समाज को शिक्षा का सही अर्थ समझना भी आवश्यक है. शिक्षा वही सही है, जिससे कम्प्लीट पर्सनैलिटी डेवलपमेंट हो. सावित्री सही मायने में शिक्षित व्यक्ति थी. आइए जानें कैसे...
घर पर हम सब महिलाओं ने वट सावित्री का व्रत किया. मेरी नई-नई शादी हुई थी तो ये व्रत कुछ ज़्यादा आडम्बर के साथ किया गया. व्रत और पूजा पूरी हुई. पकवानों के चटखारे के साथ मैंने देखा घर के बच्चों के ्पास सवालों की गठरी बंधी रखी है.
बस मैंने उसे खोलने की छूट दी और सारे प्रश्न बिखर पड़े, “आजकल के वैज्ञानिक युग में आप लोग सावित्री की कहानी पर विश्वास करते हो?” “यमराज आए?”
“राजकुमारी लकड़हारे से कैसे शादी कर सकती है?”
मुझे लगा कि इन प्रश्नों का उत्तर यदि हम जानते तो हैं, पर रियलाइज़ नहीं करते. इसीलिए मैं बच्चों को विस्तार से बताना शुरू किया-
जेठ मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला वट सावित्री का व्रत हमें बहुत कुछ सिखाता है. ये इंसान के सच्ची शिक्षा पाने की और कमज़ोर समझी जाने वाली स्त्री के शक्ति पक्ष की गाथा है.
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सावित्री-सत्यवान की कथा इंसान के जीवन में आने वाली समस्याओं की तथा साहस, सूझबूझ और दृढ़ संकल्प शक्ति द्वारा उन्हें हल किए जाने की कथा है.
भारतीय संस्कृति में स्वयंवर का चलन स्त्री के निर्णय लेने के अधिकार को सुरक्षित रखने के लिए बनाया गया था. सावित्री के पिता ने भी अपनी एकमात्र पुत्री सावित्री को शिक्षा की शक्ति से समृद्ध कर वर के चुनाव का निर्णय उस पर छोड़ दिया. उसने बहुत सोच-विचार कर एक साधनहीन किन्तु शालीन और कर्मठ सत्पुरुष का चयन किया. सत्यवान एक राजकुमार था. उसका राज्य धोखे से छीन लिए जाने के बाद वो जंगल में लकड़ियां बीनकर बेचकर अपनी जीविका चलाता था तथा अपने माता-पिता का पालन करता था.
नारद मुनि ने कहा कि वो अल्पायु है, किंतु इससे सावित्री का निर्णय नहीं बदला. सावित्री ने अपनी सद्बुद्धि तथा कर्मठता से अपने जीवन को सुंदर बनाया और संप्रेषण कला अर्थात वाक-चातुर्य से यमराज पर भी विजय प्राप्त कर ली.
अब आते हैं इस कहानी के प्रतीकार्थ पर. आज धर्म के नाम पर स्त्री शिक्षा, प्रेम विवाह आदि को नकारने वाले आडंबररियों को हमारी पौराणिक कथाओं के प्रतीकार्थों को समझना चाहिए. ये कहानी बताती है कि स्त्री को दी हुई शिक्षा और स्वतंत्रता कभी बेकार नहीं जाती, लंबे समय में नतीजे अच्छे निकलते हैं.
हां, समाज को शिक्षा का सही अर्थ समझना भी आवश्यक है. शिक्षा वही सही है, जिससे कम्प्लीट पर्सनैलिटी डेवलपमेंट हो.
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सावित्री सही मायने में शिक्षित व्यक्ति थी. आइए जानें कैसे –
शिक्षा का प्रथम उद्देश्य है, सही तथा ग़लत के बीच चुनाव करने की योग्यता का विकास.
सावित्री में सही ढंग से परखने और चुनाव करने की सामर्थ्य थी. उसे पता था कि दाम्पत्य जीवन का सुख एक सुलझे हुए साथी के साहचर्य में है, जो उसे समझ सके. तभी उसने चुनाव की स्वतंत्रता मिलने पर वैभव नहीं गुणों को देखकर वर का चुनाव किया.
सत्यवान वे व्यक्ति थे, जो जीवन की विसंगतियों का सामना मुस्कुराकर करते हैं और साहस व कर्मठता से समस्याओं का समाधान ढूंढ़ते हैं.
आज जो अभिभावक बच्चों को सही संस्कार एवं योग्यता देकर चुनाव की स्वतंत्रता देते हैं, उन्हें कभी पछताना नहीं पड़ता. साथ ही जो व्यक्ति ऊपरी चमक-दमक नहीं, गुण तथा योग्यता देखकर जीवनसाथी चुनते हैं, वे सुखी रहते हैं.
शिक्षा का दूसरा उद्देश्य है ज्ञान को प्रायोगिक तथा व्यावहारिक स्वरूप देना. गृहिणी घर की नींव होती है. सही मायने में शिक्षित स्त्री खानपान एवं दिनचर्या को सेहत के नियमों के अनुसार तय करती है. जिसका आयु एवं हेल्थ पर सीधा असर पड़ता है. आज कई परिवारों में सदस्यों की नित्य की बीमारियों या अल्पायु का कारण अशिक्षा या ग़लत शिक्षा है. हमारा पारंपरिक शिक्षा का ढांचा पूरी तरह अंक केंद्रित है. किताबी ज्ञान तथा ज़्यादा से ज़्यादा रोज़गार के अवसर मुहैया करने की क्षमता विकसित करने में बच्चे का बचपन निकल जाता है. संतुलित भोजन, व्यायाम तथा थोड़ा सा ध्यान-प्राणायाम आदि, जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास के लिए सर्वाधिक आवश्यक हैं, उनकी सही आदत बनाने की ओर शिक्षा प्रणाली बिल्कुल ध्यान नहीं देती. ये कहानी प्रकारांतर से बताती है कि थोड़ी सी नियमित एक्सरसाइज़, हेल्दी खानपान से जीवन निरोगी रहता है और आयु लंबी होती है.
शिक्षा का एक उद्देश्य है व्यक्ति में सही रीज़निंग और लॉजिक का विकास करना, जिसमें यमराज को लॉजिक में हरा देने का प्रतीकार्थ छिपा है. सत्यवान और सावित्री ऐसे ही निर्भय दम्पत्ति का प्रतीक हैं. आत्मविश्वास के साथ पोलाइटली किए गए तर्क निर्दयी तथा आक्रामक व्यक्ति का भी ह्रदय परिवर्तन कर सकते हैं. जैसे बुद्ध ने अंगुलिमाल तथा बाबा भारती ने डाकू खड्ग सिंह का किया था. उसके लिए अपने पूर्ण आध्यात्मिक विकास की आवश्यकता होती है, जो सावित्री द्वारा पाई गई सही शिक्षा द्वारा संभव हुआ.
हम अपनी पौराणिक कथाओं में छिपे प्रतीकार्थो को समझे बिना ही उन्हें अवैज्ञानिक कह देते हैं इसीलिए उनके द्वारा दी गई शिक्षाओं से वंचित रह जाते हैं.

भावना प्रकाश
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