घृणित हृदय वाला मानव ही, खेल खेलता गंदा है।
जागृत जब समाज होता तो, इनका धंधा मंदा है।
उद्वेलित होता जनमानस, निंदनीय घटनाओं से।
नारी का सम्मान बचाने, हुआ खड़ा हर बंदा है।
यह समाज की ज़िम्मेदारी, हर बच्चा संस्कारित हो।
तुच्छ सोच को आज खुरचने, हमें चलाना रंदा है।
लिए मोमबत्ती हाथों में, रोष प्रकट करते रहते।
स्वतः प्रदर्शन होते रहते, बिना जुटाए चंदा है।
व्यभिचारी कुत्सित लोगों प्रति, क्रोध भरा है जन-जन में।
इनके दुष्कर्मों का प्रतिफल, बस फाँसी का फंदा है।
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी
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Photo Courtesy: Freepik
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