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कहानी- पांच कटोरी खीर… (Short Story- Panch Katori Kheer…)

"ओह तू खाने का कितना शौकीन था रे. याद है मां कहा करती थी कि बबुआ तो जैसे खाने के लिए ही जीता है. पर तू खीर तो खा इसमें तो घी-तेल नहीं." भैया ने खीर की तीसरी कटोरी ख़त्म करते हुए कहा.

"अरे बबुआ दाल में घी ले न और ये क्या रोटी भी सूखी खा रहा है. बचपन में तो जब तक रोटी से घी नहीं टपकता था तेरे गले से रोटी नीचे नहीं उतरती थी." भैया ने अपनी दाल में दो चम्मच घी डालते हुए कहा.

"वो भैया बीपी हाई रहता है तो तेल-घी खाना मना है." बबुआ अर्थात मल्टीनेशनल कंपनी के सीईओ ने जवाब दिया.

"ओह तू खाने का कितना शौकीन था रे. याद है मां कहा करती थी कि बबुआ तो जैसे खाने के लिए ही जीता है. पर तू खीर तो खा इसमें तो घी-तेल नहीं." भैया ने खीर की तीसरी कटोरी ख़त्म करते हुए कहा.

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"नहीं भैया, पिछले साल से डायबिटीज़ हो गया है. मीठा तो एकदम बंद है." रवि ने खीर से नज़रें चुराते हुए कहा.

"ओह! खैर कोई बात नहीं. आलीशान मकान, बड़ी-बड़ी गाडियां, नौकर-चाकर, इतना रौबदाब. अच्छा हुआ तू पढ़-लिख गया. कितना सुखी है अब. काश बाबा की बात मानकर मैं भी..." भैया ने रवि के वैभव पर हसरत भरी नज़र डालते हुए कहा. कहां गांव की वो दिनभर तपती धूप में झुलसती रूखी हाड़तोड़ मेहनत भरी ज़िंदगी कहां चौबीसों घंटे एसी की ठंडक.

उधर भैया को खीर की पांचवीं कटोरी भरते देख रवि मन ही मन बोला, 'कितने सुखी हैं भैया, न महंगे बोर्डिंग स्कूलों की मोटी फीस की चिंता, न स्टेटस मेंटेन करने का तनाव. उस पर गांव की ताज़ी शुद्ध हवा. आठ साल बड़े होकर भी न बीपी, न शुगर, न इम्सोमनिया, न और कोई लाइफस्टाइल बीमारी. छक कर मलाई वाली मीठी चाय पीते हैं, तर घी के हलवे का नाश्ता. शुद्ध घी के पराठे और...

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काश मैं भी पढ़ाई छोड़ देता तो आज पांच कटोरी मेवे डली खीर खा रहा होता.'

- विनीता राहुरीकर

कहानी- पांच कटोरी खीर

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Photo Courtesy: Freepik

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