कहानी- मनवा लागे 2 (Story Series- Manwa Laage 2)

ऑफिस से लौटे मामाजी बच्चों को गरम-गरम जलेबी और कचौड़ी के लिए पुकार रहे थे. सारे बच्चे ताश की बाज़ी छोड़कर उनके पास भाग गए. केवल शिव और विभा एक-दूसरे की आंखों में आंखें डाले बैठे रह गए थे नि:शब्द, निष्प्राण! मामी दोनों के लिए 2 प्लेट्स सजाकर ले आई थीं. उन्हें दोनों की मन:स्थिति का कुछ-कुछ आभास होने लग गया था.

“कॉलेज की लड़कियां तो टूट पड़ रही थीं उन पर. साथ सेल्फी लेने की होड़-सी मची थी. मानो कोई फिल्म स्टार आ गया हो.” टिया चिढ़ते हुए बोली, तो विभा की चेतना लौटी.
“तुझे पत्र-पत्रिकाएं पढ़ने का शौक़ नहीं है न, इसीलिए ऐसा कह रही है.” विभा ने प्यार से समझाना चाहा, तो टिया और चिढ़ गई.
“और आपको बहुत ज़्यादा शौक़ है, इसीलिए उन्हें लेकर इतना उद्वेलित हो रही हैं. आ रही है अभी आप ही की जैसी उनकी एक और फैन!”
“हाय टिया, हैलो आंटी!” पुकारते हुए तब तक मिष्टी घर में प्रविष्ट हो चुकी थी.
“शैतान को याद किया और शैतान हाज़िर!” टिया ने कहा तो सबकी हंसी छूट गई.
“क्या हुआ? सिर दुख रहा है?”
“नहीं, ऐसे ही शौक़िया बाम लगवा रही हूं.”
“आंटी देखो न यह मेरी किसी भी बात का सीधा जवाब नहीं देती. मैं तो इसे अपने साथ ले जाने आई थी. मैंने प्रसिद्ध लेखक एस. दीपक से अपॉइंटेमेंट ले रखा है. कॉलेज मैग्ज़ीन के लिए उनका इंटरव्यू लेना है. टिया, तुझे बताया तो था कॉलेज में. अब उठ, झट से तैयार हो जा.”
“मेरा सिर दर्द कर रहा है.” टिया करवट बदलकर लेटी रही.
“तो मैं क्या अकेले जाऊंगी?” मिष्टी ने ग़ुस्से से कहा.

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“मां को ले जा.”
“मैं… मैं कैसे जा सकती हूं.” विभा बौखला गई थी.
“क्यों? जैसे मिष्टी जाएगी, आप भी चले जाना. जैसे वो सवाल-जवाब करेगी, आप भी कर लेना. मैं तब तक एक नींद निकाल लूंगी. आह सिरदर्द!” टिया मुंह ढांपकर सो गई.
“चलिए आंटी, हम ही चलते हैं. यह आलसी अब नहीं हिलनेवाली.”
विभा तैयार होकर मिष्टी के संग निकल तो ली, लेकिन पूरे रास्ते उसका दिल धक-धक करता रहा. यदि यह उसका शिव निकला तो? उसने उसे पहचान लिया तो? यदि वह उसे उसी तरह आंखों में आंखें डालकर देखने लगा तो, जैसे ताश की बाज़ी में सामने बैठकर निहारा करता था. कुछ पलों के लिए विभा अतीत में खो गई.
ऑफिस से लौटे मामाजी बच्चों को गरम-गरम जलेबी और कचौड़ी के लिए पुकार रहे थे. सारे बच्चे ताश की बाज़ी छोड़कर उनके पास भाग गए. केवल शिव और विभा एक-दूसरे की आंखों में आंखें डाले बैठे रह गए थे नि:शब्द, निष्प्राण! मामी दोनों के लिए 2 प्लेट्स सजाकर ले आई थीं. उन्हें दोनों की मन:स्थिति का कुछ-कुछ आभास होने लग गया था. छुट्टियां समाप्त होने और विभा के लौट जाने के बाद उन्होंने दोनों पक्षों से बात भी की थी. शिव और उसके घरवाले तैयार थे, लेकिन विभा के मम्मी-पापा ने इस रिश्ते को अपनी हैसियत से कम आंकते हुए सिरे से नकार दिया था. विभा को काफ़ी समय बाद यह सब बात पता लगी थी. वह किंकर्तव्यविमूढ़-सी रह गई थी.

       संगीता माथुर

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