विश्व स्वास्थ्य दिवस: जानें थायर...

विश्व स्वास्थ्य दिवस: जानें थायरॉयड से संबंधित स्वास्थ्य समस्याएं, उपचार और ख़तरे (World Health Day: Thyroid Related Health Problems, Treatment And Risk Factors)

आमतौर पर थायरॉयड ग्रंथि ऐसे विशेष हार्मोन का उत्पादन करती रहती है, जो शरीर को सुचारू रूप से चलाते रहते हैं. जब थायरॉयड ग्रंथि उचित मात्रा में महत्वपूर्ण हार्मोन का उत्पादन नहीं कर पाती, तो इसे समूह रूप में थायरॉयड विकार माना जाता है. जब ग्रंथि ज़रूरत से ज्यादा हार्मोन बनाती है, तो शरीर भी सामान्य से हटकर कहीं अधिक तेजी से ऊर्जा ख़र्च करता है, जो हाइपर-थायरॉयडिज़्म है. जब यह विकार होता है, तो शरीर के मेटाबॉलिज़्म या चयापचय में बहुत तेजी न केवल व्यक्ति को चिड़चिड़ा बनाता है, बल्कि हृदय के कामकाज में भी अधिकता या अनियमितता आ जाती है. अंततः जाने-अनजाने वज़न भी घटने लगता है. थायरॉयड के संदर्भ में कृष्णा डायग्नोस्टिक्स के डॉ. मनीष दत्तात्रेय कारेकर ने कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं.

दूसरी ओर, जब थायरॉयड ग्रंथि रक्तप्रवाह में अपर्याप्त मात्रा में हार्मोन बनाती और रिलीज करती है, तो इसे हाइपो-थायरॉयडिज़्म के रूप में जाना जाता है. हाइपो-थायरॉयडिज़्म चयापचय को धीमा कर देता है, जिससे थकान, अत्यधिक वज़न बढ़ना और ठंड सहन न होना जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं. शुरुआत में यह लक्षण ऐसे नहीं होता कि झट पहचान में आ जाएं. हालांकि, समय के साथ यह मोटापे, जोड़ों का दर्द, बांझपन और हृदय रोग जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में सामने आते हैं.

थायरॉयड और गर्भावस्था
गर्भावस्था का थायरॉयड ग्रंथि और उसके कार्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है. आयोडीन संपन्न देशों में गर्भावस्था के दौरान थायरॉयड ग्रंथि का आकार 10 फीसदी बढ़ जाता है. वहीं आयोडीन की कमी वाले क्षेत्रों में इसका आकार 20 से 40 फीसदी तक बढ़ जाता है. थायरॉयड हार्मोन, थायरोक्सिन (टी4) और ट्राईआयोडोथायरोनिन (टी3) का उत्पादन लगभग 50 फ़ीसदी बढ़ जाता है. साथ ही दैनिक आयोडीन की आवश्यकता में 50 फ़ीसदी की वृद्धि अलग से होती है. ये शारीरिक परिवर्तन स्वस्थ महिलाओं में बिना परेशानी के होते हैं, लेकिन कुछ गर्भवती महिलाओं में पैथोलॉजिकल प्रक्रियाओं के कारण थायरॉयड विकार की स्थिति आ सकती है.

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दोनों में से थायरॉइड की स्थिति का सबसे आम प्रकार हाइपोथायरॉयडिज़्म है. यह भारत में हर दस व्यक्तियों में से एक को प्रभावित करता है. यह बीमारी पुरुषों की तुलना में दोगुनी संख्या में महिलाओं को प्रभावित करती है और विशेष रूप से प्रसव की उम्रवाली महिलाओं में अक्सर होती है.
गर्भावस्था में टीएसएच हाइपो-थायरॉयडिज़्म की घटनाओं की जांच के लिए नौ भारतीय राज्यों में किए गए 2016 के शोध से पता चला है कि 13 फ़ीसदी से अधिक गर्भवती महिलाएं हाइपो-थायरॉयडिज़्म से पीड़ित थीं.

परीक्षण कब करवाना चाहिए और थायरॉयड की स्थिति के लिए निदान प्रक्रिया क्या है?
चिकित्सा विशेषज्ञ कई स्थितियों में थायरॉयड फंक्शन टेस्ट कराने का सुझाव दे सकते हैं, जैसे-
• व्यक्ति में एक निष्क्रिय थायरॉयड ग्रंथि (हाइपो-थायरॉयडिज़्म) या एक अतिसक्रिय थायरॉयड ग्रंथि (हाइपर-थायरॉयडिज़्म) के संकेत या लक्षण हैं.
• पिट्यूटरी ग्रंथि में समस्याओं के संकेत या लक्षण हैं.
• व्यक्ति अमियोडेरोन और लिथियम जैसी दवाएं ले रहा है, जो थायरॉयड फंक्शन को प्रभावित कर सकती हैं.
• कोई महिला गर्भवती है.
• महिला को बांझपन की समस्या का सामना करना पड़ रहा है.
• थायरॉयड बीमारी का पारिवारिक इतिहास रहा है.
• व्यक्ति को ऑटोइम्यून बीमारी जैसे टाइप 1 डायबिटीज़ या सीलिएक रोग हैं.
• गर्दन या ऊपरी छाती में रेडिएशन थेरेपी ली हुई है.

थायरॉयड फंक्शन टेस्ट रक्त परीक्षणों की एक श्रृंखला है, जिसका उपयोग यह आकलन करने के लिए किया जाता है कि थायरॉयड ग्रंथि कितनी प्रभावी रूप से कार्य कर रही है. टी3, एफटी3, एफटी4, टी4 और टीएसएच टेस्ट की सुविधा आसानी से सभी भौगोलिक क्षेत्रों में उपलब्ध हैं.

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थायरॉइड-स्टीमुलेशन हार्मोन (टीएसएच)
यह पिट्यूटरी ग्रंथि में बनता है और रक्तप्रवाह में टी4 और टी3 सहित थायरॉयड हार्मोन के संतुलन को नियंत्रित करता है. थायरॉयड हार्मोन असंतुलन की जांच के लिए यह पहला टेस्ट है. थायरॉयड हार्मोन की कमी (हाइपो-थायरॉयडिज़्म) आमतौर पर बढ़े हुए टीएसएच स्तर से जुड़ी होती है, जबकि थायरॉइड हार्मोन की अधिकता (हाइपर-थायरॉयडिज़्म) कम टीएसएच स्तर से जुड़ी होती है. यदि टीएसएच का स्तर असामान्य पाया जाता है, तो स्थिति का और विश्लेषण करने के लिए थायरोक्सिन (टी4) और ट्राईआयोडोथायरोनिन (टी3) जैसे टेस्ट से थायरॉइड हार्मोन को सीधे मापा जा सकता है.

o वयस्कों के लिए सामान्य टीएसएच रेंज 0.40 – 4.50 एमआईयू/एमएल (रक्त में मिली इंटरनेशनल यूनिट प्रति लीटर ) है.

o गर्भावस्था में टीएसएच की आदर्श सीमा है-
 पहली तिमाहीः 0.1 से 2.5 एमआईयू/एमएल
 दूसरी तिमाहीः 0.3 से 3.5 एमआईयू / एमएल
 तीसरी तिमाहीः 0.3 से 3.5 एमआईयू/एमएल

टी4ः थायरोक्सिन का टेस्ट हाइपो-थायरॉयडिज़्म और हाइपर-थायरॉयडिज़्म के लिए किया जाता है. इसका उपयोग थायरॉइड विकारों के उपचार की निगरानी के लिए किया जाता है. हाइपो-थायरॉयडिज्म के मामलों में टी4 कम होता है, जबकि टी4 का उच्चस्तर हाइपर-थायरॉयडिज़्म का संकेत है.

o वयस्कों के लिए सामान्य टी4 रेंज 5.0 – 11.0 यूजी/डीएल (रक्त में माइक्रोग्राम प्रति डेसीलीटर) है.

एफटी4ः इसे फ्री थायरोक्सिन टेस्ट के रूप में भी जाना जाता है, थायरॉयड ग्रंथि के कार्य का मूल्यांकन करने, थायरॉयड रोगों का निदान करने और थायरॉयड उपचार की प्रभावशीलता की निगरानी करने में मदद करता है. इसका उपयोग कुछ मामलों में नवजात शिशुओं में जन्मजात हाइपो-थायरॉयडिज़्म के निदान के लिए भी किया जा सकता है.

o वयस्कों के लिए सामान्य एफटी4 रेंज 0.9 – 1.7 एनजी/डीएल (रक्त में नैनोग्राम प्रति डेसीलीटर) है.

टी3ः यह हाइपर-थायरॉयडिज़्म के निदान और डिग्री निर्धारित करने में सहायता करने के लिए ट्राईआयोडोथायरोनिन परीक्षण है. हाइपो-थायरॉयडिज़्म में टी3 का स्तर कम हो सकता है, लेकिन इस टेस्ट का उपयोग आमतौर पर हाइपर-थायरॉयडिज्म के निदान और प्रबंधन में किया जाता है, जिसमें टी3 का स्तर अत्याधिक होता है.

o वयस्कों के लिए सामान्य टी3 रेंज 100- 200 एनजी/डीएल (रक्त में नैनोग्राम प्रति डेसीलीटर) है।

एफटी3ः फ्री ट्राईआयोडोथायरोनिन टेस्ट रक्त में टी3 की मात्रा को मापता है. थायरॉइड या पिट्यूटरी डिसफंक्शन के कारण थायरॉयड ग्रंथि द्वारा हार्मोन के अपर्याप्त या अनियंत्रित उत्पादन से टी3 का स्तर अधिक या कम होता है. रक्त में टी3 का असामान्य स्तर हाइपर-थायरॉयडिज़्म, हाइपो-थायरॉयडिज़्म और धीमे चयापचय से संबंधित है.

o सामान्य एफटी3 रेंजः 2.3 – 4.1 पीजी/एमएल (रक्त में पिकोग्राम प्रति मिलीलीटर) है।

हाइपो-थायरॉयडिज़्म के मरीजों को बीमारी के सटीक कारण का पता लगाने के लिए एंटी थायरॉयड एंटीबॉडी और एफएनएसी जैसे अन्य विशेष टेस्ट के साथ आगे की जांच करवाने की आवश्यकता पड़ सकती है.

यह समझना महत्वपूर्ण है कि थायरॉइड से संबंधित विकारों के लिए नियमित निगरानी और समय पर उपचार क्यों महत्वपूर्ण है. अनुपचारित हाइपो-थायरॉयडिज़्म से कई अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं जैसे कि गोइटर, हृदय रोगों का ख़तरा बढ़ जाना, पेरिफेरियल न्यूरोपैथी और बांझपन. दूसरी ओर, हाइपर-थायरॉयडिज़्म के अनुपचारित मामलों में रक्त के थक्के, हृदय की विफलता और स्ट्रोक हो सकते हैं.

ध्यान रहे, थायरॉयड से संबंधित बीमारी अक्सर एक जीवनशैली से जुड़ी मेडिकल कंडीशन है, जिसे नियमित रूप से मॉनिटर करने की आवश्यकता होती है. मामलों की ख़तरनाक रूप से बढ़ती संख्या को देखते हुए बीमारी होने से पहले ही या बीमारी का पता चलते ही जीवनशैली विकल्पों में बदलाव करते हुए समस्या को ट्रैक और मैनेज करना चाहिए.

Photo Courtesy: Freepik

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