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कहानी- छलावा (Short Story- Chhalava)

'... वासु तुमने चाहे लाखों लोगों के सिर अपने सामने झुकवाएं हों, चाहे अनगिनत लोग तुम्हारी जय-जयकार करते हों, समाज तुम्हें सम्मान देता हो. किन्तु इतना सब कुछ होते हुए भी तुम उस एक क़ीमती चीज़ से वंचित रहोगे जिसे प्यार कहते हैं...'

पागलखाने की जेलनुमा कोठरी के सामने लाकर रीना को नर्स ने खड़ा कर दिया. उसने एकटक शून्य में घूरती हुई मनु को एक कोने में बैठे पाया. एक दर्द सा रीना के हृदय में उठा. मनु को थोड़ी देर देखकर वह डॉक्टर के कक्ष में गई. उसने पहले की तरह डॉक्टर से मनु को ठीक करने की विनती की. किन्तु जवाब वही कि मनु को वही व्यक्ति ठीक कर सकता है, जिससे उसे आघात लगा है. वही कारण भी है और वही निवारण भी या वासुदेव वह बेबस होकर लौट पड़ी. अब कहां से लाए वह वासुदेव को. मनु के वसु को. जो वासुदेव का रूप अब है, वह वासुदेव मनु का वसु नहीं है. यही सोचते-सोचते वह बस स्टॉप पर पहुंची, बस छूटने ही वाली थी, जैसे-तैसे बस में चढ़ गई. बस गन्तव्य की ओर बढ़ रही थी, लेकिन रीना पीछे की ओर लौट रही थी.

अभी कुछ ही साल पहले की तो बात है, जब उसने अपने पड़ोस में रहने वाली कमला मौसी के यहां मनु को देखा था. मां ने मनु के बारे में बताया था कि मनु के माता-पिता का आकस्मात् निधन हो गया, अतः मौसी उसे अपने यहां ले आई. लेकिन कमला मौसी को तो मुफ़्त की नौकरानी मिल गई. हमेशा उस पर हुक्म चलाती रहतीं. वह बारह-तेरह वर्ष की मासूम लड़की सब सहन करती.

कमला मौसी और रीना का घर पास-पास था और उन्हीं के बराबर में वासुदेव का घर था. तीनों घरों की छतें आपस में सटी हुई थीं. बचपना होने के कारण तीनों साथ मिलकर खेलते. मनु काम ख़त्म करके रीना के पास आ जाती थी और वासुदेव भी रीना के पास आ जाता था. समय बीता, बचपन ने कब साथ छोड़ा पता ही नहीं चला. वासुदेव और रीना एक ही कॉलेज में पढ़ते थे. मनु ने भी दोनों के साथ बैठकर पढ़ना-लिखना सीख लिया था. वह अक्सर रीना से किताब मांगकर ले जाती और कमला मौसी से छिपाकर पढ़ती.

रीना उम्र में दोनों से बड़ी थी इसलिए वासुदेव उसे रीना दीदी कहता था. जब भी उसकी मनु से लड़ाई होती, तो वह बड़े शिकायत भरे लहजे में कहता, "देख लो रीना दीदी, ये मनु जब देखो उल्टे काम करती है. मैंने कहा था एक कमीज़ पर जरा इस्त्री कर दो, तो इसने कमीज़ ही जला दी."

"देखा दीदी, कमीज़ जलने का दुख तो हो रहा है, इस्त्री से मेरा हाथ जल गया उसका कुछ नहीं." मनु रुआंसी होकर कहने लगी.

"क्या हाथ जला लिया, अब तो मैं तुमसे कभी इस्त्री करने को नहीं कहूंगा. दिखाओ तो कहां जला."

और उसका जला हाथ देखकर उसके चेहरे पर यूं पीड़ा छा गई जैसे हाथ उसी का जला हो.

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रीना ने उसे बचपन का साथ और दोस्ती समझकर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन उनकी चाहत उस समय उन्हें पता चली, जब होली के दिन शाम को वह कपड़े छत पर लेने गई, रीना की छत की दीवार कुछ इस तरह की बनी थी कि अगर हल्का सा अन्धेरा हो, तो इन्सान नज़र नहीं आता.

अंतिम जीने पर जैसे ही रीना ने कदम रखा, तो उसके कानों से ये शब्द टकराए, "मुझसे रंग क्यों नहीं लगवाया?"

आवाज़ वासु की थी.

"अच्छा मौसी कितना डांटती पता है." ये मनु की आवाज़ थी.

"वासु, तुमने चाहे लाखों लोगों के सिर अपने सामने झुकवाए हों, चाहे अनगिनत लोग तुम्हारी जय-जयकार करते हों, समाज तुम्हें सम्मान देता हो, किन्तु इतना सब कुछ होते हुए भी तुम उस एक क़ीमती चीज़ से वंचित रहोगे, जिसे प्यार कहते हैं. ज़िन्दगी के किसी-न-किसी मुकाम पर ईश्वर तुम्हें यह एहसास ज़रूर कराएंगे कि तुम कितने रीते और खोखले हो."

"मौसी की डांट की चिन्ता है, मेरी नहीं." वासु ने शिकायत भरे लहजे में कहा.

"तुम्हारी चिन्ता थी तभी तो किसी से भी रंग नहीं लगवाया, रीना दीदी से भी नहीं."

रीना मन-ही-मन सोच रही थी, 'ओह! तो देवी जी, इसलिए दरवाज़ा बंद करके बैठ गई थी.'

तभी उसने सुना था वासु कह रहा था, "अब क्या इरादा है."

"तब की कसर अब पूरी कर लो."

मनु ने शोख आवाज़ में कहा था. वासु ने सुर्ख रंग मनु के सांवले कपालों पर मल दिया था.

तभी रीना ने सुना था कि मनु कह रही थी, "उफ़, ये क्या करते हो." मनु का लाज से भरा स्वर रीना के कानों में टकराया, और रीना वहां से चली गई. अभी कुछ मिनट ही बीते थे कि कमला मौसी के जोर ज़ोर से चिल्लाने की आवाज़ रीना को सुनाई दी, तो बहुत‌ तेजी से कमला मौसी के घर में चली गई. चौखट पर कदम रखते ही उसने सुना.

मौसी कह रही थी, "अरी ये रंग किस यार से लगवाया है मुंहजली."

लेकिन मनु चुपचाप खड़ी आंसू बहा रहा थी.

जैसे ही मौसी उसको मारने के लिए दौड़ी रीना बीच में आ गई और जल्दी से बोली, "मौसी रंग मैंने लगाया है. ये सारा दिन कमरे में बंद होके बैठी रही. शाम को मौक़ा मिला तो मैंने रंग लगा दिया. मरी डर के कारण मेरा नाम नहीं ले रही."

मौसी जवाब सुनकर भुनभुनाती हुई बाहर चली गई.

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रीना उसका हाथ पकडकर उसे कमरे में ले आई. मनु रीना से लिपटकर ख़ूब रोई, रोते-रोते उसने कहा, "रीना दीदी वो वासु..."

रीना ने मुस्कुराकर कहा, "मैं सब जानती हूं." तो रोते-रोते भी उसके होंठों पर मुस्कुराहट आ गई थी.

रीना को उन दोनों के प्यार को देखकर प्यार की अदृश्य शक्ति पर विश्वास हो उठा था. जो मनु हमेशा आंखों में नमी लिए रहती थी अब उसकी आंखों में शरारत भरी चमक होती थी. जबकि वही मौसी थी, वही माहौल था. किन्तु मनु वही नहीं थी. उसे वासु के रूप में सहारा मिल गया था. इसलिए अब वह मौसी के कटाक्ष भी हंस कर झेल लेती थी.

सामने की सीट पर हल्का सा सिर लगा तो रीना की तन्द्रा भंग हुई. ड्राइवर ने ज़ोर से ब्रेक लगा दिए थे. गाड़ी फिर से चल पड़ी और रीना फिर से अतीत की सड़क पर दौड़ पड़ी.

रीना की विदाई हो रही थी. मनु रीना से लिपटकर ख़ूब रोई, बोली, "दीदी अब किससे अपने दिल की बात कहूंगी."

तो रीना ने धीरे से कहा था, "वासु तो है."

ये शब्द सुनकर मनु के चेहरे पर निराशा वाले भावों का अर्थ वह समझ नहीं पाई थी. जब रीना ससुराल से वापस आई तो मनु ने जो बताया वह कुछ परेशानी वाली बात नहीं थी, किन्तु मनु का दिल तो भविष्य में होने वाली घटना को ताड़ गया था. मनु ने बताया था कि वासु अब बहुत बदल गया था. वह बहुत कम बातें किया करता था. हमेशा न जाने किस दुनिया में खोया रहता.

एक बार पूछने पर मनु को लम्बा-चौड़ा भाषण पिलाया और बड़े तल्ख लहज़े में बोला, "ये भी कोई जीवन है न मान है, न सम्मान है. समाज में इन्सान की प्रतिष्ठा होनी चाहिए. अपना क़िरदार ऐसा हो कि लोग सिर झुकाएं. मैं इस गुमनाम ज़िंदगी से ऊब गया हूं. आख़िर क्या है मेरे पास, किस बात पर गर्व करूं."

मनु सकते की सी हालत में सुनती रह गई. उसे वासु के कहे वे शब्द याद आए जब एक दिन वासु ने बड़े भावुक स्वर में उससे कहा था, "मनु जानती हो अगर सबसे क्रीमती चीज़ मेरे पास कुछ है, तो वह हो तुम और तुम्हारा प्यार. मैं तो इस बात पर गर्व सा अनुभव करता हूं कि इस संसार में मुझे भी प्यार करता है और मैं भी किसी को प्यार करता हूं."

वह वासु जो मनु को एक नज़र देखने के लिए छत पर घंटों इन्तज़ार करता था आज उसके व्यवहार में आए परिवर्तन को स्वयं उसकी परछाई से भी दूर भाग रहा था. रीना ने भी अनुभव किया था, लेकिन वह कर ही क्या सकती थी और अपनी गृहस्थी में तल्लीन हो गई. रीना वापस अपने ससुराल आ गई थी.

फिर एक बार मनु का पत्र मिला था. और काफ़ी समय बाद एक दिन मनु को अपने दरवाज़े पर पाकर रीना आश्चर्यचकित रह गई. पूछने पर पता चला कि वह वासु को ढूंढ़ने के लिए ही घर छोड़ कर उसके पास आई है. रीना के पति रमेश बड़े अच्छे इन्सान थे. रीना ने सारी बात उन्हें विस्तार से बता दी थी. वासु का फोटो रमेश को पता लगाने के लिए दे दिया था.

इस बीच रीना ने मनु को बहुत समझाया था कि वो वासु को भूल जाए. लेकिन वो बेचारी बेबस सी रीना की तरफ़ देखती रहती.

रमेश के निरन्तर और अथक मेहनत से आख़िर वासु का पता चल गया. जो पता रमेश ने रीना को दिया उसे देखकर वह स्वयं चौंक गई.

"मनु, वासु तुम्हें ना स्वीकारे तो..."

मनु बड़े विश्वास से बोली, "दीदी वासु मुझे ज़रूर स्वीकार लेगा. आख़िर वह मुझे बचपन से प्यार करता था और मैं भी तो पूछूंगी कि मुझसे आख़िर कहां चूक हुई. मैं उसके बगैर नहीं जी पाऊंगी दीदी. इन वर्षों में मैं सुकून से एक बार भी नहीं सोई दीदी. वासु के इन्तज़ार में मेरी आंखें पथरा गई हैं. उसको बिना देखे मैंने कैसे दिन काटे ये मेरा दिल जानता है. वह जहां भी हो मुझे ले चलो. मुझे देखकर उसका पत्थर दिल भी पिघल जाएगा."

कहते-कहते मनु का पूरा चेहरा आंसुओं से भीगता चला गया. आख़िर रीना को हथियार डालने पड़े.

उनका रिक्शा एक आश्रम के बाहर जाकर रुका. मनु ने‌ आश्चर्य से कभी आश्रम, कभी रीना का चेहरा देखती. दोनों उतरकर धीरे-धीरे आश्रम के अन्दर की ओर चल दीं. बहुत से स्त्री-पुरुष खड़े थे. कुछ लोग सामने सुसज्जित मंच पर बैठे साधु का आशीर्वाद ले रहे थे. रीना मनु को भी मंच की ओर लेकर चल दी. मनु आश्चर्य से चारों ओर एकत्र भीड़ को देखती हुई चल रही थी. मंच के पास पहुंच कर रीना ने मंच पर आसन्न व्यक्तित्व की ओर संकेत किया. मनु को उसे देखकर तीव्र झटका लगा, वह आश्चर्य से उसे देख रही थी. वह तो वासुदेव था उसका वासु. वह आगे बढ़कर उसके कदमों में झुकी उसके चेहरे की ओर देखकर बोली, "वासु मैं."

किन्तु जैसे वासुदेव ने न कुछ देखा और न कुछ सुना. आशीर्वाद की मुद्रा में यन्त्रवत् उठते हाथ को उठाया और कहा, "अगला भक्त आए."

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मनु सकते की सी हालत में चीख उठी, "नहीं..." लेकिन उसकी आवाज़ उसके गले में ही घुट गई. सैकड़ों भक्त जय-जयकार कर रहे थे. वह उन्हें आश्चर्य से देख रही थी. एकाएक वह सिर पकड़ कर गिरती चली गई. कुछ लोग उसको उठाने के लिए बढ़े. रीना भी हतप्रभ रह गई. कोई भक्त सज्जन अपनी कार में उन दोनों को हॉस्पिटल छोड़ गया. चेकअप और मनु के व्यवहार से पता चला कि उसे कोई मानसिक आघात लगा है, जिसे वह सह न सकी और अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठी.

कहानी- छलावा

रीना ने फोन करके रमेश को स्थिति बताई वह भी हॉस्पिटल आ गया, फिर दोनों ने मनु को डॉक्टर की सलाह पर मेन्टल हॉस्पिटल में भर्ती करा दिया.

"रीना दीदी, मैंने क्या ग़लती की. मैंने तो वासु को अपने जीवन का आधार स्तंभ माना था. उसके हट जाने पर स्वयं ही मेरा अस्तित्व गड़बड़ा गया. सोचती हूं कि बचपन से आज तक जिसे प्यार किया वह इन्सान नहीं तो क्या 'छलावा' था. मेरे प्यार की गहराई में भी वह न डूबा. मेरा कसूर क्या था? आख़िर वासु ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया?"

लेकिन उसकी मौन आंखों के बोलते प्रश्नों का रीना दीदी के पास कोई जवाब नहीं था.

आज भी मनु की हालत को हॉस्पिटल में देखकर रीना का मन भर आया, वह मन ही मन कह उठी, 'वासु तुमने चाहे लाखों लोगों के सिर अपने सामने झुकवाएं हों, चाहे अनगिनत लोग तुम्हारी जय-जयकार करते हों, समाज तुम्हें सम्मान देता हो. किन्तु इतना सब कुछ होते हुए भी तुम उस एक क़ीमती चीज़ से वंचित रहोगे जिसे प्यार कहते हैं. ज़िन्दगी के किसी न किसी मुकाम पर ईश्वर तुम्हें यह एहसास ज़रूर कराएंगे कि तुम कितने रीते ओर खोखले हो.'

तभी बस रुक गई, देखा तो आनन्द कॉलोनी आ गई थी वह भी अन्य लोगों के साथ उतर गई और तेजी से अपने घर की ओर चल दी.

- रेखा

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