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कहानी- मास्टर पीस (Short Story- Master Piece)

कोई नव विवाहित जोड़ा स्टूडियो आता तो उसके भीतर गुदगुदी होने लगती. लजाई, लाल अनार सी पत्नी और उसके पास-पास सटते पति को देख वह अकारण ही रोमांचित हो उठता.

आज यह खाली है, सुबह से दोपहर होने आई पर स्टूडियो में कोई नहीं आया. आजकल सज-धज कर फोटो खिंचवाने कम ही लोग स्टूडियो आते हैं. घर-घर कैमरे हैं. अब तो सभा समारोहों, आयोजनों में काम मिलता है या फिर रील धोने का काम. पहले स्टूडियो की रौनक़ कुछ और थी- लड़के वालों को भेजने के लिए कन्याओं के फोटो. विभिन्न मुख, विभिन्न अदाएं. नवजीवन में पदार्पण करने की उत्कण्ठा, उत्साह-उमंग से जगमगाते मुखड़े. लोग कहते "ऐसा मास्टर पीस फोटो खींचना कि पहली नज़र में ही लड़की पसंद कर ली जाए."

वह सर्वोत्तम कोण देखने के बहाने ललिताओं के मुखड़े इधर-उधर कर आराम से कुछ क्षण स्पर्श-सुख के चुरा लेता. दोस्त-यार हंसते और कहते, "एकनाथ तुम्हारे तो मज़े हैं, जब तक चाहो, हसीनाओं के मुखड़े थामे रहो और हम थोड़ा सा घूर भी दें तो आवारा कहलाएं."

"तो तुम लोग भी स्टूडियो क्यों नहीं चलाते?" कहकर वह ऐसे अभिमान से भर जाता, जैसे मित्र मण्डली में एक वही विशिष्ट, महान, सौभाग्यशाली है और शेष सभी तुच्छ.

बच्चों के फोटो खींचना उसे कभी नहीं रुचा, बड़ा श्रम साध्य काम है, माताएं अपने नौनिहालों की जिस मुद्रा में फोटो चाहती हैं, वे वह मुद्रा कभी नहीं बनाते. उसकी तो कसरत ही हो जाती. ग्रामीण लोगों के लिए तो फोटो खिंचवाना आज भी किसी उत्सव से कम नहीं है. तेल फुलेल, टिकुली लगाए ग्रामीण स्त्रियां कितनी तन्मयता से फोटो खिंचवाती थीं, जैसे उनका पोर्ट्रेट बन रहा है. कॉलेज की लड़कियां स्टूडियो में ही बहस छेड़ देतीं, "मेरी तो बिल्कुल अच्छी नहीं आई, तेरी अच्छी आई है."

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"कहां री! तू हीरोइन लग रही है न, इसलिए इतरा रही है." बिल बनाता एकनाथ नतमुख हुआ मुस्कुराता रहता. कभी फोटो खिंचवाना सचमुच आयोजन होता था, पर अब घर-घर पहुंच गए कैमरों ने धंधा मंदा कर दिया है. एकनाथ स्टूडियो के सामने से आते-जाते लोगों को देख ऊब रहा था, तभी देविका आती दिखाई दी. वह उसकी सुस्त चाल और निस्तेज लटके चेहरे से जान गया कि बात इस बार भी नहीं बनी. इस बेचारी के घर कैमरा नहीं है, वरना क्यों बार-बार स्टूडियो आती.

अब तो यह लड़की इतनी मर्तबा स्टूडियो आ चुकी है कि एकनाथ उसके साथ नितान्त अनौपचारिक हो चला है. उसकी पीड़ा, नैराश्य, छटपटाहट को अपने भीतर उतरते पाता है और सच पूछो तो यह माह-पखवाड़े में कम से कम एक बार उसके आने की प्रतीक्षा करता है, बाट जोहता है.

देविका के कमनीय सलोने मुख में उसने कितने ही रंग, उतार-चढ़ाव, भाव देखे हैं. मौसम का आना-जाना देखा है. वस्तुतः देविका का चेहरा दर्पण की तरह साफ़ है. सब कुछ स्पष्ट दिखता है उत्कंठा, उत्साह, आहलाद, अन्तर्व्यथा, टूटना-बिखरना सभी कुछ.

कब से तो आ रही है ये लड़की स्टूडियो में. शायद बी.ए. किया था तब से. अब तो एम.ए. कर एक अंग्रेज़ी माध्यम स्कूल में पढ़ाने लगी है. पहली बार अपने बाबूजी के साथ आई थी. भाव प्रवण नेत्रों में आगामी वैवाहिक जीवन के सुनहरे सपनीले बिम्ब दिख रहे थे. बाबूजी उत्साहित थे, "एकनाथ, ऐसा मास्टर पीस (फोटो) खींचो कि लड़के वाले मना न कर पाएं. मेरे पास तो पूंजी के नाम पर बस इस बच्ची की शिक्षा और संस्कार हैं."

फोटो बहुत सुंदर आया था. एकनाथ ख़ुश था उसमें अच्छे फोटोग्राफर के गुण हैं. दो माह बाद देविका पुनः अपने बाबूजी के साथ आई. बाबूजी कहने लगे, "एकनाथ, वो फोटो हाफ था. लड़के वालों ने हेल्थ-हाइट के सही अनुमान के लिए फुल पोज मंगाया है एक साड़ी में, एक सलवार कुर्ते में."

कहानी- मास्टर पीस

देविका के मुख पर आशा का बाल सूर्य दमक रहा था. शायद सोच रही थी कि और फोटो मंगाए हैं तो हो सकता है उसे पसंद करने की दिशा में सोचा जा रहा हो. क्लिक करते हुए एकनाथ बोला, "बेकार ही ये लोग फोटो मंगवाते हैं. आपको स्वयं आकर देखते क्यों नहीं? आपका रूप लावण्य पूरा इस फोटो में कहां आता है."

जैसे किसी ने चेहरे पर अबीर मल दी हो, इस तरह आरक्त हो उठी थी वह.

फिर उस दिन वे पिता-पुत्री आए तो स्टूडियो में एकनाथ के पिताजी भी उपस्थित थे. एकनाथ के मुंह से हठात् निकल गया, "बाबूजी, बात नहीं बनी क्या?"

बाबूजी मलिन मुद्रा में उसके पिता से कहने लगे, "बड़ा ख़राब ज़माना आ गया है सहाय जी. न पत्र का जवाब देते हैं, न फोटो लौटाते हैं, अब तो हमने आशा छोड़ दी है. एक दूसरी जगह बात चल रही है. फोटो भेजना है."

सहाय जी बोले "मैं आपकी पीड़ों समझता हूं पाण्डे जी. मैंने इसी गर्मी में अपनी बेटी का विवाह किया है. बड़े पापड़ बेलने पड़े."

देविका गुमसुम थी. तटस्थ, निःस्पृह, उदास या हताश कह सकना कठिन है. पहला आघात ऐसा ही मारक होता है फिर आदत पड़ जाती है. उसके बाबूजी, सहायजी से बात करते रहे.

देविका फोटो खिंचवाने अंदर चली गई, कैमरा सेट करते हुए एकनाथ कहने लगा, "ये लड़के वाले भी हद करते हैं. फोटो वापस न कर अपने एलबम की शोभा बढ़ाना कुछ लड़कों का शगल होता है. सुंदर फोटो देखी कि..."

"फोटो सुंदर होती तो पसंद न आती?" देविका उत्तेजना में बीच में ही बोल पड़ी.

""बाबूजी क्या प्रोग्रेस है?" फिर एक शाम देविका के बाबूजी, साइकिल पर झोला टांगे उसके स्टूडियो के सामने से गुज़रे. एकनाथ ने प्रणाम कर पूछा.

"कुछ लोग देविका को देखने आ रहे हैं, उसी व्यवस्था में लगा हूं." बाबूजी उत्साहित थे.

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एकनाथ को जैसे देविका की प्रतीक्षा रहने लगी थी. सोचने लगा यदि इस बार बात तय हो जाएगी तो वह स्टूडियो नहीं आएगी. और क्या पता, अपने पति के साथ हंसती हुई आकर खड़ी हो जाए और कहे, "एक अच्छा सा फोटो खिंचवाना है, मास्टर पीस." उसके मुख पर हंसी कितनी अच्छी लगती है, जैसे माघ-पूस की गुनगुनी कच्ची धूप.

देविका आई पर पति के साथ नहीं बाबूजी के साथ. चेहरा ऐसा जैसे सुविकसित पौधे को कोई रोग लग गया हो. बाबूजी का मुख करुण लग रहा था, बताने लगे, "आए, खाया-उड़ाया और अब फोटो वापस कर दी. वह भी ऐसी हालत में कि पूछो मत जैसे किसी बच्चे ने स्याही उड़ेल दी हो. क्षमा मांगी है उन्होंने, लगता है ये बेचारी फोटो खिंचवाते-खिंचवाते बुढ़ा जाएगी. अपनी सामर्थ्यहीनता पर कभी-कभी क्षोभ होता है. सबकी बेटियां ब्याह कर चली गई, पता नहीं, भगवान हमारी अरज कब सुनेगा."

देविका बाबूजी का प्रलाप सुन भीतर जाने को उद्यत थी, पीछे-पीछे वह भी चल दिया, बोला, "तो इस बार भी फोटो पसंद नहीं की गई. मुझे तो अपनी फोटोग्राफी में दोष दिखता है."

"नहीं... नहीं, मेरी सूरत ही ऐसी होगी कि किसी को अच्छी नहीं लगती, वरना इस बार तो वे लोग मुझे आकर देख गए थे."

"ये तुम्हारी धारणा है, बल्कि निराशा और टूटन है. देविका, मैंने तो बड़ी साधारण लड़कियों को अच्छे घरों में जाते देखा है. पैकिंग आकर्षक हो तो सड़ा माल भी बिक जाता है. तुम्हारे बाबूजी तगड़ा दहेज़ नहीं दे सकते हैं, बस इसीलिए तुम्हारे मास्टर पीस फोटो अस्वीकृत हो जाते हैं."

कहानी- मास्टर पीस

हर बार वही प्रक्रिया... वही आवृत्ति... फोटो खिंचवाना, भेजना, अस्वीकृत होना, कभी पत्रोत्तर न होना तो कभी अस्वीकृत का कोई ठोस कारण गिना देना, ताज़े गुलाब की रंगत वाली लड़की का रंग तेज-चटक धूप में बदरंग होता गया. सुरभि खोती गई, पंखुड़ियां मुरझाती रहीं... और आज... आज वह एक बार फिर स्टूडियो में आकर खड़ी हो गई हमेशा की तरह. एकनाथ की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या पूछे. कुछ देर व्यर्थ ही मुस्कुराता रहा, फिर शब्दों की जुगाली सी की, "आज अकेले? बाबूजी नहीं आए?"

"आए हैं, आपके पिताजी नुक्कड़ वाले पान के ठेले पर मिल गए, तो वहीं रुक गए, आते ही होंगे." देविका अस्फुट से स्वर में बोली. चेहरा ऐसा विवर्ण जैसे हिम से शीतल पानी में डुबा कर रखा गया हो. और भाव प्रवण नेत्र... जैसे कंदील की बुझती दीप बाती.

"लड़के वालों को फोटो पसंद आई?"

"नहीं."

"क्यों?"

"लिखा है, लड़की का चेहरा एकदम गऊनुमा है. साड़ी में तो वह नितान्त घरेलू लगती है. उन्हें स्मार्ट लड़की चाहिए." देविका की आंखें नैराश्य और अपमान से पसीज रही थीं.

"एक बात पूछे देविका, लड़कों की तरह तुम्हारी कोई पसंद नहीं? पति के लिए कोई क्राइटेरिया..."

"लड़कियां भी क्राइटेरिया बनाती हैं?" उसने भरी-भरी आंखें ऊपर उठाई. "और वह भी मुझ जैसी दीन-हीन लड़की, जिसके पिता के पास लड़कों के ऊंचे भावों को चुनौती देने के लिए धन न हो. आप मज़ाक अच्छा कर लेते हैं."

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"देखो मेरा उद्देश्य... मैं मज़ाक नहीं... मैं गम्भीर... देविका मैं तुमसे..." एकनाथ के टुकड़ा-टुकड़ा वाक्य पान खाकर लौटे दोनों बुज़ुर्गों के ठहाकों में डूब रहे थे. पता नहीं ऐसा क्या हो गया, जो दोनों ऐसे उत्साहित, ऐसे आनन्दित हुए जा रहे हैं. बाबूजी सहाय जी के कंधे थपथपाकर कह रहे थे, "ये तो सहाय जी वही बात हो गई, गली में लड़का, गांव गुहार."

सहाय जी हंसे, "पाण्डे जी, समस्या तो आपकी ही बनाई हुई है. जाति और धर्म की छोटी सी डोरी में बंधे आप आकाश के एक छोटे से हिस्से तक ही उड़ान भरना चाह रहे थे. आज आकाश को विस्तार दिया है तो देखिए, अपनी उड़ान पर आप स्वयं ही चमत्कृत हैं. ये मेरा गधा लड़का, देविका को सेल्यूलाइड पर उतारते-उतारते न जाने कब अपने दिल में उतार बैठा है. इसकी फोटोग्राफी में दोष आ गया है. देविका का मास्टर पीस दिल में उतारने के बाद ये मास्टर पीस बनाना ही भूल गया है. लड़के वालों को देविका का फोटो पसंद आए तो कैसे?

आप तो ब्राह्मणों में भी ऊंच-नीच देखते हैं, इसलिए मेरा साहस न होता था. पर आज आपकी निराशा मुझसे देखी न गई और मैंने कह डाला. मुझे विश्वास तो न था आप अपनी धारणा, समीकरण और परिभाषा में संशोधन करेंगे पर..."

"पर सजातियों की हृदयहीनता देखकर जी अघा गया सहाय जी. जाति-धर्म में क्या रखा है? जो अपनी पीड़ा समझे वही अपना." कहकर बाबूजी देविका से संबोधित हुए, "देविका फोटो खिंचवा ली कि नहीं?"

"अभी नहीं बाबूजी."

"तो अब रहने दे. घर की खेती है ज़िंदगी भर फोटो खिंचवाती रहना." दोनों बुज़ुर्ग मुक्त कण्ठ से एक बार फिर हंस पड़े. देविका और एकनाथ कुछ क्षण एक-दूसरे का मुंह देखते रहे, देविका सहसा लजा गई. सुबह बहन को पढ़ाया पाठ 'उसने कहा था' हृदय में रस घोल गया. जैसे कोई कह रहा हो, "देविका, तेरी कुड़माई हो गई."

"हां हो गई. इस मास्टर पीस बनाने वाले से."

सुषमा मुनीन्द्र

सुषमा मुनीन्द्र

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