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कहानी- कल्याणी (Short Story- Kalyani)

चिंटू का फोन आया. उसने कहा कि वह अभी नहीं आ सकता. पैसे देने की बात कही और केयरटेकर रखने को कहा. यह सुनकर कल्याणी रो पड़ी, “नीताजी मेरी मां हैं, उनकी सेवा के पैसे थोड़े ही लूंगी."

कल्याणी जब नीता के घर पहुंची, तब सुबह के लगभग दस बज चुके थे. वैसे भी उसे जल्दी थी, क्योंकि अभी उसे दो और घरों का काम करना बाकी था. लेकिन यहां नीता के घर पर तो जैसे अजीब सी शांति थी. दूध लेने के लिए खिड़की की कुंडी पर लटकाई गई थैली भी धूप में जैसे अंदर जाने का इंतज़ार कर रही थी. दरवाज़ा बंद था. नीता अभी तक उठी नहीं थीं

हर रोज़ तो वे सुबह पांच बजे उठ जाती थीं, नहा-धोकर पूजा करतीं, चाय-नाश्ता कर लेतीं और सब निपटाकर कल्याणी का इंतज़ार करतीं. अगर कल्याणी आठ बजे भी आती तो बड़बड़ातीं, “अरे, इतनी देर? जरा जल्दी चला कर. काम में थोड़ी फुर्ती रख. अब तू इतनी देर से आई तो काम कब ख़त्म करेगी और मेरा खाना कब बनाएगी? फिर देर होगी तो भूख भी मर जाएगी.”

लेकिन आज दस बज गए थे और वह उठी ही नहीं थीं. ऐसा तो बहुत कम होता था.

कहानी- कल्याणी

कल्याणी के मन में डर बैठ गया, कुछ अनहोनी हुई है, ज़रूर कुछ गड़बड़ है. उसने घंटी बजाई, एक-दो बार नहीं, पूरे सात बार, लेकिन अंदर कोई हलचल नहीं हुई. उसने दरवाज़ा खटखटाया और आवाज़ लगाई, “मांजी ओ नीता मांजी. ”

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पर अंदर से कोई जवाब नहीं आया.

उसने खिड़की खोलकर अंदर देखने की कोशिश की, लेकिन खिड़की नहीं खुली. उसके गले से लगभग चीख निकल गई, “नीता मांजी...”

उसकी आवाज़ सुनकर पड़ोसी मंगल बाहर आए, “क्या हुआ, कल्याणी?”

“देखो ना मंगल जी, नीता मांजी उठ ही नहीं रही हैं. मैं कब से घंटी बजा रही हूं, दरवाज़ा खटखटा रही हूं और आवाज़ लगा रही हूं. क्या इतना कोई सोता है?”

“नहीं… नहीं… नीताजी इतनी देर तक सो ही नहीं सकतीं. वह तो रोज़ पांच बजे उठ जाती हैं, जब हम उठते हैं, तब तक तो वह पूजा, चाय-नाश्ता सब कर चुकी होती हैं.” मंगल ने कहा.

उनकी पत्नी अंबा भी आ गईं. उन्होंने कहा, “मैं तो उनसे कहती भी थी कि उन्हें कौन सा ऑफिस जाना है, जो इतनी जल्दी उठ जाती हैं? लेकिन वह मानती कहां थीं. कहती थीं नींद खुल जाए तो बिस्तर पर पड़े रहना मुझे अच्छा नहीं लगता.”

मंगल ने ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला. फिर उन्होंने बगल वाले रमेश को आवाज़ दी, “अरे, दस बज गए और नीताजी उठ ही नहीं रही हैं. ज़रा उस गली के आख़िर में जो रामो मिस्त्री है, उसे बुला लाओ. दरवाज़ा खोलना पड़ेगा. नहीं खुलेगा तो तोड़ना पड़ेगा.”

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रमेश तुरंत चला गया.

नीताजी अलग ही स्वभाव की थीं. बड़ा बेटा पिंटू अमेरिका में रहता था. वह उन्हें वहां बुला रहा था, वीज़ा भी बनवाने को कहा था. लेकिन उन्होंने साफ़ मना करते हुए कहा था, “इस उम्र में परदेस जाकर क्या करूंगी? न पूजा होगी, न भक्ति और अगर वहीं मर गई तो न गंगा मिलेगी, न तर्पण, मुझे नहीं जाना अमेरिका.”

छोटा बेटा चिंटू बेंगलुरु में था. वह कुछ समय उसके साथ रहीं, लेकिन बहू से नहीं बनी. इसलिए वापस आ गईं. वे अकेली ही रहती थीं, लेकिन पड़ोसी उनका पूरा ध्यान रखते थे. और कल्याणी तो सालों से उनके यहां काम करती थी, साफ़-सफ़ाई, कपड़े, खाना, सब कुछ. दोनों साथ बैठकर खाना खातीं. नीता दिन में एक ही बार खाती थीं.

जब दरवाज़ा तोड़ा गया, तो सब अंदर दौड़े. नीता ज़मीन पर गिरी पड़ी थीं. उनकी हालत गंभीर थी. तुरंत एम्बुलेंस बुलाकर उन्हें अस्पताल ले जाया गया. पता चला कि उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गई है, जिसका ऑपरेशन करना पड़ेगा.

दोनों बेटों को फोन किया गया, लेकिन कोई तुरंत नहीं आया. तब कल्याणी ने कहा, “आप लोग चिंता मत करें, जब तक चिंटू भइया नहीं आते, मैं मांजी के साथ रहूंगी. उन्हें ऐसे कैसे छोड़ सकती हूं?”

उसने अपने बाकी काम छोड़ दिए और अस्पताल में ही रहने लगी.

ऑपरेशन ढाई घंटे चला. कल्याणी लगातार भगवान का नाम लेती रही. सब लोग आश्चर्य कर रहे थे कि एक कामवाली इतना समर्पण कैसे कर सकती है?

चिंटू का फोन आया. उसने कहा कि वह अभी नहीं आ सकता. पैसे देने की बात कही और केयरटेकर रखने को कहा.

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यह सुनकर कल्याणी रो पड़ी, “नीताजी मेरी मां हैं, उनकी सेवा के पैसे थोड़े ही लूंगी."

वह दिन-रात उनकी सेवा करती रही. नहलाना, साफ़ करना, खाना खिलाना, सब कुछ.

कुछ समय बाद जब नीताजी चलने लगीं तब चिंटू आया सिर्फ़ तीन घंटे के लिए. उसने कहा कि अब वह मां को अपने साथ ले जाएगा.

कहानी- कल्याणी

तब नीता ने कहा, “बेटा, अब मैं अकेली नहीं हूं. मेरी बेटी कल्याणी मेरे साथ है. मुझे कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है. और मैं यह घर भी कल्याणी के नाम कर दूंगी. तुम लोग इसकी उम्मीद मत रखना.”

यह सुनते ही कल्याणी चिल्ला पड़ी, “मांजी, आप क्या कह रही हैं? मुझे यह घर तो क्या, इसकी एक चीज़ भी नहीं चाहिए! मुझे हराम का कुछ नहीं चाहिए. मैं आपकी सेवा अपनी मां समझकर कर रही हूं. यह बेटी का फ़र्ज़ है.”

चिंटू और नीताजी, दोनों उसे देखते रह गए. उसके चेहरे पर एक अनोखा तेज चमक रहा था.

- वीरेंद्र बहादुर सिंह 

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Photo Courtesy: Freepik

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