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कहानी- दिवाली (Short Story- Diwali)

कंपकंपाती आवाज़ में वह बोला, "समिता, मैं... मैं बोल रहा हूं. कैसी हो तुम? मैं तुमसे मिलना चाहता हूं." वह कहना चाहता था कि मैं बहुत बीमार हूं मैं मरना चाहता हूं, पर वह कुछ नहीं कह पाया. उधर से समिता की आवाज़ गूंजी,‌ "कहां से बोल रहे हो? मैं आज रात आठ बजे तुमसे मिलती हूं."

आज सुबह से ही अस्पताल के वातावरण में चहल-पहल थी. जिन चेहरों पर हमेशा उदासी सी छाई रहती थी, वे चेहरे भी आज हंसते नज़र आ रहे थे. यूं लग रहा था, जैसे अंधेरे में किसी ने शमा जला कर रख दी है. उसकी ज़िन्दगी चंद लम्हों की है तो क्या, जब तक उसका प्रकाश रहेगा, तब तक अंधेरा भी उजाले की तरह जगमगाता रहेगा. आज दिवाली थी. सब लोग सुबह से ही अपने नाते-रिश्तेदारों के लिए फल व मिठाई ला रहे थे. कुछ लोग आते-जाते अस्पताल की नर्सों को भी तोहफ़े व इनाम आदि दे रहे थे. पूरे वर्ष में एक ही बार तो आता है यह त्योहार.

पूरे अस्पताल में केवल वह ही ऐसा था, जो इन सबसे बेख़बर अपने ही ख़्यालों में गुम था. वह झरोखे से बाहर की दुनिया देख रहा था. शाम की लालिमा सारे शहर पर छाई हुई थी. कहीं-कहीं कैंडल की रंगबिरंगी रोशनी जगमगा रही थी. ज़माने के कदमों में तेज़ रफ़्तार थी. वे दीये जलाने की बेला तक अपने-अपने घर पहुंच जाना चाहते थे, क्योंकि रात होने ही वाली थी.

पिछले सप्ताह उसे देखने कुछ डॉक्टर बाहर से बुलाए गए थे. उनकी आपस में हुई बातचीत से उसने अंदाज़ा लगाया था कि अब उसका बिस्तर जल्दी ही छूट जाएगा. उसे इस दर्द भरी ज़िन्दगी से जल्दी ही मुक्ति मिल जाएगी, यह जानकर उसे ख़ुशी ही हुई थी. अपने आप में वह तंग आ चुका था. इस बेजार व नीरस सी ज़िन्दगी से वह ऊब चुका था. रीढ़ की हड्‌डी से उठती टीस हर बार उसे यह रात याद दिलाती. हर रात यह समिता की याद में आंसू बहाता रहता. रातों में तारे गिनता व दिन में किसी के कदमों की आहट सुनने को उसके कान बेचैन रहते, परन्तु उसे मिलने कभी कोई नहीं आया

आज न जाने क्यों, वह अपने आपको बहुत विवश महसूस कर रहा था. उसका दिल चाह रहा था, आज तो कोई आकर उसके पास बैठे, उसका हाल पूछे. किसी से तो दो बातें कर सके. बिस्तर पर पड़े-पड़े उसका हाथ उठा. उसने क्रैडिल से रिसीवर उठाया समिता का नंबर घुमाया. अगले ही क्षण उसने रिसीवर दिल पर सटा दिया. क़रीब से ही बम फुटने की दबी-दबी, पर धमाकेदार आवाज़ आई थी. पटाखे की आवाज़ तो रिसीवर रखने का निमित मात्र बनी, शायद उसमें ही बात करने की शक्ति नहीं थी या वह बात करने के लिए अपनी पूरी शक्ति संजोना चाहता था.

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तभी उसने देखा, एक मरीज़ को डिस्चार्ज किया गया था. उसकी पत्नी व बच्चे उसे लेने आए थे. पत्नी के हाथ में मिठाई थी व बच्चों के हाथों में नन्हीं-नन्हीं फुलझड़ियां, सभी ख़ुश थे. वे जल्दी से जल्दी घर जाना चाहते थे, ताकि एक साथ दिवाली की ख़ुशियों में शरीक हो सके.

उसे याद आया. पिछले साल उसने भी दिवाली मनाई थी. होटल ओबेरॉय के शानदार हॉल में उसने अपने २५-३० दोस्तों को दावत दी थी. कव्वाली का भी प्रबंध था. खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी. उसे तो किसी भी बात की, किसी भी चीज़ की कमी न थी. ज़िन्दगी उसके लिए बहार थी बस, ज़िन्दगी में एक कमी आ गई थी उसके पिता की.

कुछ महीने पहले ही उसका बड़ा भाई कनाडा से आया था. उसने पिता से आग्रह किया था कि वे काफ़ी समय से अपने छोटे बेटे के साथ रह रहे हैं. अब कुछ समय उसके साथ भी रहें. वह भी तो जाने कि बड़ों का साया क्या होता है? पिताजी ने भी सोचा कि ज़िन्दगी की शाम ढलने को है. एक लंबे अरसे से वे छोटे बेटे के साथ रह रहे हैं. अब कुछ समय बड़े बेटे के पास रहकर उसकी मुराद भी पूरी कर दें और वे अपनी सारी दौलत और व्यापार उसे सौंप कर अपने बड़े बेटे के साथ कनाडा जा बसे थे. बस, पिता की याद उसे जब-तब आ जाया करती थी. उसने अपने पिता का व्यापार अच्छी तरह से संभाल लिया था, फिर उसे किस बात की कमी होती.

पिछली दिवाली पर ओबेरॉय होटल में ही उसकी मुलाक़ात वर्मा साहब की बहन समिता से हुई थी. वर्मा साहब की पत्नी के साथ-साथ उस दिन उनकी चचेरी बहन, जो नागपुर से आई थी, उनके साथ पार्टी में शामिल हुई. जैसे ही समिता ने हॉल में कदम रखा, उसकी नज़र समिता पर पड़ी. एकटक विस्मित-विमूढ़ वह उसे देखता ही रह गया. पार्टी में समिता भी बार-बार उसकी ओर देख रही थी. न जाने क्या बात थी, दोनों एक-दूसरे की तरफ़ खिंचते गए. कहीं भी तो औपचारिकता नहीं थी. पार्टी के शोरगुल में भी मौन मुखर हो उठा. आंखों ही आंखों में जैसे जनम-जनम के रिश्ते खुल गए. कहीं भी अजनबीपन नहीं था.

फिर... दोनों क़रीब आए और चंद लम्हों में ही इकरार भी हो गया और इज़हार भी. कुछ वायदे लिए और दिए गए, कुछ उपहार भी लिए और दिए गए. उस दिन के पश्चात वे एक-दूसरे से मिलते रहे थे.

एक दिन समिता ने उसे बताया था कि उसे गुलाबी रंग की साड़ी बहुत पसंद है. समिता का इतना कहना था कि उसने शहर के सारे गुलाबी रंगों का ढेर समिता के कदमों में लगा दिया था. वह अवाक सी कभी उसे देखती, तो कभी गुलाबी रंग की वे ढेर सारी साड़ियां.

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एक भी दिन समिता उससे नहीं मिलती तो वह अपने आप को बेचैन महसूस करता. समिता का आगमन उसके जीवनदीप की ज्योति में जैसे नई आग भर देता. उस दिन समिता आश्चर्यचकित हो उसे ही देखे जा रही थी. पिछले दिन उसके न आने की वजह से वह कितना परेशान था. सारे दिन की व्यथा-कथा सुनाने के बाद वह उससे बोला था कि समिता उसे फिर कभी ऐसा दिन न दिखाए, और... उस दिन के बाद समिता उसके और क़रीब, बिल्कुल क़रीब आ गई थी.

भादों की वह काली रात आज भी उसे याद है. उस दिन समिता उसके दफ़्तर में आई. वहां से वे रीगल में फिल्म देखने चले गए. शाम समुद्र-किनारे चहलकदमी की. फिर इक‌ट्ठे होटल में खाना खाया. उस दिन वे दोनों बहक गए थे. दोनों के हृदय की धड़कन बढ़ गई थी. नाड़ियों में दौड़ता खून गर्म लावा बन गया था. दोनों के दरमियान कोई फासला न रहा. बाहर बिजली की गर्जना के साथ उमड़ते-घुमड़ते बादलों का शोर था. भीतर दो दिलों की धड़कनें मिलकर एक हो गई थीं. और फिर, धीरे-धीरे बादल छंटे और घनघोर बरसात बूंदाबादी में बदल गई भीतर भी शांति छा गई थी. उसके बाद जब वे दोनों विदा हुए तो उनकी आत्मा तृप्त थीं. आंखों में चमक बढ़ गई थी. समिता के चेहरे की लाली और गहरा गई थी.

अगले दिन समिता वापस नागपुर जा रही थी. वह उससे मिलने स्टेशन जा रहा था. अपनी समिता को विदा करने जाते वक़्त उसे दुख हो रहा था. उसकी आंखों के सामने पिछले पंद्रह दिन चलचित्र की भांति घूम रहे थे. अचानक एक ज़ोरदार धमाका हुआ. उसकी गाड़ी एक वृक्ष से टकरा गई थी. उसे काफ़ी चोट आई थी. वह बेहोश हो गया. जब होश में आया तो अपने आप को अस्पताल के बिस्तर पर पाया.

तब से अब तक उसने ज़िन्दगी की भयावहता देखी थी. उसको क्रूरता देखी थी. ज़िन्दगी का कसैलापन उसके हलक के नीचे एक-एक घूंट करके उतर रहा था. पूरा एक वर्ष बीत गया था उसे बिस्तर से जुड़े. पहले तो डॉक्टर ने उसकी दाहिनी टांग का ऑपरेशन किया, जहां से हड्‌डी टूटी हुई थी. जब उसका प्लास्टर फिर किया गया तो कुछ दिन पश्चात् पता चला कि उसमें पस भर गई है. उसका इलाज जितना अधिक किया गया अंदर उतना ही कहर बढ़ता गया और फिर हार कर तीन महीने पश्चात् उसकी टांग उसके जिस्म से अलग कर दी गई थी. कितना परेशान था, कितना असहाय हो गया था वह किसे बताता? किसको अपने दिल का दर्द बताता? किसके गले से लिपट कर रोता? पहले चंद दिन तो उसके कुछ दोस्त रस्मी हालचाल पूछने आए, परंतु बाद में सब उसे भूल गए थे.

हफ़्ते में एक बार उसके फर्म का मैनेजर आता था, जो कुछ चेक साइन करवाता और चल देता. पिछले तीन माह से उसका आना भी बंद हो गया था. उसका सारा कारोबार मैनेजर के ही हस्ताक्षर से चल रहा था. उसने वक़ील की मार्फत 'पावर ऑफ अटॉर्नी' ले लिया था. अब वह निहायत अकेला था. इस सुनेपन में उसके साथी थे तो बस दवा देने आने वाली नर्स, जिसकी आंखों में दया और रहम होता. वह कितने रखरखाव व रौब से जीता था. कितनी शान थी उसकी! आज वह नर्सों और डॉक्टरों के रहम पर था. उसने फिर करवरट बदली और झरोखे से बाहर देखा.

बाहर अभी कुछ-कुछ उजाला था. बस, अब दो-तीन घंटों के बाद दिवाली की बत्तियां जल उठेगी. सारा शहर दीयों की जगमगाहट से जगमगा उठेगा. उसने फिर से क्रेडिल से रिसीवर उठाया समिता का नंबर डायल किया. एक पल को उसका हृदय धड़‌का पर फोन पर कोई पुरुष स्वर था. उसने समिता के बारे में पूछा तो पता चला कि वह मुंबई गई हुई है. उसने फोन रख दिया. वह सोचने लगा, समिता मुंबई आई है किसलिए? हो सकता है, वह उससे ही मिलने आई हो. यदि उससे ही मिलने आई है तो खोज-ख़बर लेते-लेते यहां तक क्यों नहीं आई? हो सकता है कि वह आजकल में ही आई हो और न जाने उससे मिलने किस क्षण आ जाए.

उसने फिर एक बार क्रेडिल से रिसीवर उठाया और उसने वर्मा साहब का नंबर डायल किया. इस बार वह बिल्कुल नॉर्मल था, पर पल भर बाद ही उसका दिल जोरों से धड़का. उधर फोन समिता ने ही उठाया था. कांसे के कटोरे की तरह खनकती उसकी आवाज़ ने कानों में रस घोल दिया. कंपकंपाती आवाज़ में वह बोला, "समिता, मैं... मैं बोल रहा हूं. कैसी हो तुम? मैं तुमसे मिलना चाहता हूं." वह कहना चाहता था कि मैं बहुत बीमार हूं मैं मरना चाहता हूं, पर वह कुछ नहीं कह पाया. उधर से समिता की आवाज़ गूंजी,‌ "कहां से बोल रहे हो? मैं आज रात आठ बजे तुमसे मिलती हूं."

"मैं ब्रीच-कैंडी से बोल रहा हूं." कहते हुए उसका गला भर आया और उसने फोन रख दिया. अब उसकी धड़कन बहुत तेज़ हो गई थी. उसका रक्तचाप बढ़ गया. उसकी नज़रें समिता के स्वागत में बिछी जा रही थीं. वह सोच रहा था कैसे वह समिता का स्वागत करेगा? समिता उसकी हालत देख रो पड़ेगी और उसके सीने से लिपट जाएगी तो वह कैसे उसे सांत्वना देगा? वह समिता को जी भर कर प्यार करेगा, फिर न जाने वह दोबारा मिल पाएगी कि नहीं.

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इन प्रतीक्षा के क्षणों में उसके जीने की उमंग बढ़ गई थी. वह मरना नहीं चाहता था. अब वह फिर से समिता के लिए जीना चाहता था. उसको नज़रें एकटक टिक-टिक करती घड़ी पर जमी थीं. अभी भी आठ बजने में मिनट शेष थे. घड़ी की प्रत्येक टिक के संग उसके हृदय की धड़कन बढ़ रही थी. आठ बजने ही वाले थे. उसके दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई. वह पथराई आंखों में दरवाज़े की ओर देखने लगा. हत्के गुलाबी रंग की साड़ी में समिता खड़ी थी. वह हल्के से मुस्कुराया. हाथ के इशारे से उसे समीप बैठने को कहा.

कितना रौब था उसके चेहरे पर बारह महीने पहले उसमें कितना आकर्षण था. वह अब मात्र हड्डियों का ढांचा रह गया था. उसका गुलाबी चेहरा फीका पड़ गया था. वह अपनी उम्र से बीस बरस बड़ा लग रहा था. समिता का हाथ थामना चाहा उसने. उसकी नज़रें ऊपर उठीं. उसने समिता का चेहरा शायद अब पहली बार ही गौर से देखा था, जहां गोल बड़ी बिंदी चमक रही थी. कानों में भारी झुमके व मांग में... सिंदूर उसके हाथ से समिता का हाथ एकदम छिटक-सा गया. इससे पहले कि वह उसको अपने दिल की कुछ कह पाता, समिता उसे कुछ सांत्वना दे पाती, उसका हाथ शिथिल पड़ गया. उसकी आंखें पथरा गईं उसके प्राण-पखेरू उड़ गए. उसकी यादों की समिता, उसके मन-मस्तिष्क में बैठी समिता ही जब उसकी न थी, तो वह किसकी उम्मीद पर जीता?

बाहर पटाखों का शोर शुरू हुआ, दिवाली के दीये जले. लोग एक-दूसरे को दिवाली मुबारक कहने लगे और दो डॉक्टर उसके मृत्यु प्रमाण-पत्र पर जल्दी-जल्दी हस्ताक्षर करते हुए कर्मचारियों से लाश जल्दी से जल्दी हटाने को कह रहे थे. उनको भी घर जाकर दिवाली मनाने की जल्दी थी.

- श्रीमती कुलवंत कौर नारंग

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