कहानी- तुम कब आओगे? 4 (Story- Tum Kab Aaoge? 4 )

“मम्मा! ये अंकल कौन थे?” नन्हें वैभव को समझाने के लिए शब्द ही कहां थे. एक चिंता उभरी थी कि रोहित को वापसी की टिकट दिख गई. अनजान व्यक्ति से दूरी ठीक है. ये पाठक-वाठक कुछ नहीं होते और ये मुंबई है. ये रोमांचकारी लेखनी सारी धरी रह जाएगी. मुझे ख़ुद पर ही ग़ुस्सा आया. वैभव मेरे सामने रोहित के लाए हुए चिप्स के पैकेट खोलकर क्रंच-क्रंच खा रहा था.

रोहित ने एक थैली आगे की, जिसमें कुछ खाने-पीने का सामान था. “अरे ये क्या?” “कुछ रास्ते के लिए… मुझे मालूम ही नहीं था कि बेटा साथ है, वरना चॉकलेट तो लाता.”
रोहित ने प्लेटफॉर्म पर पड़े सूटकेस को हाथ में ले लिया था और मेरे हाथ से टिकट लेकर सीट नंबर देखने लगा. “और ये दूसरी टिकट? अच्छा वापसी अगले सोमवार को है?” मैं भौंचक्की रह गई थी उसकी
कलाकारी पर. मैंने तो कितनी सतर्कता के साथ बुलाया था. ख़ैर… रोहित ने मुझे कोच में बैठने में मदद की और ख़ुद सामने की सीट पर बैठ गया. कुछ औपचारिक वार्तालाप के बाद मैंने ही उसे गाड़ी के चलने का इशारा किया, तो वो उतर गया. मैं उसे बाय करके जब केबिन में आई, तो वैभव कोल्ड्रिंक पी रहा था. “मम्मा! ये अंकल कौन थे?” नन्हें वैभव को समझाने के लिए शब्द ही कहां थे. एक चिंता उभरी थी कि रोहित को वापसी की टिकट दिख गई. अनजान व्यक्ति से दूरी ठीक है. ये पाठक-वाठक कुछ नहीं होते और ये मुंबई है. ये रोमांचकारी लेखनी सारी धरी रह जाएगी. मुझे ख़ुद पर ही ग़ुस्सा आया. वैभव मेरे सामने रोहित के लाए हुए चिप्स के पैकेट खोलकर क्रंच-क्रंच खा रहा था.
बंगलुरू में शादी में ख़ूब आनंद लिया.
वापसी में मौसाजी ने हमें गाड़ी में बैठाया. गाड़ी प्लेटफॉर्म से सरकी ही थी कि रोहित का फोन मेरे मोबाइल की धुन को छेड़ गया. मुझे यही तो अंदेशा था.

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“लो आ गई मुसीबत…” मैं बुदबुदाई थी, पर मुझे कौन-सा फोन उठाना था. 12 घंटे की यात्रा और 7 घंटे के विश्राम में हर घंटे उसका फोन आ रहा था. बीच-बीच में छोटे-छोटे मैसेजेस, ‘कहां हैं?’ ‘कब पहुंच रही हैं?’ पर मैंने पूरी तरह ख़ामोशी धारण कर रखी थी. मोबाइल पर शीतांशु के फोन भी थे.
मोबाइल की स्क्रीन पर ध्यान से देखते हुए पूरी सावधानी रखी कि कहीं ग़लती से रोहित का फोन अटेंड न कर लूं. हालांकि मुझे अपने उस पाठक पर दया भी आ रही थी. अपने शहर की गाड़ी जाने में अब मात्र आधा घंटा था. दादर की स्ट्रीट शॉपिंग के बाद मैं हांफते-हांफते पहुंची थी. कंधे पर बैग, एक हाथ में ट्रॉली सूटकेस घसीटते हुए दूसरे हाथ से वैभव का हाथ पकड़े हुए मैं गाड़ी के ए कोच के सामने जा खड़ी हुई. कोच के दरवाज़े अभी खुले नहीं थे. बैग कंधे से उतारकर बेंच पर रखा कि मोबाइल बज उठा. रोहित का फोन था. मेरे दिल में रोहित के प्रति बच्चे की तरह प्यार उमड़ आया, पर फोन उठाया नहीं मैंने.

 

        संगीता सेठी

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