"अपने बारे में?" होंठों पर विद्रूप भरी हंसी की रेखा खिंच गई, "मैं तो टुकड़ों में बंटी हूं सागर, जिसके एक खाने में तुम हो, दूसरे में पति, तीसरे में बच्चे हैं, चौथे में समाज, मेरे पास अपने अस्तित्व के लिए कोई खाना बचा ही कहां है?"
"क्या बात है, आज कुछ परेशान सी लग रही हो?" रेस्ट्रा के एक कोने में कुर्सी पर बैठते ही सागर की खोजी दृष्टि मेरे चेहरे पर बिछ गई.
"हूं..." मैं अनमनी सी हो उठी. हाथ में पकडे पर्स से उंगलियां बेमानी ही उलझने लगीं. तब तक वेटर ने आकर चाय के दो प्याले रख दिए, अनमने एहसास के बीच भी होंठों पर मुस्कान की पतली रेखा खिंच गई. इस छोटे से अन्तराल में कितना परिचित सा हो गया है यह वेटर, जो बिन कहे ही हमारी ज़रूरत भांप जाता है
"तुमने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया मानसी?" चाय के प्याले में चम्मच हिलाते हुए सागर ने अपना प्रश्न दोहरा दिया. मेरे सामने रखे प्याले की गर्म भाप से जैसे सीने में जमा गुबार पिघल कर लावा बनने लगा, जिसकी तपन से मेरा स्वर झझक उठा.
"सागर, मैं इस बंटी हुई ज़िन्दगी से ऊब गई हूं. घुटन सी होने लगी है मुझे?"
"मानसी, क्या तुम हमेशा दूसरों की दृष्टि से ही अपने को देख कर दुखी होती रहोगी, कभी स्वयं की दृष्टि से भी ख़ुद को पढ़ने का प्रयत्न किया है? कभी अपने बारे में भी सोचा है तुमने?"
"अपने बारे में?" होंठों पर विद्रूप भरी हंसी की रेखा खिंच गई, "मैं तो टुकड़ों में बंटी हूं सागर, जिसके एक खाने में तुम हो, दूसरे में पति, तीसरे में बच्चे हैं, चौथे में समाज, मेरे पास अपने अस्तित्व के लिए कोई खाना बचा ही कहां है?"
"आख़िर तुम हर बात को इतनी गम्भीरता से क्यों लेती हो? क्या ऐसा नहीं हो सकता कि ज़िन्दगी जिस ढर्रे पर चल रही है, उसी पर चलती रहे?" सागर ने मेरी हथेलियां अपनी मुट्ठी में दबा लीं. मैं उसकी नासमझी पर खीझ उठी.
"तुम नहीं समझोगे. आख़िर मर्द हो न सागर, इन चारों खानों में बंटी मेरी ज़िन्दगी अलग-अलग रहती तो;भी ठीक था, पर हर खाना एक-दूसरे से मिल कर गड्डमड्ड हो गया है कि इसमें मेरा वजूद कहां है, कुछ समझ नहीं पाती."
"मानसी, बात पहेलियों में मत बुझाओ." मेरी हथेलियों पर उसका दबाव और बढ़ गया.
"सागर, यह सब कुछ अव्यवस्थित नहीं तो और क्या है, जब मेरा जिस्म कमल के साथ होता है तो रूह तुम्हें पुकार रही होती है. जब देह तुम्हारे सामने होती है तो कमल के प्रति मन आत्मग्लानि से भर जाता है. ऑफिस में ज़रा सी तन्हाई पाते ही बच्चे, तुम और कमल की छायाएं गुत्थमगुत्था हो मुझे दोषी ठहराने लगती हैं. अब तुम ही बताओ सागर, मैं क्या करूं? काश, जिन्दगी का कोई ऐसा टुकड़ा भी होता, जिसमें मैं ख़ुद के वजूद को ढाल पाती. तब शायद यह दर्द, यह तड़प मेरी ज़िन्दगी का हिस्सा न बनता."
"क्या थोड़ी देर के लिए भी तुम यह सब भूल नहीं सकीं?" मेरी बातों से उकता कर सागर के स्वर में कड़वाहट का स्पर्श आ गया, पर मुझ पर उसकी तल्खी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा. मेरा स्वर पूर्ववत् ही रहा. शायद भीतर उबलती सारी की सारी घुटन मैं आज निकाल देने को व्याकुल हो उठी थी,
"काश, यह क्षणिक सुख ही मेरे भाग्य में होता, पर मैं कैसे भूल जाऊं कि मैं आज़ाद पंछी नहीं. एक चारदीवारी में क़ैद 'नारी' हूं, जहां मेरे दो बच्चे हैं, जिनके प्रति मेरे कुछ कर्तव्य हैं. कमल हैं, जिनके बच्चों की मैं मां हूं, पर जिसके लिए मैं केवल एक हाड़-मांस की मशीन भर हूं. मेरे सीने में भी 'दिल' नाम की कोई चीज़ धड़कती है, उसे इससे कोई सरोकार नहीं... या फिर तुम्हें भूल जाऊं, जिसके दामन में बेझिझक मैं अपने दिल का समूचा दर्द उड़ेल देती हूं. बताओ सागर, मैं किसको छोड़ दूं? किसको भूल जाऊं?" उसके हाथों से अपने हाथ खींच मैं उसकी मुट्ठियां कस कर पकड़ लेती हूं. उस पल मुझे यह भी खौफ़ नहीं रहता कि आसपास की टेबल पर बैठे लोग हमें देख रहे होंगे.
"आई एम सॉरी मानसी, मैंने तुम्हारा दिल दुखाया." सागर का स्वर पश्चाताप से भर उठा.
"अच्छा, अब चलूंगी." कलाई घड़ी पर मेरी दृष्टि टिकी देख सागर व्यथित सा हो उठा, "इतनी जल्दी?"
"हां, आज मुझे कमल के साथ कहीं जाना है" पर्स समेट मैं उठ गई.
घर पर कमल पहले से ही आकर बैठे थे, "आज बड़ी देर कर दी." मुझे देखते ही बोले.
"हां, देर हो गई." मेरा स्वर अनमना सा था. कान कुछ और सुनने उतावले हो उठे, 'इतनी देर कैसे हो गई, पर मैं अच्छी तरह जानती थी कि वह यह कभी नहीं पूछेंगे, और यदि वे पूछ ही बैठे तो क्या मैं अपने उत्तर के साथ न्याय कर पाऊंगी? एक व्यंग्य भरी मुस्कान मेरे होंठों पर तिर आई.
"जल्दी से तैयार हो जाओ. आज बॉस के यहां पार्टी है. शर्मा जी भी आएंगे वहां." कुसीं से उठते-उठते कमल कह गए.
"हूं... पार्टी..." मैं इन पार्टियों का अर्थ ख़ूब अच्छी तरह जानती हूं. मुस्कुराहट की चाशनी चिपका कर लोगों के बीच पॉपुलर बनने का ढोंग करना, दूसरों पर अपना सिक्का ज़माना और ख़ासतौर पर तब, जब कमल का बॉस, वह खूसट शर्मा अपनी गिद्ध की सी पैनी आंखों से हर ख़ूबसूरत महिला के जिस्म के विशेष हिस्से नोचता-खसोटता रहे. शर्मा का ध्यान आते ही उबकाई सी आने लगी. मन कसैला हो उठा. मन में आया, कमल से कह दूं, 'आज मेरी तबीयत ठीक नहीं, तुम अकेले ही चले जाओ,' पर उसके बाद उस पर होने वाली प्रतिक्रिया को भी जानती हूं, इसलिए जाना तो पड़ेगा ही. ऐसे मौक़ों पर मैं कमल की पत्नी नहीं, बल्कि उसकी संजोयी गई उपलब्धियों में से एक हो जाती हूं, ख़ूबसूरत बीवी, उस पर बैंक में अधिकारी, पार्टी के तौर तरीक़ों से पूर्ण परिचित, पार्टी में हर व्यक्ति कमल को ईर्ष्या से देखता है, तो अभिमान से उसका सीना तन जाता है.
हाथ मुंह धोकर मैंने आलमारी खोली, 'कौन-सी साड़ी पहनूं?' उधर से गुज़रते कमल से मैंने पूछने के लिए खोले अधर फिर बंद कर लिए, क्योंकि मुझे उसका उत्तर पहले ही मालूम है, अरे, कोई सी भी शोख रंग की साड़ी पहन लो', यह जानते हुए भी कि मुझे हल्के रंग पसन्द हैं. मन में एक हुक सी उठती है, 'क्या यह वही कमल हैं, जो शादी से पहले कहा करते थे, "यार, कपड़ों के चुनाव में तो तुम्हारा जवाब नहीं मानसी." पर अब? समझ में नहीं आता, ज़िन्दगी की गति एकसार चलते-चलते कहां उलट-पुलट गई? ख़ुशियां समेटते हुए कहां चूक हो गई, जो हमारे बीच रीतेपन की दरार उभर आई? एक छत के नीचे अब हम दुनिया की निगाहों में पति-पत्नी का धर्म ज़रूर निबाह रहे हैं, पर जज़्बातों की गरमी, संबंधों की महक तो हमारे बीच कब की दम तोड़ चुकी है. रह गया है बस एक पथरीलापन, जिसको टटोलते भी उंगलियां ज़ख़्मी हो जाती हैं. अनमने मन से मैंने सामने रखी पीली साड़ी खींच ली.
तैयार हो कर बाहर निकली तो कमल अपने सूट पर इत्र छिड़क रहे थे. मुझे देखते ही बोल उठे, "लो, तुम भी लगा लो."
"नहीं." ईवनिंग इन पैरिस की तेज़ महक मेरे नथुनों में घुस गयी. मन फिर कसैला हो उठा. कमल को मालूम है मुझे कृत्रिमता पसंद नहीं, फिर...
नौकर से बच्चों को खाना खिला कर सुला देने को कह मैं कमल के साथ कार में बैठ गई.
"हैलो मिसेज माथुर, आज तो पीली साड़ी में पूरी बसंती बहार नज़र आ रही है." पार्टी में पहुंचते ही वहां उपस्थित लोगों ने हमें घेर लिया.
"कहिए मिसेज़ माथुर, अच्छी तो हैं?" सामने शर्मा, जो अपनी नुकीली दृष्टि मेरे जिस्म के हर कटाव पर चुभो रहे थे.
"बस, सब आपकी कृपा है." भीतर से उबकाई महसूस करते हुए भी होंठों पर मैंने बेहतरीन मुस्कान का मुखौटा चढ़ा लिया.
"मिसेज़ माथुर, यू आर स्मार्ट एन्ड प्रीटीएस्ट लेडी ऑफ द पार्टी." तेवरों में भावुकता का जाम चढ़ाते हुए उस शर्मा के बच्चे ने मेरा हाथ पकड़ लिया.
"थैंक्स फॉर द कॉम्पलीमेन्ट."
हंसकर धीमे से मैंने अपना हाथ छुड़ा लिया. मन तो किया, यही हाथ उसके गाल पर रसीद कर दूं... रिटायर होने के क़रीब बैठा है और... इंडियट...
"इनसे मिलिए, मिस्टर सागर वर्मा, 'सागर इन्टरप्राइजेस' के मालिक और यह हैं मिसेज एन्ड मिस्टर कमल माथुर, हमारी पार्टी की जान." परिचय कराते-कराते बॉस हो-हो... कर हंस पड़े तो चौंकने के साथ ही उसकी हंसी मेरे कानों में गर्म शीशे सी पिघल उठी. लगा जैसे सबके सम्मुख बॉस ने मुझे निर्वस्त्र कर दिया हो. सागर भी मुझे वहां देख कर अचकचा गया. कमल से हाथ मिला कर वह बुदबुदाचा, "ग्लैड टू मीट यू." और फिर तेज़ी से "एक्सक्यूज मी" कहता हुआ भीड़ में खो गया.
मैं भी सबकी नज़रें बचा भीड़ से निकल बाहर एकान्त में आ गई. भीतर की पार्टी की गहमागहमी से दूर मन एकान्त पाते ही सागर में डूब गया. पता नही भीड़ में कहां खो गया था. सागर के साथ हुई पहली भेंट ज़ेहन पर छाने लगी.
उस दिन टैक्सी हड़ताल के कारण बसों में इतनी भीड़ थी कि तीन बस मेरे सामने से गुज़र गई और मैं वहीं की वहीं खड़ी रह गई. झल्लाहट में
भरी मैं कुछ समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूं. हड़ताल का पहले से मालूम होता तो कमल के साथ ही चली जाती. अचानक एक स्वर सुन कर चौंक उठी, "इस तरह तो आप शाम तक यहीं खड़ी रहेंगी. अगर आप इजाज़त दें तो मैं आपको छोड़ दूं." मेरे सामने फिएट कार का अगला दरवाज़ा खोलते हुए वह बोला.
क़ीमती पहनावे और सूरत-शक्ल से वह कोई संभ्रांत व्यक्ति लग रहा था. उम्र चालीस के आसपास होगी, पर अधरों पर खेलती बाल सुलभ मुस्कान उसकी शराफ़त का परिचय दे रही थी, पर फिर भी किसी अजनबी के साथ यूं जाना...
"मैं चली जाऊंगी." मैंने स्वर जान-बूझकर तान लिया, पर उसकी परवाह किए बिना उस अजनबी ने सहज स्वर में मुस्कुरा कर फिर कहा, "मैं आप पर कोई एहसान नहीं कर रहा, पर... दरअसल मुझे भी उधर ही जाना है, हिन्द नगर, आपके बैंक के आगे."
मेरी हिचकिचाहट देख वह फिर बोला, "यदि आप यहीं खड़ी रहीं तो शाम तक तो शायद बैंक पहुंच नहीं सकीं, वैसे आपकी इच्छा."
अचानक मेरे मस्तिष्क में उस दिन बैंक में होने वाली एक अति आवश्यक मीटिंग घूम गई और कदम यंत्रचालित से कार की ओर उठ गए, "मैं सागर हूं, सागर वर्मा, आपके बैंक में मेरा एकाउन्ट है." एक्सीलेटर पर पांव दबाते हुए उसने कहा था.
और फिर संयोग से जब भी मैं टैक्सी की प्रतीक्षा में होती, सागर वहां मिल जाता.
पार्टी रात दो बजे तक चली पर सागर कहीं नज़र नहीं आया. शायद वह मेरे सामने नहीं आना चाहता था. सोचा था, सागर से बहुत कुछ पूछेंगी, पर उसके बाद कई दिन गुज़र गए, उससे मुलाक़ात ही नहीं हुई.
उस दिन बैंक से लौटते समय मैंने टैक्सी बाजार में ही रुकवा दी थी. कुछ छुटपुट चीज़ें ख़रीदनी थी. मन न जाने क्यों सुबह ही बेहद उद्विग्न और बेचैन सा था. अचानक पीछे से एक नारी स्वर में अपना नाम सुन मैंने चौंक कर पीछे देखा, एक आकर्षक सी युवती मुस्कुराती हुई मेरी और बढ़ रही थी.
"सुनिए... तुम... मेरा मतलब है आप... का नाम मानसी तो नहीं?" किसी भूले परिचय का भाव उसके चेहरे पर प्रश्नचिह्न टंगा था. अचानक बचपन की पर्तों के साथ दबी कोई स्मृति मुंह निकाल कर झांक उठी, "ओह... तुम? श्यामली?" उम्र की बीस सीढ़ियां लांघ हम फिर पीछे पहुंच बचपन की तरह भरे बाज़ार में ही एक-दूसरे से लिपट गए, "शुक्र है, तूने पहचान तो लिया. इस शहर में कब आई?" उसके स्वर में उलाहना था, "मैं तो यहां दस वर्ष से हूं, बर्कले स्क्वायर वाली यूको बैंक में मैनेजर हूं."
"हद है और अब तक हमारी मुलाक़ात नहीं हुई. मैं भी तो विवाह के बाद से यही हूं." उसकी बड़ी-बड़ी आंखें हैरत में चौड़ी हो गईं.
"चल, वह सामने मेरा घर है. इतने बरसों बाद मिली हो तो यूं छोड़ने वाली नहीं मैं." श्यामली ने मेरा हाथ पकड़ लिया.
"तो मैं ही कौन सा छोड़ने वाली हूं." दिनभर के अनजाने अवसाद से खिन्न मन को जैसे शीतल फुहार का स्पर्श मिल गया.
श्यामली मेरे बचपन की हमजोली थी. जेठ के महीने की तपती दोपहर में कच्ची अमिया बीनने से लेकर यौवन की पहली सीढी तक के खट्टे-मीठे अनुभव हमने एस साथ ही जिए थे. हमारा कोई भी राज़ एकतरफ़ा नहीं था.
इतने दिनों से समस्याओं के अंधड़ में भटकते मन को जैसे श्यामली में कोई आशा का दीप दिख गया. सोचा था, मन का गुबार उस पर उड़ेल दूंगी. शायद वही कोई रास्ता सुझा सके.
घर पहुंच कर श्यामली मेरे लिए चाय लेने गई तो मेरी खाली दृष्टि उसके भरे-पूरे घर के निरीक्षण में जुट गई. कलात्मक हाथों की सुघड़ता कमरे की हरेक व्यवस्था में बिखरी थी. सामने दीवार पर टंगी आदमकद पेन्टिंग तो लगता था जैसे बस अभी सजीव हो उठेगी.
चाय की गर्म-गर्म चुस्कियों के बीच न जाने कब हम वर्तमान की सीढ़ियां उतर बचपन की उस पगडंडी पर पहुंच गए, जिसको हमने एक साथ तय किया था, पर अजीब बात थी कि यथार्थ में लौटने से हम दोनों ही कतरा रहे थे.
श्यामली का उत्साह और प्रसन्नता तो जैसे छलक पड़ रही थी, पर उस लबरेज़ ख़ुशी को देखकर न जाने क्यों मेरे भीतर कोई शीशा चटकने लगा. आख़िरकार पहल मैं ही कर बैठी.
"एक बात बता श्यामली, तू ख़ुश तो है न?" मैं यकायक पूछ बैठी. पर अगले ही क्षण अपनी बात पर स्वयं ही खीझ उठी. 'भला क्या सोचेगी वह?'
"मैं?" श्यामलो रंगे हाथों पकड़े चोर सी घबरा उठी. फिर चिहुंक कर बोली, "मैं तो बहुत प्रसन्न हूं."
एक पल को मेरी दृष्टि में, बीस बरस पार कर फ्रॉक में सजी वह भोली भाली लड़की नाच उठी, जो जब भी स्कूल में टीचर की डांट खा कर आती या किसी सहेली से लड़ाई हो जाने के कारण दुखी होती तो रोज़ की अपेक्षा कुछ अधिक ही हंसने का प्रयत्न करती. बात-बेबात पर कहकहे लगाती, पर मुझसे तब उसके भीतर की पनपती पीड़ा छुपी न रह पाती और जब एकान्त में मैं उसके दुख का आंचल खींचती, तो वह मेरे कंधे पर फूट-फूट कर बिखर जाती.
"श्यामली, क्या मैं अब इतनी पराई हो गई हूं?" अपना ही भर्राया कंठ मुझे चौंका गया..
"मानसी..." एक ही पल में उसकी तेज़ निगाहों ने मेरी पुतलियों में लिखी सारी इबारतें पढ़ लीं और अगले ही क्षण वह तीस वर्षीय प्रौढा़ दस वर्षीय किशोरी बन गई. आवरण उतर गया. मेरे कंधे पर टिका उसका सिर मेरा आंचल भिगोने लगा. आंसुओं में डूबा उसका स्वर वायलिन पर बजती किसी दुख भरी धुन सा मेरे कानों में उतरने लगा,
"पता नहीं मानसी, ज़िंदगी ठीक डगर पर चलते-चलते कब, कहां और कैसे अपना अर्थ खो बैठी? भीतर महकते गर्म सम्बन्धों के एहसास न जाने कब बाहर की आंधियों के झोंके के साथ उड़ गए और छोड़ गए कभी न भरने वाला एक रीतापन, जहां केवल अनुत्तरित प्रश्नों की खाइयां हैं और हैं निराशाओं की बढ़ती धुंध."
"पर... यह सब कैसे हो गया?" कमरे की सुव्यवस्था पर उड़ती दृष्टि उसके ख़ूबसूरत चेहरे पर टिक गई. गोरा रंग, तीखे नाक-नक्श, लम्बा कद, छरहरी देह. ऊपर से इतना सौम्य स्वभाव, "कहीं कुछ भी तो कमी नहीं." मेरे होंठ बुदबुदाए.
"बस मानसी, कभी-कभी सब कुछ होते हुए भी ज़िन्दगी में बहुत बड़ी अपूर्णता का एहसास खटकने लगता है, पर कारण कुछ भी समझ में नहीं आता,"
बचपन से ही उसको अपनी बात पहेलियों में लपेटने की आदत थी और पहले की भांति आज भी मैं उसकी इस प्रवृति पर खीझ उठी, "तू साफ़-साफ़ बता न!"
"सुना है, कोई नौकरी करने वाली महिला है." सत्य को उसने इस निर्ममता से नंगा किया कि मैं थर्रा उठी,
"क्या?" दिनभर की खिन्नता व थकान मन के ऊपरी सतह पर तैर गई. जिस कंधे पर मैं सिर रखने आई थी, वह तो ख़ुद ही ज़ख़्मी है. क्या हर नारी की यही नियति है?
सामने दीवार घड़ी ने सात के घंटे बजाए तो मैं उठ खड़ी हुई, "आज चलती हूं श्यामली, फिर किसी दिन आऊंगी." उसके दर्द का विश्लेषण करने का अब मुझमें और साहस नहीं था.
"थोड़ी देर ठहर न, सागर भी आते ही होंगे. तुझसे मिल कर बहुत ख़ुश होंगे." श्यामली ने अनुरोध किया.
"सागर?" शंका की नागफनी का कांटा मेरे ज़ेहन में धंसने लगा.
"हां, मेरे पति परमेश्वर." वह सहजता से मुस्कुराई.
"क्या करते हैं तेरे पति?" भीतर उमड़ते संदेह के बादलों को मैंने उड़ाने का प्रयत्न किया.
"उनका अपना व्यापार है 'सागर इन्टरप्राइजेस."
हज़ारों डंक मेरे वजूद में चुभ गए. उफ़, अनजाने में मैं यह क्या कर बैठी? अपने आंसू पोंछने के प्रयत्न में मैं अपनी सखी का ही दामन भिगो बैठी थी. अपने दिल के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते-लगाते मैं अपने तेज नाख़ूनों से उसी के दिल पर खरोंचें मार रही थी.
"तू चिन्ता मत कर श्यामली. सब कुछ ठीक हो जाएगा." कांपते अधरों से निकला.
अप्रासंगिक वाक्य सुन एक पल को वह भी हतप्रभ सी रह गई, पर उसने उसका दूसरा ही अर्थ लगाया, "मैं जानती हूं मानसी, मेरी स्थिति जान कर तेरा दिल दुखी हो गया है. बचपन में भी तो तू मेरी परेशानी देख ऐसे ही परेशान हो जाया करती थी, पर तू चिंता मत कर... बस मैं एक बार उस महिला से मिलकर देखना चाहती हूं कि आख़िर उसमें ऐसी कौन सी ख़ूबी है, जिसने सागर जैसे स्नेही पति को मुझसे बांट लिया? या फिर यह केवल मर्द की फ़ितरत है, जो सब कुछ होते हुए भी 'परिवर्तन' की आकांक्षा रखता है?"
"तुझे उस 'छिछोरी' स्त्री से मिलने की कोई आवश्यकता नहीं. तेरे पति धर्म की आंच के सामने वह स्वयं नहीं ठहर पाएगी." मेरा स्वर अनावश्यक रूप से इतना तीखा हो उठा कि एक बार श्यामली भी चौंक उठी. फिर मुस्कुरा कर बोल उठी, "याद है न मानसी, जब बचपन में मेरी किसी से लड़ाई हो जाती तो तू अगले पक्ष पर ऐसे ही क्रोधित हो उठती थी और तब तेरा वह रूप मुझे बहुत अच्छा लगता. आज भी तेरी वही मुद्रा देख मेरा मन बहुत हल्का हो गया है. सच में तू बिल्कुल नहीं बदली मानसी." श्यामली का स्वर बेहद भावुक हो उठा, पर मेरे भीतर तो ग्लानि की ज्वाला दहक रही थी. कहीं श्यामली ने मेरे भीतर का वह घिनौना कोना देख लिया तो..?
"अच्छा, अब चलूंगी." कह कर मैं तेज़ कदमों से बाहर निकल आई. कहीं सागर से सामना न हो जाए, उसके सम्मुख भी क्या मैं यूं ही सहजता का मुखौटा ओढ़ पाऊंगी?
"फिर आना ज़रूर." दरवाज़े तक छोड़ने आई श्यामली ने मुझसे वादा लिया.
"हो, ज़रूर आऊंगी." मैंने कह तो दिया, पर मैं जानती थी, अब कभी उस देहरी को छूने का भी मैं साहस नहीं कर पाऊंगी.
घर लौटी तो कमल बहुत दिनों बाद आज चाय पर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे.
रातभर मैं सोचों की सेज पर करवटें बदलती रही, पर सुबह तक बादल छंट चुके थे. भटके सागर को उसके द्वार वापस पहुंचा मेरे मन में अब तक का जमा सारा गुब्बार पानी-पानी बन बह गया. मन खुले गगन में उड़ते मुक्त पंछी सा प्रसन्न हो उठा. अब तक सपनों की जिस मरीचिका में भटक रही थी, पराई संवेदनाओं के जिस सेतु पर मैं अपने महल बना रही थी, वहां से मुक्त हो मुझे तनिक भी पश्चाताप नहीं हुआ. मन आज नई करवटें ले रहा था. मैंने निर्णय ले लिया अपनी ज़िन्दगी के उस रिक्त खाने को भरने का, जिसमें सागर अनाधिकार ही प्रवेश कर गया था. पराया सम्बल भी क्या किसी का आधार बन सकता है? मैं अपनी नादानी में कभी कमल तो कभी सागर में अपनी बैसाखी तलाश रही थी, पर अब मुझे ऐसा महल बनाना था, जिसकी नींव और दीवार सब कुछ मैं ही होऊं.

बहुत दिनों से काग़ज़-कलम आलमारी में बंद पड़े थे. आज निकाल लिया.
कलम चलने लगी, रीतापन पेन में भरी स्याही की तरह मेरे भीतर से निकल काग़ज़ पर बिखर गया. कलम से निकलते हर शब्द के साथ टुकड़ा टुकड़ा हुआ मेरा अस्तित्व जुड़ता जा रहा था. खाना चौड़ा होकर भरता जा रहा था. उस खाने में मैं कमल की पत्नी नहीं, सागर की मित्र नहीं, बच्चों की मां भी नहीं थी, मैं केवल मैं थी, मानसी एक भरापूरा समूचा अस्तित्व.
- मन्जू सक्सेना
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