कहानी- सामनेवाली खिड़की 3 (Story Series- Samnewali Khidki 3)

मुझे रह-रहकर रोना आ रहा था. आंसुओं से धुंधलाई आंखों से मैंने उस कमरे का मुआयना किया. व्हीलचेयर, कैनवास, रंग, ब्रश सभी कुछ वैसा ही था बस… वो नहीं था. कमरे में कोने में एक काठ की आलमारी थी, उसके ऊपर ढेर सारे चित्र थे. इतने दिनों की मुराद आज पूरी होनेवाली थी. मैं देखना चाहती थी उसने कैसे चित्र बनाए थे. मैंने कुर्सी पर चढ़कर उन चित्रों को नीचे उतारा. अख़बार हटाते ही मेरी आंखें फटी-की-फटी रह गईं. सांसें रुकती हुई-सी प्रतीत हुईं.

मेरा मुरझाता चेहरा देख मामा-मामी भी समझाते, “विनय अच्छा लड़का है करूणा, तुम्हें मां से मिलाने ले आया करेगा. तुम चिंता मत करो. फिर हम भी तो हैं बेटी. तुम्हारी मां अकेली कहां है?” मैं ख़ामोश ही हो गई थी बिल्कुल, उन दिनों जैसे शब्द गुम हो गए थे.

शादी के दो दिन पहले मैं ऊपर गई. तो देखा फिर वो खिड़की बंद थी, मेरा कलेजा धक से रह गया, ’ये कहां चला गया?’ तभी नीचे आंगन में कुछ शोर-सा सुनकर मैं जल्दी से नीचे आई तो देखा रमा चाची हांफती हुई अंदर आ रही थीं,  “अरे करूणा… ग़ज़ब हो गया, तुम्हारी मां कहां है?” मां शायद बाथरूम में थीं. “क्या हुआ चाची?” मैंने पूछा, “वो सामनेवाला लड़का था ना, अरे वही जिससे मैं उस दिन मिलकर आई थी, उसने आज तड़के खुदखुशी कर ली.”

“हे राम! मगर क्यों?” ये मां का स्वर था.

“पता नहीं बड़ा अच्छा लड़का था.” मुझे काठ मार गया. वहां एक पल भी रुकती तो मेरे आंसू मेरी पवित्र भावना को सबके सामने उजागर कर देते.

“रसोई में दूध उबल रहा है.” कहकर मैं रसोई में भागी और टूटकर बिखर गई. अपना रेशा-रेशा टूटता हुआ महसूस किया. काफ़ी देर तक जी भर कर रो लेने के बाद कुछ हल्का महसूस किया. अचानक एक निर्णय लेकर मैं मां के सम्मुख जा खड़ी हुई. मां से पहली बार झूठ बोला कि बाज़ार में कुछ काम है. मां ने कहा, “रीमा की बिटिया को साथ लेती जाना बेटी. उसे भी कुछ काम था.” मगर मुझे बाज़ार कहां जाना था, मैं घर से निकली और सीधे उस मकान में जा पहुंची.

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वो एक बड़ा-सा मकान था, जिसके सभी कमरों में ताले बंद थे, स़िर्फ वही एक कमरा खुला था, जिसमें वह रहता था. घर में पूर्णतः शांति थी. मोहल्ले के लोग उसे शमशान ले गए थे. मुझे रह-रहकर रोना आ रहा था. आंसुओं से धुंधलाई आंखों से मैंने उस कमरे का मुआयना किया. व्हीलचेयर, कैनवास, रंग, ब्रश सभी कुछ वैसा ही था बस… वो नहीं था. कमरे में कोने में एक काठ की आलमारी थी, उसके ऊपर ढेर सारे चित्र थे. इतने दिनों की मुराद आज पूरी होनेवाली थी. मैं देखना चाहती थी उसने कैसे चित्र बनाए थे. मैंने कुर्सी पर चढ़कर उन चित्रों को नीचे उतारा. अख़बार हटाते ही मेरी आंखें फटी-की-फटी रह गईं. सांसें रुकती हुई-सी प्रतीत हुईं. ये तो मेरे चित्र थे… तो क्या वह भी मुझे देखता था, मगर कब? कैसे? हर चित्र मेरा था- किसी में मैं कपड़े सुखा रही थी, किसी में बाल बना रही थी. कहीं पर चुपचाप उदास खड़ी उसे निहारते हुए… ‘उफ़! मुझे अपनी आंखों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था, मेरी हर अदा उसमें बयां थी. इतने दिनों का मेरा भ्रम टूट गया. मुझे उसे देखना पसंद था और वह कैनवास पर मुझे रंगों के द्वारा साकार करता रहा. कितनी ख़ूबसूरत चित्रकारी की थी उसने, मुझसे कहीं ज़्यादा सुंदर मेरे चित्र थे.

लगभग सौ-डेढ़ सौ की तादाद में वो चित्र यूं लग रहे थे, मानो मेरा वज़ूद हों.

हर चित्र में उसने मेरे साथ ख़ुद को भी चित्रित किया था. कहीं पक्षी के रूप में, तो कहीं चांद के रूप में. एक चित्र में तो उसने मुझे व्हीलचेयर पर चित्र बनाते हुए और स्वयं को मुझे निहारते हुए बना दिया था. मैं एक-एक करके उन चित्रों को देखती जा रही थी और चित्रों से उसके प्रेम की गहराई में डूबती जा रही थी. कितना पवित्र हृदय, कितनी निश्छल आत्मा बसी थी उसमें. मेरी ही तरह कभी मुझे सशरीर पाने का प्रयास उसने भी नहीं किया, मगर उसके कण-कण में मैं थी, ये उसके चित्रों से साफ़ पता चल रहा था.

देखते-देखते उसके सारे चित्र ख़त्म हो गए और अंतिम चित्र मेरे हाथ में था, जिसने मेरे सारे प्रश्‍नों के उत्तर दे दिए. उस चित्र में मैं डोली में दुल्हन बनी बैठी थी और दूर एक बुझा हुआ दीया चित्रित था. उसके आत्महत्या करने की कहानी थी यह. जाते-जाते मेरे अंतिम सवाल का उत्तर भी दे गया वह. अचानक काले घने बादल छा गए और तेज़ घनघोर बरसात होने लगी. उसकी मौत पर रोने का फ़र्ज़ शायद बादल भी अदा करना चाहते थे. मैं बिलख-बिलख कर रो पड़ी. उसके लिए जिसका नाम भी मैं नहीं जानती थी, मगर एक एहसास जो मेरे दिल में था अब प्यार से बढ़कर श्रद्धा में बदल चुका था, आजीवन मेरे साथ रहेगा और उस आत्मा को अपनी आत्मा के साथ मैं ताउम्र महसूस करती रहूंगी.

– वर्षा सोनी

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