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कहानी- प्रिया का घर 2 (Story Series- Priya Ka Ghar 2)

गुनगुनाता हुआ मेरा बेटा ऑफिस जाने की तैयारी में था… मैंने उसे रोककर पूछा, “ये… ये मफलर… ये कहां से लाए विक्की?”

विक्की ने चोर निगाहों से मुझे देखा, फिर एकदम से बोला, “अरे ये वो… वो लोग गए थे ना मेरे फ्रेंड्स, शिमला गए थे, वहीं से लाए मेरे लिए…”
मैंने उसके चेहरे पर आई हड़बड़ाहट को पढ़ते हुए उस समय तो मुस्कुराकर बाय कर दिया था, लेकिन मेरे अंदर का पहरेदार जाग चुका था. मैंने एक-एक बात नोटिस करनी शुरू की.

 

… प्रिया का पिछले छह महीनों में लगभग चार-पांच बार मायके आना और अबकी बार इतने लंबे समय के लिए रुकना… इन सबका संबंध कहीं विक्की से तो नहीं था? मेरा दिमाग़ मुझे जिस तरफ़ इशारा कर रहा था, वो मैं चाहकर भी मानना नहीं चाह रही थी…
जिस रिश्ते को मिटाने के लिए मैंने आनन-फानन प्रिया की शादी कहीं और करवा दी थी, क्या वो लगाव फिर से सिर उठा रहा था?
प्रिया क़रीब पांच साल की थी, जब ये लोग इस शहर में आए थे. विक्की की ही हमउम्र ये बच्ची कब हमारे घर का हिस्सा बन गई, पता ही नहीं चला! अक्सर यहीं खेलती, मेरे हाथ के बने खाने के लिए मचलती रहती और जब भी विक्की से लड़ाई होती, आकर मेरे पीछे छुप जाती… उसके पापा दुनिया में थे नहीं, मम्मी स्कूल में पढ़ाते हुए ज़रूरतभर की सुविधाएं ही जुटा पाती थीं. मेरे घर के फ़र्नीचर को देखकर, इंटीरियर को देखकर उसकी आंखें हैरत से फैल जातीं और अपनी मम्मी का हाथ हिलाकर पूछ लेती, “मम्मी, अपना घर इत्ता सुंदर क्यों नहीं है?”
मैं उसकी मम्मी के चेहरे पर आते-जाते भाव देखकर झट से उससे कह देती, “ये भी तुम्हारा घर है… नहीं है क्या?”
मुझे क्या पता था कि बचपन में उसको फुसलाने के लिए कही बात को वो सपना समझकर मन में पालने लगेगी! सपना, इस घर को अपना घर बनाने का. सपना मेरी बहू बनने का!..
पिछले साल की ही तो बात थी, मैंने अक्सर ऊपर से देखा, प्रिया आसमानी रंग के ऊन से कुछ बुनती रहती थी. कभी रसोई में खड़े होकर, कभी आंगन के किसी कोने में दुबककर! मुझे देखकर बड़ी हैरत होती थी. उसकी बुनाई देखकर नहीं, उसकी चोरी देखकर… जैसे ही उसको कोई आवाज़ देता या किसी के आने की आहट सुनाई देती, प्रिया झट से वो पैकेट कहीं खोंसकर छुपा देती! इस चोरीवाली बुनाई से मुझे कुछ लेना-देना नहीं था, लेकिन एक कौतुहूल ज़रूर जग गया था और ये तब तक जगा रहा, जब तक मैंने वो आसमानी ऊन से बना मफलर अपने घर में नहीं देख लिया… मुझे तो मानो करंट जैसा लग गया था,‌ उसी आसमानी रोएंदार ऊन से बना मफलर पहने, गुनगुनाता हुआ मेरा बेटा ऑफिस जाने की तैयारी में था… मैंने उसे रोककर पूछा, “ये… ये मफलर… ये कहां से लाए विक्की?”
विक्की ने चोर निगाहों से मुझे देखा, फिर एकदम से बोला, “अरे ये वो… वो लोग गए थे ना मेरे फ्रेंड्स, शिमला गए थे, वहीं से लाए मेरे लिए…”
मैंने उसके चेहरे पर आई हड़बड़ाहट को पढ़ते हुए उस समय तो मुस्कुराकर बाय कर दिया था, लेकिन मेरे अंदर का पहरेदार जाग चुका था. मैंने एक-एक बात नोटिस करनी शुरू की. जब विक्की के बैंक जाने का टाइम होता था, ठीक उसी वक़्त प्रिया कॉलेज के लिए निकलती थी. शायद आगे कहीं रुककर दोनों बात भी करते होंगे. हमारे यहां कथा हुई, तो विक्की का ध्यान कथा सुनने से ज़्यादा, कोने में बैठी प्रिया पर था और सबसे ख़ास बात… विक्की के फोन में ‘प्रतीक’ नाम से सेव्ड नंबर भी प्रिया का ही था! कुछ दिन तो भयानक सिरदर्द से मैं जूझती रही. मेरी आंखों पर ये पट्टी कैसे बंधी रही?

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मैं पहले क्यों नहीं देख पाई ये सब? मेरे अंदर बेचैनी हर दिन बढ़ती जा रही थी. ये सही नहीं हो रहा था. विक्की की शादी को लेकर मेरे अनगिनत सपने थे, अपने जैसे समृद्ध घर से आई, गहनों से लदी हुई बहू का स्वागत करने के सपने… किसी फाइव स्टार होटल में बारात का स्वागत करवाने के सपने… विक्की की शादी मेरे लिए एक प्रोजेक्ट जैसा था, ऐसी भव्यता से सब कुछ होना था, जिसको देखकर रिश्तेदारों की आंखें चुंधिया जातीं! मेरे इस भव्य सपने में प्रिया और उसका परिवार कहीं भी फिट नहीं हो रहे थे… रत्ती भर भी नहीं! मैं ये बात किसी से कह भी नहीं सकती थी, विक्की के पापा से भी नहीं. वो तो बड़े आराम से इस रिश्ते के लिए राज़ी हो जाते, मुझे अपनी उलझन ख़ुद सुलझानी थी, जिसका सिरा कहीं नज़र नहीं आ रहा था!

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

Lucky Rajiv

लकी राजीव

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