''हर रोज़ अपने कर्मों का लेखा-जोखा करके तुम यह कर सकते हो. इस बात को समझने के लिए तुम्हें एक व्यापारी की कहानी सुननी होगी. यहां मेरे समीप बैठकर तुम यह कहानी ध्यान से सुनो!.."
एक लुटेरा था, जो लूट के धन से ही अपनी जीविका चलाता था. वह रोज़ सुबह लूटपाट के उद्देश्य से घर से निकलता, लेकिन शाम ढले जब वह घर को आता तो रास्ते में एक महात्मा जी को पेड़ के नीचे बैठा देखता. उन महात्मा जी के पास कई लोग अपनी-अपनी दुविधा लेकर आते-जाते रहते.
लुटेरा अक्सर सोचता कि वह भी एक दिन अपने मन की दुविधा को महात्मा जी से कहेगा. एक शाम दृढ़ निश्चय कर वह लूटपाट के बाद घर ना जाकर महात्मा जी के पास गया और बोला, "महात्मा जी! मैं एक लुटेरा हूं, लोगों के साथ लूटपाट करके ही मैं अपनी जीविका चलाता हूं. लेकिन मुझे यह भलीभांति पता है कि मैं जो करता हूं वह सब पाप की श्रेणी में आता है, फिर भी मैं ख़ुद को यह पाप करने से रोक नहीं पाता. क्या आप कुछ ऐसा चमत्कार कर सकते हैं कि मैं पाप कर्म को छोड़कर पुण्य कर्म करने लग जाऊं और अपनी जीविका हेतु कोई ईमानदारी भरा काम खोज पाऊं.''
तभी बड़े शांत भाव से महात्मा जी बोले, ''बिल्कुल! तुम पाप कर्म छोड़कर निःसन्देह पुण्य कर्म कर सकते हो.''
तभी लुटेरा बोला, ''महात्मा जी! यह कैसे हो सकता?''
यह भी पढ़ें: सीखें ग़लतियां स्वीकारना (Accept your mistakes)
लुटेरे के इस सवाल पर महात्मा जी बोले, ''हर रोज़ अपने कर्मों का लेखा-जोखा करके तुम यह कर सकते हो. इस बात को समझने के लिए तुम्हें एक व्यापारी की कहानी सुननी होगी. यहां मेरे समीप बैठकर तुम यह कहानी ध्यान से सुनो!
एक समय एक बड़ा अच्छा व्यापारी था. चूंकि व्यापारी का बेईमान होना कोई बड़ी बात नहीं है इसलिए कई पीढ़ियों से उसके घर-व्यापार और बेईमानी दोनों साथ-साथ चल रहे थे. पर वह व्यापारी स्वयं को बेईमानी से दूर रखना चाहता था. लेकिन वह अक्सर सोचता कि जब उसे एक अच्छा व्यापारी होने का गुण विरासत में मिल सकता है तो बेईमान होने का अवगुण भी उसके खून में हो ही सकता है. यही सोचकर उसने अपने घर पर दो मटके रखे एक मटका पाप कर्म का और दूसरा मटका पुण्य कर्म का.
उसके बाद वह रोज़ सुबह यही सोचकर उठता कि आज वह जैसा भी कर्म करेगा शाम को आते ही पूरी ईमानदारी से उस कर्म की पर्ची बनाकर मटके में डाल देगा. पुण्य कर्म को पुण्य कर्म की मटकी में और पाप कर्म को पाप कर्म की मटकी में. ऐसा वह हर रोज़ करता रहा. कई सालों बाद उसने देखा कि उसके पाप कर्म शून्य थे और पुण्य कर्मों से उसका मटका भर गया था. व्यापारी की यह कहानी हमें बताती है कि हर रोज़ यदि हम अपने कर्मों का हिसाब करते हैं तो हमसे बुरे कर्म ना के बराबर होने लगते हैं.''
कहानी समाप्त होते ही लुटेरा बोला, ''मैं भी रोज़ अपने कर्मो का लेखा-जोखा रखना चाहता हूं, पर मुझसे यह मटके-फटके ना रखें जाएंगे, ना ही मैं पर्ची ही लिख पाऊंगा महात्मा जी! इसके अलावा यदि कोई और सरल उपाय हो तो बताएं."
तभी महात्मा जी मुस्कुराकर बोले, ''तुम शाम को अपने घर जाते हुए रोज़ इसी रास्ते से गुज़रते हो, कल से तुम घर जाने से पहले मेरे पास आकर पूरी ईमानदारी से अपने दिनभर के कर्मों को लिखवा दिया करो. मैं तुम्हारे कर्मों को लिखकर रखे रहूंगा.''
यह भी पढ़ें: अपने सपनों को पूरा कैसे करें? (How To Fulfill Your Dreams)
लुटेरा उस दिन से हर शाम महात्मा जी के पास जाता और अपने कर्मों को उनके पास लिखवा आता. चूंकि वह हर रोज़ अपने कर्मों का अवलोकन करता इसलिए धीरे-धीरे उसके बुरे कर्म कम हो गए और उसके पुण्य कर्म धीरे-धीरे बढ़ते गए. यह करते हुए एक दिन ऐसा भी आया जब उसके सारे बुरे कर्म छूट गए और वह ईमानदारी से काम करके अपनी जीविका चलाने लगा.

पूर्ति खरे

अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES
Photo Courtesy: Freepik
