
जब भी भूतों पर आधारित कोई फिल्म बनती है तब उत्सुकता, मनोरंजन, अनकहा डर और दिलचस्पी भी बनी रहती है. यही सब कुछ देखने मिलता है निर्देशक प्रियदर्शन की अक्षय कुमार, असरानी, परेश रावल, राजपल यादव, तब्बू, वामिका गब्बी स्टारर ‘भूत बंगला’ फिल्म में. पूरी फिल्म में हंसी-मज़ाक के साथ-साथ भय-खौफ़ का माहौल बनाने में कामयाब रहे हैं प्रियदर्शन.
मंगलपुर में अर्जुन आचार्य-माधव, अक्षय कुमार (दोहरी भूमिका में) के दादाजी का महलनुमा घर है, जबकि वे अपने पिता डॉ. वासुदेव आचार्य, जीशु सेनगुप्ता और बहन मीरा, मिथिला पालकर के साथ लंदन में रह रहे हैं. किस तरह उन्हें अपने पुश्तैनी धरोधर का पता चलता है और उसे पाने और बहन की शादी वहां कराने के लिए वे लंदन से भारत आते हैं, देखना मज़ेदार है. सब घटनाक्रम तेजी से बदलते रहते हैं और वो भी शुद्ध मनोरंजन के साथ. क्या अक्षय शापित, भूत व काला जादू से भरे गांव के अपने बंगले में अपनी बहन की शादी करा पाते हैं? यह तो फिल्म देखने के बाद ही आप जान पाएंगे.

दरअसल, मंगलपुर गांव नई नवेली दुल्हनों के लिए शापित है. वहां पर जिस किसी की शादी होती है नवविवाहिता दुल्हन गायब हो जाती है. ऐसा क्यों और किसलिए होता है, इसकी भी रोचक कहानी है. इसमें पौराणिक गाथाएं और अलौकिक शक्तियों का अद्भुत मिश्रण किया गया है, जो जिज्ञासा के साथ रोमांच पैदा करता है.

फिल्म की कहानी में आकाश कौशिक ने कई जगहों पर व्यंग्य के साथ कॉमेडी का अच्छा तालमेल बैठाया है. शुरुआत ही मीरा की पेड़ से शादी वो भी ऑनलाइन पंडित जी के द्वारा होती है, जो किसी हास्य-व्यंग्य से कम नहीं. पूरी फिल्म में बीच-बीच में कॉमेडी के कई पंच लाइन है, जिसे पूरा करने में असरानी, परेश रावल, राजपाल यादव की तिकड़ी अक्षय कुमार के साथ कमाल दिखाती है.
निर्देशक द्विअर्थी दृश्यों को दिखाने में कुछ कम माहिर नहीं है, ख़ासकर राजपाल यादव और अक्षय कुमार के ऐसे कई सीन हंसी का अच्छा-ख़ासा हंगामा खड़ा करते हैं. परेश रावल के तो पिछवाड़े को लेकर कई प्रसंग गुदगुदाने पर मजबूर कर देते हैं. इन सब में संवाद भी अहम् भूमिका निभाते हैं, जिसके लिए डायलॉग राइटर रोहन शंकर बधाई के पात्र हैं. उन्होंने प्रियदर्शन और अभिलाष नायर के साथ मिलकर फिल्म की पटकथा भी लिखी है.

‘भूत बंगला’ की शुरुआत लंदन से लेकर भारत के विभिन्न हिस्सों, जैसे- जयपुर, मुंबई, चेन्नई, कोची, हैदराबाद से होकर गुज़रती है. सभी के मनभावन, आकर्षक के साथ महलों, जंगल, पेड़ों, चमगादड़ के खौफ़नाक दृश्यों को सिनेमैटोग्राफर दिवाकर मणि ने ख़ूबसूरती से फिल्माया है. हर जगह आप नेत्र सुख के साथ दिलोदिमाग़ को झंझोड़तें डरावने फिल्माकन का आनंद लेते हैं.
तब्बू बहुत बाद में आती हैं, पर अपने नृत्य और अदाकारी से प्रभावित कर जाती हैं. वामिका गब्बी भी प्रिया-रिया की दोहरी भूमिका में हैं, जो अपनी जुड़वा बहन और चाचा के गायब होने के राज़ को जानना चाहती है. कई पड़ाव पर ’भूत बंगला’ चौंकाती भी है, ख़ासकर जब वामिका की हक़ीक़त जान अक्षय हैरान-परेशान होते हैं.
अक्षय कुमार, असरानी, परेश रावल, जीशु सेनगुप्ता, राजपाल यादव, तब्बू, वामिका गब्बी, मनोज जोशी, मिथिला पालकर, राजेश शर्मा, भावना पनी, जाकिर हुसैन, मनू मेनन, पेरिन मालदे हर किसी ने अपनी-अपनी भूमिकाओं को सशक्त ढंग से निभाया है. असरानी जी हमारे बीच नहीं रहे, परंतु अपनी अदायगी से हमेशा साथ हैं, इसका आभास उन्होंने बख़ूबी कराया.

पौने तीन घंटे की फिल्म कहीं भी बोरियत महसूस होने नहीं देती, परंतु एडिटर एम. एस. अयप्पन नायर कोशिश करते तो थोड़ी एडिट की जा सकती थी. फिर चाहे वो गाना ही क्यों न हो. कई बार कहानी के फ्लो में यह खटकती भी है.
ज़ी म्यूज़िक कंपनी के बैनर तले अरमान मलिक, आरवन, मेलो डी द्वारा गाया रामजी आके भला करेंगे... अच्छा बन पड़ा है. कुमार व मेलो डी के गीत भी तर्कपूर्ण हैं. इसके अलावा अरिजीत सिंह-निकिता गांधी की तू ही दिसदा... तथा ओ सुंदरी... ठीक-ठाक हैं. प्रीतम के संगीत, रूनी राफेल के स्कोर के साथ गणेश आचार्य की कोरियोग्राफी असरदार हैै.

फिल्म के अंत में अक्षय कुमार के संवाद सस्पेंस पैदा करने के साथ भूत-प्रेत, ज्योतिष, कर्म-कांडों को लेकर हमारी सोच पर भी व्यंग्य करते हैं. अलौकिक शक्तियां होती हैं या नहीं, यह और बात है, पर हम कितने सही और सच्चे हैं, यह मायने रखता है. वैसे अंतिम दृश्यों को देख यूं लगता है यदि फिल्म सुपर-डुपर हिट रही तो इसका दूसरा पार्ट भी बन सकता है, अब यह तो पब्लिक और प्रोडयूसर-डायरेक्टर पर निर्भर करता है.
अक्षय कुमार, शोभा कपूर और एकता कपूर निर्मित बालाजी मोशन पिक्चर्स और केप ऑफ गुड फिल्म्स तले ‘भूत बंगला’ कॉमेडी, ट्रेजडी के साथ-साथ फुल इंटरटेन करती है.
- ऊषा गुप्ता

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