मैं तो तुम्हें मंत्रमुग्ध हो बस देखता ही रह गया. छरहरी काया, गौर वर्ण, बेतरतीबी से बंधे तुम्हारे बाल, माथे पर लटकती बाल की एक लट और चेहरे पर लगा लाल गुलाल, जो तुम्हारे चेहरे को और भी ख़ूबसूरत बना रहा था. तुम तो चली गई पर मुझे अपने प्रेम के रंगों में भिगो गईं.
फाल्गुन का महीना आते ही तुम्हारी यादें मुझे अतीत में खींच कर ले जाती हैं और मैं पहुंच जाता हूं तुम्हारे पास. वैसे तो मैं हर पल तुम्हें याद करता रहता हूं.
पर फाल्गुन का महीना सबसे ख़ास है क्योंकि इसी महीने में मैंने तुम्हें पहली बार देखा था. बात उन दिनों की है जब मोबाइल और इंटरनेट का विकास नही हुआ था. किसी भी त्योहार के आगमन की सूचना कई दिन पहले ही बच्चे अपनी धमा-चौकड़ी से देते थे. फाल्गुन का महीना था और रंगो का त्योहार, होली आने वाला था. पिताजी का तबादला हुआ था.
मैं अपने परिवार के साथ तुम्हारी कॉलोनी में रहने के लिए आया था. हम टेम्पो से सामान उतार रहे थे कि मेरा स्वागत तुम्हारी पिचकारी की फुहार से हुआ. पूरा भीग जाने के कारण मेरा ग़ुस्सा अपनी चरम सीमा पर था. मैं ग़ुस्से में कुछ बोलने ही वाला था कि अचानक, “सॉरी… मेरी ग़लती के कारण आप पूरा भीग गए. मैं तो अपनी सहेली पर पानी डाल रही थी की बीच में आप आ गए.”
इतना कह कर तुम दोबारा होली खेलने में मगन हो गई. मेरे ग़ुस्से पर होली का पानी पड़ चुका था. मैं तो तुम्हें मंत्रमुग्ध हो बस देखता ही रह गया. छरहरी काया, गौर वर्ण, बेतरतीबी से बंधे तुम्हारे बाल, माथे पर लटकती बाल की एक लट और चेहरे पर लगा लाल गुलाल, जो तुम्हारे चेहरे को और भी ख़ूबसूरत बना रहा था. तुम तो चली गई पर मुझे अपने प्रेम के रंगों में भिगो गईं. शायद इसे ही पहली नज़र का प्यार कहते हैं. मैंने जैसे-तैसे अपना सामान उतारा. बाद में ये जान कर कि तुम मेरी पड़ोसी हो और मेरे ही कॉलेज में हो मैं मन ही मन पुलकित हो गया.
यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: तन्हाई, अब सहेली है… (Pahla Affair: Tanhai Ab Saheli Hai…)
तुम अपनी सहेलियों के साथ कॉलेज जाती और मैं अकेला अपनी साइकिल से. एक दिन सुबह कॉलेज के लिए देर हो रही थी और मेरी साइकिल का पंक्चर हो गया था. एक तो कॉलेज के लिए देरी ऊपर से पंक्चर टायर. मैं बड़बड़ाते हुए पंक्चर ठीक कर रहा था. मुझे पंक्चर ठीक करते देख तुम मेरी हालत पर हंसने लगी. तुम्हारी हंसी से ही पता चल रहा था कि ये पंक्चर वाली शरारत तुम्हारी ही थी.
तुम पर ग़ुस्सा होने के स्थान पर मैं बस मुस्कुरा दिया. ऐसे ही कॉलोनी और कॉलेज में मुझे सताने के लिए ना जाने तुम कितनी नई-नई शरारतें करतीं. मैं तुम्हारी सभी शरारतों का उत्तर बस एक मुस्कुराहट से देता था.
पता नहीं क्या जादू किया था तुमने मुझ पर. तुम जितना अपनी ऐसी शरारतों के साथ मुझे सताती, उतना ही मेरे दिल को अपने प्रेम के रंगों से भर देती. इन्हीं शरारतों के बीच हम अच्छे दोस्त बन गए.
हमारी छतें आपस में जुड़ी हुई थीं. हम पढ़ने के बहाने रोज़ शाम को छत पर मिलते. कभी पढ़ते तो कभी घंटों बैठ कर बातें करते. हम दोनों को ही एक दूसरे का साथ बहुत अच्छा लगता. अब हम दोनों ही प्रेम के रंगों में डूब गए थे. ये फाल्गुन का महीना सच में रंगों का महीना होता है, चाहे वो रंग प्रेम के हो या फिर होली के.
उस दिन होली का त्योहार था. कॉलोनी में हम सभी एक दूसरे को रंग-गुलाल लगा कर होली खेलने का भरपूर आनंद ले रहे थे. मेरी निगाहें तुम्हें ही ढूंढ़ रही थी कि अचानक तुम मेरे पास आई और सबसे नज़रे बचा कर चुपके से मुझे छत पर आने का इशारा किया. तुम्हारा चेहरा उदास था और आंखें नम थीं.
यह भी पढ़ें: लव स्टोरी: रेत अभी प्यासी है… (Love Story: Ret Abhi Pyasi Hai)
मैं भी सबसे नज़रें बचा कर छत पर आ गया.
तुम्हारी नम आंखें और उदास चेहरा मुझे बहुत विचलित कर रहा था.
“क्या हुआ? तुम ठीक हो..?"
मेरा इतना पूछते ही तुम रोने लगी. मैं और घबरा गया था.
“पापा ने मेरा रिश्ता अपने दोस्त के बेटे के संग किसी दूसरे शहर में तय कर दिया है. कुछ दिनों के बाद मेरी शादी है और हम सभी शादी तक के लिए आज शाम को ही यहां से चले जाएंगे." कह कर तुम रोने लगी.
“ये हमारी साथ में आख़िरी होली है और.. और शायद आख़िरी मुलाक़ात भी. मैं बस तुम्हें आख़िरी बार गुलाल लगाना चाहती थी और…”
तुम्हारे शब्द तुम्हारे कंठ में ही अटक गए थे.
मुझे गुलाल लगा कर रोते-रोते तुम तुरंत चली गई.
मैं बेसुध सा खड़ा, नम आंखों के साथ बस तुम्हें जाते हुए तुम्हें देखता रहा. तुम तो चली गई पर मुझे सदा के लिए अपने प्रेम के रंगों में भिगो गई.
- कीर्ति जैन

Photo Courtesy: Freepik
