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कहानी- सुबह का भूला… (Short Story- Subah Ka Bhoola…)

अब मैं कावेरी से कैसे कहता कि मेरी ज़िंदगी में सोनिया नाम की एक हसीन परी आ गई है, जिसने मेरे दिल और दिमाग़ पर अपने इश्क़ का ताला लगा दिया है.
कई बार तो मेरे मन में यह भी ख़्याल आया कि मैं कावेरी को तलाक़ देकर सोनिया को अपनी ज़िंदगी में ले आऊं. लेकिन फिर दूसरे ही पल मोनू का ख़्याल आते ही मुझे अपनी यह सोच बेमानी सी लगने लगती.

 
“कहीं घूमने चलते है."
“कहां लेकर चलोगे?"
“जहां तुम कहो."
“आज तो मेरा घर पर ही आराम करने का मूड है, फिर देखते हैं." इतना कहकर सोनिया ने मेरा फोन काट दिया. उससे फोन पर बात करने के बाद मेरी बेचैनी और भी बढ़ गई. पता नहीं मुझे क्या हो रहा है आजकल. जब तक उसे ना देखूं मुझे चैन ही नहीं आता. 
वैसे मैं कोई सड़क छाप रोमियो या कॉलेज में पढ़नेवाला वह नौजवान नहीं हूं, जो अपना दिल हथेली पर लिए फिरता है. मैं एक शादीशुदा इंसान हूं, जिसका एक प्यारा सा छोटा बेटा भी है. लेकिन क्या सिर्फ़ शादीशुदा होने से ही हमारी सारी भावनाएं दिल के किसी कोने में सिमट कर रह जाती है? आख़िर शादीशुदा मर्दों को भी तो प्यार करने का अधिकार है, क्योंकि दिल तो आख़िर दिल है. 
अब तक तो मैं सिर्फ़ और सिर्फ़ अपने काम पर ही ध्यान देता आया हूं और शायद इसी वजह से मैं अपने बॉस के दिल में अपनी जगह बना पाया हूं. ऑफिस का कोई भी ज़रूरी काम हो, उसे पूरा करने के लिए मुझे ही बुलाया जाता है. मैंने अपनी मेहनत से एक अच्छी पोज़ीशन अचीव की है. इसी वजह से ऑफिस का सारा स्टाफ मेरी बहुत इज़्ज़त करता है.
लेकिन सोनिया ने अपने दिलकश अंदाज़ और बात करने के अनूठे ढंग से कब मेरे दिल में अपनी जगह बना ली, मैं समझ ही नहीं पाया. यही नहीं, वह अपने काम को भी बहुत महत्व देती है, शायद इसी वजह से भी मैं उसके नजदीक आता चला गया, क्योंकि जो लोग अपने काम को महत्व देते हैं, मैं उन लोगों को बहुत इज़्ज़त देता हूं. 
प्यार सोच-समझ कर नहीं किया जाता, बस हो जाता है. आज तक मैं जिस लाइन को सुनकर अक्सर हंस देता था, वही लाइन आजकल मुझ पर बिल्कुल फिट बैठ रही है. तभी तो मैं अपनी पत्नी कावेरी से ज़्यादा सोनिया पर ध्यान देने लगा हूं. आज सोनिया ने क्या पहना है, उसने लंच किया है या नहीं, कहीं उसका मूड तो ख़राब नहीं है… वगैरह-वगैरह. इन सब बातों का मुझे हर समय ध्यान रहता है, पर अपनी पत्नी कावेरी से बात किए हुए मुझे अक्सर एक लंबा अरसा बीत जाता है, लेकिन मुझे इसका तनिक भी एहसास नहीं होता.

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सोनिया के साथ बाहर घूम कर जब मैं अपने घर पहुंचता हूं, तब मेरा मूड एक अजीब सी ख़ुशी महसूस करता है, जो शायद आज तक मैं कावेरी के साथ कभी महसूस नहीं कर पाया. वैसे कावेरी एक अच्छी पत्नी और एक अच्छी मां है, लेकिन कहीं तो कुछ ऐसा है जो उसमें नहीं है. लेकिन सोनिया… वह तो समझो उस चुंबक के समान है, जो पल भर में ही किसी को भी अपना दीवाना बना सकती है.  
जैसे कोई भंवरा एक सुंदर फूल को देखकर ख़ुद को रोक नहीं पाता और उसकी तरफ़ खिंचा चला जाता है, ठीक बिल्कुल वैसे ही मैं सोनिया को देखकर एक नई स्फूर्ति से भर जाता हूं. इसलिए ही तो आजकल मेरे और सोनिया के बाहर घूमने के प्रोग्राम बहुत ज़्यादा बनने लगे हैं. 
सोनिया को अच्छी-अच्छी जगह घूमने और बढ़िया गिफ्ट पसंद है. इसलिए ही तो आजकल मैं अपने घर के बजट से ज़्यादा सोनिया की पसंद और नापसंद पर ज़्यादा ध्यान देने लगा हूं, क्योंकि अब उसकी ख़ुशी से बढ़कर मेरे लिए और कुछ नहीं है. और फिर जब हम अपना दिल हार जाते हैं, तब उसके आगे और कुछ शायद मायने ही नहीं रखता.
बस इस सब में मुझे उलझन तब होती है, जब मुझे कावेरी के प्रश्नों का जवाब देना पड़ता है, मसलन- "तुम्हें इतनी देर क्यों हो गई ऑफिस से लौटने में, कम से कम मेरा नहीं तो मोनू का ही ध्यान कर लिया करो…"
"आजकल तो तुम ना उसे बाहर घूमाने ले जाते हो और ना ही उसके साथ खेलते हो… आज उसके स्कूल में पैरेंट्स-टीचर मीटिंग थी, जिसमें हम दोनों को जाना था, लेकिन तुम तो अपना फोन स्विच ऑफ करके बैठे थे. इसी वजह से मुझे अकेले जाना पड़ा…" अक्सर कावेरी मुझे देखते ही अपनी शिकायतों का पिटारा खोलकर बैठ जाती, लेकिन मैं चुप रहता था, क्योंकि मेरे पास उसकी शिकायतों का कोई जवाब जो नहीं था.
शायद कभी-कभी हमारे पास कुछ प्रश्नों का कोई जवाब होता ही नहीं है क्योंकि हम चाह कर भी उन प्रश्नों का जवाब नहीं ढूंढ़ पाते हैं. तब ऐसा लगने लगता है कि शायद हमारे मन का शब्दकोश अचानक ही रिक्त हो गया है और हम बेज़ुबान से सामनेवाले का मुंह ताकते रह जाते हैं. अब मैं कावेरी से कैसे कहता कि मेरी ज़िंदगी में सोनिया नाम की एक हसीन परी आ गई है, जिसने मेरे दिल और दिमाग़ पर अपने इश्क़ का ताला लगा दिया है.
कई बार तो मेरे मन में यह भी ख़्याल आया कि मैं कावेरी को तलाक़ देकर सोनिया को अपनी ज़िंदगी में ले आऊं. लेकिन फिर दूसरे ही पल मोनू का ख़्याल आते ही मुझे अपनी यह सोच बेमानी सी लगने लगती.
साथ ही मैं यह भी जानता था कि मेरे लिए कावेरी को छोड़ना इतना आसान नहीं होगा, क्योंकि मेरे अम्मा और बाबूजी की पसंद से कावेरी मेरी ज़िंदगी में आई है और अगर मैंने ऐसा कुछ भी सोचा तो मेरी अम्मा और बाबूजी का ग़ुस्सा मुझ पर कहर बनकर टूटेगा, जो शायद मेरी ज़िंदगी को ही तहस-नहस कर देगा. 
इसी वजह से मैं ना चाहते हुए भी दो नाव पर सवार हो गया था. लेकिन अब कावेरी ने एक चुप्पी सी लगा ली थी. ना तो वह अब कोई प्रश्न पूछ कर मुझे धर्म संकट में डालती थी और ना ही मुझे मोनू को बाहर ले जाने के लिए कहती थी. अक्सर मोनू से ही मुझे पता चलता था कि वह और कावेरी अब दोनों अकेले ही बाहर घूमने-फिरने जाने लगे हैं. कभी पिकनिक, तो कभी सर्कस… मोनू के मुंह से यह सब सुनकर मुझे अजीब तो लगता था, लेकिन मैं क्या कर सकता था? 
तब मैंने अपनी सोच का क्षेत्रफल बढ़ाया और ख़ुद को समझाते हुए सोचने लगा, 'चलो अच्छा हुआ कि कावेरी और मोनू ने मुझे परेशान करना छोड़ दिया है, वरना उनकी रोज़-रोज़ की चिक-चिक से मेरा अच्छा वाला मूड घर लौटते ही ख़राब हो जाता था."

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वैसे भी कोई किसी की नाराज़गी कब तक सहेगा, क्योंकि सहनशीलता की भी तो एक सीमा होती है और फिर अब तो मेरी और सोनिया की नजदीकियां और भी ज़्यादा बढ़ने लगी थी. ऐसे में मेरा वापस लौटना असंभव ही लग रहा था.
आजकल तो मैं और सोनिया लव बर्ड्स बने हुए प्रेम के आकाश में उड़ते रहते हैं. कितना अच्छा लगता है, एक-दूसरे का हाथ थाम कर दूर निकल जाना… कभी बारिश में भीगना और कभी गरमा गरम भुट्टे खाना और तो और हमारे ऑफिस के बाहर बनी छोटी सी चाय की टपरी तो हम दोनों की फेवरेट जगह थी, जहां हम दोनों अक्सर मिलकर गरमा गरम चाय का आनंद लेते थे और तब ना चाहते हुए भी हमारे अतीत की बातों का पिटारा ख़ुद-ब-ख़ुद खुल जाता था और समय का तो जैसे पता ही नहीं चलता था.
सच में प्यार ऐसा ही तो होता है, जहां बेमतलब की बातें यूं ही होती रहती है. हम बस मन की आंखों से अपने प्रेमी का मन पढ़ते रहते हैं. वैसे भी सच्चे प्यार में दिखावा नहीं होता, बल्कि अपने प्रेमी के प्रति अटूट प्रेम होता है, तभी तो मैं सोनिया की किसी भी बात को टाल नहीं सकता था और तब उसकी हर बात मानना मेरे लिए बेहद ज़रूरी हो जाता था.
इसलिए ही तो मैं अब ज़्यादातर उसका ऑफिस का काम ख़ुद करने लगा था. वैसे यह सब मेरे लिए आसान नहीं था, क्योंकि हर ऑफिस के कुछ नियम और क़ायदे होते हैं, जिन्हें इग्नोर नहीं किया जा सकता. लेकिन मैं यह सब जानते हुए भी अक्सर सोनिया की हेल्प कर दिया करता था.
मेरे दोस्त पीयूष ने मुझे कई बार इस बारे में समझाते हुए कहा था, “ यार दोस्ती अपनी जगह है, लेकिन ऑफिस का काम अपनी जगह… सोनिया के हिस्से का काम करके कभी किसी बड़ी मुसीबत में मत पड़ जाना, क्योंकि अगर कुछ भी ऊंच नीच हुई तो तू ही ज़िम्मेवार होगा.” तब मैं पीयूष की बातों को अनसुना कर देता, क्योंकि अब मैं उसे यह कैसे कहता कि मैं अब सोनिया का दोस्त नहीं, बल्कि उससे बढ़कर हूं.
अभी मैं यह सब सोच ही रहा था कि अचानक मेरा फोन बज उठा. फोन पर मेरी पत्नी कावेरी थी.
“हां बोलो, कैसे फोन किया?” मैं थोड़े ग़ुस्से से बोल पड़ा.
“मैंने तो बस यह बताने के लिए फोन किया था कि मैं और मोनू थोड़े दिन के लिए मामाजी के यहां जा रहे हैं. अगर तुम्हें समय मिले, तो उनसे मिलने आ जाना, उन्हें अच्छा लगेगा…" इतना कहकर कावेरी ने फोन काट दिया. 
कावेरी से बात होने के बाद मुझे तो ऐसा लगा मानो मुझे कोई अलादीन का चिराग़ मिल गया हो, क्योंकि अब कावेरी और मोनू तो कुछ दिन के लिए मामाजी के यहां रहनेवाले हैं, इसलिए मुझे कुछ भी करने की खुली छूट मिल गई थी और साथ ही घर लौटने की कोई पाबंदी भी नहीं थी. कुल मिलाकर यह मेरे लिए कोई लॉटरी निकलने के समान था.
फिर मैं जल्दी-जल्दी अपने ऑफिस का काम निपटा कर सोनिया के घर की तरफ़ चल पड़ा, ताकि उसे अचानक पहुंचकर सरप्राइज़ दे सकूं. रास्तेभर मैं सोनिया के बारे में सोचकर ही रोमांचित होता जा रहा था. 
लेकिन जब मैं उसके घर पहुंचा, तब उसके अजीब से हाव-भाव देखकर मेरा सारा रोमांस हवा हो गया. अजीब से कपड़ों में बैठी सोनिया अपने नाख़ूनों पर नेल पेंट लगा रही थी. तेज धुन पर बज रहे फिल्मी गाने के साथ-साथ सोनिया भी गुनगुना रही थी. सामने सोफे पर ढेर सारे कपड़े रखे थे और मेज पर दो-तीन कप उल्टे पड़े थे, जिन में पी गई चाय सूख चुकी थी.
मुझे अचानक सामने देखकर सोनिया हड़बड़ा गई. फिर वह तुरंत घर को ठीक करते हुए बोली, “सॉरी यार, मेरी कामवाली बाई नहीं आ रही, इसलिए मेरे घर की ऐसी हालत हो रही है वरना मैं तो बहुत सफ़ाई पसंद हूं.”
 फिर वह अंदर गई और मेरे लिए पानी ले आई. मैं पानी पीकर अभी ग्लास मेज पर रख ही पाया था कि सोनिया तुरंत बोल पड़ी, “कुछ खाओगे क्या…"  तब मुझे ऐसा लगा कि शायद वह मुझे अपने घर से जल्दी भेजना चाहती है.
इसलिए मैं ना चाहते हुए भी उससे पूछ ही बैठा, “क्या हुआ..? क्या कोई आ रहा है क्या?”
“नहीं, यार, दरअसल मेरा पड़ोसी महेश अभी थोड़ी देर में मुझे पिक करने आनेवाला है, क्योंकि आज उसकी कॉस्मेटिक कंपनी एक नया प्रोडक्ट लॉन्च करनेवाली है और वह चाहता है कि उसकी पत्नी की जगह मैं आज की पार्टी में उसके साथ चलूं, क्योंकि उसे सारे सेलिब्रिटीज़ पर अपना इंप्रेशन जो जमाना है. अब तुम तो जानते ही हो कि आजकल दिखावे का ज़माना है. बस सब कुछ बाहर से सुंदर होना चाहिए भले ही आप अंदर से कैसे भी हो."
सोनिया की यह बातें सुनकर मेरा मन एक अजीब सी कड़वाहट से भर गया. पहले तो मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं कैसे रिएक्ट करूं. मैं जैसे-तैसे अपने मन को शांत करने का उपक्रम करने लगा, क्योंकि मैं इसके अलावा और कर भी क्या सकता था?
तभी सोनिया जल्दी से अंदर गई और एक प्लेट में पिज़्ज़ा के दो पीस और एक कप ब्लैक कॉफी मेरे लिए ले आई.
"मेरे पास अब कुछ बनाने का समय नहीं है, वरना मैं तुम्हारे लिए कुछ बना देती क्योंकि मुझे अभी पार्टी के लिए तैयार भी होना है. मैंने कल अपने लिए एक पिज़्ज़ा ऑर्डर किया था, उसी के यह दो पीस फ्रिज में रखे थे. उन्हें ही मैं तुम्हारे लिए गर्म करके लाई हूं और साथ में अगर ब्लैक कॉफी पियोगे, तो पिज़्ज़ा के कारण बढ़ाने वाली कैलोरीज का अच्छे से बैलेंस हो जाएगा.” इतना कहकर वह तैयार होने लगी.


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फिर मैं चुपचाप पिज़्ज़ा के पीस खाने लगा, क्योंकि मेरे पास इसके अलावा कोई और ऑप्शन भी नहीं था और मुझे बहुत तेज भूख भी लगी हुई थी. जैसे-तैसे मैं अभी ब्लैक कॉफी ख़त्म कर ही पाया था कि अचानक सोनिया मेरे नजदीक आई और तेजी से हंसते हुए बोली, “वैसे देखा जाए, तो तुम सारे मर्द एक जैसे हो मतलब शादीशुदा होते हुए भी तुम लोगों को कुंवारेपन का मज़ा लेना होता है. अरे, अगर ऐसा ही था तो तुम लोगों ने शादी ही क्यों की? वैसे इस सब में मुझे बहुत मज़ा आता है, क्योंकि तुम जैसे रंगीन मर्दों को अपना शिकार बनाना भला किसको अच्छा नहीं लगेगा?” 
आज तक तो मैं उसकी इसी मुस्कुराहट का दीवाना था, क्योंकि उसके कोमल होंठों के बीच चमक रहे दांतों की पंक्ति मुझे बहुत लुभाती थी.
लेकिन अब मुझे सोनिया की इसी मुस्कान से एक अजीब सी कोफ्त हो रही थी. आज मुझे उसकी यह हंसी किसी राक्षस की हंसी जैसी लग रही थी, जिसके लिए किसी की भी भावनाओं से खिलवाड़ करना बेहद आसान होता है.
“रुक जाओ… महेश से मिलकर जाना…" सोनिया ने अपना मेकअप ठीक करते हुए कहा.
"तुम्हें उससे मिलकर अच्छा लगेगा…" इतना कहते-कहते उसने ख़ुद को आईने में निहार कर वही पर्स उठा लिया, जो मैंने उसे थोड़े समय पहले ख़रीद कर गिफ्ट किया था. 
“ वैसे तुम्हारी चॉइस लाजवाब है, लेकिन आज मैं भी एक लंबा हाथ मारनेवाली हूं. देखो महेश, आज मुझे गिफ्ट में क्या देता है, क्योंकि आज शाम वह मुझे कोई बढ़िया गिफ्ट ख़रीद कर देनेवाला है.".इतना कहते-कहते सोनिया की आंखों में चमकता हुआ लालच देखकर मैं भीतर तक डर गया. 
अब मैं समझ चुका था कि सोनिया को सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना लालच पूरा करने से मतलब है, बाकी किसी की भावनाओं से खिलवाड़ होता है, तो होता रहे. इसलिए मैं वहां से चुपचाप उठकर बाहर आ गया, क्योंकि अब वहां रुकने का कोई मतलब था ही नहीं. सोनिया के घर से बाहर आकर मुझे बहुत अच्छा लगा, क्योंकि बाहर चल रही शीतल हवा ने मेरे दुखी मन को एक अजीब सी राहत जो दी.
घर लौटते वक़्त मैंने कितना सोचा कि कहीं रुक जाऊं, ताकि कुछ खा सकूं, लेकिन मन ही नहीं हुआ. क्योंकि मैं तो यही नहीं समझ पा रहा था कि अब करूं तो क्या करूं? इधर सोनिया का सच जानकर मेरा मन टूटा हुआ था, तो दूसरी ओर कावेरी और मेरे बीच आई हुई दूरियां निरंतर मेरे भीतर एक बवंडर मचा रही थी. अब मुझे कावेरी के पास लौटना बेहद मुश्किल लग रहा था क्योंकि मैं तो यह भी नहीं जानता था कि अब कावेरी के मन में मेरे लिए कुछ शेष है भी या नहीं.
अब जब मेरे दिल और दिमाग़ में एक द्वंद चल रहा था, तब ऐसे में मेरे लिए कोई भी डिसीजन लेना बहुत मुश्किल हो रहा था. इसलिए ख़ुद को शांत करने के लिए मैं बाथरूम में घुस गया और गर्म पानी से नहा कर जब बाहर निकला तब मैं काफ़ी अच्छा महसूस कर रहा था.
कावेरी के घर पर न होने के कारण मुझे यह तो मालूम था कि आज डिनर में मेरे लिए कावेरी ने कुछ भी नहीं बनाया होगा. बस यही सब सोच कर मैं किचन की तरफ बढ़ गया ताकि फ्रिज से कुछ निकाल कर खा सकूं.
लेकिन किचन के स्लैब पर रखा एक गर्म खाना रखने का टिफिन बॉक्स और उसके साथ पड़ी हुई एक छोटी सी पर्ची देख कर मैं हैरान रह गया.
पर्ची में लिखा था, “मैं तुम्हारे लिए आलू के परांठे बनाकर इस टिफिन बॉक्स में रखकर जा रही हूं, ताकि तुम रात को खा सको. और हां, मैंने अपनी कामवाली बाई कमली को बोल दिया है कि वह तुम्हारे लिए खाना बना देगी. रोज़-रोज़ बाहर का खाना मत खाना, वरना तुम्हारा पेट ख़राब हो जाएगा.”
अपने फेवरेट आलू के परांठे सामने देखकर मैं खुद को रोक नहीं पाया और तुरंत अपनी प्लेट लगा ली. वैसे भी मुझे बहुत तेज भूख लगी हुई थी. जैसे-जैसे मैं परांठे खाता गया वैसे-वैसे मेरे दिमाग़ और दिल अपने आप शांत होते चले गए, क्योंकि मेरे इतने ख़राब व्यवहार के बावजूद भी कावेरी का मेरे प्रति चिंता करना दर्शा रहा था कि हम दोनों के बीच अभी भी बहुत कुछ बचा है और जो कुछ भी हमारे रिलेशनशिप के बीच बिगड़ा था, अब उसे ठीक करने की ज़िम्मेदारी मैंने अपने कंधों पर ले ली थी .
इसलिए ही तो मैंने तुरंत कावेरी को थैंक यू का मैसेज भेजा और फिर अपना लैपटॉप खोल कर एक लंबी छुट्टी की अर्जी मेल कर दी, ताकि अपनी फैमिली के साथ क्वालिटी टाइम स्पेंड कर सकूं. 

तभी अचानक मेरा मोबाइल बज उठा. फोन पर सोनिया थी, जो बेहद मीठी आवाज़ में मुझसे कह रही थी, “ यार, पार्टी शुरू होने में तो अभी शायद और ज्यादा समय लगेगा, इसी वजह से मैं कल सुबह ऑफिस देर से ही पहुंच पाऊंगी. इसलिए मैं तुम्हारे फोन पर कुछ जरूरी इनफॉरमेशन सेंड कर रही हूं, ताकि तुम हमारे प्रोजेक्ट का ज़रूरी वर्क समय से निपटा सको..."
“सॉरी सोनियाजी, अपने हिस्से का काम आप ख़ुद करो, तो ज़्यादा ठीक रहेगा और वैसे भी मैं अपनी फैमिली के साथ कुछ समय के लिए बाहर घूमने जा रहा हूं.” इतना कहकर मैंने उसका रिएक्शन जाने बिना अपना फोन रख दिया और जल्दी सो गया, ताकि सुबह अचानक कावेरी के पास पहुंचकर उसे सरप्राइज़ दे सकूं.

शालिनी गुप्ता

Photo Courtesy: Freepik

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