रमेश, "चौहान साहब को जानते हो? अभी थाने में फोन कर दूंगा न तो..." सिपाही, "कहीं भी फोन कर लो साहब, लेकिन चालान तो कटेगा ही. रसीद रखो और पैसे दो. चौहान साहब के कहने से ही चेकिंग हो रही है इस एरिया में."

रमेश, "मैं पूछता हूं कि वह बिना हेलमेट पहने चौराहे से पार हुआ ही कैसे. इस देश में व्यवस्था नाम की कोई चीज़ ही नहीं है. चेकिंग कैसे नहीं हुई. सिग्नल पर सिपाही नहीं था क्या?"
अरविंद, "पता नहीं. लेकिन जो भी हो बड़ा बुरा हुआ."
रमेश, "क़ानून का सख्ती से पालन होना चाहिए. यहा तो सब दूर ढील. न जनता सुनती है न क़ानून के रखवाले. सौ-पचास देकर निकल गया होगा. भ्रष्टाचार के मारे व्यवस्था और क़ानून की तो धज्जियां उड़ी हुई हैं."
अरविंद, "क्या करें?"
रमेश, "नैतिकता रही ही नहीं, न कर्तव्यों के प्रति ज़िम्मेदारी की भावना रह गई है किसी में. आए दिन दुर्घटनाएं तो होनी ही हैं. जगह-जगह चेकिंग करनी चाहिए, चालान काटना चाहिए, ताकि दुर्घटनाओं में कमी हो."
अरविंद, "अरे सामने चेकिंग चल रही है. सिपाही रुकने को बोल रहा है."
रमेश, "ये क्या, ये लोग कहीं भी बेरियर लगाकर चेकिंग के नाम पर समय ख़राब करते हैं. अब ये कोई जगह है."
सिपाही, "आपने सीट बेल्ट नहीं लगाया साहब. पांच सौ रुपए फाइन."
रमेश, "क्या बात कर रहे हो. पांच सौ रुपए क्या कम होते हैं. ये लो भाई सौ रुपए रख लो और जाने दो."
सिपाही, "नहीं साहब. यह लो रसीद. पांच सौ का चालान कटेगा."
रमेश, "चौहान साहब को जानते हो? अभी थाने में फोन कर दूंगा न तो..."
सिपाही, "कहीं भी फोन कर लो साहब, लेकिन चालान तो कटेगा ही. रसीद रखो और पैसे दो. चौहान साहब के कहने से ही चेकिंग हो रही है इस एरिया में."
"हां, ये लो रसीद बढ़ो आगे."
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रमेश, "काम-धाम कुछ होता नहीं. बस कहीं भी चार बेरियर लगाकर चेकिंग करने खड़े हो जाते हैं. पैसे लूटने का धंधा है और कुछ नहीं..."
- विनीता राहुरीकर

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