
मीनू त्रिपाठी
बिना ज़्यादा सोचे-विचारे वह दनदनाते हुए उनके पास आई, उसका तमतमाया चेहरा और थानेदारनी सी भाव-भंगिमा देख वो लड़के हड़बड़ाए. वहां से खिसकते उससे पहले ही उसने चश्मे वाले लड़के की बांह पकड़ ली और पूछा, “क्यों खड़े हो यहां?” “बस ऐसे ही आंटी जी.” वह बुरी तरह घबराया. “ऐसे ही क्यों? मैंने देखा है, तुम लोग अक्सर किसी न किसी घर के सामने इस समय खड़े हो जाते हो. क्या टोह लेते हो.” उसकी आवाज़ ऊंची हुई तो उन दोनों के चेहरों का रंग उड़ गया.
रसोईं में आज अलग ही चहल-पहल और रौनक़ थी. पुदीना, धनिया, नींबू, मिर्ची, टमाटर सब स्लैब पर सजे थे. गोभी और आलू के बीच निश्चय होना था कि पराठे गोभी के बनेंगे या आलू के. हालांकि अमिता जानती थी कि आलू के पराठों की महक और स्वाद गोभी, मूली, मेथी सब पर भारी है, तिस पर शेखर का झुकाव भी आलू के पराठों की ओर ही था, इसलिए उसने कुकर में आलू उबलने को रख दिए और आटा गूंथने का काम शुरू कर दिया.
“मक्खन होगा क्या?” अख़बार पढ़ते शेखर ने पूछा ज़रूर, पर जवाब कुकर की सीटी ने दबा दिया. शेखर ने अंदाज़ा लगा लिया कि अमिता ने क्या कहा होगा, “मक्खन कहां से होगा!” मक्खन तो जब बेटा सनी आता है तभी मंगवाया जाता है. न वो खाते हैं न अमिता खाने देती है. पिछली बार डॉक्टर से फुल चेकअप करवाया था तो कोलेस्ट्रॉल बढ़ा निकला. जाने क्यों बढ़ जाता है.
बुढ़ापे में दलिया और सादी दाल-सब्ज़ी भी शरीर में जाकर हेठी दिखाने लगे, तो कोई क्या ही करे. पराठे खाए मुद्दत हो गई. तली-भुनी चीज़ों के स्वाद जाने कब से बिसरा गए हैं. हां, सनी जब घर आता है, तब ज़रूर उसके बहाने कुछ प्रतिबंधित तेल-मसाले वाले व्यंजन चखने को मिल जाते हैं. हालांकि अधिकतर पकवान तो चुपचाप उसके कमरे में ही यह कहकर पहुंचा दिए जाते हैं कि उसी के लिए बनाया है.
“हम कहां खाएंगे ये सब, न पचेगा न रुचेगा.” वो पत्नी से कहना चाहते हैं, “रुचेगा, क्यों नहीं रुचेगा. तुम दर्शन तो करवाओ.” पर चुप रह जाते हैं.
अमिता को उनका कहा कहीं खल गया तो पुरानी मेडिकल रिपोर्ट उठाकर सामने रख देगी. सौ-सौ उलाहने देगी, योगा, वॉक जैसी अच्छी आदतों को दिनचर्या में शुमार न करने पर ताने मारेगी सो अलग. सबसे बड़ा खामियाजा तो सनी के जाने के बाद भुगतना होगा. दलिया, फल, चम्मच भर तेल में बनी बेस्वाद सब्ज़ी सलाद के साथ मोटे अनाज की रूखी सूखी रोटी लंबे समय तक थाली में दिखेगी. इस भय से वह नाक और आंख दोनों पर कंट्रोल कर लेते हैं.
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लगभग रोज़ ही डाइनिंग टेबल में दाल देखकर अम्मा के छौंके की याद आती है. कड़छी भरकर देसी घी में लहसुन-मिर्ची और जीरे का क्या बढ़िया छौंक लगाया जाता था. तेल-मसाले में भुनी स्वादिष्ट तरकारी की याद वह मन ही मन कर लेते हैं. यदि अमिता से साझा करें भी तो वह आंखें तरेर कहेगी, “मैंने तो जैसे तुम्हें स्वादिष्ट खाना खिलाया ही नहीं है. अरे अब उम्र देखो, ब्लड शुगर और कोलेस्ट्रॉल की चिंता करो और चुपचाप खा लो.” इसलिए वह सिर झुकाए चुपचाप खा लेने में हर्ज नहीं समझते.
सच है, अमिता ने ख़ूब स्वादिष्ट खाना बनाया और खिलाया है. वो अलग बात है जो अब उम्र, पाचन और बुढ़ापे में लगी रहनेवाली बीमारियों में बहुत नाप-तौलकर खाना बनाने लगी है. वो तो आज भला हो उनका दरवाज़े से निकलते-निकलते शेखर की नज़र सामनेवाले फ्लैट के बंद दरवाज़े पर पड़ी और होंठों पर मुस्कान आ गई. लिफ्ट आ गई तो सोचे-विचार बाहर झटक वह लिफ्ट में प्रवेश कर गए. दही, मक्खन लेकर घर आए, तो देखा अमिता मुस्तैदी से पराठे बनाने की तैयारी में लगी थी. मिक्सी के जार की घुर-घुर से अंदाज़ा लगाया चटनी पिस गई. अचार की बरनियों से आई सोंधी महक से लगा तैयारी पूरी है.
“कुछ मदद करवाऊं क्या?” शेखर ने पूछा तो अमिता ने कहा, “उन्हें बुला लाओ.” उन्हें मतलब सामनेवाले फ्लैट में रहनेवाले वो दो लड़के जो आज के मेहमान हैं. सिर हिलाकर वह उठने को हुए कि तभी, “न, रहने दो. तुम कटलरी निकाल दो. मैं बुला लाती हूं, तुम्हें देख कहीं संकोच में न आ जाएं. और हां, परसों की कोई बात न छेड़ना. सहज रहना.” निर्देश देती वह बाहर आई और सामनेवाले फ्लैट की ओर चली गई.
डोरबेल बजाने पर दरवाज़ा खुला, फ्रेंचकट दाढ़ी वाला लड़का निकला. अमिता को देख उसके चेहरे पर स्वाभाविक संकोच भरी मुस्कान आई. अमिता ने कुछ कहा और उसने सिर हिलाते हुए जवाब दिया जिसे सुन वह संतुष्ट भाव से घर आ गई.
शेखर ने प्रश्नवाचक नज़रों से देखा तो वह प्रफुल्लित हो बोली, “आ रहे हैं, तैयार ही बैठे थे. दो-चार पराठे सेकने तक उनसे बतियाते रहना, फिर डाइनिंग टेबल पर बुलाना. और हां, तुम अपने पराठों पर मक्खन कम लगाना, दही लेना और हां ज़्यादा मत खाना कि उनके सामने टोकना पड़े. अमिता और भी पाबंदियां लगाती, पर तभी डोरबेल बज गई.

“आओ-आओ, अंकल से बातें करो, मैं तब तक...”
“मैं कुछ हेल्प..?” रसोई की ओर जाती अमिता से संकोच भरे स्वर में चश्मे वाले लड़के ने मदद की पेशकश की तो...
“अरे नहीं, अंकल से बातें करो. सब हो गया है.” उसने मुस्कुराकर उन्हें सहज किया, फिर कुछ ही देर में पराठों की महक के साथ उनकी बातें, जो अमूमन पराठों की ही थीं, ग़मकने लगीं.
“पराठे हमारे घर का नाश्ता नहीं, बल्कि जिया हुआ लम्हा हुआ करता था. हम जब बच्चे थे तब से संडे को पराठे बनते ही देख रहे हैं. यह रवायत बनी ही रही, कम से कम तब तक तो जब सनी घर पर था. संडे और पराठों का मेल तो बारिश और इंद्रधनुष सा है. अहा! उन दिनों कभी मेथी तो कभी गोभी और आलू के तो बना ही करते थे. सनी सब्ज़ी नहीं खाता था तो उसका तोड़ पराठों में भरकर निकाला अमिता ने. पराठों की तो बात ही अलग है. पराठे सिर्फ़ पराठे नहीं हुआ करते थे, वो एक माहौल होता था छुट्टी का. जमकर उन पर मक्खन लगाते थे.” शेखर पराठों पर धारा प्रवाह बोल रहे थे, और वह गर्दन हिलाकर उनकी बातों का अनुमोदन भर कर रहे थे. अमिता समझती है शेखर का उत्साह, पर वो लड़के थोड़ा असहज ही थे. वह समझ रही थी उनकी असहजता और उसका कारण भी, जो वह ख़ुुद ही थी.
कल तक उन लड़कों के प्रति उसका दूसरा नज़रिया था और आज दूसरा. उन लड़कों के बारे में जो सोचा, उसका पछतावा मन को कचोट रहा था. सच कहा जाए तो तवे से वह पराठे नहीं, सिर से ग्लानि का बोझ उतार रही थी. गर्म तवे पर पराठा डालकर गैस मद्धिम करके उसने उसके चारों ओर बड़ी उदारता से देसी घी डाला. पराठा धीमे-धीमे सिंकने लगा, साथ ही सिंकने लगी दो दिन पहले की घटी घटना.
उस दिन उसका व्यवहार अप्रत्याशित नहीं था, वह कई दिनों की आशंकाओं का परिणाम था. कई दिनों से उसे महसूस हो रहा था कि सामने वाले फ्लैट में रहनेवाले ये 20-22 साल के लड़के अक्सर लॉबी में टहलते हुए अन्य फ्लैटों के दरवाज़े पर इधर-उधर ताकते आ खड़े होते हैं. उनके होंठों पर मुस्कान होती है, कभी-कभी आपस में फुसफुसाते भी हैं. उन लड़कों को कभी आते-जाते तो कभी जाली के दरवाज़े से उन्हें अपने फ्लोर की लॉबी में घरों के सामने खड़े देखा. एकाध बार उसने अचानक दरवाज़ा खोलकर उन्हें चेताया भी. ऐसे में वह इधर-उधर होकर कभी लिफ्ट की तरफ़ बढ़ जाते, तो कभी अपने फ्लैट के भीतर चले जाते या कभी लॉबी में यूं ही टहलने लगते.
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उसे उनका रवैया अजीब लगा तब उसने शेखर से कहा, “सुनो, सामनेवाले फ्लैट में किराए में रहनेवाले ये दोनों बैचलर कुछ ठीक नहीं लगते. मकान मालिक को इन बैचलर्स को फ्लैट नहीं देना चाहिए. जब देखो, इधर-उधर के फ्लैटों के बाहर खड़े जाने क्या करते हैं.”
उसकी आपत्ति का जवाब कुछ यूं मिला, “तुम्हारा बेटा भी तो बाहर है, मत भूलो कि उसे भी घर मुश्किल से मिला है.”
शेखर का इशारा वह बख़ूबी समझती थी. वाकई बड़ी मुश्किल से उसके बेटे को वहां घर मिला. सब परिवार वाले को ही घर देना चाहते हैं. बैचलर सुनते ही लोगों के मुंह बन जाते, शंका-आशंका होना जायज़ भी है. इनके मन की थाह भला कौन ले सकता है. लिफ्ट में कभी मिलते भी हैं तो न नमस्ते, न दुआ सलाम. या तो मोबाइल में मुंह डाल लेंगे या लिफ्ट की छत या ज़मीन ताकेंगे. आंखों में आंख मिले, ऐसी हर कोशिश से बचते हैं. ऐसे में कोई कैसे जानेगा कौन कैसा है. कुछेक ही उसके सनी जैसे होंगे बाकी सब इन जैसे.
‘फ्लैट में सेंध मारकर चोरी करके अपने शौक पूरे करते थे अच्छे घर के लड़के.’ ऐसी ख़बरें अख़बारों में आम हैं. मन में आशंका का कीड़ा कुलबुला रहा था. ऐसे में दो दिन पहले उसने किसी काम से दरवाज़ा खोला तो देखा, बगलवाले फ्लैट के पास वे दोनों खड़े धीमे-धीमे बतिया रहे थे. दरवाज़ा खुलने की आहट सुनकर थोड़ा दाएं-बाएं हुए. यह जगह उनके खड़े होने के लिए ज़रा भी मुफ़ीद नहीं थी. पड़ोसन निशा के दो छोटे बच्चे हैं. वह ख़ुद भी तो जवान और ख़ूबसूरत है. इन लड़कों का जाने क्या इरादे हो! उसकी भृकुटी चढ़ गई. एक अच्छा अलर्ट नागरिक होने का एहसास और पड़ोसी प्रेम सहसा जाग उठा. इस फ्लोर में सबसे वरिष्ठ वो ही है, फिर क्यों न वो ही इनकी ख़बर ले.
फ्लैट कल्चर में तो वैसे ही किसी को, किसी से कोई मतलब नहीं होता. अब वो भी इनकी हरकतों को नज़रअंदाज़ कर दे तो यह कतई सही नहीं था. बिना ज़्यादा सोचे-विचारे वह दनदनाते हुए उनके पास आई, उसका तमतमाया चेहरा और थानेदारनी सी भाव-भंगिमा देख वो लड़के हड़बड़ाए. वहां से खिसकते उससे पहले ही उसने चश्मेवाले लड़के की बांह पकड़ ली और पूछा, “क्यों खड़े हो यहां?”

“बस ऐसे ही आंटी जी.” वह बुरी तरह घबराया. “ऐसे ही क्यों? मैंने देखा है, तुम लोग अक्सर किसी न किसी घर के सामने इस समय खड़े हो जाते हो. क्या टोह लेते हो.” उसकी आवाज़ ऊंची हुई, तो उन दोनों के चेहरों का रंग उड़ गया.
“अरे क्या कह रही हैं आंटी, ऐसा कुछ नहीं, हम तो बस ऐसे ही टहल रहे थे.” गिरफ़्त से बचा वह दूसरा फ्रेंचकट दाढ़ी वाला लड़का बोला.
“झूठ मत बोलो, मैं अक्सर देखती हूं, तुम लोग शाम के समय कभी इस घर के सामने तो कभी उस घर के सामने खड़े हो जाते हो.”
“आप ग़लत सोच रही हैं आंटी. हम ऐसे-वैसे लड़के नहीं हैं.” अब तक उस चश्मेवाले लड़के ने उसकी पकड़ से झटके से ख़ुद को छुड़ाते हुए कुछ ग़ुस्से से कहा तो कुछ ठिठकी ज़रूर, पर कदम पीछे नहीं हटाए.
“मैं टॉवर गार्ड को बताती हूं. यहां भी लोगों को पता चलना चाहिए कि बैचलर्स करते क्या हैं.” “क्या करते हैं हम, हमें भी तो पता चले आंटी.” फ्रेंचकट दाढ़ी वाला लड़का उत्तेजित हुआ, तो वह सहसा चुप हो गई और उन्हें घूरते हुए घर के भीतर चली गई.
इंटरकॉम से नीचे टॉवर गार्ड को फोन लगाया. वह उठाता उससे पहले ही डोरबेल बज गई और टॉवर गार्ड की हेलो का बिना जवाब दिए वह दरवाज़े की ओर बढ़ गई. शेखर घर पर नहीं थे, क्या पता वो आए हों. उन्हें शायद मसला बताकर ही कदम उठाना होगा, सोचते हुए उसने चिटखनी खोली तो देखा, वही दोनों लड़के खड़े थे. चेहरों पर हवाइयां लिए, कुछ शर्मिंदा.
“क्या है?” उसने तल्ख़ लहजे में पूछा तो चश्मे वाले ने नज़रे चुराते हुए कहा, “आंटी, प्लीज़ आप किसी से मत कहिएगा. वो दरअसल, इस वक़्त जब हम बाहर से आते हैं, तो हर घर से खाने की बढ़िया ख़ुशबू उठती है. सच कहते हैं.” वह कंठ पर उंगली रखकर बोल रहा था, “हम खाने की ख़ुशबू सूंघने के लिए बाहर खड़े हो जाते हैं.”
“मतलब?” उसकी आंखें हैरत से फैलीं.
“इस वक़्त उठी पराठों की ख़ुशबू मम्मी के बनाए पराठों की याद दिला देती है तो...” वो दोनों बेहद शर्मिंदा नज़र आए. उनकी नज़रें झुकी हुई और उसकी आंखें विस्मय से फैली हुई थीं.
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“पराठे!” वह अवाक थी. सहसा याद आया कि कुछ दिन पहले जब सनी बैंगलुरू से आया था तब उसके लिए पराठे बनाए थे. पराठे सेंकते समय कुछ काम से दरवाज़ा खोला तो ये लड़के बाहर खड़े थे. उसे देखकर ठिठके, तब पहली बार उसने नोटिस किया और फिर ध्यान जाने लगा कि जब-तब ये लड़के शाम ढले पड़ोसियों के फ्लैट के आसपास दिखते हैं. क्यों दिखते हैं इसके हज़ार हवाई किले बना लिए, पर ये तो कल्पना से परे था. कौन सोच सकता है कि एग्जॉस्ट फैन से खिंची पराठों की ख़ुशबू उन्हें वहीं ठहर जाने को अवश कर देती है. वह कुछ समय वहीं खड़े होकर अपने मन को तृप्त कर लेते हैं. घर के स्वाद को कुछ इस तरह अपनी जिह्वा पर महसूस करके आत्मतृप्ति पा लेते हैं. “मम्मी, आपके हाथों के पराठों की बहुत याद आती है.” सनी भी तो अक्सर कहता है. उसका मन सहसा गीला हो आया.
“सॉरी आंटी, अब ऐसा कभी नहीं होगा.” फ्रेंचकट दाढ़ी वाले लड़के ने कहा, तो वह बिना कुछ कहे घर के भीतर चली आई. शेखर घर आए तो बड़े पछतावे के साथ उसने क़िस्सा सुनाया. कुछ देर वह चुप रहे फिर बोले, “सनी आए तो इन लड़कों को घर बुला लेना.” वह चुप रही, पर कल शाम ही ये अचानक लिफ्ट में मिल गए तो मौक़ा जाने नहीं दिया. चश्मेवाले लड़के के कंधे पर हाथ रखकर कहा, “जब से सनी बाहर गया है, तब से घर में पराठे नहीं बने. कल संडे है, दस- ग्यारह बजे के बीच इंतज़ार करूंगी.”
“अरे... नहीं आंटी...” वह झेंपे तो वह बोली, “नहीं, स़िर्फ तुम्हारे लिए नहीं, इनके लिए भी.” मंद-मंद मुस्कुराते शेखर की ओर इशारा करते हुए वह बोली, “इन दिनों कई बार तुम्हारे अंकल ने ताना मारा है कि जब से सनी बाहर गया है पराठे बनाने बंद कर दिए. अब मैं भी क्या करूं, पहली बात कि हमारी उम्र पराठे खाने लायक रही नहीं और कभी मन भी करे तो अपने लिए उतनी मेहनत नहीं होती. तुम लोग आओगे तो मेहनत वसूल हो जाएगी. हमारा भी ज़ायका बदल जाएगा, ख़ासकर तुम्हारे अंकल का.” उसकी आंखों में सहसा पनप आए स्नेह की नमी को देखकर वह बोले, “एक शर्त पर आएंगे, रसोई में हमारे लायक काम निकालकर रखिएगा.”
“तुम लोग आओगे उतना ही बहुत है.” कहते कहते अमिता रुकी. बीच के किसी फ्लोर पर लिफ्ट रुकी, कोई और चढ़ा तो सब चुप हो गए. “तो कल सुबह 11 बजे इंतज़ार करूंगी.” ग्राउंड फ्लोर पर लिफ्ट रुकने पर बस इतना कहा, तो सहमति में उनके चेहरों पर मीठी शर्माई सी मुस्कान आई.
शेखर उन लड़कों के लिए कम ख़ुद के लिए ज़्यादा प्रसन्न थे. उनके आने पर पराठे बनेंगे, इससे ज़्यादा सुखद कुछ हो ही नहीं सकता था. “अरे सुनो, हर्ष और अगम ने बहुत बढ़िया स्टार्टअप शुरू किया है...” गरमागरम पराठे खाने आ जाएं, यह कहने आई अमिता से शेखर ने उनके नाम और काम का परिचय करवाया. कुछ ही पलों में हर्ष, अगम नामों से पुकार कर, इसरार कर वह उनके पराठों पर मक्खन लगवा रही थी. वो अब अजनबी नहीं सहज थे. रसोई के एग्जॉस्ट से निकली पराठों की ख़ुशबू का आनंद उठाने के लिए वो किसी घर के बाहर नहीं, बल्कि घर के अंदर आपसी चुहलबाज़ी के बीच पराठों के स्वाद का आनंद उठा रहे थे. हर्ष, अगम और शेखर बेशक पराठों के स्वाद में डूबे थे, पर अमिता का मन तो भूले-बिसरे संडे का जश्न मनाने में उमगा जा रहा था.

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