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कहानी- दूर का आईना (Short Story- Door Ka Aaina)

"आप!" मुझे देखकर वह हतप्रभ रह जाती है.‌ "जी हां!" मैं मुस्कुरा देता हूं, "इधर किसी शिकार की तलाश में आया हुआ था. सोचा आपके भी दर्शन करता चलूं." "ओ समझी!" वह खिलखिला कर हंस पड़ती है. वह आंखें नचाती है, "तो आप जासूसी भी किया करते हैं." "जी हां! ज़रूरत पड़ने पर."

चूड़ियों की खनक सदा से ही मेरी सबसे बड़ी कमज़ोरी रही है. आज भी पड़ोस में खनकती हुई चूड़ियां मेरे मनोभावों को छितरा रही हैं. ऐसे में मेरा मन काम से उखड़ने लगता है. लिखने की मेज़ से उठ कर मैं सोफे पर आ बैठता हूं. ऋचा बेटी के सिर पर कंघी फेरती हुई पत्नी मुझे देखने लगती है.

"काम में मन नहीं लग रहा है." मैं सिगरेट सुलगा लेता हूं.

"वो पटाखा शायद फिर से आ टपकी है." रीता के होंठों पर वही शरारती मुस्कान उभर आई.

"हां!" मैं होंठों से उगलते धुएं के वर्तुलाकार छल्ले बनाने लगता हूं.

मेरे पड़ोसी ओमी सारस्वत स्थानीय बैंक में अधिकारी हैं. वे आकर्षक व्यक्तित्व के धनी हैं. पली स्वर्णा के अतिरिक्त उनके दो फूल-से बच्चे हैं, बंटी और रवंदना. सालभर की जान-पहचान है. वैश्य बस्ती से वे पिछले ही महीने इस मोहल्ले में आए हैं. एक अच्छे पड़ोसी होने के नाते उनकी ओर मित्रता का हाथ बढ़ाते हुए मैंने उन्हें अपना परिचय दिया था, "मुझे आनंद कहते हैं, आपका सगा पड़ोसी हूं."

"आपसे मिल कर बड़ी प्रसन्नता हुई आनंद भाई." तपाक से उन्होंने मुझसे हाथ मिलाया था. अच्छे पड़ोसी भी भाग्य से ही मिला करते हैं.

"आइए..." मैंने उनसे अंदर आने का आग्रह किया था.

"इस समय तो नहीं, किसी और दिन आऊंगा." वे संकोच से भर आए थे.

"अजी साहब, आइए भी न!" मैंने उनका हाथ खींच लिया था. बैठक में लिवाकर मैंने उनसे बैठने

का अनुरोध किया था. मुस्कुरा कर वे सोफे पर बैठ गए थे. मैंने उन्हें अपनी पत्नी और बच्चों से भी परिचित करवाया था. रीता बैठक में चाय ले आई थी. चाय सिप कर उन्होंने पूछा था, आप किस जॉब में है?"

इस पर मैंने उन्हें बताया था कि मैं स्वतंत्र लेखन के बलबूते पर ही अपनी गृहस्थी के रथ को हांकता आ रहा हूं. वे प्रमुदित स्वर में बोले थे, "पेशे से भी आप लकी हैं. लेखक लोग ही सही मायने में समाज का मार्गदर्शन कर सकते हैं. शहरी जीवन भी एक प्रकार से भूल भुलैया ही है. यहां कोई किसी की परवाह नहीं करता. हर कोई अपने-अपने खोली में दुबके पड़े रहते हैं."

तब से हम लोग कभी-कभी ही एक-दूसरे को विश कर पाते. हां, हमारे घर से चल देने के बाद रीता और स्वर्णा अक्सर मिलते रहते हैं. रीता तो उस सुखी परिवार का गुणगान करती नहीं थकती थी.

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पिछले महीने एक हादसा हो गया था. पिता की मृत्यु पर स्वर्णा भाभी को बच्चों समेत मायके जाना पड़ा था. ओमी भाई स्वयं उन्हें आगरा छोड़ आए थे. उनके अकेलेपन पर पसीज कर मैंने उनसे कहा था, "ओमी भाई, आप भोजन यहीं कर लिया करें."

"धन्यवाद आनंद भाई!" वे सिर 'खुजलाने लगे थे.

"ऐसी कोई बात नहीं है. मैं बाहर ही खा लिया करूंगा."

मैंने भी उनसे और आग्रह नहीं किया था. बात आई-गई-सी हो गई थी. मैं पूर्ववत् 'संवाद' की दुनिया से जुड़ता चला गया. दिनभर शहर-बाज़ारों की खाक छानने के बाद रात को मैं स्थानीय समाचार-पत्र के लिए नियमित स्तंभ लिखा करता. रीता भी अपनी गृहस्थी में उलझती चली गई. कभी वह बच्चों के होम-वर्क में मदद करती, कभी साफ़-सफ़ाई में जुट जाती.

पिछले सप्ताह भी चूड़ियों की खनक ने मेरा ध्यान इसी प्रकार बंटाया था. संभव है, स्वर्णा भाभी मायके से लौट आई हों. यही कुछ सोच, पैरों में चप्पल फंसाए हुए मैं उनके द्वार पर जा पहुंचा था. अंदर के दृश्य को देखकर मैं बाहर ही ठिठक गया था.

"अरे!" मेरे उसे अप्रत्याशित आगमन पर ओमी भाई को कुछ असुविधा हुई थी.

"मैं समझा था..." मैं अंदर चाय छानती हुई एक अपरिचित युवती को देखने लगा था. वह अत्यंत सुंदर‌ थी.

"अरे हां!" ओमी भाई के होंठों पर फीकी मुस्कान उभर आई थी, "ये मिस पारूल हैं. अपने ही बैंक में काम किया करती है."

मैं अंदर चल दिया था. पारुल ने शालीनतापूर्वक मुझे अभिवादन किया था. मुस्कान में उसके लिपस्टिक रहित होंठ कुछ चौड़े हो आए थे, "आइए, चाय पीजिए न!"

हम तीनों बिस्कुट कुतरते हुए चाय पीने लगे थे. साथ ही हम लोग मौसम संबंधी जुगालियां भी करते जा रहे थे. मैंने नोट किया था कि ओमी भाई ने कॉर्निश पर रखा हुआ अपना वैवाहिक चित्र हटा लिया था. चाय के बाद मैं उठ खड़ा हुआ था. मैंने उनसे इजाज़त चाही थी.

"अच्छा!" वे मुझे छोड़ने द्वार तक आए थे. वे सिर खुजलाने लगे, "माफ़ करना आनंद भाई... दरअसल, पारुल और मैं..."

कहानी- दूर का आईना

मैंने उन दोनों के संबंधों को कोई विशेष अहमियत नहीं दी थी.

"कोई बात नहीं." कहकर मैं अपने घर आ गया था.

"क्यों?" सामने से आती हुई रीता मेरी तंद्रा भंग करती है. वह बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर चुकी होती है.

"मुझे तो दाल में कुछ काला नज़र आ रहा है. ओमी भाई का चरित्र मुझे संदिग्ध लगने लगता है."

"लगता है, यह चिंगारी स्वर्णा जीजी की गृहस्थी को तबाह करके ही छोड़ेगी." रीता गहरी सांस खींचती है.

"छोड़ो भी. मैं इस प्रसंग को यहीं समाप्त कर देना चाहता हूं. क्यों हम किसी पर कीचड़..."

नीचे से स्कूल बस की पी-पीं सुनाई पड़ती है.

बच्चों को लेकर मैं नीचे चल देता हूं. बस के चल देने पर मैं ओमी भाई के घर की ओर देखने लगता है. वहां खिड़की पर पारूल खड़ी है. ओमी भाई उसके जूड़े पर फूल खोंस रहे होते हैं. वह आवारा लड़की सचमुच ही स्वर्णा भाभी के जीवन में सेंध लगा रही है. उधर से मैं अपने घर आ जाता हूं.

दो दिन बाद स्वर्णा भाभी मायके से लौट आती हैं. शाम को हम सहानुभूति जतलाने के लिए उनके घर जा पहुंचते हैं, किंतु उनमें तनातनी चल रही होती है. उसका कारण शायद पारुल ही हो. पड़ोस के निजी जीवन में दख़ल न देकर मैं फिर से अपने ही खोल में दुबकने लगता हूं.

"लगता है, वह जादूगरनी अपने तीरों में तेज़ी लाने लगी है." एक दिन रीता कहती है.

"दूसरे का खून लगने पर ऐसा ही होता है." कह कर मैं कपड़े बदलने लगता हूं.

....और एक हादसा फिर से हो जाता है. पड़ोस में 'टेंऽ टिन..' के साथ बर्तन पटके जाने की आवाज़ें आने लगती हैं.

"अरे!" रीता चौंक पड़ती है, "पड़ोस में तो सचमुच ही..." पड़ोस में आग लगी हुई हो और आप उधर से मुंह फेर लें, यह कैसे हो सकता है! किसी भी हादसे पर सर्वप्रथम आस-पड़ोस में ही पूछताछ होती है. एक अच्छे पड़ोसी का कर्तव्य निभाने की गरज से मैं ओमी भाई के घर की ओर चल देता हूं. वहां दरवाज़ा बंद होता है. बंद दरवाज़े के उस पार ओमी भाई की गृहस्थी में भयंकर आग लगी हुई होती है. अंदर पति-पत्नी दोनों ही एक-दूसरे को धमकियां दे रहे होते हैं.

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"मैं कहता हूं, मेरे सामने से दफ़ा हो जा." ओमी भाई दहाड़ते हैं, "नहीं मैं तेरा गला घोंट दूंगा."

"घोंट दो." स्वर्णा भाभी सिसकी भरती है, "घोंट दो मेरा गला." मैं ज़ोर-ज़ोर से द्वार थपथपाने लगता हूं.

भड़ाक से द्वार खुलता है. ओमी भाई का चेहरा क्रोध में तमतमा रहा होता है. मुझे देख कर उनकी आंखों में प्रश्न उभर आता है. मेरी उपस्थिति उन्हें अखरने लगती है.

"माफ करना ओमी भाई..." मैं हकला कर ही रह जाता हूं.

"सॉरी भाई. ऐसे में आप अलग ही रहें तो ठीक रहेगा." वे फटे बांस के स्वर में कहते हैं, "क्यों ख़्वामख्वाह..."

"अच्छा बंधु!" मैं उधर से घर आ जाता हूं.

"क्यों!" रीता मेरा मुंह देखने लगती है.

"ओमी भाई ख़ुद ही अपने पांवों पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं." मैं कहता हूं.

"वही पटाखा आई होगी?" वह पूछती है.

"नहीं, वो तो नहीं है." मैं उपेक्षापूर्वक कहता हूं. "लेकिन हम लोग कौन होते हैं दाल-भात में मूसरचंद?"

मैं फिर से अपने दैनंदिन काम-काज में डूबने लगता हूं. पिछले सप्ताह मैंने अपने हाथ में एक खूनी मामला लिया है. महानगर के एक बड़े व्यापारी ने अपने घरेलू नौकर की हत्या कर दी थी. उसका इतना ही दोष था कि उसने मालिक की चोर बाज़ारी के सारे कारनामे पुलिस तक पहुंचा दिए थे. मैं उसी की टोह लेने चल देता हूं.

थका-मांदा मैं बड़े बाज़ार के एक रेस्तरां में कॉफी पी रहा होता हूं. मेरी दृष्टि फैमिली केबिन पर जा लगती है. वहां पारूल होती है. संभव है वह ओमी भाई के साथ हो. मैं पूर्ववत् कॉफी पीता रहता हूं. कुछ क्षणों बाद पारूल केबिन से बाहर निकलती है. देखकर मैं धक्से रह जाता हूं. किसी गैर मर्द का हाथ थामे हुए वह खिलखिलाने लगती है. तत्क्षण ही उसकी उस छवि को मैं अपने कैमरे में क़ैद कर लेता हूं.

ओमी भाई का गृह-कलह दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है.

"वह छोकरी तो स्वर्णा जीजी की छाती पर मूंग दलने पर ही तुली हुई है." रीता मुझे चाय की प्याली थमा कर कहती है.

"वो तो पहले दर्जे की चालू और चालाक लड़की है." मैं चाय सिप कर कहता हूं.

मेरा पत्रकार उसकी खोज ख़बर में जुट जाता है. खोजबीन करने पर मालूम होता है कि वह एक परित्यक्ता युवती है...

"यह भी क्या रोमांस हुआ कि..." रीता मेरे आगे बिस्कुट की तश्तरी सरका देती है.

"हां तो..." मैं भी उसी का समर्थन कर देता हूं. "ओमी भाई को ऐसा अनर्थ नहीं ढाना चाहिए था."

एक संध्या को मैं अपने किसी मित्र को लिवाने के लिए रेलवे स्टेशन चल देता हूं. गाड़ी एक घंटे लेट होती है. मैं वेटिंग रूम की ओर आ जाता हूं. वहां ओमी भाई को देख कर मैं ठगा सा रह जाता हूं. वे मुस्कुरा देते हैं, "बच्चों को ससुराल छोड़ कर आ रहा हूं."

"कुशल मंगल तो है न?"

"जी हां!" वे कंधे उचका देते हैं, "स्वर्णा कई दिनों से मायके जाने की ज़िद कर रही थी."

सिगरेट सुलगा कर मैं उन्हीं की बगल में बैठ जाता हूं.

कुछ क्षणों तक हमारे बीच चुप्पी छाई रहती है. ओमी भाई का हाथ मेरे कंधे पर आ लगता है, "मैं बहुत बड़ी उलझन में आ फंसा हूं आनंद भाई कि..."

"उलझन?" मैं उनका मुंह देखने लगता हूं.

"जी हां!" वे गंभीर हो आते हैं, "आप तो लेखक हैं न! मेरी इस उलझन को सुलझाइए प्लीज़!" मैं चुप्पी साध लेता हूं.

"पारूल मुझसे विवाह करना चाहती है." ओमी भाई मुझे अपनी उलझन बतलाने लगते हैं, "मैं भी उसे बहुत चाहता हूं. पर..."

"आखिर आप ऐसा क्यों कर रहे है?" मैं उन्हें नसीहत देने लगता हूं.

"बाल बच्चेदार होकर भी..."

"मैं अब तक उसे अंधेरे में ही रखता रहा हूं." ओमी भाई गहरा उच्छवास भरते हैं, "कैसे बताऊं..."

"यानी कि प्रेमिका को गले लगाए हुए आप पत्नी को झेल रहे है?" मैं उनकी आंखों में झांकने लगता हूं.

"है न?'

"हां!" ओमी भाई मुझे एक पत्र थमा देते हैं. उसमें पारूल ने लिखा है कि विवाह न होने पर आत्महत्या कर लेगी. उसे जेब में रख कर वे कहते हैं, "सच तो यह है कि मैं पली और प्रेमिका दोनों को ही अंधेरे में रखता आ रहा हूं."

"कहीं ऐसा तो नहीं कि आपकी प्रेमिका भी आपको अंधेरे में रखती आ रही हो." मैं आशंका प्रकट करने लगता हूं. पारूल का चरित्र मुझे संदिग्ध लगने लगता है.

"समझा नहीं." ओमी भाई अपने सूखे होंठों पर जीभ फेरने लगते हैं.

"समय आने पर सब कुछ समझ जाओगे मित्र. उस मामले में मैं जल्दबाज़ी ठीक नहीं समझता,"

पारूल महानगर के वीमन हॉस्टल में रहती है. मेरा पत्रकार उसकी खोज-ख़बर में जुट जाता है. खोजबीन करने पर मालूम होता है कि वह एक परित्यक्ता युवती है. एक दिन मैं सीधे ही उसके कमरे में जा पहुंचता हूं.

"आप!" मुझे देखकर वह हतप्रभ रह जाती है.

"जी हां!" मैं मुस्कुरा देता हूं, "इधर किसी शिकार की तलाश में आया हुआ था. सोचा आपके भी दर्शन करता चलूं."

"ओ समझी!" वह खिलखिला कर हंस पड़ती है. वह आंखें नचाती है, "तो आप जासूसी भी किया करते हैं."

"जी हां! ज़रूरत पड़ने पर." मैं सिगरेट सुलगा लेता हूं.

"आप क्या लेंगे?" वह पूछती

"ठंडा या गर्म?"

"फ़िलहाल तो मुझे आपसे कुछ सवालात पूछने हैं."

"सवाल?"

"जी हां! चौंकिए नहीं." मैं सहज होकर पूछता हूं, "आपको तलाक़ मिल गया?"

"तलाक़?" पारूल के हाथों से जैसे तोते उड़ जाते हैं.

"जी हां!" मैं उसी लहजे में पूछता हूं.

"आपने अपने पति विनायक से तलाक़ ले लिया?"

"अरे!" पारूल को अपने इर्दगिर्द की दुनिया तेज़ी से घूमती हुई प्रतीत होने लगती है.

मैं तुरूप चाल चलता हूं, "देखिए मैडम ओमी भाई के गले में बांहें डालने से पूर्व आपको 'नो ड्यू सर्टिफिकेट' दिखलाना होगा."

"हम दोनों के बीच आने वाले आप कौन होते हैं?" वह मेरे लिए नथुने फुलाने लगती है.

"शायद आप नहीं जानती कि वे शादीशुदा ही नहीं, दो बच्चों के पिता भी है." मैं उसे वास्तविकता से परिचित कराता हूं.

"हुआ करें!" वह उपेक्षापूर्वक कहती है, "मैं यह भी जानती हूं कि वे उन्हें ससुराल छोड़ आए हैं."

"तब तो मैडम, आप जान-बूझकर आग में हाथ डाल रही हैं?" मुझे उसकी सोच पर तरस आने लगता है.

पारूल से कुछ भी तो कहते नहीं बन पाता. मैं उसे फिर से कुरेदने लगता हूं, "देखिए मेम साहिबा! आपके तमाम कच्चे चिट्ठे मेरे पास हैं. आपको दो फूल से बच्चों के भविष्य को नहीं बिगाड़ना चाहिए."

पारूल को सचेत कर मैं फिर से शहर-बाज़ारों के शोरगुल में डूबने लगता हूं.

लिखने की मेज पर झुका हुआ मैं अपनी रपट को अंतिम रूप दे रहा हूं. तभी कोई द्वार थपथपाता है. रीता दरवाज़ा खोलती है. बाहर ओमी भाई होते हैं. वे घबराए‌ हुए से लग रहे हैं.

"आइए ओमी भाई!" मैं मुस्कुरा देता हूं.

"आनंद भाई!" आते ही वे मेरे आगे अपना दुखड़ा रोने लगते हैं, "आप मेरा मार्गदर्शन कीजिए न!"

इस पर मैं उन्हें पारूल के बारे में सब कुछ बतला देता हूं. रीता बैठक में चाय ले आती है. वह भी हमारी बातचीत में सम्मिलित हो जाती है. वह उन्हें चाय की प्याली थमाने लगती है, "भाई साहब, आप दूर का आईना भी देखिए न!"

"हां ओमी भाई!" मैं भी पत्नी का ही समर्थन कर देता हूं, "आदमी को दूरदर्शी होना चाहिए."

"लेकिन आनंद भाई..." ओमी भाई अब भी सामने का आईना देखते आ रहे हैं. वे सिर खुजलाने लगते हैं, "पारूल तो..."

"पारूल भी कोई दूध की घुली हुई नहीं है." मैं उन्हें फिर से समझाने लगता हूं.

"विश्वास ही नहीं होता."

"वह आपको अंधेरे में ही नहीं रखती आ रही है, आपकी खिली बगिया में ज़हर भी घोलती आ रही है." मेरा हाथ उनके कंधे पर जा लगता है, "अब भी सचेत होने का समय है."

लेकिन ओमी भाई तो पारूल के प्यार में अंधे ही हुए जा रहे हैं. उनका प्रकंपित स्वर होता है, "मैं कैसे मान लूं कि..."

"पारूल चालू ही नहीं, चालाक भी है." मैं उन्हें फिर से सावधान करने लगता हूं, "मैं उसे कई बार गैरों के गले में बांहें डाले हुए देखा है."

मित्र को सही राह पर लाने के लिए मैं उन्हें पारुल का वह चित्र दिखला देता हूं, जिसमें वह किसी गैर मर्द के साथ बड़े बाज़ार के एक रेस्तरां में खिलखिला कर हंस रही होती है. उसे देख कर ओमी भाई की आंखे फटी की फटी ही रह जाती हैं. अगले ही क्षण वे मेरा हाथ अपने हाथों में ले लेते हैं, "धन्यवाद आनंद भाई! आज आपने मेरी आंखें खोल दी है."

"लेखक आदमी जो हूं," मैं मुस्कुरा देता हूं. ऐसे में वे झेंप जाते हैं.

कैलेंडर के पन्ने बड़ी तेज़ी से पलटते जाते हैं. एक दिन ओमी भाई आगरा जाकर अपने बीवी-बच्चों को बुला लाते हैं. उन्हीं से मालूम होता है कि पारूल ने अपनी बदली कहीं अन्यत्र करवा ली है. एक रविवार को मैं उनके घर चल देता हूं.

"आइए भाई साहब!" द्वार पर स्वर्णा भाभी होती हैं.

"ओमी भाई किधर है?" मैं इधर-उधर देख कर पूछता हूं.

"नहा रहे हैं." वे मुस्कुराती हैं, "आइए, बैठिए न. वे अभी आ जाते हैं." बंटी और वंदना बैठक में आकर मुझे अभिवादन करते हैं. स्वर्णा भाभी के साथ-साथ वे भी तो प्रसन्नचित दिखाई देते हैं. उसी समय स्वर्णा भाभी चाय ले आती है.

"और सुनाइए भाभीजी." चाय सिप कर मैं उनके हालचाल पूछने लगता हूं, "कैसी है?"

"सब आपकी कृपा है भाई साहब!" प्रत्यक्ष रूप में वे मेरा आभार प्रकट करने लगती है.

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ओमी भाई भी बैठक में आ जाते हैं. वे भी प्रफुल्लचित दिखाई दे रहे जैसे कि उनके साथ कुछ घटा ही न हो. कुछ देर तक उनके साथ गप्प-शप्प करने के बाद मैं अपने घर आ जाता हूं.

रीता दोनों बच्चों को स्कूल के लिए तैयार कर चुकी होती है. पी-पीं का स्वर सुन कर उन्हें लेकर मैं नीचे गली में चल देता हूं.

"पापा, टा-टा..." बस मैं बैठ कर बच्चे मेरे लिए हाथ हिलाते हैं.

उन्हें टा-टा कर मैं ओमी भाई के घर की ओर देखने लगता हूं. खिड़की के उस पार के दृश्य को देख कर मैं गदगद हो आता हूं. स्वर्णा भाभी ऑफिस जाते हुए पति के कोट के कालर पर फूल लगा रही होती हैं. एक-दूसरे की आंखों में झांकते हुए शायद वे दूर का आईना देख रहे हों. फिर मैं मुस्कुरा कर‌ अपने घर आ जाता हूं.

अब भी मेरे पड़ोस में जब-तब चूड़ियां खनकती रहती हैं. वह खनक मुझे किसी भी प्रकार की कोई असुविधा नहीं पहुंचाती. वह खनक मेरे कानों को अच्छी ही लगा करती हैं,

- पाठक

कहानी- दूर का आईना

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