कहानी- चरित्रहीन 1 (Story Series- Charitrheen 1)

 

के. के. बोला, “सर, पार्टी किस ख़ुशी में?”
के. वाई. भी चौंकी, “वैसे सर, आज पार्टी किस ख़ुशी में हो रही है?”
“अब आप भी पूछेंगी तो कैसे काम चलेगा? अरे, आपके लेट आने की ख़ुशी में.”
“बस, सर और शर्मिंदा मत कीजिए.”
“लो भई, मैंने कुछ कहा क्या किसी को? एक तो पार्टी दी और ऊपर से बात भी सुनो. आप रोज़ लेट आया करिए, हमारी पार्टी हो जाएगी.” और फिर एक ज़ोरदार ठहाके की आवाज़ गूंज उठी.

आर. के. मोहन अपने केबिन से निकले और मुस्कुराते हुए बोले, “आइए मिस के. वाई., आपके आते ही ऑफ़िस में ख़ुशबू फैल गई. देखिए, ज़रा जल्दी आएंगी तो स्टाफ़ थोड़ा और पहले आने लगेगा और हम लोगों को भीनी-भीनी सुगंध का एहसास भी होता रहेगा.” यह सुनकर सारा स्टाफ़ ज़ोर से हंसने लगा.
“प्लीज़ बैठिए मिस के. वाई., वैसे आज देर कैसे हो गई? बस छूट गई, लंच रह गया या फिर कोई मिल गया था?”
“सर, आई एम सॉरी. अब कभी देर नहीं होगी.”
तभी आर. के. मोहन ने रामू को पूरे स्टाफ़ के लिए समोसे लाने के लिए कहा. अभी तक सीरियस लग रहा ऑफ़िस का माहौल काफ़ी हल्का हो गया था.
के. के. बोला, “सर, पार्टी किस ख़ुशी में?”
के. वाई. भी चौंकी, “वैसे सर, आज पार्टी किस ख़ुशी में हो रही है?”
“अब आप भी पूछेंगी तो कैसे काम चलेगा? अरे, आपके लेट आने की ख़ुशी में.”
“बस, सर और शर्मिंदा मत कीजिए.”
“लो भई, मैंने कुछ कहा क्या किसी को? एक तो पार्टी दी और ऊपर से बात भी सुनो. आप रोज़ लेट आया करिए, हमारी पार्टी हो जाएगी.” और फिर एक ज़ोरदार ठहाके की आवाज़ गूंज उठी.
इस बीच रामू गरम-गरम समोसे ले आया और सभी मज़े से खाने लगे. ऑफ़िस में ऐसा ख़ुशनुमा माहौल देख मिस के . वाई. के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई. मिस के. वाई. को आर. के. मोहन ने बुलाया और बोले, “सारे अकाउंट्स पिछले पांच साल के रिकॉर्ड के साथ तैयार रखना. पता नहीं किस डेटा की ज़रूरत पड़ जाए. मैं आपकी मदद के लिए यहां हूं और आप मुझसे कुछ भी पूछ सकती हैं.” उनकी बात सुन मिस के. वाई. मुस्कुरा दी.
सचमुच बहुत काम था उस दिन और जब मिस के. वाई. ने काम ख़त्म कर सिर उठाया, तो होश आया कि शाम के साढ़े छह बज गए हैं. चार्टर्ड बस तो अब तक जा चुकी होगी. इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती, आर. के. मोहन बोले, “मिस डोंट वरी. मैं आपको रास्ते में घर छोड़ता हुआ निकल जाऊंगा.”
आर. के. मोहन ने गाड़ी पार्किंग से निकाली और मिस के. वाई. के साथ चल पड़े. आर. के. मोहन ने एक फ़ास्टफूड रेस्तरां के आगे गाड़ी रोकी और कुछ पैक कराया. भीतर बैठते ही एक पैकेट के. वाई. को देते हुए कहा, “ये लीजिए मिस, यह हमारी तरफ़ से. आज आपने सचमुच बहुत काम किया है.”
पैकेट से आ रही ख़ुशबू से के. वाई. को एहसास हुआ कि भूख लगी है और वह बिना संकोच के पैकेट से बर्गर निकाल कर खाने लगी.
थोड़ी ही देर में गाड़ी उसके घर के पास आकर रुक गई. के. वाई. उतरते हुए थैंक्स कहने लगी तो मोहनजी मुस्कुराते हुए बोले, “यह तो हमारा फ़र्ज़ है मैडमजी.” और ‘जी’ पर कुछ ऐसा ज़ोर दिया कि हंसी आए बिना न रह सकी.
घर पहुंचने के बाद भी के. वाई. दिनभर के घटनाक्रम को याद कर हंसती रही. आर. के. मोहन अब बस मोहनजी रह गए थे.
मोहनजी सभी के साथ ऐसा ही व्यवहार करते थे, पर कभी-कभी के. वाई. को लगता कि मोहनजी उसकी तरफ़ आकर्षित हैं. वह भी उनके क़रीब होने का प्रयास करने लगी. लेकिन हर बार उसके ऐसे प्रयास पर मोहनजी मुस्कुरा देते.

 

 

 

 

 

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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