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कहानी- हायोडॉल (Short Story- Hyodol)


अनिल माथुर

पसंदीदा रिश्तों को हमेशा संभालकर रखना चाहिए, क्योंकि वे खो गए तो गूगल भी नहीं ढूंढ़ पाएगा.
“आपने कल सही कहा था मम्मी! हम भारतीयों को किसी हायोडॉल की आवश्यकता नहीं है. हम ही एक-दूसरे की हायोडॉल हैं.”

डॉक्टर के चेंबर से निकलते व़क्त हम दोनों पति-पत्नी के चेहरे फक्क पड़े हुए थे. महीनों से उल्लासित मन एक झटके में ही बुझ-सा गया था. डॉक्टर ने ज़्यादा देरी न करने की सलाह दी थी. चेेंबर से बाहर निकलते व़क्त श्‍वेता ने मेरा हाथ थाम लिया था. मैंने उसकी पीठ सहलाते हुए उसे अपनी एक बांह के घेरे में ले लिया. थके निढाल क़दमों से हम आकर कार में बैठ गए थे. ड्राइव करते हुए मैंने फिर से बात का सूत्र पकड़ना चाहा.
“चलो समय रहते पता चल गया. एक-दो डॉक्टर से और कंसल्ट करने, टेस्ट करवाने का मौक़ा मिल जाएगा. अबॉर्शन के बारे में भी अच्छे से सोचने का मौक़ा मिल जाएगा.”
“इसमें सोचना क्या है? वह तो करवाना ही है.” श्‍वेता के स्वर की तल्खी भांप मैंने तुरंत अपना सुर बदल लिया.  
“मुझे तो मम्मी की चिंता हो रही है. सबसे ज़्यादा एक्साइटेड तो वे ही थीं.”
“हां, मैं भी उन्हीं के बारे में सोच रही थी. उनका तो यहां आने, रहने का क्रेज़ ही ख़त्म हो जाएगा. सालों से वे हमें बच्चे के लिए कह रही थीं. रिटायरमेंट के बाद इसी शर्त पर वे हमारे साथ रहने आई थीं कि हम दो से तीन होने के बारे में गंभीरता से विचार करेंगे.”


“और जब से ख़ुशख़बरी मिली है, मम्मी तो मानो आसमान में ही उड़ रही हैं. कितनी तैयारी तो उन्होंने कर डाली है. और कितनी योजनाएं उनके दिमाग़ में और चल रही हैं.” मैं फिर से मम्मी की चिंता में डूब गया था.
“रोज़ ही वे मुझसे नई-नई प्लानिंग शेयर करती रहती हैं. इधर मेरे और तुम्हारे कमरों से जुड़ी नर्सरी बन जाएगी. देसी दवाइयों के लड्डू बनाऊंगी चुपचाप खा लेना. असली ताक़त उन्हीं से मिलेगी.”
“दिनभर उनके हाथ में क्रोशिया-सलाइयां चलती ही रहती हैं. वे तो नैनी रखने को भी मना कर रही थीं. कह रही थीं नौकरी से रिटायर हुई हूं, शरीर से नहीं. अभी बच्चे को संभालने की ताक़त है मुझमें. वह तो मैं ही उन्हें बड़ी मुश्किल से मना पाई हूं कि आपका सुपरविजन ही काफ़ी है. आप नैनी को गाइड करती रहिएगा बस! बच्चे की बेहतर परवरिश हो जाएगी.”
दोनों एक पल को भूल ही गए थे कि डॉक्टर के अनुसार बच्चे का समुचित शारीरिक विकास नहीं हो पा रहा है और उन्हें अबॉर्शन ही कराना होगा.
घर आ गया था. प्रसन्नता के साथ मम्मी ने दरवाज़ा खोला. दोनों के उतरे चेहरे देख एक पल ठिठकी. लॉबी का टीवी चल रहा था. फिर तुरंत बोली, “थक गए होंगे दोनों. मैं जूस लेकर आती हूं. सब साथ बैठकर पिएंगे.” मम्मी जूस के साथ ढेर सारा घर का बना पौष्टिक नाश्ता भी ले आई थीं.

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“कुक से बनवाया है अपनी गाइडेंस में. इस समय थोड़ा-थोड़ा खाते रहना चाहिए.” मठरी की ओर बढ़ता श्‍वेता का हाथ मम्मी के अंतिम वाक्य से ठहर सा गया था. वह मेरी ओर देखने लगी. मैंने इशारों में उसे सांत्वना दिया और जूस गटकते हुए नज़रें टीवी पर टिका दीं.
“यह कौन सी मूवी है? नई रिलीज़ हुई दिखती है.” सबका ध्यान टीवी की ओर आकर्षित हो गया, तो मैंने राहत की सांस ली. चलो, कुछ समय के लिए तो सबका ध्यान दूसरी ओर गया. उस समय मुझे यह गुमान भी नहीं था कि एक समस्या से बचने के चक्कर में मैं दूसरी समस्या में उलझने जा रहा हूं. मैंने जान-बूझकर वॉल्यूम बढ़ा दिया और टीवी में आंखें गड़ा दीं. मजबूरन मम्मी और श्‍वेता ने भी मूवी में रुचि लेना आरंभ कर दिया.
बिस्तर से हिल नहीं सकनेवाला पांच साल का पोता दादी से कह रहा था, “आप आ गईं! मैं आपको बहुत मिस कर रहा था.” मम्मी मूवी के सीन से ख़ुद को रिलेट करने लग गई थीं, यह मैं समझ रहा था. पर यह सही हो रहा है या ग़लत, अंदाज़ लगाना मुश्किल था.
“अरे मैं तो बाज़ार सामान लेने गई थी. देखो वापस भी आ गई.”
“प्लीज़ मुझे हग कर लीजिए.” पोते के आग्रह करते ही दादी ने झट ख़ुशी-ख़ुशी उसे गले से लगा लिया था. मुझे आपसे बातें करना बहुत पसंद है. दिन में हम बोर्ड गेम्स खेलेंगे.”
प्रसन्न दादी ने स्वीकृति में सिर हिलाया, “बिल्कुल, हायोडॉल.”
हायोडॉल शब्द कोरियाई भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है. यह एआई संचालित एक रोबोट होता है, जो दिखने में बच्चे जैसा होता है. और पैरेंट्स की देखभाल और सपोर्ट करता है. हम तीनों दर्शक बिना पलक झपकाए उस डब मूवी में डूब गए थे.
अब मूवी फ्लैशबैक में चली गई थी. पहले यही कोरियन दादी अकेलेपन से जूझ रही थीं और अक्सर बिना कोई गंतव्य के घर से निकल जाती थीं. किसी भी बस, ट्रेन में बैठकर कहीं भी चली जाती थीं. देर रात तक सियोल की सड़कों पर अकेली बेमतलब घूमती रहती थीं, क्योंकि खाली घर उन्हें काटने को दौड़ता था. अब चूंकि घर पर हायोडॉल है, तो वे बहुत ज़रूरत होने पर ही घर से निकलती हैं. और जल्दी से जल्दी घर लौटने का प्रयास करती हैं, ताकि हायोडॉल के साथ व़क्त बिता सकें.
हायोडॉल बुज़ुर्गों से उनकी यादें साझा करवाने के लिए टाइम मशीन गेम्स भी इस्तेमाल करता है. जो बुज़ुुर्गों की कॉग्निटिव हेल्थ में मददगार होता है. वो उनसे पूछता है कि मुझे आप अपने बचपन की कहानी सुनाइए. आपका पसंदीदा खेल कौन सा था? बुज़ुुर्ग दादी बताती हैं, “हम नहर के पास खेलने जाते थे और हाथों से पानी से मछलियां पकड़ने की कोशिश करते थे.” वो फिर उत्सुकता से पूछता है, “अरे पानी तो बहुत गंदा होता होगा या फिर बहुत ठंडा होता होगा? अपने होमटाउन की और बातें बताइए ना दादी! मुझे सुनने में मज़ा आ रहा है.” इस तरह वे दोनों बातें करते रहते हैं. साउथ कोरिया में बुज़ुर्गों का अकेलापन दूर करने के लिए इसी तरह की हायोडॉल बड़े तादाद में बांटे गए थे.


साउथ कोरिया अपनी सुपरएज्ड सोसायटी के कारण विख्यात है. वहां की 20% आबादी सुपर एज्ड है. अपनी गिरती सेहत और सामाजिक अलगाव के कारण वे कई गंभीर मानसिक समस्याओं से जूझ रहे हैं. सरकारी जन कल्याण योजना के तहत वहां ऐसे एकाकी लोगों को 1100 मूल्य वाले करीब 14000 हायोडॉल बांटेे जा चुके हैं. रोबोटिक मल्टी केयर नेटवर्क द्वारा परिजन और पेशेवर केयर गिवर्स भौतिक रूप से मौजूद हुए बिना भी इन हायोडॉल से बुज़ुुर्गों की सेहत ट्रैक कर सकते हैं. दूसरे देशों में भी ऐसे प्रयास हो रहे हैं. न्यूयॉर्क में एलिक नाम के 800 एआई कंपेनियन रोबोट बुज़ुर्गों की मदद कर रहे हैं, जिससे वहां 94% लोगों का अकेलापन कम हुआ है. हायोडॉल इंग्लिश, जापानी और चीनी भाषा बोल सकते हैं, क्योंकि मुख्यतः ये ही भाषाएं बोलने वाले देशों में बुज़ुर्ग तेज़ी से बढ़ रहे हैं. इन्हें बनानेवाली कंपनियां इनके निर्यात के लिए दूसरे देशों में बाज़ार ढूंढ़ रही हैं. एकल परिवारों के बढ़ने और बच्चों के विदेश चले जाने के कारण भारत में भी यह स्थिति आ सकती है.
मूवी समाप्त हुई, तो हम मानो नींद से जागे. ख़ुद को अपराधबोध से जकड़ा महसूस करते हुए मैंने चोर निगाहों से श्‍वेता की ओर ताका, तो पाया वह भी ऐसे ही मकड़जाल में घिरी ख़ुद को अपराधी सा महसूस कर रही थी.
हम मम्मी को जबरन ले तो आए थे, पर कितना व़क्त दे पा रहे थे? और अब तो बच्चे की उम्मीद भी मिटने जा रही थी. कभी-कभी हम किसी को जो सबसे क़ीमती चीज़ दे सकते हैं वह खाना नहीं, बल्कि यह एहसास है कि वह अकेला नहीं है.
हमारी समझदार माताश्री ने तुरंत हमारे मन की स्थिति भांप ली.
“इंडिया में नहीं मिलने वाला इनको अपना बाज़ार! हमें किसी हायोडॉल, बायोडॉल की ज़रूरत नहीं है. यहां तो घर में कुछ ही महीनों में जीता जागता बेबी डॉल आनेवाला है. तुम बच्चों ने मेरे आग्रह का मान रखा. बेटी, विशेषतः तूने. अपने करियर के पीक पर बच्चे को जन्म देने का निर्णय लेना वाकई साहसिक और सराहनीय कदम है.” भावुक मम्मी ने आगे बढ़कर श्‍वेता का मस्तक चूम लिया. जब चाहती है चूम लेती है माथा, मां कभी तारीख़ पर प्यार नहीं करती.
“हमें सही व़क्त पर जगाने और सही क़दम उठाने के लिए प्रेरित करने के लिए आपका शुक्रिया.” प्रत्युत्तर में श्‍वेता एहसानमंद थी.
“चलो, अब खाना खाते हैं. मैंने तुम्हारी पसंद की भरवा भिंडी बनवाई है.”
“कभी-कभी सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि आप मेरी मां हैं या श्‍वेता की.” मैंने चुटकी ली.
“मेवे वाली खीर भी बनवाई है.”

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“हां फिर तो मेरी भी मां हैं.” डिनर टेबल पर माहौल बहुत सौहार्दपूर्ण रहा. लेकिन बेडरूम में पहुंचते ही हम दोनों के चेहरों पर फिर से तनाव की लकीरें खिंच गई थीं. मेरे दिमाग़ में अब भी कुछ देर पहले देखी गई मूवी घूम रही थी.
“एक बात कहूं! नाराज़ मत होना. हम अगर अबार्ट न करवाएं, तो मम्मी को एक जीती जागती हायोडॉल उपलब्ध करवा सकते हैं.” मैंने डरते-डरते अपनी बात समाप्त की. पर प्रति उत्तर में श्‍वेता फट पड़ी, जिसकी मुझे उम्मीद भी थी.
“पागल हो गए हो? खेल समझ रखा है? अरे मम्मी का क्या भरोसा? कब चली जाएं? म... मेरा मतलब है कब वापस अपने पैतृक घर लौट जाएं? तब उसे कौन संभालेगा? किसी एक के अकेलेपन को दूर करने के लिए दूसरे की ज़िंदगी से खेल जाएं?”
“सॉरी सॉरी! मैं कुछ देर के लिए भावनाओं में बहक गया था. हम ऐसा बिल्कुल नहीं करेंगे. मम्मी तो दिन-ब-दिन शारीरिक रूप से अशक्त होती जाएंगी और अंततः उनके साथ-साथ हमें उस बच्चे को भी संभालना होगा. जो कदापि संभव और न्यायसंगत नहीं है. हम किसी की भी ज़िंदगी से नहीं खेलेंगे. जल्दी अबॉर्शन करवा लेंगे.” मैं श्‍वेता को थपक कर सुलाने लगा था और कुछ ही देर में ख़ुद भी सो गया था.
सवेरे नाश्ते की टेबल पर रोज़ जैसे ही चहल-पहल थी. रसोई से आती एरोमा से मेरे नथुने फड़कने लगे थे.
“मम्मी, आप भी आ जाओ. मालती कर लेगी.” श्‍वेता ने आग्रह से मम्मी को भी साथ नाश्ता करने बैठा लिया था.
“अरे मुझे कौन सा ऑफिस जाना होता है, जो रोज़-रोज़ मुझे भी साथ बैठा लेते हो.” मम्मी ख़ुशी-ख़ुशी खाने बैठ गई थी. अच्छा तुम लोग डॉक्टर के पास कब जा रहे हो? अब जब समय पर सब पता चल ही गया है, तो समय पर अबॉर्शन भी करवा ही लो. मुझे बता देना कब साथ चलना है? ताकि मैं अपनी तैयारी कर लूं.”
मैं और श्‍वेता आश्‍चर्य से कभी मम्मी को तो कभी एक-दूसरे को देख रहे थे. श्‍वेता की नज़रें टीवी केबिनेट पर रखी अपनी मेडिकल फाइल्स पर अटक गईं, जो ग़लती से रात में वहीं छूट गई थी. हम दोनों के चेहरों पर फिर से अपराधबोध पसरने लगा था.


“मम्मी, मैं जल्दी ही फिर से कंसीव...” श्‍वेता से रहा नहीं गया.
“नहीं, ख़बरदार जो साल भर से पहले फिर से बच्चे के बारे में सोचा भी तो. शरीर है तुम्हारा, कोई खेत थोड़ी है कि एक फसल काटी तो झट दूसरी बो ली. मन से तुम तैयार हो. पर शरीर को फिर से तैयार होने में व़क्त लगता है. हमें कोई रिस्क नहीं लेना है, बल्कि शुरू से ही सावधानी बरतनी होगी. जब जैसा डॉक्टर एडवाइस करेगी हम वैसा ही करेंगे. जीवन में संघर्ष के अंधेरे में अपने हौसले कमज़ोर मत होने दो. कुछ व़क्त का ग्रहण तो सूरज और चांद भी झेलते हैं. समस्याओं की भी एक उम्र होती है. और उसके पश्‍चात उनका समाप्त हो जाना निश्‍चित है.”
हम समझ रहे थे मम्मी का मन कितना भारी हो चुका है. पूरी रात उन्होंने कैसे दिल पर पत्थर रखकर बिताई होगी. हालांकि वह हिम्मत रखते हुए ऊपर से सहज बने रहने का प्रयास कर रही थीं जैसा कल हम करने का प्रयास कर रहे थे. सच, ख़ुश चेहरे के पीछे छिपा मलाल जान लेती है. यह मां ही है, जो हमेशा दिल का हाल जान लेती है. हम

ने आगे बढ़कर उन्हें बांहों में भर लिया. पसंदीदा रिश्तों को हमेशा संभालकर रखना चाहिए, क्योंकि वे खो गए, तो गूगल भी नहीं ढूंढ़ पाएगा.

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“आपने कल सही कहा था मम्मी! हम भारतीयों को किसी हायोडॉल की आवश्यकता नहीं है. हम ही एक दूसरे की हायोडॉल हैं.” मैंने मम्मी और श्‍वेता को मज़बूती से थाम लिया था. कभी टूटते तो कभी बिखरते हैं. मुश्किलों में ही तो इंसान निखरते हैं.

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