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कहानी- ज़िंदा पड़ाव (Short Story- Zinda Padav)

   
          

उनके साथ हुए अभद्र व्यवहार को मैं सह नहीं पाया, किंतु उन महिलाओं के पतियों को क्रोध क्यों नहीं आया? उन्होंने कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दिखाई? वे किस प्रकार इसे सह गए? क्या वे चुप और शांत रहकर अपने परिवार की रक्षा कर रहे थे और विवाद में फंसना नहीं चाह रहे थे?  यह दुनियादारी थी, समझदारी थी या उनकी कायरता थी?

कृतज्ञ अभी प्लेटफार्म तक पहुंचा भी नहीं था, तब तक ट्रेन पटरी पर रेंगने लगी थी. उसके तो होश उड़ गए. उसने सोचा, 'मैं जब तक वहां पहुंचूंगा, तब तक तो ट्रेन अपनी रफ़्तार में होगी.' एक समय के लिए तो कृतज्ञ के सामने पूरा करियर धराशयी होता दिखा. असफलता का पूरा दृश्य उसके सामने घूम गया. बड़े भाई उसे स्टेशन तक छोड़ने आए थे. कृतज्ञ का बैग उनके हाथ में था. उन्होंने निराश होते हुए कहा, “यह ट्रेन हम लोग नहीं पकड़ पाएंगे. हमें लौटना होगा."
मगर उसके दिमाग़ में तो कुछ और ही चल रहा था. उसने अपने को पूर्ण रूप से ट्रेन की रफ़्तार पर केंद्रित किया और हिम्मत बनाई. उसने अपना बैग झटके से उनके हाथों से लिया, कंधे पर लटकाया और बेतहाशा दौड़ पड़ा.  उसके भाई चिल्लाते हुए उसके पीछे दौड़ पड़े. वह ट्रेन छोड़ने की बात कह रहे थे, मगर उसने उनकी नहीं सुनी और ट्रेन के साथ होड़ लगा दी.
कृतज्ञ ध्यान से यह भी देख रहा था कि किस बोगी के दरवाज़े पर भीड़ नहीं है. अब तक ट्रेन अपनी पूरी रफ़्तार में थी, लेकिन उसने भी हार नहीं मानी. उसकी सांसें फूल गई थी. आख़िर उसे वह बोगी दिखी, जिसके दरवाज़े पर भीड़ नहीं थी और वह झटके से ट्रेन पर चढ़ गया.
चढ़ने के बाद मुड़कर उसने भाई को आश्वस्त करना चाहा कि वह ठीक है. उसे भाई तो नहीं दिखे, किंतु घूमने के क्रम में उसका बैग दरवाज़े से टकरा गया, जिससे उसका संतुलन बिगड़ गया. शायद वह ट्रेन से नीचे गिर पड़ता, किंतु उसके आत्मबल ने उसे गिरने नहीं दिया. उसने दरवाज़े के हैंडल को बहुत कस के पकड़ रखी थी, जिससे वह बच गया.
विडंबनाओं के कारवां में शामिल हो,  विचित्रताओं से कदम मिलाते हुए मानव जीवन के हर धागे के साथ पल-प्रतिपल जीता चला जाता है. एक छोटा सा बैग लटकाए जब बच्चा स्कूल जाता है, तो उसका कोमल मन किसी बोझ तले ना दबकर एक कौतूहल… एक जिज्ञासा… लेकर बाहर की दुनिया में प्रवेश करता है. ना अतीत… ना भविष्य… ना ही वर्तमान… उन्मुक्त होकर जीवन को खेल समझकर खेलता चला जाता है. उसके लिए तो जीवन होता है सिर्फ़ एक क्रीडा स्थल.  किंतु जैसे ही बचपन की दहलीज़ को लांघ कर जब वह किशोरावस्था में प्रवेश करता है, तब सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों के रेशे से बंधने लगता है. धीरे-धीरे यह रेशा बड़ा होता जाता है और बंधन भी कसने लगते हैं. वर्तमान और भविष्य के सफ़र को जोड़ने की कोशिश में वह कई पड़ावों, कई मोड़, कई चौराहों से गुज़रते हुए मंज़िल को पाने के लिए जीवन से होड़ लगा देता है. समय दौड़ता चला जाता है, परंतु छोड़ जाता है कुछ बातें कुछ यादें… उन पड़ावों का जो जीवनपर्यंत ज़िंदा रहते हैं.
कॉलेज, किताबें, मौज-मस्ती, पढ़ाई, बिंदास सोच, उत्तरदायित्वों का दूर-दूर तक कोई अस्तित्व नहीं. इन्हीं विलक्षण शब्दों से एक विद्यार्थी जीवन की एक तस्वीर बनती है. और सभी इसी तस्वीर को देखते हैं. किंतु यदि तस्वीर के पीछे हम झांक कर देखें, तो वहां सकारात्मक भविष्य के उत्तरदायित्व से लदी हुए एक परछाई दिखाई पड़ती है.

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सिविल सर्विसेज के पीटी परीक्षा में पास होने के बाद कृतज्ञ मेंस का परीक्षा देने पटना से दिल्ली जा रहा था. उसकी तैयारी बहुत अच्छी थी और पूरी तरह से आत्मसंतुष्ट था वह. मन में एक उम्मीद, स्फूर्ति और उल्लास लेकर वह इस परीक्षा को देने जा रहा था. यदि उसकी ट्रेन छूट जाती, तो वह परीक्षा नहीं दे पाता.
उस बोगी में उसे एक सीट मिल गई वह वहीं बैठ गया. टीटी जब टिकट चेक करने आया, तब उसने अपना टिकट दिखाते हुए बताया कि उसका दिल्ली तक का रिजर्वेशन है. उसने अपनी पूरी घटना सुनाई और फिर कहा कि अगला स्टेशन आते ही वह अपनी बोगी में चला जाएगा. जब वह दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन पहुंचा, तब वह उस बोगी से उतरकर अपनी बोगी में चढ़ा. उसे जब अपना बर्थ मिला तब जाकर उसे चैन आया.
भय, थकान और चिंता तीनों सम्मिलित रूप से उसके मन-मस्तिष्क पर छाए हुए थे. जिस तरह से तेज रफ़्तार में ट्रेन पर चढ़ा था, वह सोचकर अब उसे भय हो रहा था. दौड़ने के कारण थकान भी महसूस हो रही थी और भाई के लिए चिंता भी थी कि पता नहीं वह उसके लिए कितना परेशान होंगे. उस समय मोबाइल फोन का दूर-दूर तक निशान नहीं था. आज लगता है कि उस समय मोबाइल फोन होता, तो वह भाई से बात कर लेता.
यह कृतज्ञ को बाद में पता चला चला, जब वह परीक्षा देकर दिल्ली से लौटा था कि भैया घंटों सिर पर हाथ रखे स्टेशन पर बैठे रहे थे.
ट्रेन प्रयागराज और कानपुर के बीच में थी. बर्थ पर बैठा कृतज्ञ कुछ किताबें निकाल कर पढ़ रहा था. उस बोगी में दो-तीन परिवार बैठे हुए थे, जिसमें चार-पांच महिलाएं और चार-पांच पुरुष थे. वे ज़ोर-ज़ोर से बातें कर रहे थे. उसे थोड़ी परेशानी तो हो रही थी, किंतु उसने कुछ नहीं कहा और उसने किताब पर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया.
अचानक बगल से एक व्यक्ति बर्थ के सामने आया और महिलाओं को देखकर अभद्र बातें करने लगा. सीट पर जितने लोग बैठे थे, वे सभी शांत हो गए. उसका व्यवहार अभद्र होता जा रहा था. महिलाओं के बारे में वह अनाप-शनाप बोले जा रहा था. सारी महिलाएं उसे देख कर डर गई थी. वह बार-बार आता और उन लोगों को अभद्र बातें सुनाकर चला जाता. वहां पर बैठे सारे पुरुष उसके सामने कुछ नही बोल रहे थे, किंतु जब वह चला जाता, तो उसके बारे में बुरा-भला कहते.
कृतज्ञ ने उसे ध्यान से देखा उसने बहुत पी रखी थी. महिलाओं को देखकर वह अश्लील बातें करने लगा. बातचीत के क्रम में कृतज्ञ यह जान गया था कि वहां जितने भी पुरुष थे, वे सभी उन महिलाओं के पति थे. वह अचंभित था कि उन महिलाओं के पति बिल्कुल चुप थे. उन लोगों ने उस व्यक्ति को रोकने की कोशिश नहीं की. उसकी बातें सुनकर कृतज्ञ का क्रोध बढ़ने लगा था. वह अपनी सीट से उठा और सीधे उसके पास गया. सारी महिलाएं और पुरुष उसे देख रहे थे, लेकिन अब भी वे चुप ही थे. कृतज्ञ ने उसे डांटते हुए कहा, “शर्म नहीं आती तुम्हें  इस तरह का अभद्र व्यवहार करते हुए. कई परिवार यहां  बैठे हुए हैं और तुम इस तरह की हरकतें कर रहे हो."
कृतज्ञ के इस बात पर वह तन गया और उसके साथ गाली-गलौज करने लगा. बातें बढ़ने लगी थी. सबसे बड़ी बात यह थी कि वहां पर बैठे एक भी पुरुष ने उसका साथ नहीं दिया. उन्होंने उसकी तरफ़ से एक शब्द भी नहीं कहा. वह हिंसक हो उठा था.

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उसने कृतज्ञ के सिर पर वार करते हुए कहा, “मैं तुम्हें अभी यहीं ख़त्म कर दूंगा.” इस बात पर कृतज्ञ का क्रोध इतना बढ़ गया कि उसने सीधे उसका गला पकड़ा और खींचते हुए दरवाज़े के पास ले गया और कहा, “मैं ट्रेन से तुम्हें नीचे फेंक दूंगा.” वह अपने को छुड़ाने का प्रयास करने लगा. लेकिन कृतज्ञ ने इतनी मज़बूती से पकड़ रखी थी कि वह अपने को छुड़ा नहीं पाया.
उन महिलाओं के पति अब जाकर हरकत में आए, किंतु उन लोगों ने उस व्यक्ति को रोकने की बजाय कृतज्ञ को रोकने की कोशिश की. किसी ने उस व्यक्ति को कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं दिखाई. अचानक से उस व्यक्ति के कुछ दोस्त दौड़ते हुए आए और कृतज्ञ को रोकने की कोशिश की. 
कृतज्ञ ने ध्यान से देखा वे सभी फौजी की वर्दी में थे. कृतज्ञ के तेवर और डील-डौल को देखते हुए उन लोगों ने उसे भी फौजी समझ लिया. उस समय कृतज्ञ के बाल भी छोटे-छोटे फौजी स्टाइल में थे. वे सभी उससे माफ़ी मांगने लगे और कहा, “ सर इसे छोड़ दीजिए इसने बहुत ही शराब पी ली है. यह होश में नहीं है.”
कृतज्ञ ने उन्हें ख़ूब डांटा और कहा, "अब तक आप लोग कहां थे और यह कौन हैं?" उन्होंने बताया कि वह भी फौजी ही है, किंतु वर्दी में नहीं है.
“आप लोगों की इस तरह के व्यवहार की मैंने कल्पना भी नहीं की थी. एक फौजी को पूरा देश इज़्ज़त और सम्मान की नज़र से देखता है, पर इसने तो फौजी के सम्मान पर दाग़ लगाया है. फौजी देश की सुरक्षा के लिए शपथ लेता है, किंतु इसके कारण यहां की महिलाएं अपने आपको भयभीत और असुरक्षित महसूस कर रही थीं. उसने ग़ुस्से में कहा.”
“सर, आगे से ऐसा नहीं होगा हम लोग इस बात का पूरा ध्यान रखेंगे." उन लोगों ने खेद के साथ कहा. उन्होंने कृतज्ञ से दोस्ताना व्यवहार जताते हुए बताया कि वे किस रेजिमेंट से है और उन्होंने उससे भी पूछा, “सर आप किस रेजिमेंट से हैं?"
कृतज्ञ ने उनकी बात को टाल दिया और उसके साथी को छोड़ दिया. फिर आकर वह अपनी सीट पर बैठ गया. वे सभी अपने साथी को खींच कर ले गए.
ट्रेन अब तक कानपुर पहुंच चुकी थी. वह बड़ी दुविधा में था और उसकी समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह सही था या उन महिलाओं के पति? वह सोचने लगा‌ कि मैं अविवाहित था, फिर भी मुझे उन महिलाओं की चिंता हुई. उनके साथ हुए अभद्र व्यवहार को मैं सह नहीं पाया, किंतु उन महिलाओं के पतियों को क्रोध क्यों नहीं आया? उन्होंने कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं दिखाई? वे किस प्रकार इसे सह गए? क्या वे चुप और शांत रहकर अपने परिवार की रक्षा कर रहे थे और विवाद में फंसना नहीं चाह रहे थे? यह दुनियादारी थी, समझदारी थी या उनकी कायरता थी? 

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अक्सर वह अपने पिता के मुंह से सुना करता था, "अनजान जगह पर या अजनबियों से उलझना नहीं चाहिए. समझदारी से काम लेना चाहिए."
क्या उन महिलाओं के पतियों ने यही समझ कर कुछ नहीं कहा था या फिर वह व्यक्ति उन महिलाओं को स्पर्श नहीं कर रहा था, सिर्फ़ दूर से ही उन्हें अभद्र बातें कहता जा रहा था, शायद यही सोचकर वह चुप बैठे थे या फिर वह जानते थे कि वह फौजी है. और फौजी से उलझने से वह डर रहे थे.
क्या मैं ग़लत था? मुझे इस विवाद में नहीं पड़ना चाहिए था. मेरी परीक्षा है, मुझे अपने किताबों पर ध्यान देना चाहिए था. उन महिलाओं की सुरक्षा के लिए उनके पति तो उनके पास थे ही, मुझे बीच में नहीं पड़ना चाहिए था.
मन में द्वंद और हज़ारों सवाल थे. वह अनमना सा हो गया था. इस घटना ने कृतज्ञ को जीवन की बहुत बड़ी सीख दी. यदि स्वयं में दमखम हो, तभी बाहर किसी विवाद में पड़ो या किसी की मदद करो, क्योंकि बाहर एक व्यक्ति भी तुम्हारी मदद के लिए तैयार नहीं होगा…
मन में इतनी उथल-पुथल थी कि ट्रेन कब गाजियाबाद पहुंच गई, उसे पता ही नहीं चला. ट्रेन के रुकने और हॉकर्स की आवाज़ ने कृतज्ञ का ध्यान भंग किया. इतनी देर में वह अपनी परीक्षा की बात भी भूल गया था. तभी एक चायवाला आया. उसने उससे चाय ख़रीदी, ताकि मन फ्रेश हो सके. एक बात पर उसने और गौर किया कि स्टेट बदलते ही दूसरे स्टेट में प्रवेश करने पर लोगों की भाषा और बोलने के अंदाज़ भी बदल जाते हैं. चाहे पढ़े-लिखे हो या फिर उस चायवाले की तरह. सभी एक ही अंदाज़ में बोलते हैं.
उसने अपना ध्यान अपनी परीक्षा की ओर केंद्रित किया और अपना सामान ठीक करने लगा, क्योंकि ट्रेन अब दिल्ली पहुंचने ही वाली थी. इस बीच उसने देखा कि उन महिलाओं के पति उस फौजी को लगातार बुरा-भला कह रहे थे, किंतु किसी ने उससे कृतज्ञता नहीं जताई. उसके मन में खीझ हुआ कि सामने तो इनकी बोलती बंद थी और पीठ पीछे बुरा-भला कह रहे हैं.
ट्रेन दिल्ली स्टेशन पर पहुंच चुकी थी. कृतज्ञ ने उनकी तरफ़ देखा तक नहीं. उसने सीधे अपना बैग उठाया और दरवाज़े की तरफ़ चला. अचानक वह मुड़ा यह देखने के लिए कि कहीं सीट पर उसका कुछ छूट तो नहीं गया है. और दो पल के लिए वह हतप्रभ रह गया. उन महिलाओं के पति तो आपस में बातों में व्यस्त थे, लेकिन वे महिलाएं बड़ी कृतज्ञता से उसे देख रही थीं, मानो उनके दिल से दुआएं निकल रही हों. वे सभी उसके क़रीब आईं, धन्यवाद दिया और कहा, "आप के कारण ही आज हम लोग सुरक्षित दिल्ली पहुंच गए." कृतज्ञ ने उन्हें देखकर सिर्फ़ मुस्कुरा दिया, कहा कुछ भी नहीं और ट्रेन से नीचे उतर गया.
 वे आंखें, दुआओं के सागर सी कृतज्ञता की बहती नदी… अचानक उसकी सोच बदली, 'मैं सही था…' कृतज्ञ के ज़ेहन में यह पड़ाव हमेशा ज़िंदा रहा.

प्रीति सिन्हा  


        

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Photo Courtesy: Freepik

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