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कहानी- अनसुना प्यार (Short Story- Ansuna Pyar)


रीता कुमारी

झरने से लौटने के बाद दूसरे दिन जब हम मंदिर में मिले थे. हमने लाख कोशिश की थी कि अपना व्यवहार स्वाभाविक रखें. पर कुछ भावनाओं को दबाना कठिन हो जाता है. तुम बात-बात पर मुस्कुरा कर मेरा हाथ थाम लेते थे. मैंने सोचा था तुम शायद अपने प्यार का इज़हार करोगे, पर अचानक तुम गहन चिंतन में डूब गए थे. जाने क्या सोच रहे थे.

ज़िंदगी में कभी-कभी ऐसे पल भी आते हैं जब इंसान अंदर से पूरी तरह टूट जाता है और ज़िंदगी में सब कुछ बदल जाता है. पर एक यादें हैं, जो कभी नहीं बदलतीं ना ही दिल से दूर जाती हैं. एहसास के रूप में हमें अपनी ज़िंदगी के सबसे ख़ूबसूरत पल से हमेशा जोड़े रखती हैं. यही कारण है कि आज भी मेरी हर एक सांस में तुम्हारा अस्तित्व जैसे समाया हुआ है.
आज फिर तुम्हारी यादों ने मन को विकल कर रखा है. तुम्हारी यादें मन में समेटे सुकून की तलाश में मैं पथरीली सड़क पर यूं ही निकल आई थी. टहलते हुए एक बार फिर उसी कॉफी हाउस के उसी कोने वाले टेबल पर आ बैठी हूं, जहां कभी हम दोनों बैठकर फिल्टर कॉफी का आनंद लेते हुए बातें करते थे.
इतना लंबा समय गुज़र जाने के बाद भी यह कॉफी हाउस समय के साथ चाहे कितना ही क्यों न बदल गया हो, पर वह हिस्सा जहां हम बैठा करते थे, आज भी वैसा का वैसा ही दिखता है. करीने से लगे पेड़-पौधे और बांस से बनी दीवारें, जो इस पूरे हिस्से को ग्रामीण परिवेश प्रदान करता है. कहीं कोई अनजानापन नहीं, सब कुछ में एक अपनापन सा है. भले ही मेरी शादी पास के दूसरे शहर में हुई थी, पर यहां की ख़ूबसूरती ने मेरे पति को इतना आकर्षित किया कि यहीं पर हम लोगों ने अपना मकान बनवा लिया. पति के रिटायरमेंट के बाद से तो हम दोनों यहीं पर रह रहे हैं. मेरे दोनों बच्चे नेहा और नील अब यहां से दूर, कनाडा में जा बसे हैं.
आज जीवन के छठे दशक में भी दिल के एक अछूते कोने में वही सूनापन है, जो तुम्हारे जाने के बाद से कायम हो गया था. मैं अच्छी तरह जानती हूं कि तुम फिर कभी लौट कर मेरे जीवन में नहीं आओगे, ना कभी दोबारा दिखाई दोगे, ना कभी आवाज़ दोगे, क्योंकि काल का पहिया कभी पीछे नहीं मुड़ता. फिर भी काल की परतों को उधेड़ कर अपना स्वर्णिम दिन तलाशती रहती हूं, जो अतीत से सीधे मेरी आत्मा में उतरता है. समय के निरंतर प्रवाह में कितने वर्ष गुज़र गए. फिर भी तुम्हें भुलाना मेरे वश में नहीं है. तुम्हारी एक-एक बात तुम्हारे साथ गुज़ारे पल अक्सर उन स्थानों पर और भी जीवंत हो जाते हैं, जहां हम साथ-साथ जाते थे. एक हूक सी उठती है और एक अनजानी लहर पूरे शरीर में दौड़ जाती है.
कहते हैं व़क्त सारे घाव भर देता है, पर सच तो यह है कि समय ने मेरे घाव नहीं भरे. मुझे दर्द के साथ जीना सिखा दिया और सारे दर्द खून में मिल नसों में बहने लगे. 30 वर्ष काफी होते हैं किसी को भुला देने के लिए, पर क्या मैं आज भी तुम्हें भूल पाई? यह भी सच है कि मैं तुम्हें भुलाती भी कैसे, तुम तो मेरे दिल की धड़कनों में बसे हो. तुम्हें भूलना यानी कि दिल की धड़कनों का बंद हो जाना. आजकल एक बात शिद्दत से मेरे मन में उठती है. ईश्‍वर ने हमें मिलाया ही क्यों जब उसे इतनी जल्दी जुदा करना था? मैं तो तुम्हारे साथ जीना चाहती थी, पर ऐसा हो ना सका या यूं कहो नियति ने ऐसा होने नहीं दिया. कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि दुनिया का सबसे बड़ा नाटककार जैसे हमारे जीवन की हर छोटी-बड़ी बातों को लिखकर रखे रहता है, जो कालचक्र के साथ घटित होता है. मिलना-बिछड़ना सब उसके अधीन होता है, वरना कोई मंज़िल के करीब आकर यूं बिछड़ता है जैसे हम बिछड़े? फिर भी आमने-सामने ना सही, पर आज भी ख़्यालों में हमारी बातें होती हैं, तो फिर दूर कहां हो मुझसे... इसीलिए शायद प्यार का दूसरा नाम पागलपन है.

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आज फिर मौसम काफ़ी ख़ुशगवार है. ठीक उसी तरह का माहौल है जब बरसों पहले हम यहां मिले थे. पूरी घाटी में धुंध पसर गया है. रुक-रुक कर हल्की बारिश हो रही है. तेज़ हवाएं पेड़-पौधों के पत्तों से टकराकर शोर मचा रही हैं. धुंध में डूबे लोग समुद्र में तैरती मछलियों की तरह दिखने लगे हैं. मुझे आज भी याद है मैं बारिश से बचने के लिए जिस पेड़ के नीचे खड़ी थी, तुम भी उसी पेड़ के नीचे आ खड़े हुए थे. ठंड से मैं थोड़ी सी सिकुड़ क्या गई, तुमने किसी फिल्मी हीरो की तरह अपना जैकेट ही मेरी तरफ़ बढ़ा दिया था. पर मैंने लेने से यह कहते हुए साफ़ इनकार कर दिया था कि इतनी सी ठंड तो हमारे यहां के मौसम की ख़ूबसूरती है, परेशानी का सबब नहीं है. वैसे भी एक अजनबी से कुछ लेना मेरी फ़ितरत में नहीं है.
तुम्हारी यूं आत्मीय होने की कोशिश मुझे अच्छी नहीं लगी थी. मैं अपनी ओढ़नी को अपने चारों तरफ़ शॉल की तरह लपेटते हुए आगे बढ़ गई थी. रास्ते में यह कॉफी हाउस मिला तो मैं अंदर आ गई. पीछे-पीछे तुम भी आ गए थे. जब तक मैं अपने रुमाल से भीगे हुए हाथ-पांव को सुखाने की कोशिश कर रही थी, तब तक तुम दो कप कॉफी ले आए थे. लेने का मन तो नहीं था, पर मैं दोबारा मना नहीं कर सकी थी. कॉफी पीते हुए, जब तुम प्रकृति के अद्भुत नजारे को निहार रहे थे तब मैंने गौर से देखा था, तुम काफी हैंडसम लग रहे थे. ब्लू जींस के ऊपर स़फेद शर्ट तुम पर काफ़ी जंच रही थी. तुम्हारे तीखे नैन-नक्श और लंबे क़द के साथ सबसे ज़्यादा जो आकर्षित कर रहा था, वह थी तुम्हारी संवेदनशील आंखें.
बातों के दौरान तुमने बताया था कि तुम कुर्ग में घूमने नहीं आए हो, बल्कि एक बैंक में काम करते हो. बातों ही बातों में तुमने यह भी बताया था कि पास के मंदिर में तुम हर शनिवार और रविवार को आते हो. बातें करते-करते छुपी दृष्टि से तुम्हारा मुझे देखना मेरे मन को एक सुखद एहसास से भरने लगा था. जैसे ही बूंदाबांदी बंद हुई, मैं तुमसे विदा लेकर अपने घर की तरफ़ बढ़ गई. तुमने जाने किस कौशल से मुझे बांधा था कि घर लौटने के बाद भी मैं देर तक तुम्हारे बारे में ही सोचती रही. तुम्हारा वह मासूम सा चेहरा दिल में कहीं उतर गया था.
फिर तो शनिवार आते ही मैं तुमसे पहले मंदिर पहुंच गई थी. जब तुम आए, मुझे वहां देखकर तुम भी कम प्रसन्न नहीं हुए थे. फिर तो हर शनिवार और रविवार को मंदिर आने का मेरा सिलसिला शुरू हो गया था. अक्सर हम दोनों मंदिर के बाहर बेंच पर ख़ामोश बैठे बातों से ज़्यादा एक-दूसरे की समीपता को महसूस करते थे. मंदिर से निकलकर घर लौटते समय हम आसपास के किसी प्राकृतिक स्थान पर थोड़ी देर रुक जाते. कभी कॉफी पीने के बहाने हम एक-दूसरे के साथ कुछ समय बिताते, दरअसल एक-दूसरे का साथ हमें रोमांचित करने लगा था. तुम बोलते कुछ नहीं थे, पर तुम्हारी आंखों की गहराई में मुझे साफ़-साफ़ अपने लिए उमड़ता-घुमड़ता तुम्हारा प्यार नज़र आता. अचानक एक दिन तुमने यहां के एक प्रसिद्ध झरने को देखने की इच्छा ज़ाहिर की थी और मुझसे भी साथ चलने के लिए आग्रह किया था.
वह रविवार का दिन था. मैं पहली बार अपने घर में झूठ बोलकर कि मैं एक सहेली के साथ घूमने जा रही हूं, सुबह-सुबह ही तुम्हारे साथ  झरना देखने निकल गई थी. तुम अपनी कार ले आए थे. जहां कहीं भी सुंदर दृश्य दिखता, तुम कार रोक कर उतर जाते. हवा में कुछ ऐसी खनक थी, जो मन को एक ख़ुशनुमा एहसास से भर रही थी. अपनी इतनी लंबी उम्र में मैंने कभी इतनी ख़ुशी और ऊर्जा का अनुभव नहीं किया था. गंतव्य पर पहुंचकर झरने के पास सीढ़ियों से उतरते समय ठंडी हवा के झोंके, लटों से उलझती और बिखेरती मन को एक गहरे सुकून से भर रहे थे. कई जगह मोटे-मोटे दरख्त पर नाम खुदे हुए दिखे. तुमने भी एक मोटे से दरख्त पर मेरा और अपना नाम लिख दिया था. तुम्हारी बच्चों जैसी इस हरकत पर मुझे हंसी आ गई थी. लेकिन अब जब भी कभी वहां जाने का मौक़ा मिलता है, वही बचपना मैं भी करती हूं. तुम्हारे लिखे को और भी गहरा करके आती हूं, क्योंकि जैसे ही तुम्हारे लिखे को स्पर्श करती हूं, तुम्हारे होने का एहसास होता है.
उस दिन की उस रोमांचक यात्रा को मैं कभी नहीं भूल पाती हूं जिसने मुझे पूरी तरह बदल दिया था. दोपहर में जब हम थक गए थे, तब पास के एक रेस्टोरेंट में खाना खाया था. वहां की सजावट और खाने का टेबल सब कुछ अनोखा सा अनुभव दे रहा था. सामने बड़ी सी खिड़की से पूरी घाटी दिख रही थी. दूर तक  फैली घाटी, हरे भरे पेड़-पौधों से भरी थी, जिनके बीच से पहाड़ी नदी कल-कल कर बह रही थी. हर चीज़ एक नया कौतूहल पैदा कर रहा था. बादलों में लुका-छुपी करता सूरज अब पश्‍चिम की तरफ़ बढ़ रहा था. पहाड़ी के ढलानों पर ढेर सारे ख़ूबसूरत फूल खिले हुए थे. मुझे एक फूल ने इतना आकर्षित किया कि मैं ख़ुशी से चीख पड़ी थी, “देखो कितने सुंदर ऑर्किड प्रकृति के गोद में खिले हुए हैं.” और तुम बिना सोच-समझे उसे तोड़ने के लिए घाटी में उतर गए थे. तुम्हें घाटी में उतरते देख मेरा दिल धड़क उठा था.
“लौट आओ, मुझे फूल नहीं चाहिए.”  
मेरी दहशत भरी आवाज़ सुनकर तुम वहीं से चिल्ला कर बोले थे, “डरो मत. मुझे कुछ नहीं होगा.” पर फूल तोड़ने के बाद लौटते व़क्त तुम्हारे पैर लड़खड़ा गए थे और तुमने एक पेड़ की डाली थाम ली थी. फिर भी तुम अपने पैरों को ज़मीन पर स्थिर नहीं कर पा रहे थे. मैं बुरी तरह घबरा गई और मुझे रोना आ गया था. फिर भी मैं हिम्मत से काम लेते हुए बोली थी, “घबराना मत मैं हूं्.” और जल्दी से जाकर कार में रखी हुई रस्सी ले आई थी. रस्सी का एक सिरा एक मज़बूत पेड़ से बांधकर दूसरा तुम्हारी तरफ़ फेंक दिया था. रस्सी तुम्हारी  पकड़ में नहीं आ रही थी. तुमने वहीं से मना किया था, “तुम ढलान पर मत उतरना. तुम्हारी जान भी ख़तरे में पड़ जाएगी.” लेकिन मैंने बिना किसी डर और भय के ढलान पर कुछ दूर तक उतर कर रस्सी तुम्हारे क़रीब तक पहुंचा दिया था. फिर तुम रस्सी को थामे किसी तरह अपने को संभालते हुए बाहर आ गए थे.

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बाहर आते ही अचानक बढ़कर तुमने मुझे गले से लगा लिया था. जैसे एक सम्मोहन सा छा गया हो हम दोनों पर. एक-दूसरे से लिपटे जाने क्या-क्या कहते रहे, इसका तो अब इल्म तक नहीं है. ख़तरे की कसौटी हमें काफ़ी क़रीब ले आया था. अभी तक मैं शायद तुम्हें प्यारी सी गुड़िया नज़र आ रही थी, पर तुम्हें बचाने के लिए मेरी बेचैनी और हिम्मत देख तुम्हें मैं उम्मीद से ज़्यादा बेशक़ीमती लगने लगी थी.
कुछ नया सा, अनजाना सा प्यार हम दोनों के दिल में एक साथ उद्वेलित हो रहा था और हमारी धड़कनें एक हो गई थीं.
मैं ख़ुद हैरत में थी इस एहसास से. पर थोड़ी देर में जब हमारी तंद्रा भंग हुई. सत्य से रू-ब-रू होते ही हम एक-दूसरे से अपनी नज़रें चुराते कार में आ बैठे थे. कुछ देर तक हम दोनों चुपचाप थके से बैठे रहे थे.
थकान जिस्म से ज़्यादा रूह की थी. मौत की आहट ने हमारे दिल में छुपे प्रेम को उजागर कर दिया था. अपने लिए मेरी आंखों में व्याकुलता देखकर तुम शायद हतप्रभ थे. मेरे प्रेम की गहराई का अंदाज़ा तुम्हें हो गया था. हमारे दिल जैसे एक साथ धड़कने लगे थे.
तुम आज होते भी तो विश्‍वास नहीं करते कि वह फूलों का गुच्छा जिसने हमें क़रीब लाया था, आज भी मेरे पास सुरक्षित है. मैंने उसी दिन घर लौटने के बाद उन फूलों का हरबेरियम बना डाला था. वैसे भी बॉटनी की स्टूडेंट थी, हरबेरियम बनाना मेरा जुनून भी था. तुम्हारे जाने के बाद बस यही एकमात्र प्यार की निशानी अब तक मेरे पास है.
झरने से लौटने के बाद दूसरे दिन जब हम मंदिर में मिले थे, हमने लाख कोशिश की थी कि अपना व्यवहार स्वाभाविक रखें. पर कुछ भावनाओं को दबाना कठिन हो जाता है. तुम बात-बात पर मुस्कुरा कर मेरा हाथ थाम लेते थे. मैंने सोचा था तुम शायद अपने प्यार का इज़हार करोगे, पर अचानक तुम गहन चिंतन में डूब गए थे. जाने क्या सोच रहे थे. फिर तुमने बताया कि तुम पटना जा रहे हो किसी ख़ास मक़सद से. आने पर मुझे एक बड़ा सरप्राइज़ दोगे. तुम्हारे मन की बातों की कल्पना तो कर पा रही थी, क्योंकि मेरे लिए तुम्हारे प्यार की भावना तुम्हारे आंखों से बरस रही थी. फिर भी तुमने स्पष्ट कुछ नहीं कहा था. तुम्हारी बातों का अर्थ समझकर मेरी ख़ुशियां चरम पर थीं. फिर भी दिल में एक बात खटक रही थी कि मैं कर्नाटक से थी तो तुम बिहार से, बाधा तो आनी ही थी. तुम्हारे जाने के बाद पूरा एक हफ़्ता गुज़र गया. तुम्हारा ना कोई फोन कॉल आया, ना कोई संदेशा. मन एक अनजानी सी आशंका से घबरा रहा था. मैं क्या जानती थी उस दिन तुमसे हुई मुलाक़ात मेरे जीवन का अहम और अंतिम मुलाक़ात बन जाएगी. तुमने अपने दोस्त नवीन का नंबर दिया था कि मेरे विषय में कुछ जानने की ज़रूरत हो तो तुम उससे बात कर सकती हो, पर एक नारी सुलभ झिझक थी, इसलिए चाह कर भी मैं उसे फोन नहीं कर पाई. मैं तुम्हारे पटना से लौटने का इंतज़ार करती रही.


पर तुम पटना से नहीं लौटे. हां, एक भयानक संदेश तुम्हारे दोस्त नवीन के द्वारा ज़रूर लौटा था. तुम्हारे कार और एक ट्रक की भीषण दुर्घटना की. उस कार एक्सीडेंट में तुम बुरी तरह घायल हुए और फिर इस दुनिया से विदा हो गए. तुम सोच भी नहीं सकते कि इस समाचार को सुनकर मेरा क्या हाल हुआ था. गहरे दुख और सदमे से मैं सुन्न हो गई थी. इस क्रूर थपेड़े को सह नहीं पा रही थी. कई दिनों तक पागलों की तरह छत पर जाकर, तारों में तुम्हें ढूंढ़ती, तुमसे बार-बार अनुरोध करती. मुझे अकेला छोड़ कर मत जाओ. कभी लगता तुम्हारी मृत्यु का समाचार ही झूठा है. तुम ज़रूर लौट आओगे. फिर भी सत्य को कब तक नकारा जा सकता था.
पूरे तीन वर्षों तक मैं अपनी शादी टालती रही. कोई जान से प्यारा शख़्स अचानक दूर हो जाए, तो इस बात का ख़ुुद अपने आपको ही यक़ीन दिलाने में देर लगती है. होनी को कौन रोक सका है, कहना आसान होता है, पर इस बात को दिल को समझाना मुश्किल था.
मेरे शादी न करने के ़फैसले से मेरे माता-पिता बहुत परेशान रहने लगे थे. प्रेम आदमी को भीतर से मज़बूत बना देता है. मैंने जीवन में आगे बढ़ने का ़फैसला यह सोचकर किया कि मेरा प्रेम स्वयं की अनुभूति है, स्वयं का अनुभव है, इसे दूसरों के ख़ुशियों के आड़े नहीं आने दूंगी.

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शादी के बाद मेरी ज़िंदगी बदल गई. मैं पत्नी, मां और बहू के क़िरदार में बंट गई और आज मेरे पास माता-पिता, पति, बेटा-बेटी जैसे बहुत से क़रीबी रिश्तेदारों का एक मुकम्मल जहां है, जिसे देख लोग मुझे ख़ुशनसीब महिला का खिताब देते हैं, पर यह कोई नहीं जानता कि इन सबके बीच भी दिल के एक कोने में गहरा सन्नाटा पसरा रहता है, जहां उस मुक़ाम का खंडहर है, जो मेरे जीवन की कभी मंज़िल थी. पर यह भी सच है कि भले ही तुम मुझे इस जीवन में नहीं मिले और हमारा प्यार अनसुना रह गया, पर आज भी मैं प्रेम के उस ऊर्जा को महसूस करती हूं, जो मृत्यु के द्वार पर समाप्त नहीं होती, बल्कि स्मृतियों के गलियारों में और भी प्रखर हो जाती है. बाहर से कितना भी दिखूं कि आगे बढ़ गई हूं पर सच यही है कि आज भी उसी मोड़ पर खड़ी हूं, जहां से हम अलग हुए थे. राधा कृष्ण सा प्यार है हमारा. मिलने की कोई आस नहीं, बस एक ख़ामोश यक़ीन है कि तुम मुझमें हो और मेरी अंतिम सांस तक रहोगे.

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