कहानी- बदलते समीकरण 1 (Story Series- Badalte Samikaran 1)

समझ में नहीं आ रहा था क्या करूं…? कहां तो मैं उसकी मित्र बनकर उसे पालना चाहती थी, पर अब जब भी कुछ कहती तो सीधा बोल देती, “ममा, आप तो मेरी जासूसी करती रहती हो. क्या आपको मुझ पर विश्‍वास नहीं है?”

“तुझ पर तो विश्‍वास है बेटा, पर दुनियावालों पर नहीं है.”

“ऐसा वही लोग बोलते हैं, जिन्हें स्वयं पर विश्‍वास नहीं होता.”

“अति आत्मविश्‍वास वाले ही धोखा खाते हैं. हो सकता है जिसे तू अपना मित्र समझ रही है, वही तुझे धोखा दे दें.” उसने उसे समझाना चाहा.

“ममा, अगर ऐसा है तो किसी को दोस्त ही न बनाया जाए, क्यों?” आश्‍चर्य चकित मुद्रा में उसने पूछा.

शहर में नित्य अपराधों के बढ़ते ग्राफ़ के मद्देनज़र सुश्री दिव्या खन्ना की नियुक्ति इस शहर में की जा रही है. वे जहां-जहां रही हैं, वहां उनके रहते अपराधों में भारी कमी आई है. अपराधियों पर सख़्ती बरतने के साथ-साथ वह उन्हें सामान्य ज़िंदगी जीने की ओर प्रेरित करने से भी नहीं चूकी हैं. इसके साथ ही वह पुलिस फोर्स को भी अपराधियों से जूझने के नये-नये तरी़के सीखने की ट्रेनिंग लेने के लिए भी प्रोत्साहित करती रही हैं. उनकी नियुक्ति की ख़बर से अपराधियों में अफ़रा-तफ़री मच गई है…’

अख़बार में छपी ख़बर पर आकांक्षा की आंखें ठहर ही गईं. तो क्या दिव्या का स्थानांतरण यहां हो रहा है. कितने दिनों बाद वे सब साथ-साथ रह सकेंगे. उसने इस ख़बर की पुष्टि के लिए दिव्या के घर फ़ोन किया, पता लगा कहीं बाहर गई हैं. देर रात तक लौटेंगी.

बात न हो पाने पर चिंता तो हो ही जाती है, पर उसका कार्य ही ऐसा है. अपराध और अपराधियों के बीच झूलती दिव्या कभी उन्हें स्मरण भी करती होगी, उसे संदेह था. मन अनायास ही अतीत की ओर मुड़ गया.

दिव्या उनकी एकमात्र संतान थी. उसके साथ हुए हादसे ने उन सबको हिला कर रख दिया था. जीवन तो हादसों का ही नाम है. पर अगर जिजीविषा हो. संकटों में भी इंसान टूटे नहीं. निरंतर संघर्ष करता रहे, तो सफलता अवश्य ही मिलती है. उन सबने भी उस स्थिति का सामना बड़ी बहादुरी से किया था.

नन्हीं दिव्या याद आई, जिसकी हर ख़ुशी को पूरा करते वे फूले नहीं समाते थे. शायद उनके इसी अधिक लाड़-प्यार और देखभाल ने उसे ज़िद्दी बना दिया था. जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, वह तुनकमिज़ाज और ज़िद्दी बनती चली गई. जिस बेटी को वह सहेली बनकर पालना चाहती थी, उसके लिए वह पुराने ज़माने की मां बनकर रह गई.

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कॉलेज में पहुंचते ही उसकी नई-नई फरमाइशें शुरू हो गईं. तरह-तरह की नई ड्रेस, मैचिंग जूते, पर्स इत्यादि ख़रीदे गए. टू व्हीलर भी अब आवश्यक हो गया. अब तो मानो उसके पर ही निकल आए. घर में वह टिकती ही नहीं थी, कुछ कहते तो चिढ़ जाती. दुख तो इस बात का था कि अपनी ही बेटी अपने लिए पराई होती चली जा रही थी.

विनय से कहती तो वह कहते, “क्यों चिंता करती हो, यह उम्र ही ऐसी है. इस समय शरीर में होनेवाले हार्मोनल परिवर्तन युवाओं के शरीर के साथ-साथ मानसिक स्थिति में भी परिवर्तन ला देते हैं. इसीलिए बाल्यावस्था और युवावस्था के मध्य के इस काल को संक्रमणकाल भी कहा जाता है. इस उम्र में ज़्यादा टोका-टोकी करने पर बच्चों को अपने ही माता-पिता अपने दुश्मन नज़र आने लगते हैं, इसीलिए कहा गया है कि इस समय बच्चों के साथ माता-पिता का नहीं, बल्कि दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए.”

“मैं तो उससे मित्रवत् व्यवहार ही करना चाहती हूं, पर वह कुछ कहे-सुने तब न. उसने तो घर को सराय बना रखा है. आने-जाने का कोई समय ही निश्‍चित नहीं है.” न जाने क्यों वह आवश्यकता से अधिक तिक्त हो चली थी.

“सब ठीक हो जाएगा, तुम चिंता मत करो.” कहकर विनय ने बातचीत का विषय बदल दिया था.

जबकि मेरा सोचना था कि बच्चों को पैसे के महत्व का भी पता होना चाहिए. उनकी उतनी ही इच्छाएं पूरी करनी चाहिए जितनी आवश्यक हों.

इसी बात पर मेरी अक्सर दिव्या से बहस हो जाती.

एक ऐसे ही दिन आने में देर होने पर उसने उस मित्र के घर फ़ोन कर उसके बारे में पता करना चाहा तो पता चला कि वह तो काफ़ी पहले निकल चुकी है. उस दिन मन बहुत ही अशांत रहा. बाहर बरामदे में बैठी उसका इंतज़ार कर ही रही थी कि उसकी स्कूटी गेट पर रुकी, साथ ही दूसरे स्कूटर पर कोई लड़का उसे बाय कहता हुआ निकल गया.

पूछने पर चिढ़कर बोली, “हां मेरा दोस्त था.”

समझ में नहीं आ रहा था क्या करूं…? कहां तो मैं उसकी मित्र बनकर उसे पालना चाहती थी, पर अब जब भी कुछ कहती तो सीधा बोल देती, “ममा, आप तो मेरी जासूसी करती रहती हो. क्या आपको मुझ पर विश्‍वास नहीं है?”

“तुझ पर तो विश्‍वास है बेटा, पर दुनियावालों पर नहीं है.”

“ऐसा वही लोग बोलते हैं, जिन्हें स्वयं पर विश्‍वास नहीं होता.”

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“अति आत्मविश्‍वास वाले ही धोखा खाते हैं. हो सकता है जिसे तू अपना मित्र समझ रही है, वही तुझे धोखा दे दें.” उसने उसे समझाना चाहा.

“ममा, अगर ऐसा है तो किसी को दोस्त ही न बनाया जाए, क्यों?” आश्‍चर्य चकित मुद्रा में उसने पूछा.

“मैं तो तुझे ऊंच-नीच समझा रही थी. स्त्री की दौलत उसका चरित्र ही है. अगर वही नहीं रहा तो मान-सम्मान, धन-दौलत सब व्यर्थ है.”

पर वह तो कब की जा चुकी थी. सच एक लड़की की मां होना कांटों का ताज पहनने के बराबर है. ख़ासतौर से तब, जब लड़की सुंदर हो, नादान हो और जवानी की ओर क़दम बढ़ा रही हो. कितनी ही शंकाएं, कितने ही संदेह मन को घेरे रहते हैं. उस पर भी यदि वह बच्ची मां की परेशानी को समझ नहीं पाए. उसे रूढ़िवादी, परम्परावादी इत्यादि अनेक अलंकरणों से युक्त कर सदैव कटघरे में खड़ा कर अपमानित करे तो बेचारी मां अंत:कवच में सिमटने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती है.

परेशानी तो उसे तब होती थी जब वह दिव्या को पढ़ने की बजाय सजने-संवरने में ज़्यादा ध्यान देते हुए देखती. विनय से कहती तो उनका वही रटा-रटाया जवाब होता, “तुम व्यर्थ परेशान हो रही हो, यह उम्र ही ऐसी है. कुछ दिनों बाद सब ठीक हो जाएगा.” एक दिन वह शॉपिंग करके लौट रही थी कि देखा दिव्या किसी के साथ बाइक पर बैठी जा रही है.

अपना स्कूटर होते हुए भी भला वह दूसरे के स्कूटर पर कहां जा रही है? इस समय तो उसका क्लास होना चाहिए, फिर यह बाहर कहां घूम रही है? सोचते हुए उसने ऑटोवाले से उनका पीछा करने के लिए कहा, पर जब तक ऑटो मुड़ता तब तक वे आंखों से ओझल हो गए. मन मारकर घर लौट आई.

– सुधा आदेश

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