लगता है. यही है एक पुरुष का सच."
अरावली पर्वत श्रृंखला के हरिताभ शिखरों एवं सर्पिल उपत्यकाओं के मध्य बसे उस छोटे से रमणीक स्थल पर रहने वाला प्रत्येक आदमजात उसको अवश्य जानता था. मुझे भी वहां पहुंच कर सर्वप्रथम जिन चीज़ों की जानकारी मिली, उनमें एक नाम उसका भी था. यदि मनचलों की गोष्ठी में उसका नाम लेकर चटखारे लिए जाते थे तो दोपहर की नर्म-नर्म धूप सेंकती घरवालियों के झुंड में भी कोई न कोई ज़रूर ही कह बैठती, "हाय राम! शर्म तो एक किनारे रख दी है! बेहया!!"
ऐसा नहीं था कि उसे जन-जन के मन की दुर्भावना या सद्भावना का भान नहीं था. वह सब जानती थी कि कैसे उसे नित नए अलंकरणों से संवारा जाता था, किंतु कुटिल, कटाक्ष, वक्र मुस्कानें, चढ़े तेवर उसमें बाल बराबर भी फ़र्क़ नहीं डालते थे.
रोज़ सुबह नौ बजे बलखाती लता सी श्यामा वर्मा जब ऑफिस जाने के लिए घर से बाहर निकलती तो उसकी मुट्ठी भर कमर पर टिकी नाभि-दर्शना जार्जेट की साड़ी, उन्नत वक्षस्थल को ढंकता एक अंगुल भर का ब्लाउज़, खुली लम्बी बांहें, काली आंखों को काजल से और भी कजरारी बनाती रेखाएं और ग्रीवा पर झूलते टोकरा भर केश-गुच्छ देख राह चलते लोगों के दिल हाय-हाय कर उठते.
यथा नाम तथा गुण थी श्यामा. काली आबनूस-सी. नाक-नक्श भी बड़े मामूली से. कुल मिलाकर सौंदर्य के पैमाने पर वह कहीं भी नहीं ठहरती थी, कितु पुरुष के लिए सौंदर्य क्या है? भला आज तक कोई जान सका है?
प्रतिदिन सुबह नौ बजे के लगभग बनी-ठनी जब अपने पति के साथ वह आबू की सर्पिल सड़क पर अपने कदम धरती तो मनचले जल जाते. फुसफुसाहट भरे स्वर में कहते, "ब्यूटी एंड बीस्ट!" उसका सम्पूर्ण व्यक्त्तिव अपने चारों ओर कुछ ऐसी सृष्टि करता था, जिसे कोई भी शालीन-सुसंस्कृत मन कदापि भी स्वीकार नहीं कर सकता था.
आबू के युवा वर्ग में उसका नाम था रसभरी, उसे आते देख क्या युवक, क्या वृद्ध, एक बार नज़र भर देखते अवश्य थे. कहते, "रसभरी आ रही है..." और वह पलक पांवड़े बिछाए, इंतज़ार करते हुए प्रेमियों के दिलों पर एक-एक कर पांव धरती बड़ी अदा के साथ गुज़र जाती. पूरी राह श्यामा का पति ख़ामोशी से गुज़ार देता. सिगरेट के धुएं के छल्ले बनाते हुए, गर्दन नीचे डाले झुकी हुई नज़रों से मानो वह श्यामा के कदमों का सन्तुलन देखता जाता था, कहीं किसी मोड़ पर पैर थम तो नहीं जाते, कहीं पैरों की गति मंद तो नहीं होती?
मैंने जब प्रथम बार आबू की उस 'रसभरी' को देखा तो मेरे मन में भी उसे देखकर जुगुप्सा-सी जागी थी. मैं आज भी यह स्वीकार नहीं कर पाती कि उस श्यामा के मोह में दिवाकर जैसा पुरुष कैसे पड़ गया?
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दिवाकर के बारे में सोचती हूं तो यही लगता है, न जाने क्यों स्त्री के साथ इतने ढेर सारे अच्छे-बुरे विशेषण जोड़ दिए गए हैं? छलनामई, तिरिया चरित्तर और भी जाने क्या-क्या कहा जाता है, किन्तु सच तो यह है कि पुरुष का ही मन एक ऐसी रहस्यमय कंदरा है, जिसमें घुसकर वह स्वयं भी राह नहीं ढूंढ़ पाता. मन मरीचिका के पीछे भागता रहता है. हाथ में लपकने पर भान होता है कि अरे, वह तो सूखी रेत ही पा सका तो हाथ झाड़ कर चल देता है, फिर पीछे मुड़ कर देखना भी नहीं चाहता. पाप-पुण्य की छलना में तो पुरुष ही भटकता है. स्त्री तो सदा से ही सीधी राह चलती आई है चाहे वह राह श्यामा की राह जैसी हो या फिर नंदी की राह जैसी हो.
मैं जब उस मनोहारी स्थल पर पहुंची थी, तो उस छोटे-से शहर की प्रत्येक पहाड़ी, प्रत्येक सड़क, वहां के छोटे-बड़े घर और उसमें रहने वाले लोगों के सरल व्यवहार सभी ने मुझे मंत्रमुग्ध किया था. इस निगोड़ी दिल्ली में बीस तरह के लॉक, इंटर-लॉक लगा कर भी आदमी डरता रहता है, वहीं आबू में लोग यूं ही घर के दरवाज़े खुले छोड़ काम पर चले जाते. न चोरी, न गुंडागर्दी, न आतंक, न आतंकवादी, शांत-सुरम्य वादियां, ठंडी मंद बयार. लगा, ईश्वर ने स्वर्ग के आनंद कानन वन में लाकर बिता दिया. विकास और प्रगति ने इस स्थल के सौंदर्य को कुरूपता में अभी तक परिवर्तित नहीं किया था. फागुन के दिनों में जब पूरी घाटी और पहाड़ियां टेस्सू के लाल फूलों से सज जातीं तो लगता, मानो प्रियतम के आगमन का समाचार सुन सभी पहाड़ियां नववधू-सी सुहाग चूनर ओढ़े सज उठी हों.
दिवाकर मेरे सहयोगी ही नहीं, पड़ोसी भी थे. दिवाकर चौधरी, सूरज जैसा तेजस्वी व्यक्तित्व और विलक्षण बुद्धि के स्वामी दिवाकर, गेहुंआ रंग, उन्नत भाल, सदा मुस्कुराती आंखें. एक चुंबकीय आकर्षण था उनमें, जो सब को अपनी मोहनी में बांध लेता था. अपने अनुरूप ही जीवनसंगिनी पाई, नंदिनी चौधरी. दिवाकर प्यार से नंदी कह कर पुकारा करते थे. देखने वाले कहते, "कितनी अच्छी जोड़ी है!"
दोनों में प्यार भी बहुत था, लेकिन उस प्रेम के बीच भी श्यामा न जाने कैसे घुस गई?
मैं भी शायद यही सोचती, अगर दिवाकर ने मुझे अपने हृदय के अंदर झांकने की अनुमति न दी होती. आज सोचती हूं, यह सब होना तो सहज ही था, स्वाभाविक था. पुरुष और नारी और उनकी क्रीड़ा-स्थली यह संसार, उनके लिए तो बस इतना ही था. जो कुछ बनना-बिगड़ना था, वह तो सामाजिक तानों-बानों का बनना-बिगड़ना था.
जो कुछ होना था, वह तो हो चुका था और दिवाकर में उस होने को नंदी के साथ बांट लेने की छटपटाहट थी, लेकिन यही तो समस्या थी. दिवाकर के लिए सब कुछ होना ऐसा था, मानो बाढ़ का आना और उतर जाना और बाढ़ उतरने के बाद पीछे रह जाती है गंदगी, कीचड़, ढेर सारी बदबू. अब दिवाकर चाहते थे कि नंदी का आंचल दिवाकर के मन पर जमी उस गंदगी को, मैल को झाड़-पोंछ कर साफ़ कर दे. आस्था के उजाले से, तन से होती हुई मन तक पहुंचने वाली कालिख को दूर कर दे, किंतु नंदी इन ऊंची-नीची राहों से परे नियम-बंधन में बंधी ज़िंदगी जीने वाली, कैसे समझे कि जिस प्रकार बाढ़ का आ जाना प्रकृति का नियम है, उसी प्रकार बाढ़ का उतरना भी. नंदी के नियम-विधान के संसार में यह बात सोचना भी महापाप था कि दिवाकर के जीवन से बाढ़ जुड़ी है, उतनी ही गहराई है, जितनी गहराई से नंदी जैसी झील जुड़ी है. यह सब कैसे समझाएं दिवाकर कि यदि सूरज का निकलना एक सत्य है तो सूरज का अस्त होना भी एक सच है.
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दिवाकर और नंदी दोनों ही मुझसे बहुत खुल गए थे. उनकी सभी प्रकार की समस्याओं और उलझनों, मुस्कुराहटों और ठहाकों से अनजाने ही मैं धीरे-धीर जुड़ती चली गई. कब उनकी चिंता, मेरी चिंता बन गई, पता ही नहीं चला. कब उनके दुख-सुख मेरे अपने बन गए, जान ही नहीं सकी और इसीलिए उस दिन दिवाकर के घर पर ही लेटी थी. यदि किसी दिन मैं नहीं जाती तो नंदी आ धमकती और उसके आग्रह पर मुझे जाना ही पड़ता. एक दिन जब मैं उनके घर पहुंची तो पाया कि दोनों में एक बहस छिड़ी हुई थी.
"औरत बड़ी अजीब होती है. वह नाक की सीध देखती है, न दाएं, न बाएं, दो आंखें एक ही समय में दो चीज़ें देख सकती हैं. ये औरत को या तो समझ नहीं आता या वह समझना नहीं चाहती." दिवाकर खिजलाए से स्वर में कह रहे थे.
"मुझसे बेकार बातें मत करो, एक आंख और दो आंख, मुझे समझाने की कोशिश मत करना." नंदी भी आवेश में थी.
"अच्छा चलो, ये सब जाने दो, लेकिन यदि कोई स्त्री तुमसे आकर कहे कि मेरा उसके साथ सम्बंध है तो क्या करोगी?"
"क्या करूंगी? तुम्हें सदा-सदा के लिए छोड़ कर चली जाऊंगी."
"मुझसे एक बार भी नहीं पूछोगी कि सच क्या
"हां, पूछेंगी, ज़रूर पूछेंगी, लेकिन उसके बाद भी कदम यही उठाऊंगी."
मैं कुर्सी खींचकर पास ही बैठ गई. अपनी बहस में वह दोनों यूं उलझे हुए थे कि मेरे आने का भान ही नहीं हुआ, कुर्सी खींचने की आवाज़ से नंदी मेरी ओर देख कर बोली, "देख रही हो अपने साथी को? ये आजकल मुझसे यूं ही बेकार की बातें बहुत करने लगे हैं."
दिवाकर ने गोद में रखे दोनों हाथों को नीचे गिरा दिया, मानो हार गए हों. उनके चेहरे पर विवशता, अकुलाहट एक साथ आकर ठहर गए, एक आख़िरी प्रयास.
"अच्छा, अगर तुम्हारा मन किसी पर आ जाए तो?" नंदी के आंखें तरेरते ही दोनों हाथ उसके कंधों पर रखकर समझाते हुए बोले, "थोड़ी देर के लिए फर्ज़ करो, अरे यार! मान भी लो, तो तुम क्या करोगी?"
"मैं इस पार या उस पार कर दूंगी. दोनों साथ-साथ नहीं चलाऊंगी, समझे. ये धोखेबाज़ी तुम पुरुषों में होती है, हम लोगों में नहीं."
नंदी बात को वहीं समाप्त करने के लिए, मेरे लिए चाय बनाने के लिए उठ गई. मैं ख़ामोशी से दिवाकर को पढ़ने का प्रयास करने लगी. हमेशा ही ज़ोर से हो-हो करके हंसने वाले दिवाकर आज उदास से थे. उनके पास हमेशा ही बातों का भंडार रहता था, पर आज लगा, अभी इसी पल सभी शब्द मानो चूक गए, अपना सिर पीछे मोड़े की पीठ से टिका कर उन्होंने आंखें बंद कर लीं. उन बंद आंखों के पीछे बहुत कुछ था, जो अनकहा था.
मानव की गुत्थियों को सुलझाने की मेरी प्रवृत्ति मुझे उन आंखों के पीछे लिखे हुए अध्याय को पढ़ने के लिए बेचैन कर रही थी, किंतु कैसे आरंभ करूं? कहां से कुरेदूं? यही नहीं समझ पा रही थी. मेरी इस उलझन को ख़ुद दिवाकर ने ही कुछ दिनों बाद दूर कर दिया.
मुझे और दिवाकर दोनों को ही एक सर्वेक्षण कार्य के लिए चंद दिनों के लिए पाली जाना पड़ा. वहीं मुझे मौक़ा मिला दिवाकर के मन की बंद गिरह को खोलने का, लेकिन दिवाकर ने वादा लिया कि मैं उनको एक अच्छे मित्र की तरह लूंगी. कोई प्रतिवाद नहीं करूंगी. कैसा भी आक्षेप नहीं लगाऊंगी. एक मानव को जिस प्रकार दूसरे मानव की बात समझनी चाहिए, ठीक वैसे ही समझना होगा. मैंने वादा किया और दिवाकर के मन की परतें एक-एक कर स्वतः ही उतरने लगीं.
"सच तो यह है कि मैंने जब उसे पहली बार देखा तो उसके प्रति मन में कैसी भी भावना नहीं जागी. हां, उसको देखकर कौतूहल ज़रूर हुआ. फिर ऑफिस आते-जाते वह मुझे अक्सर दिख जाती. जब भी कभी वह मेरे आगे जा रही होती थी, मैं अनजाने ही उसको पढ़ने की कोशिश में लग जाता. सच कहूं तो उसकी देह की नाप-तोल भी करने लगा. उसकी लम्बी खुली हुई पीठ मुझे ऐसी लगती, मानो केले के पेड़ के तने की ऊपरी परतें छील कर अंदर की खिग्ध छाल झलकने लगी हो. कमर से भी नीचे बंधी साड़ी में कदमों की ताल के साथ उठते-गिरते बल. श्यामा शायद जान चुकी थी मेरी कमज़ोरी को. तभी तो... तभी तो वह शायद इंतज़ार करती थी मेरा. जैसे ही मैं उसके घर के नज़दीक पहुंचता, वह गेट खोल कर मेरे आगे-आगे चल पड़ती थी."
"लेकिन दिवाकर, तुम तो कार से..." दिवाकर ने मेरी बात काट दी.
"जाता था, किंतु तब मैं ऑफिस पैदल ही जाता था, तुम्हें ध्यान नहीं, जब उस दिन लंच पर मैं तुम्हें पैदल ही लाया था."
"हां, मुझे याद आ गया था. वो बरसात का मौसम था. पहाड़ी रास्तों पर बरसात के दिनों में चलना कितना कठिन होता था."
किसी ने दिवाकर को छेड़ा भी तो था.
"क्यों भई गाड़ी बिगड़ गई है या बिगाड़ दी गई है?"
तब मैंने ध्यान नहीं दिया था. उन दिनों दिवाकर बड़े ज़ोर से ऐलान करते थे, "पैदल चलना सेहत के लिए ज़रूरी है." उस सेहत का राज़ अब खुल रहा था.
"और नंदी कुछ नहीं कहती थी?" मेरा मन अभी भी शंकित था.
"अरे बाबा, क्यों नहीं कहती थी? मेरे गीले कपड़ों को देख रोज़ चिढ़ती, "एक तो गीला मौसम, रोज़ के दो जोड़ी भीगे कपड़े कहां सुखाएं? कितना खिज जाती थी, लेकिन मैं मना लेता था और वो मान भी जाती थी."
मेरा मन नंदी की ओर दौड़ गया. उसका पूरा जीवन दिवाकर के इर्द-गिर्द घूमता था. प्रत्येक गतिविधि दिवाकर से आरंभ हो दिवाकर पर समाप्त हो जाती थी. दिवाकर के आकर्षण से भी वह अनजान नहीं थी, इसीलिए दिवाकर के चारों ओर एक लक्ष्मण रेखा सी खींच वह पहरेदारी करती थी. यदि कोई भी अन्य स्त्री उस लक्ष्मण रेखा के अंदर जाती दिखती तो वह हाथ धोकर उस स्त्री के पीछे पड़ जाती, "चुडैलें कहीं की, इन्हें और कोई नहीं मिलता, जो इनके पीछे लग जाती है?"
नंदी को चकमा देकर, दिवाकर जैसे सुरुचिपूर्ण व्यक्ति को श्यामा ने कैसे झपाके से अपनी ओर खींच लिया और ख़ुद दिवाकर जैसा सुसंस्कृत व्यक्ति कैसे गिर पड़ा उसकी झोली में? मैं यही सोच रही थी.
मुझे यूं सोच में पाकर दिवाकर थोड़ा लज्जित हो गए, "आप सोच रही होंगी, कैसा वहशी हूं मैं. एक जानवर, लेकिन यही मेरा सच है. नंदी की ज़िंदगी रेल की पटरियों पर चलने वाली गाड़ी जैसी है. ज़रा सी चूक हुई नहीं कि सब कुछ ख़त्म हो सकता है. वहां कोई क्षमा नहीं. कोई दया नहीं. ये सब जानकर वह कभी नहीं मानेगी कि मैं प्यार उससे ही करता हूं. हृदय पर मेरे वही विराजती है. श्यामा तो मेरे लिए केवल मात्र एक भूख थी. भूखे को जो भी मिले, स्वादिष्ट ही लगता है. यही है एक पुरुष का सच."
मैं टुकुर-टुकुर दिवाकर का मुंह देख रही थी. "उसने मुझे रिझाया और मैं रीझ गया. हम दोनों अपने-अपने ऑफिस से गोल हो जाते थे. मुझे उसकी देह खींचती थी, किंतु उसी देह का भोग वितृष्णा जगाता. भोग की तीव्र लालसा और भोग के बाद की वितृष्णा, विरिक्त. सच तो यह है, उसी ने पाया मुझे."
"बस करो दिवाकर, बहुत हुआ."
किसी पुरुष के द्वारा इतने स्पष्ट रूप से अपनी भावनाओं की स्वीकारोक्ति से मैं अटपटा सा महसूस कर रही थी. दिवाकर ने शायद मेरी उलझन समझ ली थी.
"मैं जानता हूं, मेरी यह उन्मुक्त भाषा, यह सब आपको बड़ा भद्दा लग रहा होगा, लेकिन आपने मुझे सुना, बस, मेरा मन बहुत हल्का हो गया है. आप समझ रही होंगी कि मैंने नंदी के विश्वास को भी छला, आपकी दृष्टि में शायद मैं आदर्श पति नहीं, किंतु आपको यह तो मानना ही होगा कि इसी दुनिया में तो है सब कुछ.
अगर गीता जैसा धर्म ग्रंथ तो पोर्नोग्राफी भी तो है. तुलसी-मीरा को पढ़ने वाला कभी घासलेटी कहानी भी पड़ सकता है. अगर किसी ने पोर्नोग्राफी स्टोरी पढ़ ली तो क्या उसे तीर्थ यात्रा पर जाने का अधिकार नहीं?"
दिवाकर अपनी बात पूरी कर ख़ामोश हो लाल होते आसमां को निहारने लगे. हम दोनों के बीच एक चुप्पी पसर गई. सूरज डूबने लगा था. दूर कहीं-कहीं बादल के टुकड़े छितरे हुए थे. आकाश का लाल सिंदूरी रंग धीरे-धीरे कालिमा को ओढ़ने लगा.
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पाली में सर्वेक्षण का कार्य समाप्त हो चुका था. हमारा पूरा दल वापस आ चुका था. तक़रीबन एक सप्ताह बीत गया. कार्य की अधिकता के कारण नंदी से मिलने का अवसर ही नहीं जुटा सकी. अचानक मुझे लगा, इतने दिनों में नंदी भी तो नहीं आई थी. वह तो दिन में एक बार मिले बिना रुकती नहीं थी. फिर इतने दिन? बस, उसी पल सारे कामकाज छोड़ उससे मिलने चल दी. सोचा, आज रात नंदी के हाथ की बनी स्वादिष्ट तरकारी का स्वाद लूंगी. नंदी को भोजन बनाने में विशेष महारथ हासिल थी.
नंदी, दिवाकर दोनों ही थे. दिवाकर बगीचे में बैठे सुबह का अख़बार चाट रहे थे और नंदी अपने कमरे में रजाई में घुसी किताब में उलझी थी. मुझे देखकर पहले तो गुमसुम सी रही, फिर अचानक मुझसे लिपट भरभरा कर रो पड़ी. मुझे लगा, अवश्य ही कोई बात है. किसी प्रकार उसे शांत कर जब उसके दुख का कारण जाना तो मेरा मन भी विचलित हो उठा था.
"जानती हो दीदी, वो सामने वाला घर, उसी में रहती है वह काली-कलूटी, हम दोनों जब भी बाहर बैठते, वह निर्लज्ज बाहर आकर ख़ुद भी टंग जाती और एक दिन तो जब मैं और दिवाकर घूम रहे थे सड़क पर, तो हिम्मत देखो उसकी, दिवाकर को देखकर मुस्कुराने लगी. मुझे तो पहले ही सबने कहा था, इस दुष्टा से बचकर रहना, पर दीदी, उस कुलटा की तो मैं चोटी, अरे नहीं, चोटी तो है ही नहीं, उसके वो मुट्ठी भर छल्ले कैची से कतर लाती, किंतु मुझे तो दिवाकर ने काट डाला. वो समझे, मैं देख नहीं रही, पर मैंने देख लिया था उसकी मुस्कान के बदले कैसी मुस्कुराहट आई थी चेहरे पर दबी-छिपी, भला मैं अपने पति के चेहरे के हाव-भाव नहीं जानती क्या?
अंजना स्टोर वाली शर्माइन ने मुझे एक दिन कहा भी था कि उन्होंने दिवाकर और काली-कलूटी को साथ घूमते देखा था, लेकिन तब मैंने कहा, जाने दो. शर्माइन को ऐसी डांट लगाई कि बेचारी चलती बनी. आज लगता है, वही मुझ पर व्यंग्य से हंस रही है. पिछले सात दिनों से मैंने बाहर कदम नहीं रखा. लगता है, सब मुझे दया से देख रहे हैं. मुझ पर हंस रहे हैं."
"नंदी, क्या तुम दिवाकर को क्षमा नहीं कर सकतीं? उसकी एक भूल, मुस्कुराहट का प्रत्युत्तर मुस्कुराहट से देने की भूल को? वह तुम्हें बेहद प्यार
करते हैं." मैंने नंदी को समझाना चाहा, यद्यपि मैं जानती थी कि दिवाकर की यह भूल तो नंदी शायद माफ़ भी कर दे, किंतु जिसकी स्वीकारोक्ति उन्होंन पाली में की, क्या उसे भी कभी क्षमा कर सकेगी नंदी?
"क्या मैं जानती नहीं, दिवाकर मेरे बिना नहीं रह सकते, वह मुझे कभी नहीं छोड़ेंगे, उन्होंने मुझे आश्वस्त किया है. फिर यह घर तो उन्हीं का है, मैं उन्हें भला कहां निकाल सकती हूं. और ख़ुद भी कहां जाऊं? कहां रहूं?"
दिवाकर वैसे ही शांत थे, जैसे कि कोई व्यक्ति तूफ़ान में फंसने के अंदेसे से पहले तो घबराता रहे, किंतु जब तूफ़ान में फंस जाए तो धीरज से उस तूफ़ान का सामना करे,
दिन यूं ही व्यतीत हो रहे थे. दिवाकर अपना समय अधिक से अधिक नंदी के साथ गुज़ारते. शायद यही उनका पश्चाताप था. पूरे मन-प्राण से वह नंदी को सहज बनाने में लगे थे. समय बड़े से बडा घाव भर देता है. दिवाकर के प्रेम तथा समय ने नंदी को सहज होने में बड़ा योग दिया. प्रत्येक शाम दोनों सैर-सपाटे, सिनेमा आदि में बिताते. दोनों की खिलखिलाहट सुनाई पड़ने लगी थी, लेकिन जब भी कभी श्यामा सामने पड़ जाती, उसकी मुस्कान निर्जीव हो जाती. आंखों में सूनापन तैर जाता, किंतु बलपूर्वक वह श्यामा के विचार को झटके से झाड़-पोंछ कर फेंक देती. मैंने भी राहत की सांस ली. चलो झंझट मिट गया. चलो, दिवाकर संभल गए.
और श्यामा? वह शायद इसी पल का इंतज़ार कर रही थी. तक़रीबन दो सप्ताह के लिए मुझे सरकारी कार्य से आबू से बाहर जाना पड़ा. लौटने के बाद जब दूसरे दिन सुबह मैंने अपने घर के दरवाज़े के बाहर ऑफिस जाने के लिए कदम बाहर निकाला तो देखा, दिवाकर पैदल चले आ रहे थे. हम दोनों साथ हो लिए, श्यामा के घर के नज़दीक पहुंचने भी न पाए थे कि लहराती-सी वह हम लोगों के ठीक आगे-आगे चल दी. हां, चलने से पहले एक झटके से तीखी नज़रों से दिवाकर को देखकर भी अनदेखा-सा करने का प्रयास अवश्य किया. तभी पास से कोई गुज़र गया यह कहते हुए, "हाय श्यामली, सबको करती सुखी."
- डॉ. संतोष सिंह
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