कहानी- अपने लिए 4 (Story Series- Apne Liye 4)

शेष जीवन में यदि कभी मेरी सहायता की आवश्यकता महसूस हो, तो बेझिझक मेरे पास आ सकते हो तुम. एक मित्र की हैसियत से मैं हमेशा तुम्हारी मदद के लिए तत्पर रहूंगी. अवधेषजी को कभी आपत्ति नहीं होगी, इसका मुझे विश्‍वास है, क्योंकि उनकी सोच काफ़ी व्यापक है.
शुभकामनाओं सहित.
नीचे तुम्हारी लिखना तो ग़लत होगा, क्योंकि जब तुमने मुझे कभी अपनाया ही नहीं तो मैं तुम्हारी कैसे हो सकती हूं?
अतः केवल संपूर्णा

अब सपना व रिया उम्र के उस मुक़ाम पर पहुंच चुकी है, जहां वे इन सारी स्थितियों को सही-सही समझने की क्षमता रखती हैं. अतः उनसे भविष्य में सामना होने पर तुम्हें किसी प्रकार की शर्मिंदगी महसूस करने की आवश्यकता नहीं होगी. उन्हें तुमसे कोई शिकायत नहीं है, बल्कि उनके मन में तुम्हारी एक ग्रेट पापा वाली छवि ही स्थापित की है मैंने.
रही अपने संबंधों की बात तो मेरे चले जाने से तुम्हें शायद कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, क्योंकि मेरा तुम्हारे घर में अब कोई रोल शेष रहा भी नहीं है. हां, पत्नी का स्थान निरर्थक रूप से ही सही, परंतु मेरी उपस्थिति से जो भरा हुआ था वह कल रिक्त हो जाएगा. हो सकता है इससे तुम्हारी सामाजिक प्रतिष्ठा पर आंच आए, परंतु बीते काल में जिस कुशलता व बुद्धिमानी से मैंने तुम्हारे सारे नाजायज़ कार्यों को ढांकने-छिपाने का कार्य किया है- आशा है तुम भी ऐसा ही कुछ अवश्य कर लोगे या शायद तुम्हारे आधुनिक परिवेश में इसकी आवश्यकता ही न पड़े.
शेष जीवन में यदि कभी मेरी सहायता की आवश्यकता महसूस हो, तो बेझिझक मेरे पास आ सकते हो तुम. एक मित्र की हैसियत से मैं हमेशा तुम्हारी मदद के लिए तत्पर रहूंगी. अवधेषजी को कभी आपत्ति नहीं होगी, इसका मुझे विश्‍वास है, क्योंकि उनकी सोच काफ़ी व्यापक है.
शुभकामनाओं सहित.
नीचे तुम्हारी लिखना तो ग़लत होगा, क्योंकि जब तुमने मुझे कभी अपनाया ही नहीं तो मैं तुम्हारी कैसे हो सकती हूं?
अतः केवल
संपूर्णा
पूरी चिट्ठी पढ़कर भास्कर ने चाय पर नज़र डाली, जो ठंडी हो चुकी थी. संपूर्णा होती, तो बिन कहे अब तक चाय गर्म कर रख जाती, अख़बार पढ़ते व़क़्त भी तो रखी चाय कई बार पीना भूल जाते थे भास्कर…
‘संपूर्णा को मैंने पत्नी कभी नहीं माना, पर उसने तो पत्नी के कर्तव्यों से कभी मुंह नहीं मोड़ा था. मैंने उसे केवल शारीरिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानसिक स्तर पर भी तो अकेला छोड़ दिया था. उसने मुझसे कभी कुछ नहीं मांगा, बल्कि जाने-अनजाने मैं ही उस पर इतना निर्भर हो गया था, यह अब महसूस हो रहा था.
संपूर्णा ने तो साबित कर दिया कि वह आदर्श पत्नी ही नहीं, आदर्श मां भी है. पर इन सबसे पहले वह इंसान भी तो है, उसे पूरा हक़ है अपने बार में सोचने का.. ख़ुश रहने का.’
एक लंबी सांस भरकर रह गए थे भास्कर. आख़िर उसे वापस बुलाते भी तो किस हैसियत से.

स्निग्धा श्रीवास्तव

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