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कहानी- सुहागिन (Short Story- Suhagin)

वह फीकी सी हंसी हंस दीं, "फूफाजी‌ अब ठीक हैं. मुझे कुछ नहीं कहते शायद उनके हिस्से के अत्याचार अब समाप्त हो चुके हैं. मैं भी सब भूल चुकी हूं. यह सब तो भाग्य की बातें हैं. मेरा भाग्य ही खोटा था, अब तो बस एक ही इच्छा है, इस संसार से सुहागिन रहते ही विदा ले लूं, पर मुझ अभागिन के भाग्य में यह गौरव, यह सुख कहां."

अभी-अभी राजन ने बताया कि मेरी सुधा बुआ नहीं रहीं. हार्ट अटैक का तीसरा और अंतिम दौरा उन्हें सदा के लिए हमसे छीन ले गया. मैं पत्थर बनी जाने कब तक शून्य में देखती रह गई. अभी पिछले महीने ही तो उनसे मिल कर आई थी. तब सपने में भी न सोचा था कि उनसे अंतिम बार मिल रही हूं. कितने स्नेह से उन्होंने मुझे फिर आने को कहा था, "बेटी फिर आना, तेरे आने से जी बहल गया था मेरा."

पर बुआ यह क्या, मैं फिर आने की सोचती इससे पहले ही तुमने संसार से विदा ले ली, यह कैसा बुलावा था? उस लम्बे-चौड़े शानदार बंगले में अब किससे मिलने जाऊंगी, तुम्हारे कमरे का सूनापन कैसे बर्दाश्त कर पाऊंगी? वह‌ कमरा जहां तुम्हारा स्नेह भरा वजूद, तुम्हारी मुहब्बत भरी बातें उस बड़े से कमरे को भरा-पूरा बनाए रखती थीं. उस कमरे की सूनी दीवारें, वीरान छत, खाली बेड मुझे तड़पाएंगे. बुआ, भला ऐसी भी क्या जल्दी थी संसार त्यागने की? तुमसे दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह वर्ष बड़े भाई-बहन जीवित हैं और तुम सबसे छोटी होकर हमारा साथ छोड़ गई?

पर शायद अच्छा ही हुआ कि तुम मर गईं, पल-पल की मौत मरने से एक बार ही सांसों से नाता तोड़ लेना अच्छा ही तो है? जीवन के सुख मनुष्य को जीने का उत्साह देते हैं. छोटी-छोटी ख़ुशियां ज़िंदगी में नई उमंगें जगाती हैं, तब मनुष्य जीना चाहता है. अपनों की मुहब्बत, अपनापन मन में आशा की किरणें जगा दिया करती हैं. तब मनुष्य वशीभूत हो जीने के लिए विवश हो जाता है. पर जब न सुख हो, न ख़ुशियां, न कोई उमंग, जब आपका वजूद दूसरों पर भार बन जाए.. जब अपनों से अपनापन न पाकर केवल औपचारिकता का एहसास होने लगे, तब मनुष्य स्वयं को बोझ समझने लगता है. उसे सिर्फ़ अपनी मृत्यु ही राहत का विकल्प नज़र आने लगती है. सुधा बुआ भी अपने जीवन से तंग आ गई‌ थीं. तभी तो मुझसे कहा करती थी, "रूपा वह स्त्री बड़ी भाग्यशाली होती है जिसे सुहागन की मौत नसीब हो, मेरा दिल कहता है इस मामले में मैं भाग्यशाली रहूंगी."

तुम सच ही तो कहती थीं बुआ, जीवनभर दुर्भाग्य की छाया तुम्हारे साथ-साथ चलती रही, पर अंत में तुमने उसे शिकस्त दे ही डाली.

आंसू पलकों से टूट-टूट कर गालों को भिगोते रहे और मैं उन्हें पोंछने का साहस न जुटा पाई कि हर बूंद में मुझे सुधा बुआ का चेहरा दिखाई दे रहा था.

छह बहनों, तीन भाइयों में सबसे छोटी थीं मेरी सुधा बुआ. दादाजी की गांव में बड़ी इज़्ज़त थी. खाता-पीता घराना था, ख़ूब ज़मीन-जायदाद थी. उस ज़माने में प्रत्येक घरों में आठ-दस बच्चे होना कोई विशेष बात नहीं होती थी, पर बेटियां पैदा होना तो शायद सदा से ही दुर्भाग्य की निशानी समझी जाती थी और समझी जाती रहेगी. दादाजी भी छह बेटियों के बोझ तले दब से गए, फिर भी आज की तरह उस समय लड़कों का इतना काल न था और न कैंसर की भांति जड़ें फैलाती दहेज की बीमारी.

बहनों में से तो कुछ का विवाह उस समय हुआ, जब सुधा बुआ मात्र तीन-चार वर्ष की रही होंगी. अलग-अलग, रूप-रंग वाली बहनों के अलग-अलग भाग्य थे. कोई धनवान घराने में ब्याही गई, तो कोई सामान्य से खाते-पीते घर में, पर सभी अपनी-अपनी जगह ख़ुश थीं. भाई भी अपने परिवार के साथ अच्छा जीवन व्यतीत कर रहे थे. सुधा बुआ कोई बहुत रूपवती तो नहीं थीं, पर आकर्षण था उनमें. सीधी-सादी नाममात्र की पढ़ी-लिखी.

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उस समय लडकियों की शिक्षा तो दूर की बात लड़कों को पढ़ाना भी ख़ास ज़रूरी नहीं समझा जाता था. पर पता नहीं यह कैसा संयोग था कि सुधा बुआ की जहां सगाई हुई वह घराना गांव में सबसे अधिक शिक्षित था. बहनें, भाभियां, सखी सहेलियां सुधा बुआ के भाग्य पर रश्क करने लगीं, बुआ भी बहुत ख़ुश थीं. इतने अच्छे घर की बहू बनने की तो कल्पना भी न की थी उन्होंने, क्योंकि अपनी बहनों में सबसे साधारण रंग-रूप उन्हें मिला था. पर यह ज़रूरी तो नहीं कि ऊपर वाला जिसे साधारण रंग-रूप दे उसका भाग्य भी उसी की भांति साधारण ही लिखे. शायद भगवान इसी प्रकार उन्हें ख़ुशियां देना चाहता था. इन्हीं रंग-बिरंगी कल्पनाओं में खोई बुआ कब दुल्हन बन गई उन्हें स्वयं ख़बर न हो सकी.

पर पता नहीं क़िस्मत को क्या मंज़ूर था. कभी-कभी हमारे अपनों से हुई छोटी सी भूल का प्रायश्चित हमें जीवनभर करना पड़ता है. पता नहीं सुधा बुआ का भाग्य ही ख़राब था या कुछ और...

हुआ यूं कि फूफाजी चूंकि शिक्षित थे और शहर में रहते थे इसलिए बारात में उनके कुछ ख़ास दोस्त आने वाले थे.

उन्होंने दादाजी के यहां कहलवा दिया था कि उनके दोस्तों और बारातियों का कुछ विशेष स्वागत किया जाए व उनके लिए कुछ ख़ास व्यंजन का भी प्रबंध किया जाए. उनकी यह मांग यूं तो कोई बहुत बड़ी मांग न थी, दादाजी के लिए तो बिल्कुल ही नहीं, पर ताया ने इसे अहं का प्रश्न बना लिया. उनका कहना था कि जिस प्रकार शेष बहनों की बारात का स्वागत हुआ है वैसे ही इस बारात का भी होगा, हमारे लिए सारी बहनें एक जैसी हैं दादाजी.

दादाजी ने लाख समझाने की कोशिश की पर वह न माने. बारात आई पर बजाय हंसी-ख़ुशी और कहकहों के माहौल में तनाव व्याप्त हो गया. फूफाजी को अपने दोस्तों के सामने शर्मिदा होना पड़ा. अपमान की आग से उनका तन-मन सुलग उठा. खैर शादी तो हो गई, बुआ बिदा होकर ससुराल भी पहुंच गई, पर वहां उन्हें स्नेह और प्रेम की बजाय तानों और व्यंग्यों के नश्तर मिले. फूफाजी के दिल में वह चाह कर भी जगह न बना सकी. शादी के दिन लगी वह गांठ उनके प्रेम व सेवा से भी न खुल सकी.

शायद समय उनके बीच उपजी यह दूरी मिटा देता यदि दुर्भाग्य की काली परछाइयां सुधा बुआ का साथ छोड़ देती. पर नहीं उसे तो बुआ की न जाने कितनी परीक्षाएं लेनी थी.

एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, चीथी, पांचवीं और छठी बार भी उनके यहां बेटी ही पैदा हुई. पति व ससुराल वालों की निगाहों में उनकी वैसे भी कोई हैसियत न थी. छह-छह बेटियां पैदा करने का गुनाह उन्हें सबकी नज़रों से गिराता चला गया. फूफाजी बहुत बड़े पद पर कार्यरत थे. हर प्रकार की सुख-सुविधाएं उपलब्ध रहती थी. पर बुआ के लिए कुछ या तो आंसू थे, दुख थे, निराशाएं थीं.

फूफाजी अपनी बेटियों को प्यार न करते हों ऐसी बात नहीं थी, बल्कि वह तो उन्हें बहुत चाहते थे. पर बेटियों की मां कूड़ा-करकट से भी गई गुज़री थी. बात-बात पर सबके सामने अपमानित कर देना उनके लिए बड़ी साधारण सी बात थी. बुआ बीमार रहने लगीं. सातवीं बार वह फिर बेटी नहीं जनना चाहती थी, पर फूफाजी के आगे उनकी क्या मजाल थी. सातवीं बार भगवान को शायद थोड़ा सा तरस आ गया बुआ पर, इस बार उनकी गोद में बेटा डाल दिया. बुआ को जैसे नया जीवन मिल गया था. ख़ुशी से फूली न समा रही थी. कितनी मन्नतों, कितनी प्रार्थनाओं के पश्चात् यह फल मिला था उन्हें.

मां-बहनों को भी बहुत प्रसन्नता हुई, दुखियारी बहन को कुछ तो ख़ुशियां मिली. बुआ मायके न के बराबर आती थीं. शादी के बाद फूफाजी ने उनके मायके जाने पर पाबंदी लगा दी थी. उन्हें घृणा थी अपने ससुराल वालों से. बड़े ताया को भी बाद में अपनी ग़लती का एहसास हुआ, उनकी भूल बहन के जीवन में विष घोल देगी शायद इसका आभास न था उन्हें, पर अब पछताने से भी वह उसका प्रायश्चित नहीं कर सकते थे.

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सबके बच्चे बड़े हो गए. शादी-ब्याह होने लगे. सुधा बुआ की बेटियों की भी एक के बाद एक, अच्छे घरानों में शादियां हो गईं. दो बेटियां डॉक्टर थी. बेटा भी डॉक्टर था. बुआ को बेटे की शादी का बड़ा अरमान था. वह अपनी पसंद की बहू लाना चाहती थी, पर यहां भी उनका दिल टूट गया. बेटे ने अपने लिए डॉक्टर लड़की का स्वयं ही चुनाव कर लिया. खैर, बुआ के लिए बेटे की ख़ुशी अधिक महत्व रखती थी. बड़ी धूमधाम से उनके इकलौते बेटे का ब्याह हुआ. बुआ बीमार थीं, पर ख़ुशी से फूली न समा रही थीं. शादी में सभी गए थे, वहीं पता चला कि बुआ को एक बार हार्ट अटैक हो चुका है. उनके ख़ुशी से चमकते चेहरे को देखकर कौन कह सकता था कि वह भीतर से कितनी खोखली हो चुकी हैं.

शादी हो गई. बहू भी आ गई. जल्द ही दादी भी बन गई वह, पर शायद ख़ुशियां उनके हिस्से में लिखी ही न थीं. बहू-बेटा दोनों' डॉक्टर थे, दोनों को नौकरी पर जाना होता था. दिनभर अकेली पोते से जी बहलाती रहती थी. फूफाजी घर में होते हुए भी उनके लिए कुछ नहीं थे. समय बीतता रहा, क्योंकि उसका काम ही है बीतते जाना.

एक बार राजन को किसी काम से अहमदाबाद जाना था, मैं भी बच्चों के साथ तैयार हो गई. बुआ से मिलने की ख़ुशी थी. कितने वर्षों बाद उन्हें देखूंगी. जाने क्यों सुधा बुआ से कुछ अधिक ही लगाव था मुझे. उनके लम्बे-चौड़े शानदार बंगले को देखकर शायद किसी को यह आभास भी न होता होगा कि इसमें रहने वाले दुखों के कितने निकट हैं.

बुआ कितने ही क्षण मौन ताकती रही थी मुझे. उनकी बूढ़ी आंखों में जाने क्या था, मैं अधिक देर तक ठहर न पाई, सीने से लग कर सुबक पड़ी.

उस रात जाने कब तक हम बातें करते रहे. उन्होंने जब बताया कि अनिल (बुआ का बेटा) उनसे बात तक नहीं करता, तो क्षण भर को विश्वास न हो सका मुझे.

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"इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं बेटी, स्त्री का मान-सम्मान सब पुरुष पर निर्भर होता है. यदि वह उसे इज़्ज़त देता है, तो सभी देते हैं. पुरुष की निगाहों में गिरी स्त्री सबकी निगाहों' से गिर जाती है, यहां तक कि ख़ुद की औलाद भी उसे फ़ालतू समझते हैं. पुरुषों के इस समाज में स्त्री का अपना कोई अस्तित्व नहीं. विवाह से पहले बाप और भाई के अधीन, विवाह के बाद पति के और बुढ़ापे में बेटों के अधीन होता है उसका वजूद."

इतना कहकर उन्होंने एक गहरी सांस ली और बोलीं, "अनिल ने सदा ही पिता के सामने मुझे अपमानित होते देखा. शायद इसीलिए जब उसे दो स्त्रियों के बीच निर्णय लेना पड़ा तो सदा की अस्तित्वहीन मां पत्नी के समक्ष फिर महत्वहीन रह गई. उसने पूरी तरह पत्नी का पक्ष ले लिया और बहू..."

उन्होंने फिर एक ठंडी सांस भरी और कहने लगी, "जिस बहू को मैंने बेटी से कम नहीं समझा, जिसकी अपनी सारी बीमारी भूल कर सेवा की. अपने हाथों से उसका लंच बॉक्स बना कर दिया करती, उस बहू की न जाने क्यों मैं मां के बजाय दुश्मन ही बनती चली गई. वह शुरू से ही खिंची खिंची रही. फिर मेरे ख़िलाफ़ अनिल के कान भरने शुरू कर दिए और अनिल- मेरा बेटा, वह बेटा जिसके जन्म के समय में मौत के मुंह से वापिस आई थी, वह बेटा, जिसको पाकर मैं जीवन के सारे दुख भूल गई थी अपनी पत्नी की झूठी शिकायतें लेकर मुझसे लड़ा. मुझे बुरा-भला कहा, यहां तक कि अब बात तक करना छोड़ दिया है. मैं इतने बड़े घर में अपनों के बीच एक ऐसा बोझ बन गई हूं बेटी, जिससे सभी दामन बचाते फिरते हैं. सभी..."

उनका गला रुंध गया और वह फफक-फफक कर रो पड़ीं और मैं पत्थर बनी केवल उनका मुंह ताकती रह गई. उनके आंसू पोंछते हुए तसल्ली के दो शब्द भी न बोल सकी. यूं भी उनके दुखों पर तसल्ली देने के लिए मेरे पास शब्द ही कहां थे?

जाने कितने क्षण बीत गए तब मैंने धीरे से पूछा, "और फूफाजी, उनका व्यवहार अब कैसा है बुआजी?"

वह फीकी सी हंसी हंस दीं, "फूफाजी‌ अब ठीक हैं. मुझे कुछ नहीं कहते शायद उनके हिस्से के अत्याचार अब समाप्त हो चुके हैं. मैं भी सब भूल चुकी हूं. यह सब तो भाग्य की बातें हैं. मेरा भाग्य ही खोटा था, अब तो बस एक ही इच्छा है, इस संसार से सुहागिन रहते ही विदा ले लूं, पर मुझ अभागिन के भाग्य में यह गौरव, यह सुख कहां."

"बुआ यह क्या कह रही हो, भगवान न करें, अभी तो..."

"सुन बेटी, मुझसे थोड़ी भी सहानुभूति है तो यही प्रार्थना करना, इसी में मेरी मुक्ति है." उन्होंने आंसू पोंछते हुए कहा था और मैं चुप रह गई थी.

तीसरे दिन मैं वहां से भारी मन से वापस चली आई थी. उन्होंने बड़ी आस से फिर आने को कहा था और अब मैं फिर उनके बंगले में जाने के लिए किसी तरह स्वयं को तैयार न कर पा रही थी, पर जाना तो था ही और मैं गई भी.

बेटियां, अभागिन मां के शव पर आंसू बहा रही थीं, बेटा भी रो रहा था और बहू भी दिखावे को आंखें पोंछ रही थी, पर इन रोने वालों में सबसे अधिक रोने वाले फूफाजी थे. पागलों की तरह सुधा-सुधा पुकार रहे थे. शायद सदैव उनका अत्याचार चुपचाप सहने वाली अस्तित्वहीन पत्नी का अस्तित्व आज उनकी समझ में आ गया था. आंसुओं की धुंध में मैंने देखा, बुआ को दुल्हन की तरह सजाया गया था और एक चीज़ जो सबसे अधिक स्पष्ट हो रही थी, वह था उनकी मांग में भरा लाल सिंदूर.

बुआ के तेजस्वी मुख पर एक निश्चिंत मुस्कान थी. जैसे कह रही हों, "देखो आज मैंने अपने निर्दयी भाग्य को शिकस्त दे दी और सुहागिनों का गौरव लेकर संसार से जा रही हूं, हूं न मैं भाग्यशाली!

- रखशिन्दा अख्तर रिज़वी हल्लौरी

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