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कहानी- घुटन के बीच (Short Story- Ghutan Ke Bich)

ये जब भी दिखते, अपनी मौज में ही डूबे मिलते. मैं आहत हो जाती, फिर सोचती, चलो ख़ुश तो हैं. इन्हें पराजित करने की भावना मेरे अंदर कभी नहीं उठी और न कभी मैंने प्रतिकार लेना चाहा.

सहने की आदत पता नहीं कैसे लग गई कि मौसम के बेरुखेपन का एहसास भी नहीं होता. चाहे गर्मी की चिलचिलाती धूप हो या सर्दी की बर्फीली हवाएं या बरसात की मूसलाधार वर्षा... सब आसान लगता है. काली भयावनी रातें भी अब नहीं चुभतीं, तपते बोझिल दिन अब नहीं टीसते.

एक लंबा समय गुज़र गया इनसे बतियाते, जूझते... कुछ पहचान-सी हो गई है.

ये लंबे दरख़्त अब भी वैसे के वैसे हैं. सागर की रेत भी वही है. लहरें वैसे ही उफनती हैं. मैं ही बदली हूं, पहले सा एहसास कहां? ख़ामोश निगाहों में कुछ टिकता भी तो नहीं.

यह मेरे साथ ही होना था... नहीं पता था.. जिसे अपना देवता समझा, सर्वस्व माना, पूजा, उसी ने रद्दी काग़ज़ सा फेंक दिया. तुम मेरे इस रूप की तारीफ़ करते थे ना... कि ये आंखें जिस पर टिकेगी, वह विचलित हो जाएगा. ये गेसू जिस पर उड़ेंगे, वह विभोर हो जाएगा, ये अधर जिसे छू लेंगे, वह तड़प ही उठेगा, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ.

मेरा आंचल इन्हें देहाती दिखा अविनाश... मेरे गेसू इन्हें ज़रूरत से ज़्यादा लंबे लगे. अधर कांतिविहीन दिखे. ज़रूरत पर ही मेरे क़रीब रहे. बदन को गठरी सा उठाने पटकने में ही इन्हें सुख मिला. अंदर का मर्म इन्होंने नहीं समझा.

वासना की निगाहों से ही मुझे तौला. चूड़ियों की खनखनाहट इनके प्रेम में बाधक थी, इसीलिए कलाइयां सूनी कर ली थीं, जो अभी तक सूनी हैं, भर नहीं पाईं. माथे की बिन्दी, पैरों की पायल भी इन्हें पसंद नहीं थीं, उसे भी त्याग दिया था.

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तुम तो पायल की रुनझुन पर गीत लिख देते थे और बार-बार छेड़ने को कहा करते थे, इन्हें इसमें ऐसा कुछ नहीं लगा.

साड़ी इन्हें पसंद नहीं थी. विदेशी, भड़कीली पोशाक ये पसंद करते थे. तुमने तो कई बार मेरा झूलता आंचल खींच सिर तक कर दिया था. तुम्हें कैसी अनुभूति हुई थी... तुम घण्टों मुझे देखते ही रहे थे, पर इस रूप में जब भी मैं इनके पास गई तो ये भड़क ही उठे. मेरी लज्जा, शर्म को इन्होंने निरर्थक समझा.

मैं वैसा कुछ नहीं कर पाई, जैसा ये चाहते थे. खुले, भड़कीले कपड़ों में मेरी कंपकंपी छूट जाती थी. हाई हील की सैंडिलों में मुझसे चला नहीं जाता. ये मुझे अपने दोस्तों की मण्डली में बैठने को कहते, बियर पीने की ज़बर्दस्ती करते. मैं इनका साथ नहीं दे पाती... ये मुझ पर बरस पड़ते. जलसों, पार्टियों में मेरा झिझकना, शर्माना, कतराना इनसे सहन नहीं होता. घर आकर ये अपना ग़ुस्सा मुझ पर उतारते, गालियों से घर भर देते.

ये मुझसे कैसी उम्मीद बांधे थे? मुझे घर ब्याह कर लाए थे कि मेरी नुमाइश बनाने? जो इन्हें पसंद था, वह मुझे नहीं और जो मुझे पसंद था, वह इन्हें नहीं. मैंने क्या नहीं किया? घंटों इनकी प्रतीक्षा की. जब तक ये ऑफिस से नहीं लौटे, एक कौर नहीं निगला. कर्तव्य परायणता में ही लगी रही. ज़रा सी आहट पर दरवाज़े पर दौड़ पड़ती. गेट खुला ही रखती कि जब ये आएं तो इन्हें स्कूटर बाहर न रोकना पड़े. लेकिन जब अंधेरा गहरा जाता, सड़क सूनी हो जाती तो गेट बंद कर बिस्तर पर लेटी रहती.

रात देर से आते ही ये बिस्तर पर ऐसे लुढ़कते कि इन्हें जूते खोलने का भी होश नहीं रहता. मैं ही इनके जूते खोलती. मुझे अपनी बेबसी पर रोना आता कि मेरे रूप का तिलिस्म, मेरे रिश्ते का अधिपत्य इन पर क्यों नहीं चला?

ये उचटे-उचटे क्यों रहते हैं? आंख उठाकर बात क्यों नहीं करते? मुझे अपने आपसे प्लानि होती कि मुझमें ऐसा क्या अवगुण है कि जिसकी दुर्गन्ध इनके नथुनों पर बैठी है? कुछ कमी अवश्य है मुझमें, तभी तो ये मुझसे इतनी दूरी रखते हैं.

कोई दंपति जब मेरी नज़रों के सामने से गुज़रता तो मेरे अंदर एक टीस सी उठती. ये लोग कितने ख़ुश हैं, रोज़ ही घूमने निकलते हैं. एक हम ही.... अंधेरे में हैं. इन्हें फ़ुर्सत ही नहीं है.

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मुझसे इतना साहस नहीं होता कि मैं अपने तृप्त होंठ इनके चेहरे पर रख देती. इनका सीना भींच लेती. ये एहसास तो करते कि मेरे अंदर भी एक धड़कता दिल है, जिसकी कुछ उम्मीदें है, आवश्यकताएं हैं.

कभी इन्होंने मुझे आत्मिक प्रेम से नहीं देखा. काश, ये एक बार कोशिश करते तो इन्हें वह अवश्य मिलता, जिसे ये इधर-उधर तलाशते थे.

बाहरी चमक-दमक के ये इतने दीवाने थे कि अपनी पहचान ही खो बैठे, शराब-जुए को ही जीवन समझ बैठे. फिर भी मैं कभी इनके आड़े नहीं आई. इनकी स्वतंत्रता में मैंने कोई दख़ल नहीं दिया. अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर इन्हें समर्पित रही कि कभी तो ये सुध लेंगे. ये अपने मन की करते रहे. बात-बात पर चिल्लाते रहे, बरसते रहे. मैं छलछलाती आंखों से सब सहती रही. अपने को ही कमज़ोर समझती रही. इनकी पहुंच भी तो दूर-दूर थी. बड़े-बड़े लोग इनसे मिलने आते थे. मेरी हैसियत भी क्या थी?

एक दिन इन्होंने अपना बिस्तर भी दूर कर लिया. अपनी मनपसंद युवती को घर ले आए और रासलीला में मग्न हो गए. मुझ पर वज्रपात हुआ, पति सेवा की भावना सिसक कर रह गई, फिर भी मैं चुप रही. मैंने कुछ नहीं कहा. अगर कहती भी तो ये कहां सुनने वाले थे, मुझे धक्का मार कर घर के बाहर कर देते. ग़ुस्सा तो इनकी नाक पर ही रहता था.

जब इन्होंने मुझसे बात करना भी छोड़ दिया और मेरी इन्हें कुछ फ़िकर भी नहीं हुई तो मैंने अपनी ज़िंदगी की एक अलग रेखा खींच ली. बीमा कार्यालय में नौकरी कर ली. अर्थ का संकट टला. रोज़मर्रा की आवश्यकताएं पूरी होने लगीं. किसी के आगे मुझे हाथ नहीं फैलाना पड़ा.

ये जब भी दिखते, अपनी मौज में ही डूबे मिलते. मैं आहत हो जाती, फिर सोचती, चलो ख़ुश तो हैं. इन्हें पराजित करने की भावना मेरे अंदर कभी नहीं उठी और न कभी मैंने प्रतिकार लेना चाहा. संबंध एक तरह से विच्छेद हो चुके थे. इनके कहकहे रात-रात भर गूंजते रहते. मेरा ध्यान उस तरफ़ भी नहीं गया. ये अपने में मस्त थे. मैं अपनी घुटी ज़िंदगी में व्यस्त हो चली थी.

मेरे अंदर कभी दूसरे जीवनसाथी का ख़्याल नहीं उठा और न मैंने इस बारे में सोचा. नौकरी की व्यस्तता में मैं इस तरह बह गई कि कोमल अनुभूतियों को अंकुरित होने का अवसर ही नहीं मिला. मैंने इस बारे में जितना भी सोचा, उतना ही दर्द मिला. एक तरह से इनको बिसार ही दिया.

तो मैं कह रही थी, जब मेरे संबंध इनसे पूर्णतः टूट चुके, तब ये एक दिन थके-मांदे-से निराश मेरे पास आए. मैं देखती रह गई कि इन्हें इतने वर्षों बाद मेरा ख़्याल कैसे आया?

इनकी नज़रें नीचे झुकी थीं. ये मुझसे नज़र भी नहीं मिला पा रहे थे. आहत स्वर में बोले, "मैं बर्बाद हो गया वंदना... मुझे बचा लो."

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मैं अवाक् रह गई, ऐसा क्या हुआ? कल तक तो बड़े ख़ुश थे. ज़रूर वह इन्हें छोड़कर भाग गई. नशा उतर गया तो चले आए. जैसे एकमात्र दवा मैं ही हूं... यह सोचकर मेरा मन कड़वा हो आया. मैंने झट-से कहा, "आपको मेरा ख़्याल कैसे आया? कौन हूं आपकी..? वो नाराज़ न होगी...?"

"उसका नाम मत लो. वो कमीनी..." मैं स्तंभित रह गई, मेरा अनुमान सही निकला. आख़िर वह इन्हें चूना लगा ही गई. मैं तो उसे पहले दिन ही समझ गई थी कि वह अधिक दिन नहीं टिकने वाली, उसके हाव-भाव ही ऐसे थे. लज्जा तो उसे छू नहीं गई थी. मर्दों से बेबाक़ बात करती, इठलाती झूमती. इन्हें भी तो यह पसंद था. आज मेरी ज़रूरत कैसे आ पड़ी? ये देहाती गंवार चेहरा कैसे भाया? जिस हृदय को इन्होंने धड़कता नहीं समझा, जिस यौवन का उन्माद नहीं जाना, आज इन्हें कैसे ख़्याल आया? मैंने कहा, "मैं क्या कर सकती हूं?"

ये ज़ोर-ज़ोर से सिसक पड़े और सिसकियों के बीच बोले, "वंदना, मुझे माफ़ कर दो. मैंने तुम्हें बहुत दुख दिए, बहुत तड़‌पाया. उसका प्रायश्चित मुझे कर लेने दो."

इनके आंसू मुझे बेध गए. कहना तो बहुत कुछ था, लेकिन कुछ न कह पाई. गहरा निःश्वास लेकर रह गई.

मुझे ख़ामोश देखकर ये गिड़‌गिड़ा उठे, "कुछ तो कहो वंदना, बोलो तुम बोलती क्यों नहीं? मुझे गालियां दे दो... कुछ तो बोलो." मेरे होंठ से एक शब्द भी नहीं निकला. मैं तुरंत बाहर निकल आई.

ये सिर पकड़ कर नीचे बैठ गए. मैं तत्काल निर्णय नहीं कर पाई कि मुझे क्या करना चाहिए, पल में दस वर्षों की घुटन कैसे भुला देती? कैसे इनका भरोसा करती कि ये सच ही कह रहे हैं?

ये अब घर के बाहर नहीं निकलते. न अब इनके यहां शोरगुल होता है, न पार्टियां चलती हैं. मौत की सी ख़ामोशी छाई रहती है. कभी-कभी सिसकियों की आवाज़ें भी मेरे कानों में पड़ती है.

मन होता है कि जाकर इनका हाथ थाम लू, आंसुओं से तर चेहरा आंचल में छुपा लूं, लेकिन अतीत मेरे सामने पसर जाता है. घुटन के बीच कुछ एहसास भी तो नहीं होता.

- योगेश दीक्षित

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