कहानी- मृग-मरीचिका 1 (Story...

कहानी- मृग-मरीचिका 1 (Story Series- Mrig-Marichika 1)

एक दिन फेसबुक अकाउंट ओपन किया, तो एक ‘फ्रेंड रिक्वेस्ट’ को देखकर चौंक गई- ‘देवव्रत चौधरी’. दूर अतीत से एक चेहरा उभर आया. मैं वहीं कुर्सी पर आंखें मूंदे बैठी उन्हीं दिनों में पहुंच गई.

मानो कोई पसंदीदा पुरानी फिल्म दुबारा देख रही हूं. कच्छ के कांडला बंदरगाह से जुड़ा टाउनशिप- गांधीधाम. तब वह इतना छोटा था कि चलते-चलते पूरे शहर का चक्कर मारकर घंटेभर में लौट भी आओ. अधिकतर लोग कांडला बंदरगाह के दफ़्तर में ही काम करते थे, सो तक़रीबन सभी परिवारों का आपसी परिचय था. छोटे शहरों में घर भी ब़ड़े होते हैं और दिल भी.

अपने मौलिक विचार को आकार देते हुए मार्क ज़ुकरबर्ग ने यह कल्पना भी नहीं की होगी कि उसके दिमाग़ की उपज ‘फेसबुक’ एक पूरी पीढ़ी को यूं अपनी गिरफ़्त में ले लेगी कि किशोरों और युवाओं को उसके बिना एक दिन भी गुज़ारना मुश्किल हो जाएगा. भक्तगण जिस लगन से अपने आराध्य देव की उपासना करते हैं, इन युवाओं की लगन उससे रत्तीभर भी कम नहीं है.

मेरे बच्चों ने जब इस बाबत बहुत डांट खा ली, तो उन्हें एक नायाब तरीक़ा सूझा. उन्होंने फेसबुक पर मेरा भी अकाउंट बना दिया. “मम्मी, आपको इससे स्कूल और कॉलेज के बिछड़े मित्रों से जुड़ने का अवसर मिल जाएगा. आपके पास कितना तो समय रहता है आजकल.” शुरू में तो मुझे यह समय की बर्बादी ही लगी, पर धीरे-धीरे जब दूर बसे मित्र, जिनसे ईमेल व फोन द्वारा ही संपर्क था, फेसबुक पर मित्र बनने लगे और जिन्हें एक अरसे से देखा नहीं था,

उनके व उनके परिवार के फोटो देखे- कहीं छुट्टियां बिताते, तो कहीं बच्चों के जन्मदिन मनाते, उनके फोटो को इतने क़रीब से देखकर उनसे जुड़े होने का एहसास होने लगा.

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एक दिन फेसबुक अकाउंट ओपन किया, तो एक ‘फ्रेंड रिक्वेस्ट’ को देखकर चौंक गई- ‘देवव्रत चौधरी’. दूर अतीत से एक चेहरा उभर आया. मैं वहीं कुर्सी पर आंखें मूंदे बैठी उन्हीं दिनों में पहुंच गई.

मानो कोई पसंदीदा पुरानी फिल्म दुबारा देख रही हूं. कच्छ के कांडला बंदरगाह से जुड़ा टाउनशिप- गांधीधाम. तब वह इतना छोटा था कि चलते-चलते पूरे शहर का चक्कर मारकर घंटेभर में लौट भी आओ. अधिकतर लोग कांडला बंदरगाह के दफ़्तर में ही काम करते थे, सो तक़रीबन सभी परिवारों का आपसी परिचय था. छोटे शहरों में घर भी ब़ड़े होते हैं और दिल भी. चारों ओर बगीचे से घिरे बड़े-बड़े बंगले हुआ करते थे. हमसे दो घर छोड़कर ही था देवव्रत का घर. उसकी मां की मृत्यु हो चुकी थी और पिता काम में व्यस्त रहते थे. सो जब भी वह अकेला महसूस करता, हमारे घर चला आता. भइया तो उसके संगी थे ही, मां भी उससे अपार स्नेह रखतीं. आज की कामकाजी स्त्रियों के पास तो समय ही कहां है, लेकिन उस समय की महिलाएं अपने बच्चों के संगी-साथियों पर भी बड़ी सहजता से अपनी ममता का आंचल डाल दिया करती थीं.

बड़े उतावलेपन से भरी होती है किशोर अवस्था. बहुत सारी बातें एक साथ कहने-करने को व्याकुल. इसी जल्दबाज़ी में वह नामों को छोटा कर देते हैं. संगी-साथियों को देवव्रत का पूरा नाम लेना कठिन लगता और वह सबके लिए ‘डीवी’ बन गया. एक ही स्कूल था गांधीधाम में. सुबह तो सब आगे-पीछे निकलते, पर वापसी में हम एक साथ ही लौटते और सीधा रास्ता न पकड़, आस-पास के बगीचों का चक्कर मारते हुए घर पहुंचते कच्चे आम, अमरूद, बेर आदि का ख़ज़ाना साथ लिए हुए. गांधीधाम में कॉलेज नहीं था, इसलिए स्कूली पढ़ाई ख़त्म करने के बाद आगे पढ़ने दूसरे शहर जाना पड़ता. बस, छुट्टियों में इकट्ठे हो पाते. एक क्लब भी था गांधीधाम में और ऐसी जगहों पर क्लब औपचारिक स्थान पर न होकर, सबकी मिलन स्थली ही बन जाते हैं, जहां मेज़बानी की ज़िम्मेदारी किसी को नहीं ओढ़नी पड़ती. जितनी नियमित उपस्थिति कार्ड रूम अथवा बार में रहती, उतनी ही नियमित रूप से महिलाओं की महफ़िल भी लॉन की एक तरफ़ रोज़ जमती. इस महफ़िल में विभिन्न प्रांतों के स्वादिष्ट पकवानों की रेसिपी बांटी जाती, साड़ियों के स्रोत और जूड़ा बनाने के स्टाइल सीखे जाते. जी हां, वह साड़ियों और जूड़ों का ही ज़माना था. पैंट-शर्टवाली महिलाएं, तो स़िर्फ विदेशी पत्रिकाओं में ही नज़र आती थीं. वर्ष में दो बार बाहर पढ़ते बच्चे लौटते, तो घरों के साथ क्लब की भी रौनक़ बढ़ जाती. पढ़ाई और परीक्षाओं से मुक्त बच्चों का पल-पल उठता उन्मुक्त अट्टहास क्लब का माहौल बदल देता. वे टेबल टेनिस, बैडमिंटन खेलते और अपने-अपने शहर के अनुभव बांटते. उन्हें व्यस्त रखने के लिए इन्हीं दिनों स्पोर्ट्स टूर्नामेंट का आयोजन किया जाता. मैं भी थोड़ा बैडमिंटन खेल लेती थी. मिक्स्ड डबल्स में देवव्रत मुझे अपना पार्टनर बनाता, वो इसलिए नहीं कि मैं बहुत अच्छा खेलती थी, वरन् इसलिए कि बाकी लड़कियों को शायद मुझसे भी कम आता था.

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पापा के अवकाश प्राप्ति पर हम चंडीगढ़ आ बसे. 18 वर्ष बहुत लंबी अवधि लग सकती है, परंतु कुछ बातें, कुछ लोग हमारे ज़ेहन में जगह घेरे बैठे रहते हैं- तमाम उम्र. जैसे मेरे भीतर गांधीधाम सदैव बसा ही रहा. पर मेरे लिए गांधीधाम का अर्थ था-‘देवव्रत का शहर’ और आज भी है, क्योंकि हमारे शहर छोड़ते समय भी देवव्रत अपने पिता के संग वहीं रहता था. उन दिनों संपर्क रखना इतना सरल नहीं था.

Usha Vadhava

        उषा वधवा

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