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कहानी- तुच्छ सी अभिलाषा (Short Story- Tuchchh Si Abhilasha)

“… वो तो दीया ने बताया कि उनके ऑफिस में आनेवाला डिब्बे का खाना एक ज़रूरतमंद मां के हाथों से बना खाना ही है. यह बहू की डिप्लोमेसी नहीं, आज की पीढ़ी की जियो और जीने दो की पॉलिसी है. और सबसे बड़ी बात मुझ तुच्छ की एक तुच्छ सी अभिलाषा पूरी होने जा रही है.”

प्रतिदिन की तरह सुबह सात बजे स्मार्ट वॉच का अलार्म वाइब्रेट हुआ. गहरी नींद में ही मैंने उसे हल्का सा थपककर फिर सुला दिया. लेकिन 15 मिनट बाद ही वह फिर बीप बीप कर उठा. मजबूरन मुझे रजाई से निकलना पड़ा. एक तो मुई यह नींद भी भोर वेला में ही सबसे गहरी आती है और इतनी मीठी की बस इस मिठास का आनंद लेते रहो.
स्कूल के दिनों में एक कविता पढ़ी थी- पुष्प की अभिलाषा- चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं.. चाह नहीं देवों के सिर चढूं, भाग्य पर इठलाऊं.. मुझे तोड़ लेना वनमाली… पता नहीं पुष्प की अभिलाषा पूरी हुई या नहीं, पर मेरी भी एक अभिलाषा है सवेरे देर तक सोते रहने की. देखो कब पूरी होती है?


एक भरपूर अंगड़ाई लेकर मैंने बेमन से बिस्तर छोड़ा और रसोई में जाकर बेटे का टिफिन तैयार करने लगी. एक तो यह आधी  नींद में टिफिन बनाने से जाने कब छुटकारा मिलेगा? शादी के तुरंत बाद यही ज़िम्मेदारी पहले पति के लिए निभानी पड़ती थी. फिर काफ़ी समय तक पति और बेटे दोनों के लिए निभानी पड़ी.
बड़ा अजीब लगता था सवेरे उठकर पूरा खाना बनाना और हाथों हाथ आधे से ज़्यादा टिफिनों में भर देना. बचा खाना अपने लिए भी एक टिफिन में भरकर मैं सारे बर्तन धुलवा लेती थी, क्योंकि तब बाई एक व़क्त ही आती थी. संक्षेप में कहूं, तो मेरा और सवेरे के टिफिन का जन्म-जन्मांतर का साथ है. और सवेरे की मीठी नींद और मेरा जन्म-जन्मांतर का बैर है. जब से होश संभाला है, स्कूल जाने के लिए सवेरे जल्दी उठकर तैयार होना ही पड़ता था. यही सिलसिला कॉलेज जाने तक भी जारी रहा.
पढ़ाई पूरी होते ही शादी हो गई. ससुराल में सास-ससुर पर अच्छे इंप्रेशन के लिए सवेरे जल्दी उठकर, नींद में ही दो मग पानी डालकर, साड़ी लपेटकर कमरे से बाहर आना होता था. यह सोचकर संतोष कर लेती थी कि चलो थोड़े दिनों की बात है. जब पति के साथ दूसरे शहर जाकर रहूंगी, तब सवेरे की नींद का भरपूर आनंद उठाऊंगी. पर हाय रे क़िस्मत! दूर के ढोल सुहावने होते हैं सुना तो था, प्रमाण यहां आकर मिला.

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“बहुत दिनों तक कैंटीन का खा-पी लिया. अब सवेरे तुम्हारे हाथों का गरमा-गरम नाश्ता खाकर और स्वादिष्ट पैक्ड लंच लेकर निकलूंगा. शादीशुदा ज़िंदगी का यही तो मज़ा है.” पति ने इतने प्यार और अरमान से अपनी इच्छा ज़ाहिर की थी कि मुझे उनकी आशाओं पर तुषारापात करना उचित नहीं लगा. उनका मज़ा मेरे लिए हमेशा की सज़ा बन गई. यहां तक कि रात के मधुर पलों में भी मेरा दिमाग़ सवेरे के नाश्ते-खाने में ही उलझा रहता. क्या बन जाएगा जल्दी से? क्या सामान है घर में? क्या मंगाना है? और जब पेट में चिंकू के आने की सुगबुगाहट हुई, तो बची=खुची नींद भी उड़ गई. पहले मॉर्निंग
सिकनेस ने मीठी नींद को दुलती झाड़ी. रही-सही कसर अंदर से पड़नेवाली दुलतियों ने पूरी कर दी. जब मैं जग रही होती, वह अंदर चैन की नींद सोया रहता. और जब मैं सोना चाहती, उसकी अंदर से दुलतियां शुरू हो जातीं. जन्म के बाद और काफ़ी बड़े हो जाने तक भी उसने यह 36 का आंकड़ा निभाया. किसी के सामने दुखड़ा भी रोती, तो यही सुनने को मिलता सब बच्चे ऐसे ही करते हैं.
तुम्हारे कौन से अनोखे हैं? मैंने सोचा जब यह स्कूल जाने लगेगा, तब मैं चैन की नींद सोऊंगी.
उसका नर्सरी में एडमिशन करवाकर मैंने चैन की नींद लेने का ख़्याली पुलाव पकाना आरंभ ही किया था कि मेरे पुलाव की खिचड़ी बनाने पेट में मिंकू महाशय कूद पड़े. ठीक समझे आप! मैं दोबारा गर्भवती हो गई थी. एक बार फिर वही 36 के आंकड़े वाला साइकिल दोहराया गया. साथ ही आधी नींद में सवेरे जल्दी उठकर दो-दो टिफिन बनाने का सिलसिला भी चलता रहा. एक पति का
और एक चिंकू का. जब पति थोड़ी सीनियर पोज़ीशन पर आ गए और हमने उनके ऑफिस के पास ही घर ले लिया, तो उनका टिफिन बंद हो गया. लेकिन तब तक मिंकू का टिफिन शुरू हो गया था.

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हां, अलार्म क्लॉक की टन टन की जगह अब मोबाइल की अलार्म टोन ने जगह ले ली थी. लेकिन उससे क्या फ़र्क़ पड़नेवाला था? चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर, कटना तो हर हाल में खरबूजे को ही था. सवेरे की मीठी नींद के लिए तरसना तो मुझे ही था. दिन में सबके चले जाने के बाद सोने का प्रयास करती, तो एकाध झपकी ज़रूर ले लेती. पर सवेरेवाली मीठी नींद की क्रेविंग हमेशा बनी ही रही. अब तो मैंने उसके बारे में सोचना ही छोड़ दिया था. जो चीज़ भाग्य में है ही नहीं, उसके पीछे क्यों भागना? दिन की नींद ख़्वाबों को बनाने में गुज़र गई, रात की नींद बच्चों को सुलाने में गुज़र गई. जिस घर में मेरे नाम की तख्ती भी नहीं, मेरी सारी उम्र उस घर को सजाने में गुज़र गई.
पर कहते हैं ना जिस चीज़ से विमुख होना चाहो उसकी कमी और शिद्दत से महसूस होती है. चिंकू इंजीनियरिंग करने बाहर चला गया और मिंकू ने सीए ज्वाइन कर लिया, तो दबी हुई लालसा फिर जाग उठी. अब टिफिन का झंझट समाप्त. सुबह देर तक सोऊंगी, पर पता चला मिंकू को सवेरे कोचिंग में जाना है. वहां से वह सीधे आर्टिकलशिप के लिए ऑफिस चला जाएगा. और शाम को ही घर लौटेगा.
“फिर खाना-पीना?” मेरी ममता ने पहला सवाल यही किया था.
“ठेले वगैरह पर कुछ खा लूंगा मां. आप परेशान मत हो.”
“अरे कैसी बात कर रहा है? ठेलों का खाकर बीमार पड़ना है क्या? फिर एक-दो दिन की बात थोड़े ही है. ऊपर से पढ़ाई की मार अलग. मैं सवेरे जल्दी उठकर दो तरह के टिफिन तैयार कर दूंगी. अलग-अलग व़क्त पर खा लेना. कुछ सूखे नाश्ते भी डाल दिया करूंगी. थर्मस में छाछ, जूस…”
मीठी नींद पर ममता हावी हो गई थी. और जब तक मिंकू सीए नहीं बन गया, यह ममता हावी ही रही. इस दौरान संयोग से चिंकू की नौकरी इसी शहर में लग गई, पर ऑफिस बहुत दूर था.
“ऑफिस के पास ही कमरा ले लेता हूं. आने-जाने का समय बचेगा.” चिंकू ने सुझाव रखा था.
“पागल हुआ है इसी शहर में अलग घर लेकर रहेगा? घर से घटा-दो घंटा पहले निकल जाना. मैं जल्दी उठकर दूध-नाश्ता दे दूंगी. पैक्ड लंच दे दूंगी.”
“पर मां आपकी अब उम्र हो रही है.
कब तक हमारे लिए खटती रहोगी?” मां नामक इमोशनल फूल बस यहीं आकर तो ढेर हो जाती है.
“अरे, अब तो मैं इतनी अभ्यस्त हो गई हूं कि नींद में भी टिफिन बना सकती हूं. बल्कि सोचती हूं कभी जल्दी उठकर टिफिन बनाना छूट गया, तो मैं कैसे रहूंगी? क्या करूंगी?” सबकी हंसी छूट गई थी. मेरी सदाबहार दिनचर्या सदाबहार ही बनी रही. अब तो पति भी रिटायर हो गए थे.
“मैं तो रिटायर हो गया, पर तुम यह सवेरे जल्दी उठकर टिफिन बनाने की डयूटी से शायद कभी रिटायर नहीं होगी.”
“घूरे के भी दिन फिरते हैं. मेरे भी फिरनेवाले हैं.” मैंने रहस्यमयी मुस्कान बिखेरी.
“कैसे?”
“कानपुर वाली बुआजी ने एक रिश्ता भेजा है हमारे चिंकू के लिए. यह देखिए बायोडाटा, कुंडली. इधर घर में बहू का आगमन, उधर मेरा रसोई से बहिर्गमन. फिर तो देर तक तानकर सोऊंगी.” बरसों से सीने में दफ़न अरमान फिर से हुलसकर अंगड़ाई लेने लगे थे.
शाम को चिंकू को फोटा-बायोडाटा दिखाया, तो वह बिदक गया.
“मुझसे पूछ तो लिया होता. मैं अभी शादी के लिए तैयार नहीं हूं,” बहुत समझाने, कुरेदने पर पिटारा खुला कि जनाब अपनी एक सहकर्मी से प्यार में हैं. और उसी से शादी रचाएंगे.
“अरे तो पहले क्यों नहीं बताया?”
चट मंगनी पट ब्याह की तर्ज़ पर हम तुरंत ब्याह रचाकर बहू घर ले आए. उनके हनीमून पर चले जाने पर हमने न केवल घर समेटा, वरन उनके आने से पहले अपनी नींद भी पूरी कर ली.


बच्चों के लौटने के दिन समीप देख पतिदेव ने एक दिन अपनी रहस्यमयी चुप्पी तोड़ी, “बच्चों के लौटने की ख़ुशी तुम्हारी तरह मुझे भी है, लेकिन ज़रा सोचो बहू भी बेटे के साथ ही ऑफिस में नौकरी करती है, तो ज़ाहिर सी बात है दोनों साथ ही आएंगे-जाएंगे.”
“हां तो..?”
“नहीं मेरा मतलब है सवेरे भी साथ ही उठेंगे, तैयार होंगे.”
“हां तो…” मैं अभी भी कुछ समझने की स्थिति में नहीं थी. 
“नहीं मतलब तुम्हारी फिर से वही दिनचर्या शुरू हो जाएगी. सवेरे जल्दी
उठना, टिफिन…”
“ओह,तो यह चिंता सताए जा रही है आपको. ग़लती मेरी ही है. मैं ही घर समेटने में ऐसी मशगूल हो गई थी कि आपको बताना ही भूल गई. दरअसल, जाने से दो दिन पूर्व दीया मेरे पास आई थी. कुछ सकुचा सी रही थी. मैंने पूछा, “जाने की तैयारी हो गई? कुछ चाहिए तो नहीं साथ ले जाने के लिए? काफ़ी सूखा नाश्ता तो मैंने बना दिया है. बाकी तुम अपनी रुचि अनुसार रख लो. हमें परस्पर एक-दूसरे की रुचि, आदतें, स्वभाव आदि जानने में कुछ व़क्त तो लगेगा ही.”
“ज.. जी… वही बताना चाह रही थी. मुझे सवेरे देर तक सोने की बुरी आदत है. बहुत कोशिश कर ली, मम्मी-पापा ने भी बहुत समझाया, पर क्या करूं मुझे सवेरे ही मीठी नींद आती है. कभी मजबूरन उठना पड़े, तो पूरा दिन चिड़चिड़ाहट में गुज़रता है.”
“मैं समझ सकती हूं…” मेरे मुंह से बेसाख्ता निकल गया.
“मतलब आपको भी सवेरे देर तक सोना पसंद है?” हर्ष और विस्मय से दीया की आंखें चौड़ी हो गई थीं.
“पर मयंक तो बता रहे थे कि आप जल्दी उठकर उनका नाश्ता-टिफिन सब तैयार कर देती हैं.”
“मजबूरन करना पड़ता है. बरसों से मजबूरी में ही करती आ रही हूं.” खग ही जाने खग की भाषा, सोचकर मैंने अपनी व्यथा उड़ेल दी थी.”

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“फिर?” पतिदेव व्यग्र हो उठे थे.
उसका रुख एकदम बदल गया. चेहरे पर शर्मिंदगी का स्थान आत्मविश्‍वास ने ले लिया. “बोली मां, यह कोई ऐसी बहुत गंदी आदत भी नहीं है हम दोनों की. आख़िर हम महिलाओं को भी तो पूरा आराम और वह भी अपने बॉडीक्लॉक के अनुसार चाहिए होता है.”
“हां पर हम मासूम नारियां करें क्या? मजबूरियां देर तक सोने नहीं देतीं और ज़िम्मेदारियां सवेरे जल्दी उठा देती हैं.” हमदर्दी पाकर मेरे दिल के अरमान आंसुओं में बह चले थे.
“नहीं, अब आप और समझौता नहीं करेंगी. बहुत उठ लीं जल्दी और बहुत बना लिए टिफिन! हमारे ऑफिस में बहुत से लोग डिब्बा मंगवाते हैं. ताजा गर्म और घर का बना खाना होता है. हम वही मंगवा लेंगे. रही घर पर खाने की बात, तो मैंने एक कुक खोज ली है. वह नाश्ता, लंच, डिनर सब कुछ हमारे अनुसार, हमारे समय पर आकर बना देगी. मैं यही पूछने आई थी कि उसे कल से बुला लूं?”
“नहीं… नहीं… अभी तो पूरे घर में सामान बिखरा पड़ा है. तुम लोग भी नहीं होंगे. अभी किसी अजनबी को घर में बुलाने का रिस्क मैं नहीं लेना चाहती. फिर उसे कुछ दिन सब बताना भी पड़ेगा. मैं अपनी सुविधा अनुसार सब व्यवस्थित हो जाने पर उसे बुला लूंगी. तो सोच रही हूं अब कल से उसे बुला लूं.
नंबर तो मेरे पास है ही.”
“वाह! बढ़िया डिप्लोमेसी है बहू की. सोओ और सोने दो.”
“ऐसा क्यों सोचते हैं आप? मैं तो ख़ुश हूं कि उसने मेरे लिए इतना सोचा. मेरी परवाह की.” मुझे भावुक देख पतिदेव को अपनी ग़लती का एहसास हुआ.


“मैं शर्मिंदा हूं कि ऐसा कुछ मैंने क्यों नहीं सोचा? जबकि मन ही मन मैं भी जानता हूं कि तुम्हें सुबह की नींद बहुत प्यारी है. ऐसी कुछ व्यवस्था मैं भी तो कर सकता था.”
“अरे अब आप ख़ुद को दोषी समझने लगे. मेरा मंतव्य किसी को शर्मिंदा करने का नहीं है. आपको क्यों दोष दूं? मैं भी तो अपने लिए यह सब कर सकती थी. पर हमारी सोच हमारे ज़माने के अनुसार ही रही. मैंने अपनों का साथ पाने के लिए मीठे सपनों का साथ छोड़ना चुना. और ज़माने को भी क्या दोष देना? व़क्त से हारा या जीता नहीं जाता, केवल सीखा जाता है. हमारा बेटा तो इसी
ज़माने का है. उसे यह सब क्यों नहीं सूझा? बल्कि वह तो बड़े गर्व से मुझे बताता था कि ऑफिस के सभी लोग उससे ईर्ष्या करते हैं कि उसे अभी तक रोज़ मां के हाथ का स्वादिष्ट भोजन खाने को मिल रहा है.
वो तो दीया ने बताया कि उनके ऑफिस में आनेवाला डिब्बे का खाना एक ज़रूरतमंद मां के हाथों से बना खाना ही है. यह बहू की डिप्लोमेसी नहीं, आज की पीढ़ी की जियो और जीने दो की पॉलिसी है. और सबसे बड़ी बात मुझ तुच्छ की एक तुच्छ सी अभिलाषा पूरी होने जा रही है.”
“चाह नहीं मैं गहनों से लादी जाऊं, चाह नहीं मैं पान के पत्ते सी फेरी जाऊं…” पतिदेव का सप्तम स्वर में कविता पाठ शुरू हो गया, तो मैं भी पीछे नहीं रही.
“मुझे मीठी नींद सोने देना मेरे भरतार.. इस तुच्छ को है मात्र एक तकिए और चादर की दरकार…”

संगीता माथुर

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