कहानी- बाजूबंद ३ (Story Series- ...

कहानी- बाजूबंद ३ (Story Series- Bajuband 3)

“तुम्हारे बिना कुछ नहीं हूंं मैं! तुमने मुझे, इस घर को सदैव टूटने-बिखरने से बचाया है. तुम्हारे संरक्षण में यह
घर-परिवार हमेशा एक रहेगा, ऐसा मेरा विश्‍वास है. बस, सुकेश के लिए
कभी-कभी मन उदास हो जाता है. कैंसर से सुमन के असामयिक देहावसान ने बेचारे को अकेला कर दिया है…”

 

 

 

 

… “हो सकता है घर पर ही पड़ा हो. बहुत पहले जब हमने लॉकर शिफ्ट किया था, तब सारे डिब्बे घर लाए थे. हो सकता है वापिस रखते समय वो डिब्बा घर रह गया हो. पर डिब्बा न मिलना था न मिला.”
मुझे सब याद आ रहा था. कैसे उस समय सुकेश भैया मां-बाउजी से भी ज़्यादा परेशान नज़र आ रहे थे.
“समझ नहीं आ रहा ज़मीन निगल गई या आसमां खा गया. हमेशा मां-बाउजी के साथ मैं ही लॉकर ऑपरेट करने जाता हूं सबसे ज़्यादा मेरी ज़िम्मेदारी बनती है.”
‘तू परेशान मत हो. भाग्य में होगा, तो अपने आप मिल जाएगा. मां-बाउजी, आप भी अब इसे जेहन से निकाल लौटने की तैयारी कीजिए. कल सवेरे हमें निकलना है.” राकेश ने समझाया था. बाकी सब तो शांत हो गए थे, लेकिन मांजी ने तब से न कुछ खाया, न पीया, न एक शब्द भी बोलीं. उन्हें गहरा सदमा लगा था. हम उनका दर्द समझ रहे थे. हर स्त्री को अपने आभूषण प्रिय होते हैं. फिर बाजूबंद में तो मांजी के प्राण बसते थे. वह था ही इतना ख़ूबसूरत, जड़ाऊ और राजसी! अपनी मां की यह उनके पास अंतिम निशानी थी. मांजी उस रात सोई, तो फिर कभी नहीं उठीं. नींद में ही उन्हें साइलेंट हार्टअटैक आ गया था.

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बाहर पदचाप हुई तो मैं और सुकेश भैया सचेत हुए.
“इसे अंदर रख दीजिए. भैया आ गए लगते हैं.”
“अरे सुकेश, सोया नहीं अभी तक? थोड़ा आराम कर ले, बीमार हो जाएगा. सारा तूने ही संभाल रखा है.” बड़े भाई का प्यार बरस पड़ा था.
कपड़े बदलकर बिस्तर पर लेटे, तो राकेश ने मेरा हाथ अपने हाथों में ले लिया.
“तुम्हारे बिना कुछ नहीं हूंं मैं! तुमने मुझे, इस घर को सदैव टूटने-बिखरने से बचाया है. तुम्हारे संरक्षण में यह
घर-परिवार हमेशा एक रहेगा, ऐसा मेरा विश्‍वास है. बस, सुकेश के लिए
कभी-कभी मन उदास हो जाता है. कैंसर से सुमन के असामयिक देहावसान ने बेचारे को अकेला कर दिया है.
पिंकी-मिंकी भी कितना संभालें? उनके अपने भी तो परिवार है. अब तो हम ही उसके सब कुछ हैं. वह ज़िद नहीं करता, तो मैं इतने बड़े सेलिब्रेशन के लिए कतई तैयार नहीं होता. महीनेभर से जुटा है बेचारा! तुम्हारे मातृवत स्नेह ने ही उसे इस क़ाबिल बनाया है…” भावनाओं का निर्बाध बहता झरना संवेदना के अतिशय आवेग के कारण थमने को हुआ, तो मैंने उस प्रवाह को बांहों में समेट लिया.
“अब सो जाते हैं. सवेरे जल्दी उठकर शेष मेहमानों को विदा करना है.”
लेकिन ख़ुद मेरी ही आंखों से नींद कोसों दूर थी.

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

संगीता माथुर

 

 

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