तुम्हारे सिवा भी
दर्द बहुत थे
कुछ मिट गए
कुछ बीत गए
कुछ भूल गए
कुछ रीत गए
बाकी सब,
रह-रह चुभते हैं
पर एक वह
जो मिटा न बीता
भूला न रीता
और चुभना तो दूर
जिस कम्बख़्त ने
मुझे छुआ तक नहीं,
बस एक आदत-सा
जो साथ-साथ रहता है
रग-रग में बहता है,
पर आज भी कुंआरा है
वह दर्द तुम्हारा है...
- शशांक शेखर सिंह
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