“अरे मां तेरे ठाकुर जी भी तो काले हैं और तेरा बेटा भी काला. तो मेरी गुड़िया भी सांवली हो गई, मुझे तो इस रंग से ही बहुत प्रेम है.”
“माधव बेटा, देख ‘ठाकुर जी’ ने तुझे इतने साल बाद औलाद का सुख दिया भी तो बेटी देकर, उस पर भी काली.”
यह सुनकर दस साल बाद मातृत्व सुख में भीग रही रमा की आंखें भीग गईं. उसने अपने पति की तरफ़ देखा, जो अपनी बिटिया को गोद में उठाए निहार रहे थे.
“अरे मां तेरे ठाकुर जी भी तो काले हैं और तेरा बेटा भी काला. तो मेरी गुड़िया भी सांवली हो गई, मुझे तो इस रंग से ही बहुत प्रेम है.”
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“तेरी बात अलग थी बेटा, ये तो छोरी है. इसे तो रोज़ हल्दी का उबटन लगाना पड़ेगा. ऐसे तो इसकी शादी भी न हो पाएगी.”
“हां मां, इसे ख़ूब उबटन लगाएंगे, लेकिन हल्दी का नहीं शिक्षा का, जिसकी चमक से इससे जुड़ा हर रिश्ता चमक उठेगा.”
– पल्लवी विनोद
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