काश! इस मांग में सिंदूर की लाल रेखा होती. मां की सिंदूर की डिबिया सामने रखी है. उसने चारों ओर देखा, कोई नहीं दिखा, डिबिया उठाकर उसने ढक्कन खोला. सींक उठाई, हाथ रूक गया. और वह सोचने लगी-मुझे कहां अधिकार रहा है अब इसका?
शरद पूनम की रात.
सामने फैला है कन्याकुमारी का अनंत सागर, प्रत्येक लहर धड़ड- धड़ड़ की तेज़ गर्जना के साथ तट से टकरा कर लौट जाती है. प्रत्येक टक्कर के साथ एक धक्का उम्मी के हृदय को भी लगता है. चांदनी स्निग्ध हो जाती हैऔर समुद्र का उफान बढ़ता जाता है. उम्मी के हृदय की तरह इन अनंत जलधि का भी कहीं ओर-छोर नहीं, केवल लहरें और लहरें, दौड़ती आती हैंप्रिय तट से मिलने और लौट जाती हैं निराश होकर धीमी गति से. ये इसी प्रकार युग-युगों तक दौड़ती रहेंगी, किंतु कभी नहीं बंध सकेंगी प्रिय की बांहों में.
उम्मी इस सागर में अपने ही मन के प्रतिबिम्ब को देख रही है. उसके दुख का विस्तार भी इस सागरके समान ही है. सारा का सारा सागर जैसे उसके हृदय में समा गया है. उसके अंतराल में उठती लहरें दूर-दूर तक चली गई. सिंदूर की डिबिया और सूनी मोग. वह शीशे के सामने खड़ी है. अपना ही रूप उसे अविश्वसनीय सा लग रहा है. यौवन का वह मादक रूप. कोई श्रृंगार नहीं, कोई बनाव नहीं, फिरभी आकर्षण क्यों? काश इस मांग में लाल रेखा होती? मां की सिंदूर की डिबिया सामने रखी है. उसने चारों ओर देखा,कोई नहीं दिखा. डिबिया उठाकर उसने ढक्कन खोला. सींक उठाई, हाथ रूक गया और वह सोचने लगी- मांग तो सुहागिनें भरती हैं. मुझे कहां अधिकार रहा है अब इसका? क्यों नहीं? उसका जी हुआ एक बार मांग भरकर जी भरकर देख तो लूं अपने को. पर ये लोग खा जाएंगे. इतनी जल्दी थोड़े लाली धूल जाएगी? न धुले. मैं कौन सा पाप कर रही हूं? एक आदमी जिसका मैंने रंगदेखा न रूप, अक्ल देखी न शक्ल, उसके लिए मांग नहीं भरूं? रंगीन साड़ियां नहीं पहनूं.. अच्छी तरह कंधी चोटी भी न करूं?
मैं नहीं मानती ऐसे पाप को. उम्मी ने सींक सिंदूर में डुबोई और सिर तक ले गई. पीछे से किसी की शीशे में पड़ती हुई परछाई देखी. झटपट सींक पटककर उसने पीछे मुड़कर देखा-राजा. वह ऐसे घबरा गई जैसे कोई चोरी कर रही हो. राजा नज़दीक आ गया, 'उम्मी, एक दिन ऐसालाने का अवश्य प्रयत्न करूंगा." सिंदूर की डिबिया हाथ में उठाते हुए राजा ने कहा.
उम्मी का कलेजा मुंह को आ रहा या. बड़ी-बड़ी बरीनियों में आंसू अटक गए थे, 'राजा तुम एक बात का मुझे वचन दे सकते हो?" उम्मी ने भराये हुए गले से पूछा.
"तुम्हारी बात मैं कब नहीं मानता?"
"तो राजा मैं मर जाऊं तब तुम सिंदूर से मेरी मांग भर देना और मेरी राख गंगा में बहा देना." इन शब्दों के साथ ही दो बड़े-बड़े आंसू लुढ़क पड़े उसके गुलाबी गालों पर.
"क्या पागलों जैसी बातें करती हो. ऐसी मनौती करो कि तुम्हारी मांग भरकर..." राजा क्या कहने जा रहा था वह अपनी ग़लती समझकर रूक गया. उम्मी की सूनी मांग देखकर राजा का रोम-रोम कराह उठा था, यह उम्मी ने उसकी आंखों में पढ़ लिया था.
एक ज़ोर की लहर गर्जना करती आई एक ऊंची चट्टान से टकराकर असंख्य कणों में बिखर गई. उम्मी के हृदय में उठी लहर भी रीति-रिवाज़ों और रिश्ते-नातों की चट्टानों से टकरा कर बिखर गई.
राजा रोम-रोम से मेरा है, पर मेरा नहीं. इस दुनिया में चंद श्लोकों का साक्ष्य जन्म-भर का हो सकता है, किंतु आत्मा का साक्ष्य झूठ है. राजा ने ही मुझे इस योग्य बनाया है कि मैं आज देश के दक्षिणी छोर पर बैठी हूं. उम्मी के विचार पांच साल पीछे खिसक गए.
नौकरी की तलाश में उसके घर आया दूर के रिश्तेका यह युवक दिनभर नौकरी की तलाश में भटकता है और शाम को आकर कहता है.
"उम्मी किताब लाओ पढ़ेंगे.'
"राजा तुम थक गए होंगे, आराम कर लो."
"नहीं- नहीं, तुम्हें पढ़ाने में मेरी थकान उतर जाती है."
एक दो नहीं, उसने मुझे पांच साल तक पढ़ाया. पढ़ाते समय वह तरह-तरह के मज़ाक करता रहता. मुझे हंसाने का प्रयत्न करता रहता. साहित्य में जहां भी कहीं विरह का वर्णन आता था तो उसे छोड़ देता था मज़ाक में लेकर उसे पढ़ाता. लेकिन ऐसा कब तक? एक दिन जब मैं बी.ए. की परीक्षा में बैठी थी, पढ़ने के लिए किताब खोली.
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सब पढ़ चुके थे केवल जायसी ही बाकी था. नागमती का विरह वर्णन, कितनी भी बार राजा ने उसेटाल दिया किंतु आज उसे पढ़ाना ही होगा, हिंदी पद्म का पेपर जो है. विरह वर्णनः विरह की मूर्ति तो उसके सामने बैठी है, जिसका न पिय है न रहेगा शायद. जिसकी छाया में वह जीवन काट रही है वह अवधिहीन विरह है. किताब खोली, "पिय से कह दे संदेसड़ा रे भौरा, रे काग..." एक पंक्ति पढ़ते ही राजा से उम्मी की ओर देखा न गया. उसका मन एक अकथनीय वेदना से भरने लगा.
"उम्मी इसे छोड़ दो, यह कोई इतना इम्पारटेंट नहीं." वह यही चाहती थी. उसने एकदम किताब बंद कर दी. दोनो ख़ामोश बैठे थे. मन में अनेक बातें होते हुए भी होंठों से बाहर नहीं आ रही थी. कहीं पर बजती शहनाइयों का स्वर दोनों सुन रहे थे. राजा ने भारी हुए वातावरण को हल्का करने के लिए बातछेड़ी, "यह शहनाई किसके यहां बज रही है?"
"पास के घर में फरीदा की शादी है."
"अच्छा बारात कहां से आ रही है?"
"मौसी का ही लड़का है. कहीं दूर से नहीं. उसकी पास में है."
"हां, इन लोगों में तो होते हैं ऐसे संबंध."
राजा का स्वर अत्यंत धीमा और निराशा में डूबा हुआ था. गंभीर हुए वातावरण को हल्का करने केलिए बात छेड़ी गई थी, किंतु प्रभाव उल्टा हो रहा था. दोनों के मन में एक ही तरह की विद्रोही भावना सिर उठा रही थी.
आपस के रिश्तों में ही शादी तय आज भी कई जातियां ऐसी हैं जो कर लेती हैं. विम्मी एक दिन कह रही थी कि हमारी जाति में तो ऐसी शादियां होती हैं. उसकी स्वयं की शादी उसके बुआ के लड़के सेतय हो गई है. उसकी यह बात सुनते ही मां ने एकदम कान पर हाथ रख लिए थे, बोली, "ऐसा तो सुनना भी पाप है." मां के इन शब्दों ने उम्मी को निचोड़ डाला था.
जो अपनी संतान का सुख नहीं समझते वे मां-बाप कैसे? पिता का स्वभाव कितना तीखा है. वे भारतीय संस्कृति की दुहाई देकर रूढ़िवाद पर चलने वाले हैं. पहले तो पिताजी कहीं मुझे जाने-आने भी नहीं देते थे. न ही मेरी पढ़ाई लिखाई का कुछ ध्यान था. यदि कदाचित मां साहस करके उनसे कुछ कहती भी भविष्य के लिए, तो वे जीवन में सबसे बड़ा महत्व अर्थ को देते हुए कहते
"पन्द्रह हज़ार रुपए उसके नाम पर जमा हैं और क्या? आदमी को ख़ुशी से ज़िंदा रहने के लिए रोटी और मकान ही तो चाहिए."
तीसरी बात को वे अपनी ज़ुबान पर भी कभी नहीं लाए, इस ढलती उम्र में भी अपनी पत्नी से दूर न रहने वाला आदमी अपनी तरूण विधवा लड़की की भावनाओं पर भाग्य का हथौड़ा मारकर मन में एक गहरा संतोष अनुभव करता था.
राजा तो इस घर में कुछ ही दिनों के आश्रय के लिए आया था. किंतु उम्मी की मूक वेदना ने उसे ऐसा बांधा कि उसके पैर अब इस घर से उठना ही नहीं चाहते थे. वह समाज का विचारशील प्राणी है. जो वस्तु प्रकृति ने सबको समान रूप से बांटी है उसके लिए झूठे आदर्शों में फंसकर कोई दुखी क्यों हो सकता है?
राजा जिस दिन से उम्मी के घर आया है उसका ध्यान उसी में केन्द्रित हो गया है. विवाह के पच्चीस दिन बाद ही विधवा हो जाने वाली इस कोमल मझाई लता को देखकर उसका मन समाज के अत्याचार और अपने प्रति कुछ कर्तव्य के लिए चीत्कार कर उठता.
राजा अच्छी नौकरी करने लगा था. पढ़े-लिखे कमाऊ लड़के के लिए कई रिश्ते आने लगे थे. राजा इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं लेता था. उसे एक ही धुन थी, उम्मी को इस योग्य बना देना कि वह समाज से लड़ सके. राजा ने आज उसे इस योग्य बना दिया है. वह नौकरी करती है. बी.ए. तक पढ़ लिख गई है. इतने दिनों में विकसित हुआ प्यार अब राजा को हमेशा के लिए पाने को विकल है. पर आज उसकी विवशता ने उसे निराशा के सागर में डाल दिया है. रिश्ते की दीवार किसी तरह तोड़ी नहीं जा सकती. आज वह सब कुछ पाकर भी अपने को पहले से अधिक बेचैन अनुभव कर रही है. इतना आगे बढ़ने के बाद भी, इतना पढ़ने-लिखने के बाद भी, विवशता ने उनके तन-मन पर पहरे डाल दिए हैं. काश! राजा उसका मौसेरा भाई न होता.
एक दिन राजा उसके बहुत क़रीब आ गया था और जब वह यह कहते हुए दूर छिटक गई थी, "यह क्या राजा? यदि तुम जन्म-भर के लिए मेरे नहीं हो सकते तो आगे मत बढ़ो, मत बढ़ो..."
"उम्मी सारे रिश्ते-नाते हमने बनाए हैं. सत्य पर आदर्श का आवरण देकर हम जीते हैं. ये रिश्ते तो मनुष्य के अपने दिमाग़ की उपज हैं, जो उसने अपनी सहूलियत के लिए गढ़ लिए हैं. समाज की प्रगति के साथ ही इन रिश्तों ने भी प्रगति की है."
उम्मी दीवार से सिर टेके खड़ी थी और राजा कहे जा रहा था, "यह स्त्री और पुरुष का आकर्षण है जो किसी रिश्ते, किसी जाति, किसी देश की सीमा में बंध नहीं सकता? हम तो रिश्ते और रिवाज़ों की चादर से उसे ढककर दफ़नाते हैं, उसे ही हम आदर्श की संज्ञा देते हैं. ज़रा सोचो, यदि तुम्हें और मुझे यह मालूम ही नहीं होता कि हमारा कुछ रिश्ता है तो..."
"बस करो राजा. तुम ठीक कहते हो, पर यदि अपनी विवशता को हमें जीतना नहीं आया तो संसार और समाज के विचारशील प्राणी कैसे..?"
"दहेज़ की बात होती तो क़ानून की आड़ देकर उसे लात मार देते. विधवा विवाह का प्रश्न होता तो प्रगतिशील बनने का दावा कर उसे कर दिखाते, पर जो रिश्ता लेकर हम बंधे हैं उसमें यह कुछ संभव नहीं. राजा दुनिया की नज़र में मैं अत्यंत सुखी और अपने अंतर में अत्यंत दुखी हो चुकी हूं. हम सब अंदर से कुछ भी सोचने के लिए स्वतंत्र हैं पर उसे कार्य का रूप दे सकते हैं क्या? और प्यार की परिणति शादी में ही क्यों समझ रहे हो राजा."
"उम्मी स्त्री और पुरुष का प्यार युगों-युगों की प्यास है. उसे स्वस्थ और पवित्र रूप में पाने के लिए ही शादी का बंधन डाला गया है. शादी के पहले का प्यार कलंक है, तो उसके बाद काआदर्श."
लहरों की तेज गर्जन को उम्मी शून्य-सी होकर देख रही थी. रात कितनी गहरी हो गई है इसका उसे भान नहीं था.
"ओ... खो गई क्या सागर में? अपनी कन्वीनियर ने ख़बर भेजी है कि सुबह चार बजे यहां से चल देना है." शीलू ने उम्मी को झकझोरते हुए कहा.
"ओं..."
"ये क्या. इस समय ढाई बज रहे हैं रात के."
उम्मी के मुंह पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई. वह दो दिन बाद राजा से मिल सकेगी. महीने भर से वह टूर पर है. अंजता की चित्रकारी में, कोडई केनाल के प्राकृतिक दृश्यों में, कन्याकुमारी के सूर्योदय में, और योगफल के इन्द्रधनुषी रंगों में उसने राजा को ही देखा था. उसने उसे जितना भुलाने का प्रयत्न किया इन दृश्यों में वह उसे अधिक याद आया.
घर आकर उम्मी सबसे पहले राजा से ही मिली. राजा उसे देखते ही ख़ुशी से उछल पड़ा, "तुम आ गई. मैं तुम्हारी ही राह कल से, जोरों से, देख रहा था."
"अच्छा ऐसा कौन-सा काम था मेरे लिए?"
"काम-वाम तो शाम को बताऊंगा घूमने चलेंगे तब. अभी तो तुम बहुत थकी हो. मां-पिताजी से मिल लो. थोड़ा आराम कर लो."
मन में अनेकानेक विचार लिए उम्मी शाम को राजा की राह देख रही थी. राजा आया तब दोनों गंगा किनारे घूमने निकल गए.
"अब तो बताओ क्या बात है राजा?"
"पहले वचन दो मेरी बात मानोगी."
"मैंने तुम्हारी बात कब नहीं मानी."
"महेश को तुम जानती हो न. वो मेरे साथ पढ़ता था?"
"हां."
"बस, उसी के लिए हां कर दो."
"राजा तुम्हें यह क्या हुआ है?"
"भुलो मत, तुमने मेरी बात मानने का वचन दिया है."
"राजा मैं भगवान के समान तुम्हें पूजकर जन्म बिता दूंगी, पर ऐसी बात के लिए मजबूर न करो."
"उम्मी प्यार की परिणति शादी नहीं हो सकती, किंतु प्रिय पात्र को सुखी देखना तो उसकी सबसे उत्तम परिणति है."
"राजा..."
"उम्मी मैंने भी यह मनौती की थी कि तुम्हारी मांगभरकर तुम्हें इस घर से विदा करूंगा. अपने आराध्य के चरणों में इससे अच्छी मनौती और क्या हो सकती थी." उम्मी ख़ामोश थी. उसने सिर झुका लिया.
- उर्मि कृष्ण
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