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कहानी- प्यार का दर्द (Short Story- Pyar Ka Dard)

"मां ग़लत न समझो पर ये शिबू का ही बेटा है. कुछ क्रिश्चियन जैसा है क्या? वही दो आंखें, एक नाक, दो कान." हाथों में जैसे कुछ झनझना गया. 'शिबू का बेटा!' और फिर जैसे गले में कुछ अटक गया. उसे कसकर छाती से लगा लिया उन्होंने.

काली पड़ी छत पर लंबे-लंबे धुआएं जाले लटक रहे थे. चूना उखड़ी दीवारों से ईंटों ने झांकना प्रारम्भ कर दिया था. न जाने कितने साल पुराना पीला पड़ा शिवजी के चित्र वाला कैलेंडर टंगा था. कभी इन दीवारों पर बारह सिंगे के सींग, पीतल की कामदार तश्तरियां, सुनहरे फ्रेम जड़ी तस्वीरें टंगी रहती थीं. कमरे में दोनों कोनों पर पत्थर निकला था. उन पर कभी बड़े-बड़े पीतल के फूलदान रखे रहते थे. पता नहीं वे फूलदान आहार बन वृद्ध दंपति के पेटों में उतर गए. वहां अब एक पर मात्र एक मोमबत्ती और दियासलाई रखी थी और दूसरे पर कुछ शीशियां. एक कोने पर जहां आदमकद संगमरमर की मूर्ति हुआ करती थीं, वहां आज खटिया पड़ी थी. उस पर लेटे-लेटे वृद्धावस्था को झेल रहे थे शारदा प्रसाद,

कभी शहर की नाक समझे जाने वाले शारदा प्रसाद को मात्र जीविका चलाना भी मुश्किल लग रहा था. व्यापार बंद हुआ तो पैसों को भी पंख लग गए. छह-सात साल भी तो बैठकर नहीं खा पाए. बीस-पच्चीस साल का दबा दबाकर रखा जोड़ा धन न जाने कहां चला गया. बिट्टो की शादी में तिजोरी खाली हुई और शिबू की पढ़ाई और दोनों समय के भोजन में सारा वैभव ख़त्म हो गया. रह गई चुना झड़ती दीवारें. यदि इन्हें बेच दिया जाए तो, संभव है कुछ दिन पेट और साथ दे दे, लेकिन रहने का ठिकाना भी तो ख़त्म हो जाएगा.

"शिबू की मां..." एकाएक शारदा प्रसाद ने करवट बदली और पास बैठी माला जप रही पत्नी से बोले, "शिबू तो बुरा कभी नहीं था, पर बहू ही कुलच्छनी है. आख़िर है तो क्रिश्चियन ही न."

शिबू की मां ने नज़र उठाकर पति की ओर देखा अवश्य, लेकिन यंत्रवत उंगलियां चलाती रहीं और मुंह 'राम-राम' कहता रहा.

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"ज़रा नहीं सोचा, एक बार माफ़ी भी नहीं मांगी, दमक कर चल दिया."

"इसमें उसका क्या कसूर, निकाला तो हमीं ने था, हमने कब सोचा था कि कहां रहेगा कैसे रहेगा?" शिबू की मां धीरे से बोली.

'हां, बड़े मज़े में चला आया. टहल-घूम कर कोई आए, कहे खेत से मूली तोड़ लाया हूं ऐसे ही क्रिश्चियन बहू लाकर खड़ी कर दी. अब उसे घर में रख कर कौन बिरादरी में मुंह दिखाने लायक रह जाएगा?" उत्तेजना से शारदा प्रसाद उठकर बैठ गए.

"तो अभी कौन मुंह दिखाने लायक हैं. इन फटे चिथड़ों से घर की चौखट तक पर तो बैठ नहीं पाते."

"तुम्हारा मतलब क्या है? उस समय कौन तुम राजी थी, बहू को लाने के लिए?" शारदा प्रसाद क्रोधित हो उठे. क्या केवल वे ही दोषी थे? उस समय शिबू की मां ने ही उनके क्रोध को भड़काया था, अब अपने ऊपर सारा दोषारोपण पा भड़क गए.

"राज़ी तो नहीं थी, पर मैंने घर से निकालने को भी तो नहीं कहा था. बहू के हाथ का छुआ पानी नहीं पीऊंगी ये कहा था. अलग चौका कर लेती." "तो तुमसे अब किसने मना किया है, चली जाओ न! कहा तो है ही उसने हमारे ऊपर कितना एहसान करेगा, जो हमें संग रखेगा."

खिसिया कर अपना पुराना अस्त्र दे मारा उन्होंने. जानते थे कि शिबू की मां उन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाएगी.

"चाय बनाऊं?" कहती हुई शिबू की मां उठ गईं. शिबू की मां इस विवाद में नहीं पड़ना चाहती थीं. स्टोव जलाते उनकी आंखें भी भक्-भक् करती बरस पड़ीं.

"हे, भगवान, ऐसी जिन्दगी से तो उठा ले..."

पता नहीं, जितनी भगवान से मरने की कामना करती है, उतनी ज़िन्दगी लंबी होती जा रही है. बहुत मान है बेटे पर दस-दस बेटों की मां भी अकेली रहती हैं, पर मेरा लाखों में एक है.

यही मान अभिशाप बन गया जैसे. वैसे तो हीरा लड़का है अभी भी कितनी बार बिट्टो के हाथ कहलवाया है पर उनका स्वाभिमान आड़े आ जाता है.

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सदा बिट्टो से यही कहा है, "अम्मा जैसा कहेंगी सुप्रिया वैसा ही करेगी, नहा-धोकर ही चौका छुएगी, लेकिन रहेगी तभी जब उसे बहू मानेंगी. हाड़चाम के साथ क्या जात-बिरादरी. फ़र्क़ तो धर्म है, खानदान है, जब वहीं वह हमारे जैसा करेगी तो फिर उसमें हममें क्या फ़र्क़ रह जाएगा.

चाय का पानी खौल उठा. पल्ले से ही उसे उतार लिया. कहता तो ठीक है, पर अब हार मानना भी तो बहुत बड़ा अपमान है.

पहले आलू छौंक दिए, फिर चाय पूरी बना, स्टोव धीमा कर, कड़ाही रख, चाय ले आईं. बार-बार स्टोव जलाने की झंझट से मुक्ति पाने के लिए ही, अधिकतर ऐसा ही करती थीं. चाय पीकर आलू देखें, फिर उनमें एक ग्लास पानी और डाल दिया. खाने में सुविधा रहती है. पानी-सा झोल ही अब जीवन में रह गया था.

कितने अरमान से शिबू को पाला-पोसा था, शिबू के बाद कोई संतान नहीं हुई थी. परंतु एक बेटी और एक बेटा, बहुत हैं. उन्हें कोई ग़म न था. गोलमटोल शिबू को देखकर ही जैसे उन्हें सारी दुनिया मिल गई. शिबू को बेहद लाड़-प्यार से पाला था. लेकिन क्या करें जब बेटा ही खोटा निकला, क्या-क्या सोचा था. अपनी मर्ज़ी से शादी की थी तो अपनी जात-बिरादरी में करता.

शादी के बाद शिबू की हिम्मत नहीं हुई थी कि वह तुरंत घर आ सके. बिट्टो ही सब ख़बर लाई थी. एक तो करेला वह भी नीम चढ़ा. एक तो अपनी मर्ज़ी से शादी की वह भी जात-बिरादरी में नहीं. जात भी ढूंढ़ी तो बिल्कुल ही दूसरी, क्रिश्चियन. कैसे गोरी फिट होती. उस समय तो बेटे से नाता तोड़ने के अलावा और कुछ सोच ही नहीं सके थे.

बिट्टो उन्हें कितना समझा कर गई थी, लेकिन जैसे ही शिबू को देखा ताव चढ़ आया और उसे देखते ही दरवाज़ा बंद कर लिया था.

शिबू की मां की आंखें भर आई थीं. वो बहू ही तो थी उनकी. दरवाज़े पर आए दुश्मन से भी पानी पूछ लेते हैं, पर पेट जाए एकलौते बेटे को... उनकी आंखों से झर-झर पानी बह उठा.

उसके बाद शिबू तो नहीं आया था. हां, आया था उसका मनीआर्डर.

"देख लिया." शारदा प्रसाद जी ने क्रोध से कांपती आवाज़ में कहा, "सपूत ने रुपए भिजवाए है. हम भिखमंगे है न. मार दिया उसी के मुंह पर वापस. अब तक तो यह सोचकर फ़िक्र नहीं की थी कि बेटा कमाने लायक हो ही गया है. नौकरी पर लग ही गया है. ज़िन्दगी होम हो गई उसकी पढ़ाई लिखाई, पर नौकरी देख लूंगा कोई, दो प्राणी हम ठाठ से रहेंगे. ज़िन्दगीभर सूरत नहीं देखूंगा इसकी."

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शिबू की मां सिकुड़ी-सिमटी साड़ी के पल्ले को उंगली पर गोल-गोल लपेटती खोलती रहीं. उनके हाथ कांपने लगे थे. किसी तरह अपने को काबू में कर अंदर जाकर बैठ गईं. कल की ही समस्या तो मुंह बाये खड़ी हैं, घर आई लक्ष्मी ठुकरा दी.

पुराने समय का मक़ान है. रोज़ की तो टूट-फूट होती रहती है. पिछवाड़े किराए पर उठे हिस्से के तीन सौ रुपए में से क्या-क्या हो जाएगा. भरे-पूरे कुटुम्ब में रोज़ लेना-देना रहता है. कल को बिट्टो के ही बाल-बच्चा होगा. अब तो कुछ भी नहीं है. कहां से कुछ करेंगी.

शारदा प्रसाद अंदर आए छड़ी उठाई और जूते पहन, "आता हूं." कहकर बाहर निकल गए.

शिबू की मां पति को तीन-चार दिन से नौकरी की तलाश में भटकते देख रही थी. एक लंबी सांस ले अलगनी पर कपड़े सुखाने लगी. जिसका बेटा हज़ारों रुपए कमा रहा हो, वह थोड़े से रुपयों के लिए दर-दर भटक रहा है.

इन बूढ़ी खड़खड़ाती हड्डियों से अब कहां नौकरी होगी और फिर नौकरी क्या जात-बिरादरी देख कर होगी. कितनी ही बार अंग्रेज़ कलक्टर के साथ बैठ स्वयं शारदा प्रसाद ने खाना खाया है, तब तो उसे बड़ी गौरव की बात समझते थे. तब क्या स्वयं उसने शारदा प्रसाद को छूना बंद कर दिया था?

एकाएक खटपट की आवाज़ से चौंक उठीं. दरवाजा खोला तो बिट्टो. ख़ुशी से बिट्टो का चेहरा चमक रहा था.

"मां देखो क्या लाई हूं."

बिट्टो की गोद में रूई के गोले सा बीस-पच्चीस दिन का बच्चा था.

"अरे... अरे... छोटा सा ही है." उन्होंने एकदम उसे गोद में ले लिया.

"कितना प्यारा है." गुलाबी फर के कंबल को उन्होंने और लपेट दिया.

"कहां से ले आई इसे."

कुछ देर बिट्टो मां को देखती रही फिर बोली, "मां प्यारा है न! पर लेने से पहले तुमने इसकी जात-बिरादरी नहीं पूछी."

"अरे बच्चे तो कुत्ते बिल्ली के भी प्यारे लगते हैं, फिर यह तो इन्सान का है. बच्चे की क्या जात-पात."

"यदि उसमें अपनापन लग जाए तब क्या होता है मां?"

"तब तो जिगर का टुकड़ा हो जाता है री. पर तू पहेलियां क्यों बुझा रही है." मां की आंखों में शक की तैरती परछाइयां देख बिट्टो बोली, "मां ग़लत न समझो पर यह शिबू का बेटा है, कुछ क्रिश्चियन जैसा है क्या? वही दो आंखें, एक नाक, दो कान."

हाथ में जैसे कुछ झनझना गया, "शिबू का बेटा..."

"और फिर जैसे गले में कुछ अटक गया. उसे कसकर छाती से लगा लिया उन्होंने.

शारदा प्रसाद लौटे तभी, हताश से बोले, "शिबू की मां, हिम्मत ही नहीं होती किसी से कहने की. बड़ा अजीब सा लगता है."

कहानी- प्यार का दर्द

कुछ देर वो जिगर के टुकड़े को प्यार करती रहीं फिर शारदा प्रसाद जी को पकड़ाते बोलीं, "कोई ज़रूरत नहीं है कहीं और नौकरी करने की. अब तो इसकी नौकरी करनी है. देखो तो बिल्कुल छोटा सा शिबू है न!"

शारदा प्रसाद कुछ देर हकबकाए से कभी बिट्टो तो कभी बच्चे को और कभी शिबू की मां को देखते रहे.

"अरे इतने छोटे बच्चे को क्यों ले आई है. पागल है क्या? अभी हवा वगैरह लग गई तो."

"मुझे नहीं मालूम. शिबू ने ही दिया था. कहा, "बाबू ने मुझे तो घर में पैर न रखने की क़सम दी है, इसे तो नहीं. यह लिवा लाएगा अम्मा-बाबा को. जा इसे ले जा कहना यह बुलाने आया है अपने दादी और बाबा को."

एक अरसे बाद शारदा प्रसाद हो-हो... करके हंस पड़े, "बड़ा शैतान है शिबू भी, जानता है न इसका बुलावा नहीं टाल पाएंगे."

शिबू की मां ने आंसू पोंछ लिए.

"देखा न तभी कहते हैं मूल से सूद प्यारा होता है. चल बिट्टो देख बहुत देर हो गई है. ले चल इसे इसकी मां के पास."

- डॉ. शशि गोयल

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