कहानी- तीसरा मोड़ (Short Story- T...

कहानी- तीसरा मोड़ (Short Story- Teesra Mod)

उसे रात को जब कभी देर तक नींद नहीं आती, तो वह अपने तक़दीर पर सोचती, कैसी रूठी हुई है. जीवन में सुख-शांतिवाली गृहस्थी बसने ही नहीं देती. यहां भी लोग उसकी सुन्दरता को देख बातें करते. उन्हें लगता कि वह अभी अविवाहित है, पर अभी किसी को भी पता नहीं है कि वह दो बार विवाह बंधन में बंधने के बाद भी विधवा जीवन जी रही है. वह सोचती अब क़िस्मत ने ही बता दिया कि विवाह करना ठीक नहीं है और जब लोगों को मालूम पड़ेगा तो कौन बनना चाहेगा उसका जीवनसाथी.

पिछले एक सप्ताह से अरावली पर्वत मालाओं से घिरी छोटी काशी बून्दी में रिमझिम तो कभी मूसलधार हो रही. वर्षा सावनी गीत सुना रही थी. पहाड़ियां हरी-भरी हो मन को लुभाने लगी थी. झरने अपना जल संगीत सुनाने लगे थे और शहर की दोनों झीलें भी लबालब होने लगी थी.
वैसे आज सुबह से ही वर्षा थम सी गई थी. दिन में मौसम सुहावना हो गया था. आसमान में सतरंगी इन्द्रधनुष के रंग मन मोह रहे थे. शाम के ऐसे सुहावने मौसम में रोहन और रचना ने अपनी इकलौती बेटी, सोनल से कहा, ’’आज मौसम गरमा गरम पकौड़ी का है. पकौड़ी बना लेते हैं. चाय के साथ ठीक रहेगा.’’ मां की स्वीकृति के बाद वह किचन में जाकर पकौड़ी बनाने की व्यवस्था करने लगी.
रोहन व रचना बाहर बरामदे में बैठे बातें कर रहे थे. रोहन स्कूल में हेडमास्टर थे. एक साल पहले ही रिटायर हुए थे. सोनल उनकी लाडली बेटी थी. उसने ड्रॉइंग विषय में एम.ए. फर्स्ट डिविजन से पास की थी. टीचर बनने के लिये वह बी.एड. भी कर चुकी थी. सोनल कुछ समय अलग से बून्दी शैली के मिनिएचर कला सीखने लगी थी.
ईश्वर ने सोनल को गोरा रंग और मन मोहिनी रूप दिया था. उसकी आकर्षक आंखें, काले स्याह लंबे बाल और पांच फीट पांच इंच लंबाई वाली गदराये बदन की लड़की थी. उसे जो भी देखता बस देखता ही रह जाता.
उसने ड्रॉइंग विषय में व्याख्याता बनने हेतु पीएससी में इन्टव्यू भी दिया हुआ था.
रोहन और रचना ने अपनी एकमात्र सुन्दर बेटी, जो अब चौबीस वर्ष की हो चुकी थी की शादी के लिए चिंतित होने लगे. उन्होंने अपने समाज की मासिक पत्रिका में सोनल का परिचय रंगीन फोटो सहित प्रकाशित करवाया. उसकी सुन्दरता और योग्यता को देख कई प्रस्ताव शादी के लिए आने लगे, पर उन्होंने सोनल का विवाह बारां के एक सम्पन्न व्यापारी और लंबे-चौड़े खेत-खलियान के मालिक धन कुमार के यहां करना उचित समझा. उनका पुत्र सोमित्र भी एम.ए. एल.एल.बी. था. दिखने में वह स्मार्ट था.
सोनल और सोमित्र ने एक-दूसरे को दिल से पसंद किया. एक माह बाद दोनों का विवाह हो गया. सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व की बहू पाकर धनकुमार और उसकी पत्नी सुगना तो जैसे धन्य हो गए. उन्हें गर्व था कि सोमित्र को भाग्य से इतनी पढ़ी-लिखी और मन मोहिनी पत्नी मिली. जो भी रिश्तेदार और मिलनेवाले आते वह सोनल की सुन्दरता की तारीफ़ करते नहीं थकते.


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पर कुछ दिनों बाद लगा जैसे धनकुमार के परिवार को किसी की नज़र लग गई. एक दिन सोमित्र व्यापार के काम से कोटा कार से जा रहा था. सर्दी की सुबह थी. रास्ते में घना कोहरा छाया हुआ था. पास की वस्तुएं भी स्पष्ट दिखलाई नहीं दे रहीं थी. ऐसे में तेज गति से चल रही कार आगे चल रहे ट्रोले से जा टकराई. टक्कर इतनी भयंकर थी कि देखते ही देखते कार के आगे का हिस्सा चकनाचूर हो गया. सोमित्र जो स्वयं कार ड्राइव कर रहा था, उसका तो वहीं तुरंत प्राणान्त हो गया.
धन कुमार की तो जैसे दुनिया ही लुट गई. परिवार कई दिनों तक सदमें में रहा. लोगों ने उनसे इस अप्रत्याशित दुखद घटना पर सहानुभूति संवदेना प्रगट की. कोई कहता नई बहू का पग फेरा ही शुभ नहीं रहा. एक माह में ही सोनल की मांग का सिन्दूर उजड़ गया. सोनल की माता-पिता जिन्होंने अपनी इकलौती बेटी की शादी शान-शौकत से की थी, वह सब यादों में सिमट कर रह गया.
सोनल कुछ दिनों बाद अपने माता-पिता के पास आ गई. वह अब अपने भविष्य के बारे में सोचने लगी. पिता फिर से उसका नया घर बसाने के लिए लड़का तलाशने लगे. जैसे ही परिचितों को यह मालूम हुआ कि सोनल के माता-पिता उसका दूसरा विवाह करना चाहते है, तो कई एक से एक बढ़कर युवाओं की लाइन लग गई. किसी को भी उसके विधवा होने से कोई एतराज नहीं था. आख़िर सोनल कोहीनूर जो थी. जब भी किसी परिवार से युवा का प्रस्ताव आता, तो वह दुल्हन ही दहेज है के कथन को स्वीकारते हुए रोहन से कह देते, ’’आपको तो कुछ नहीं करना, सारा ख़र्च हमारा रहेगा. आप तो बस सोनल को लेकर हमारे शहर आ जाना.’’ आख़िर जिस युवा के साथ उस रूपवती सोनल का विवाह होगा वह तो स्वर्ग की इस अप्सरा को पाकर निहाल हो जाएगा.
सोनल से स्वजातीय और विजातीय, अच्छे पढ़े-लिखे, नौकरीवाले तथा लाखों रुपए कमानेवाले युवा रिश्ता करने के लिए लालायित थे. कोई भी उसकी योग्यता पर ध्यान न देकर बस उसके रूप लावण्य पर ही मोहित हुए जा रहा था. हर युवा मन ही मन प्रार्थना करता, कितना अच्छा हो कि यह स्वर्ग की परी उसकी जीवनसाथी बन जाए. माहौल ऐसा जैसे स्वयंवर रचाया जा रहा हो.
इस बार कई दिनों तक सोनल अपने नए जीवनसाथी के बारे में सोचती रही. कई युवक उससे मिल चुके. वह सभी से बातचीत कर चुकी थी. इस बार भी उसने जयपुर के एक धनाढ़य एवं स्मार्ट युवक गोविन्द शर्मा को पसंद किया. सोनल के माता-पिता को तो बस कन्यादान करना था. शादी का सारा ख़र्चा युवक के पिता सोने-चांदी के बड़े व्यापारी सज्जन कुमार को करना था.
अपने पुत्र गोविन्द की शादी में सज्जन कुमार ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. विवाह के आशीर्वाद समारोह में बड़ी संख्या में शहर के प्रतिष्ठित लोग सम्मिलित थे. कुछ लोग दबी जुबान से यह भी कह रहे थे, “इस धनाढ़्य के लड़के को इस विधवा के अलावा अन्य कोई लड़कियां पसंद ही नहीं आई क्या?’’ कुछ कहते, ’’अरे विधवा हुई तो क्या हुआ, लड़की तो देखो जैसे स्वर्ग की परी उतर के आई हो. कोयले की खान में जैसे हीरा मिला हो.”
शादी के बाद गोविन्द और सोनल सैर-सपाटे के लिए पहाड़ी स्थानों पर गए. जहां मन को सुकून देनेवाली शांति से भरा शुद्ध पर्यावरण था. ऐसे अच्छे प्राकृतिक वातावरण का उन्होंने जी भर कर आनन्द लिया. एक सप्ताह की हनीमून यात्रा के बाद वे जयपुर लौट आए.


सब कुछ प्रसन्न्ता से भरा माहौल बना हुआ था. सज्जन कुमार और उसकी पत्नी आरती, सोनल को बहू के रूप में पाकर गौरान्वित थे. उसकी सुन्दरता और मीठे व्यवहार से पूरे परिवार में आनन्द मंगल वाली स्थिति बनी हुई थी.
तीन माह गुज़रे थे कि एक दिन सदा की तरह गोविन्द बैंक में रुपए जमा करवाने गया हुआ था. बैंक खुला ही था. वहां अभी बैंक स्टाफ के अलावा दो-तीन लोग ही आए थे. तभी बैंक में डकैती की नीयत से तीन युवक मुंह में कपड़ा बांधे और हाथ में पिस्तौल व चाकू लिए कैशियर एवं वहां रुपए जमा करवाने आनेवालों पर टूट पड़े. बैंक कर्मियों की सूझबूझ और बहादुरी से वे बैंक राशि तो नहीं ले पाए. लेकिन जो लोग बैंक में रुपए जमा करवाने आए थे, उनके रुपए लूटने लगे. इस बीच गोविन्द से दो लाख रुपए से भरा बैग छीनने लगे. इस छीना-झपटी से एक लुटेरे ने उसके सिर पर गोली मार दी और रुपए लेकर भाग गए. गोविन्द को तुरन्त हाॅस्पिटल ले जाया गया, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका.
इस अनहोनी घटना से सर्राफ के घर रोना-पीटना शुरू हो गया. लोगों ने बहू सोनल को ही दुर्भाग्यशाली बताया. पहले ही विधवा इस अपशगुनी ने यहां भी अपने पति को निपटा दिया. तरह-तरह की बातें चलती रहीं.
जैसे-तैसे दो माह गुज़रे. उसे लगा यहां अपमानित होकर रहना व्यर्थ है. सोनल ने फिर अपने माता-पिता के घर रहकर ही अपना जीवन बिताने का निर्णय ले लिया. अब वही अपने माता-पिता का सहारा बनेगी.
रोहित और रचना भी सोनल के भाग्य पर विचार करते. कैसा दुर्भाग्य रहा है सोनल का. दोनों पति छह माह में ही चल बसे. अब उन्हें चिन्ता थी कि वे कहां तक सोनल को संभालेंगे? ख़ूबसूरती से भरी लड़की की जात है. कहां-कहां निगरानी रखेंगे? ज़माना कैसा होता जा रहा है. उनकी पेंशन से भी कहां तक गुज़ारा होगा और वे भी सदा थोड़े ही बने रहेंगे.
अब सोनल ने भी सोच लिया कि भाग्य उसके साथ नहीं है. तभी तो किसी भी पति के साथ जीवन कहां गुज़ार सकी.
सोनल को अपने पीहर में एक माह ही हुआ था कि उसका चयन लोकसेवा आयोग की ओर से ड्रॉइंग व्याख्याता में चयन हो गया. कुछ दिनों बाद उसकी नियुक्ति चितौड़गढ़ के एक गर्ल्स सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हो गई. अब वह वहीं रहने लगी. वहां दो कमरेवाला मकान किराए से ले लिया. कुछ दिन उसकी मां भी उसके साथ रही.
मां के जाने के बाद वह अकेली रहने लगी. जब वह पहली बार स्कूल ज्वाॅइन करने पहुंची, तो उसकी सुन्दरता और व्यक्तित्व के आकर्षण को देखकर सब मोहित हो गए.
वह स्कूल की छात्राओं को पूरे समर्पण भाव से पढ़ाती और ड्रॉइंग बनाने की कला सिखाती. उसने वहां कई कलाकृतियां बनाई. उसकी लैण्डस्केप, पोट्रेट और पेन्सिल स्केच में अच्छी पकड़ थी. उसे तो दुख इसी बात का था कि वह अपनी क़िस्मत से खेल में जीत नहीं पाई. छात्राएं भी उससे बहुत कुछ सीखने लगी. वे उसकी सुन्दरता व बेहतरीन कला सृजन की प्रशंसा करती.
कई टीचर्स उसका परिचय जानने की कोशिश करतीं, पर वह चुप रहती. उसने किसी के साथ मित्रता नहीं की. उसने नहीं बताया कि वह एक नहीं दो बार विधवा रूप लेकर जी रही है. स्टाफ उसकी सुन्दरता के चर्चे आए दिन करता.
सरकारी नौकरी लग जाने से सोनल के माता-पिता की उसे लेकर चिंता समाप्त हो गई. अब वह कभी उसके पास कुछ दिनों के लिए आ जाते.
सोनल को स्कूल में अध्यापन कराते दो वर्ष बीत गए. उसे धीरे-धीरे अपनी सृजन कला को निखारने का अवसर मिलता रहा. उसने शहर की ड्रॉइंग गैलेरी में अपने चित्रों की एक प्रदर्शनी लगाई. उसकी आर्ट को कई कला प्रेमी, काॅलेज व स्कूल के ड्रॉइंग टीचर देखकर उसकी कला की प्रशंसा करते. इससे सोनल व उसके स्कूल का गौरव बढ़ने लगा. अब कई छात्राएं ड्रॉइंग सीखने उसके घर पर आने लगी. कला अकादमी में भी उसने अपने पहचान बनाई. उसके बनाए चित्र कई प्रकाशकों की किताबों के कवर पेज पर स्थान पाने लगे. उसका विश्वास था कि वह अभी ड्रॉइंग के क्षेत्र में और ऊंची पायदान पर पहुंचेगी.
उसने कला के क्षेत्र में पीएचडी करने का मन बनाया. जल्द ही वह उदयपुर के एक चित्रकला विशेषज्ञ प्रोफेसर के अन्तर्गत पीएचडी करने लगी. अपनी लगन व मेहनत से उसने जल्द ही उदयपुर युनिवर्सिटी से डाॅक्टरेट की उपाधी प्राप्त कर ली.
अब सोनल का ट्रांसफर उदयपुर के एक सीनियर सेकेंडरी स्कूल में हो गया. वहां भी उसकी मनमोहिनी सुन्दरता ने स्कूल स्टाफ में अपना स्थान बना लिया. महिला टीचर्स भी उसकी सुन्दरता, गोरे रंग, मुस्कुराती आंखें, लंबे-काले बाल और व्यवहार की प्रंशसक थी. उसने लोगों के दिलों में जैसे मिश्री घोल दी. दूसरी ओर उसकी मौलिक कलाकृति उसके व्यक्तित्व को निखारने में महत्वपूर्ण बनी हुई थी.
उदयपुर में सहेलियों की बाड़ी के पास की काॅलोनी में वह कमरा किराए पर लेकर रहने लगी. अब वह स्कूल अपनी स्कूटी से जाती-आती. स्कूल में ही नहीं, वह जहां रहने लगी उसके आसपास भी उसकी ख़ूबसूरती की चर्चा होती.
सोनल घर के काम और स्कूल की भागदौड़ में दिनभर व्यस्त रहती. रविवार को शाम को झील के किनारे तथा अन्य प्राकृतिक आकर्षक स्थानों पर जाती. वहां के सुन्दर दृश्य को अपनी स्केच बुक में पेन्सिल से रफली स्केच कर लेती. फिर जब भी उसका मूड होता वह उसे विस्तृत रूप देती.


उसे रात को जब कभी देर तक नींद नहीं आती, तो वह अपने तकदीर पर सोचती. कैसी रूठी हुई है. जीवन में सुख-शांतिवाली गृहस्थी बसने ही नहीं देती. यहां भी लोग उसकी सुन्दरता को देख बातें करते. उन्हें लगता कि वह अभी अविवाहित है, पर अभी किसी को भी पता नहीं है कि वह दो बार विवाह बंधन में बंधने के बाद भी विधवा जीवन जी रही है. वह सोचती अब क़िस्मत ने ही बता दिया कि विवाह करना ठीक नहीं है और जब लोगों को मालूम पड़ेगा तो कौन बनना चाहेगा उसका जीवनसाथी. अब तो जो भी मुझसे विवाह बंधन के बारे में सोचेगा और जब वह यह जानेगा कि पूर्व में दो बार शादी हो चुकी है और दोनों पति दिवंगत हो चुके, तो कौन हिम्मत करेगा विवाह करने की? ठीक है जैसी ईश्वर की इच्छा है जी लूंगी.
सोनल से स्टाफ की महिला टीचर्स पूछती, ’’सोनल, तुम कब तक अकेली रहोगी? जीवनसाथी के साथ ही ज़िंदगी जीना ठीक रहता है.” पर सोनल उन्हें क्या बताए, क्या न बताए. वह तो बस उसकी सुन्दरता व युवा अवस्था को देखकर ही विचार प्रगट करतीं.
सर्दी के दिन थे. एक रविवार को सोनल सुबह सोकर उठी, तो उसे उसकी तबीयत ठीक नहीं लगी. सिरदर्द व हल्का बुखार था. उसने चाय पीकर पास के ही एक डाॅक्टर को दिखलाने चली गई. सुबह के नौ बजे थे. उस समय तक कोई पेशेन्ट भी नहीं था. उसने युवा डाॅक्टर राजकुमार को दिखाया. डॅाक्टर उसे देख मोहित हो गया. लगा जैसे मुंह में मिश्री घुल गई हो. डाॅक्टर ने उसकी जांच कर दवा लिख दी. “कल तक इन टेबलेट्स से तबीयत ठीक हो जाएगी. रात तक ही बहुत आराम मिल जाएगा. यदि ज़रूरत समझो, तो कल सुबह फिर दिखला देना. दिक़्क़त तो नहीं होगी?’’
“नहीं सर, मैं इसी काॅलोनी में कुछ दूरी पर रहती हूं.”
डाॅक्टर उससे बातें करने को उत्सुक था.
’’आप क्या सर्विस में हैं?’’ डाॅक्टर ने उसे और थोड़ी देर बिठाए रखने की गरज से पूछा.
’’जी. मैं यहां एक सीनियर सेकेंडरी स्कूल में ड्रॉइंग की व्याख्याता हूं.’’ तभी एक लड़का डाॅक्टर के लिए चाय लेकर आ गया. लड़के से मैडम के लिये भी चाय लाने को डाॅक्टर ने कहा.
’’मैं अभी चाय पीकर ही आई हूं.’’
“कोई बात नहीं हमारे साथ भी पी लिजिएगा.’’
’’मैं आपको अपने पास से टेबलेट्स दे रहा हूं. आपको लाना नहीं पड़ेगा. इन्हें बताए अनुसार समय पर ले लेना.’’
सोनल डाॅक्टर से पहली बार में ही इतनी सहानुभूति पाकर ख़ुश हो गई. उसने भी डाॅक्टर के साथ चाय पी. जाने लगी, तो डाॅक्टर ने कहा, ’’आप कल सुबह आकर अपनी तबीयत के बारे में बता देना. यह मेरा मोबाइल नंबर है. यदि ज़रूरत हो, तो आप शाम को भी आ सकती है. आपका मोबाइल नंबर भी बता दें.’’
घर जाकर सोनल ने दूध-ब्रेड लेकर दवा ले ली. दिन में भी डाॅक्टर के बताए अनुसार दवा ले ली. शाम तक कुछ आराम महसूस हुआ. रात को हल्का भोजन लिया. सोने लगी, तो वह डाॅक्टर के बारे में सोचती रही. कितना उत्सुक था वह उससे बात करने के लिए. लगता है तीस-पैतीस साल का कुंवारा है. मेरी सुन्दरता से दिल में प्रेम के तार झनझना उठे होंगे. तभी तो चाय का बहाना लेकर क्योंकर बिठलाता और क्यों अपने पास से गोलियां देता. यहां तक की ली गई फीस भी यह कहकर लौटा दी, ’’आप तो अपने ही पड़ोसी हो.’’ पूछे क्या कोई सभी पड़ोसी से फीस नहीं लेगा.
तभी डाॅक्टर का मोबाइल आया.
’’मैडम कैसी तबीयत है अब आपकी?’’
’’बिल्कुल ठीक हूं. कल स्कूल जा सकती हूं.’’
’’अच्छा मैं कह रहा था, आप ड्रॉइंग की व्याख्याता हैं. आपके हाथ की एक बेहतरीन कलाकृति क्लीनिक में लगाना है. यदि आप बनाकर देना चाहे तो अच्छा रहेगा और मैं इसका जितना मूल्य आप बताएंगी मैं दे दूंगा. मुझे एक-दो दिन में बताइगा.’’
एक दिन शाम को सोनल डाॅक्टर राजकुमार के यहां कलाकृति लेकर पहुंची. वह उस समय हाॅस्पिटल से आए थे. एक लड़के ने उसे अन्दर डाॅइंगरूम में बैठने को कहा. डाॅक्टर की मां अंजली भी वहां आकर बैठ गई. कुछ ही देर में डाॅक्टर भी आ गए. सोनल अख़बार में लिपटी कलाकृति को खोलकर कर दिखलाया. वह उन्हें बहुत पसंद आई. उनकी मां ने भी उसे पसंद कर उसकी प्रशंसा की.
तभी लड़का वहां चाय लेकर आ गया. डाॅक्टर ने सोनल का अपनी मां से यह कहकर परिचय कराया कि यह पास ही रहती हैं. बून्दी की रहनेवाली हैं. यहां एक स्कूल में ड्रॉइंग की लेक्चरर हैं. अंजली को तो कलाकृति की तरह सोनल भी दिल से भा गई.
डाॅक्टर राजकुमार के परिवार में उनकी मां और दो वर्ष का पुत्र था. पत्नी का एक्सीडेंट में छह माह पूर्व देहांत हो गया था. पिता तो बचपन में ही चल बसे थे. मां ने ही बेटे को उसकी रूचि अनुसार डाॅक्टर बनाया. एम.बी.बी.एस करने के बाद एम.डी. भी कर ली.
मां कहती है फिर से शादी कल लो, घर बस जाएगा. लेकिन वह कहता जिस दिन उपयुक्त लड़की मिल जाएगी, मैं शादी कर लूंगा. मां चाहती थी कोई डाॅक्टर लड़की मिल जाए, पर अभी तक कुछ हुआ नहीं.
अंजली ने सोनल से पूछा, ’’तुम यहां अकेली रहती हो?’’
’’हां, मांजी मैं यहां अकेली ही रहती हूं. माता-पिता बूंदी रहते हैं. मैं पिछले कुछ समय से सर्विस में हूं.’’
अंजली और डाॅक्टर राजकुमार को सोनल पसंद थी, लेकिन अभी यह जानना शेष था कि क्या वह अविवाहित है?
मां सोनल के बारे में जानने को उत्सुक थी, सो पूछ ही लिया, ’’अभी तुम्हारी शादी हुई या नहीं?’’
सोनल, डाॅक्टर की मां के प्रश्न से सोच में पड़ गई. वह इसका जवाब न देकर चाय समाप्त कर उठ कर जाने को हुई. तभी डाॅक्टर ने उससे कलाकृति के बारे में पूछा, ’’कितना मूल्य है इसका?’’
’’नहीं सर! मेरी ओर से भेंट स्वरूप है यह कलाकृति.’’ सोनल ने संक्षिप्त में कहा.
’’अरे, नहीं इसमें आपकी बहुत मेहनत है. ऐसा मत कीजिए. कुछ तो स्वीकार कीजिए.’’
’’नहीं, बिल्कुल भी नहीं.’’ वह चली गई.
डाॅक्टर ने सोनल की कलाकृति को उसी रूम में लगाया, जहां वह पेशेन्ट को देखते है.
एक रविवार को सुबह डाॅक्टर ने सोनल को फोन किया, ’’आज आपका लंच हमारे साथ रहेगा. मां मक्के के ढोकले बना रही है. वह बहुत स्वादिष्ट बनाती है.’’ सोनल ने उनके आमत्रंण को स्वीकार कर लिया.
सोनल डाॅक्टर के घर पहुंची. उसे लगा परिवार से निकटता बढ़ती जा रही है. डाॅक्टर का दो वर्ष का बच्चा उसके पास आया, तो वह भी उससे बोलने लगी. डाइनिंग पर तीनों खाना खाने बैठ गए. सोनल को दाल ढोकले का वैसा ही स्वाद आया जैसा उसकी मां बनाया करती है. इसी बीच डाॅक्टर की मां ने सोनल से पूछ ही लिया, “तुम्हारे माता-पिता तो बून्दी रहते हैं और उन्होंने तुम्हारा विवाह कहां किया?’’
इस प्रश्न के उत्तर में उसने चुप्पी साध ली और सोच में पड़ गई. क्या वह यह बता दे कि वह दो बार विवाहित हो चुकी, लेकिन क़िस्मत ने उसे दोनों ही बार विधवा रूप दिखा दिया.
मां ने सोनल से यही प्रश्न फिर से किया, तो अब सोनल को स्पष्ट कहना पड़ा, ’’मांजी! मेरा एक बार नहीं दो बार विवाह हो चुका है, लेकिन दोनों पतियों की कुछ समय बाद हादसों में मृत्यु हो गई. क़िस्मत को शायद यही मंज़ूर था. अब मैंने और शादी करने की संभावना पर ही विचार करना छोड़ दिया.’’
’’पर सोनल, अभी तो तुम्हारी उम्र ही क्या है? तुम्हें फिर से अपने वैवाहिक जीवन के बारे में सोचना चाहिए. जीवन-मृत्यु तो ऊपरवाले के अधीन है. जो जितनी उम्र लेकर आया है, वह उतना ही जीवन जीएगा. तुम्हारे साथ घटे हादसों को तुम्हें अपना दुर्भाग्य नहीं मानना चाहिए. जीवन तो ईश्वर की इच्छा मानकर जीने का आनन्द लेना चाहिए.’’
सोनल के बारे में सब कुछ जानने के बाद अंजली ने कहा, ’’सोनल, मैं अपनी ओर से तुम्हें अपनी बहू बनाने का प्रस्ताव रखती हूं. डाॅक्टर राजकुमार की उम्र अभी पैंतीस वर्ष है. इसकी पत्नी की भी कुछ माह पूर्व एक्सीडेंट में मृत्यु हो गई. एक पुत्र है दो साल का, जिसे तुमने बाहर देखा. उसे भी मां मिल जाएगी और राजकुमार को जीवनसंगिनी. आप विचार करना. अपने माता-पिता से भी सलाह लेना. हम वैष्णव समाज से हैं.’’


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’’मेरे माता-पिता अगले सप्ताह यहां आ रहे है उनके सामने मैं आपका प्रस्ताव रख दूंगी.’’ सोनल ने तो कभी सोचा भी न था कि उसकी ज़िंदगी में फिर कभी विवाह सम्बन्धी प्रस्ताव आएगा. वह यह अच्छे से जानती थी कि इस प्रस्ताव के दो प्रमुख कारण है एक उसका अच्छी सरकारी नौकरी में होना तथा दूसरा उसकी सुन्दरता. उसके आकर्षक व्यक्तित्व के चलते ही यह प्रस्ताव आया है.
वह रात्रि को सोने लगी, पर डाॅक्टर के जीवनसाथी बनने को लेकर सोचने लगी. क्या उसे अपने दोनों हादसों के होते हुए भी फिर से तीसरा रिश्ता स्वीकार करना चाहिए? और दूसरी तरफ़ वह अपनी ख़ूबसूरती व जवानी के बारे में सोचती. भविष्य किसके सहारे गुज़ारेगी. यही सब सोचती रही वह देर तक.
अगले सप्ताह सोनल के माता-पिता भी आ गए. एक-दो दिन बाद उसने डाॅक्टर के साथ सम्बन्ध जोड़नेवाली बात की चर्चा की. वे तो चाहते ही यह थे कि किसी भी प्रकार से एक बार फिर सोनल का घर बस जाए और अच्छा जीवनसाथी मिल जाए. उन्होंने सोनल को समझाया, “बेटी, यह प्रस्ताव तुम्हारे लिए किसी सौभाग्य से कम नहीं. आगे होकर सीमित वैष्णव परिवार से यह प्रस्ताव आया है, यह तो अच्छी बात है.’’
“एक बात और है डाॅक्टर विधुर है. उसकी पत्नी की कुछ माह पूर्व एक्सीडेन्ट में मृत्यु हो गई थी. दो साल का पुत्र भी है. घर में डाॅक्टर की मां है.’’
’’कल रविवार है, दिन में बातचीत करने चलेंगे. यदि सब कुछ सही बैठता है, तो विचार कर लेंगे.’’
सोनल ने रात को ही डाॅक्टर को फोन कर बता दिया, ’’मेरे माता-पिता आए हुए हैं. हम लोग कल दिन में आपके यहां आ रहे हैं.”
जब वे लोग डाॅक्टर के घर पहुंचे, तो वह पेशेन्ट देख रहे थे. वे लोग ड्रॉइंगरूप में बैठ गए. कुछ ही देर में डाॅक्टर राजकुमार और उनकी मां अंजली भी वहां आ गए. दोनों परिवारों के बीच इधर-उधर की बातें होने के बाद डाॅक्टर व सोनल के रिश्ते को लेकर बातचीत हुई. दोनों ओर से सहमति के बाद एक शुभ दिन दोनों का विवाह एक मन्दिर में पूरे विधि-विधान से सम्पन्न हो गया और दोनों सदा के लिए मज़बूत रिश्ते में बंध गए.
अब सोनल किराए का मकान छोड़ डाॅक्टर राजकुमार के मकान में रहने लगी. दोनों के जीवन में फिर से सावन-भादों सी हरियाली लौट आई. सोनल के माता-पिता चिंता मुक्त हो गए. उन्हें लगा फिर से बेटी के प्रति उन्होंने अपना उत्तरदायित्व पूरा कर दिया. डाॅक्टर की मां भी अब चिन्ता मुक्त होने पर प्रसन्न थी.
सोनल ने अब सिन्दूरी मांग के साथ रंगबिरंगी चूड़ियां और कलर फुल साड़ियां पहनकर स्कूल जाने लगी. उसे ख़ुशी थी कि एक बार फिर उसके भाग्य से बिखरे जीवन में ख़ुशियों भरा तीसरा मोड़ आया है.

दिनेश विजयवर्गीय

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Photo Courtesy: Freepik

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