"ऊपरी आमदनी की गुंजाइश कहां नहीं होती सरिता? यह तो तुम पर डिपेन्ड करेगा कि किसको, कब और कैसे घुमाती हो..?" उसकी बात समाप्त होते ही दोनों एक-दूसरे की ओर देख-देख कर हंसने लगे, अपने-अपने संदर्भ में.
अपनी इकलौती बेटी सरिता के लिए ब्याह की बात लेकर बिहारीलाल जी, शहर की समता कॉलोनी में रहनेवाले बाबू केदारनाथ से मिलने सुबह आठ बजे ही निकल पड़े. जब लौटे तो ग्यारह बज गए थे. इस बीच उनकी पत्नी रामेश्वरी मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना कर रही थी कि हे ईश्वर, सरिता के बाबूजी कोई अच्छी ख़बर लेकर लौटे.
सरिता ने बी.एस.सी. पास कर लिया था और अब सयानी हो चली थी. बिहारीलाल और रामेश्वरी कि वह एकमात्र संतान थी, जिसे उन्होंने बड़े लाड़-प्यार से पाला था और चाहते थे कि कोई ऐसा घर-वर मिले, जहां दान-दहेज न देना पड़े, क्योंकि उनके पास कुछ नहीं था. क्लर्की करते-करते उम्र बीत रही थी. मकान भी किराए का था.
रामेश्वरी चौके में काम तो कर रही थी, पर उसके कान अपने पति के आने की आहट की प्रतीक्षा कर रहे थे. थोड़ी भी आहट होती तो वह दरवाज़े की ओर दौड़ पड़ती. इस बीच सरिता को भी कई बार बाहर आंगन तक उन्हें देख आने को कह चुकी थी.
सरिता ने मां की व्यग्रता का आनंद लेने की दृष्टि से कहा, "मां, लगता है इस बार बाबूजी मेरे ब्याह की बात पक्की करके ही लौटेंगे, देर जो लग रही है..." फिर वह हंसने लगी.
मां ने उसे थोड़ा डांटा और कहा, "तुझे मज़ाक सूझ रहा है, यहां मेरी धड़कन बढ़ गई है. कहती है, बात पक्की करके ही आएंगे. अभी तक उन लोगों ने तुझे देखा तक नहीं है. बात पक्की कैसे हो जाएगी?"
तभी बिहारीलाल ने घर में प्रवेश किया और कहा, "ख़ुश हो जाओ सरिता की मां, केदारनाथ ने मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है. आज ही वे लोग सरिता को देखने आ रहे हैं. आज छुट्टी है दोपहर के तीन बजे तक सब ठीक ठाक कर लो."
रामेश्वरी खिल गई, कमरे का टेबल फैन ऑन करती हुई बोली, "क्या करता है लड़का? देखने-सुनने में कैसा है?" बिहारीलाल के बिना मांगे ही सरिता ने उनके सामने एक ग्लास ठंडा पानी रख दिया और भीतर चली गई.
एक घूंट पानी पी कर बड़ी शान से बिहारीलाल ने बोलना शुरू किया, "इसी को कहते हैं चिराग़ तले अंधेरा, लड़का मेरे ही दफ़्तर में था और मुझे पता ही नहीं था कि वह केदारनाथ का बेटा है. गोरा-चिट्टा, हंसमुख और मिलनसार."
रामेश्वरी को इतने से संतोष नहीं हुआ. बात काटकर बोली, "करता क्या है, यह तो कहो. पढ़ा-लिखा कितना है? बी.ए., एम.ए, तो होगा ही..." बिहारीलाल बड़ी निश्चिंतता से बोले, "बी.ए., एम.ए. कुछ नहीं है, मैट्रिक पास है. उच्च श्रेणी लिपिक है."
सुनकर रामेश्वरी उदास हो गई. बोली, "क्या इसीलिए सरिता को बी.एस.सी. कराया था कि मैट्रिक पास बाबू से उसकी शादी कर दो?"
बिहारीलाल पर इस क्षोभ-प्रदर्शन का कोई प्रभाव नहीं पड़ा. समझौते के स्वर में कहने लगे, "ज़रा शांति से काम लो सरिता की मां. मैंने सब कुछ पता लगा लिया है. लड़का बाबूगिरी करता है तो क्या, है बड़ा होनहार."
रामेश्वरी कुछ संभली. पूछने लगी, "तनख्वाह क्या पाता होगा?"
बिहारीलाल को लगा कि अब रेल पटरी पर आ गई है. समझ गए कि रामेश्वरी के इस प्रश्न का सही उत्तर दे दें, तो वह शांत हो जाएगी. वे उसके मन के विरूद्ध कुछ भी करना ठीक नहीं समझते थे. वे जानते थे कि रामेश्वरी को सरकारी नौकरी के तंत्र-मंत्र का कोई ज्ञान नहीं था. यह प्रपंच उसकी समझ के बाहर है. फिर भी इकलौती बेटी के ब्याह जैसी महत्वपूर्ण बात में उसे विश्वास में न लेने जैसी कैसी भूल नहीं करना चाहते थे. बोले, "देखो, मर्दों की आमदनी और महिलाओं की उम्र पूछी नहीं जाती. मैंने इस बारे में केदारनाथ से कोई पूछताछ नहीं की. पूछने की बात भी नहीं थी. लिपिक होने के नाते लड़के को उसकी श्रेणी का वेतन और महंगाई भत्ता तो मिलता ही होगा. ऊपरी आमदनी बहुत है."
"ऊपरी आमदनी..?" रामेश्वरी ने इन दो शब्दों को कई बार यहां-वहां सुना था, परन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उसका अर्थ जान लेना ठीक समझा, इसलिए बोली, "ऊपरी आमदनी क्या होती है?"

बिहारीलाल हंसकर बोले, "ऊपरी आमदनी का अर्थ है, वेतन के अतिरिक्त यहां-वहां से होने वाली आय. यह लड़का जिस सेक्शन में काम करता है, वहां उसे कई लोगों के ऐसे काम करने पड़ते हैं, जो बड़े टेढ़े-मेढ़े होते हैं. लड़का जुगाड़ू है. अफसरों को मिलाकर रखता है. वह लोगों की समस्याएं सुलझा देता है तो लोग अपने आप उसे कुछ न कुछ दे जाते हैं. अच्छी कमाई हो जाती है. यही है उसकी ऊपरी आमदनी... अब समझी?"
रामेश्वरी धर्म संकट में पड़कर बोली, "तब तो दान-दहेज भी अच्छा ही मागेंगे?" रामेश्वरी को पटाने का आख़िरी मौक़ा भी मिल गया बिहारीलाल को तपाक से बोले, "यही तो विशेषता है इस परिवार में. मैंने इस संबंध में भी साफ़-साफ़ बात कर ली है. उन्हें सुंदर और पढ़ी-लिखी लड़की चाहिए. हमारी सरिता पढ़ी-लिखी भी है और सुंदर भी. दान-दहेज की कोई बात उठेगी ही नहीं."
"क्या वे लोग ऐसा कह रहे थे?" रामेश्वरी ने बात बिल्कुल साफ़ कर लेनी चाही.
"हां भई हां, केदारनाथ ने यही कहा है. लड़के की मां भी वहां मौजूद थीं. जब वे लोग यहां आएंगे, तब तुम्हारे सामने भी उनसे कहलवा दूंगा... बस! अब सरिता को राजी करना तुम्हारा काम है." रामेश्वरी बातों के जमाखर्च में विश्वास करने वाली महिला नहीं थी, इसलिए उसने कह दिया, "पहले वे लोग आकर लड़की को पसंद तो करें... फिर देखा जाएगा."
दोपहर को तीन बजे केदारनाथ जी अपनी पत्नी राधा देवी और पुत्र रंजन कुमार के साथ बिहारीलाल जी के घर आए और सारी औपचारिकताएं पूरी की गई. लगे हाथ रामेश्वरी ने राधा देवी से लेन-देन की बात भी पूछ ही ली. रंजन कुमार की ओर देखते हुए उन्होंने कहा, "बहन जी, हम लोग भी तो आप लोगों जैसे खाते-कमाते लोग हैं. भला किस मुंह से दान-दहेज की बात करें? हमें सुंदर और पढ़ी-लिखी बहू चाहिए थी, सो मिल गई. यही हमारा दहेज है. दान में कन्यादान और दहेज में उसकी पढ़ाई-लिखाई..." सभी लोग हंसने लगे.
होनेवाली समधिन के मुंह से इतनी मीठी बात सुनकर रामेश्वरी पुलकित हो उठी. सरिता के मन
में अलबत्ता यह बात उठी कि उसका भावी पति उससे कम पढ़ा-लिखा है और एक मामूली क्लर्क है, परंतु दहेज का विरोध करने वाले परिवार की बहू बनने के गौरव ने उसके मन से इस बात को हटा दिया. फिर वह इसलिए भी परिस्थिति से समझौता कर गई कि उसके माता-पिता को दहेज-दानव का सामना नहीं करना पड़ेगा.
बीस-पच्चीस दिनों के बाद ही मुहूर्त निकल आया और बहुत ही सादगी के साथ सारा समारोह सम्पन्न हुआ. सरिता ससुराल चली गई.
सरिता के ससुर केदारनाथ जी, स्थानीय प्राथमिक शाला के प्रधानाध्यापक थे, रंजन कुमार ही उनके बुढ़ापे का सहारा था. उन्हें उस पर बड़ा गर्व था. वह भी अपने माता-पिता का बड़ा ध्यान रखता था. चार-पांच वर्षों की नौकरी में ही उसने गृहस्थी में काम आने वाली सारी वस्तुएं जुटा ली थीं. सोफासेट, डाइनिंग टेबल, बडी पलंग, पंखा, कूलर, आलमारी, बर्तनों का सेट, मिक्सी... सब कुछ तो था उसके घर में.
सरिता ने ससुराल आकर यह सब देखा तो आश्चर्य में पड़ गई. उसके बाबूजी तो ऊंचे पद पर थे. काफ़ी लंबी नौकरी भी कर चुके थे. घर में खाने वाले भी अधिक नहीं थे. फिर भी वे कुछ नहीं कर पाए, मकान तक किराए का था. मां की लंबी बीमारी का कर्ज़ तक उतार नहीं पाए थे... और यहां तो.
वह यही कुछ सोच रही थी कि रंजन कुमार आ पहुंचा.
"किस सोच में पड़ी हो सरिता?" उसने बड़े प्यार से कहा, "क्या तुम्हें यहां किसी वस्तु की कमी महसूस हो रही है? हां, फ्रिज नहीं है फ़िलहाल! वह भी आ जाएगा."
"नहीं, नहीं..." सरिता ने घबराकर कहा, "ऐसी कोई बात नहीं. यहां किसी चीज़ की कमी नहीं है. सब कुछ तो है. इतना सब कुछ तो अपने किसी पड़ोसी के घर भी नहीं है. मेरे मायके में भी नहीं."
रंजन कुमार को सरिता का अंतिम वाक्य बहुत पसंद आया. प्रसन्न होकर बोला, "सरिता, मैं बहुत शीघ्र लंबी छुट्टी लेने वाला हूं. हम लोग मुंबई चलेंगे, मौज करेंगे वहां कुछ दिन. और हां, आज शाम को तैयार रहना, पिक्चर देखने चलना है. अभी मैं दो-तीन लोगों से मिल आऊं, आज छुट्टी का दिन है न, कुछ कलेक्शन करता आऊं."
"कलेक्शन?" सरिता ने इस शब्द का भावार्थ समझने के लिए रंजन कुमार की ओर देखकर कहा. रंजन कुमार जानता था कि सरिता इस कोडवर्ड को डीकोड नहीं कर पाएगी, इसलिए समझाने लगा, "सरिता, तुम तो जानती हो कि मैं एक क्लर्क हूं. आज की महंगाई में तो दो जून की रोटी नसीब होना मुश्किल है, इसलिए कुछ लोगों का आड़ा-टेढ़ा काम भी कर देता हूं. उन्हीं से कुछ आमदनी हो जाती है. जिन पर बकाया होता है, छुट्टी के दिन जाकर उनसे अपनी फीस कलेक्ट कर लेता हूं."
"मतलब, आपको ऊपरी आमदनी काफ़ी हो जाती है." सरिता ने कहा और एक अर्थपूर्ण नज़र रंजन कुमार पर डाली.
"आपको नहीं, हमको कहो सरिता." रंजन कुमार इतना कहते हुए खिलखिलाने लगा और तेज़ी से बाहर निकल गया.
मुंबई पहुंचकर रंजन कुमार ने सरिता को ख़ूब घुमाया-फिराया और काफ़ी कुछ ख़र्च किया. दो हफ़्तों बाद जब वे लौटे तो एक दिन उसने सरिता से कहा, "देखो सरिता, हमारा बैंक बैलेस काफ़ी कम हो गया है. अब मुझे काफ़ी मेहनत करनी पड़ेगी, हम लोग टी.वी. और फ्रिज़ नहीं ला पाएंगे जल्दी."
सरिता ने चुपचाप सुन लिया. उसे आभास होने लगा कि वह भी अपने पति के साथ उसके कदाचार में लिप्त होती जा रही है, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष. आए दिन समाचारपत्रों में भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध सरकार द्वारा चलाए जा रहे अभियान और धरपकड़ की ख़बरें छपती, जिन्हें पढ़कर उसकी छाती धक रह जाती. जब कभी वह इसका ज़िक्र रंजन कुमार से करती तो वह हंस देता और उसे डरपोक, दक़ियानूसी और जाने क्या-क्या कहकर चुप करा देता.
कभी भाषण देने के मूड में होता तो कहता, "दुनिया झुकती है सरिता, बस झुकाने वाला चाहिए. मैं किसी को नोचता-खसोटता तो हूं नहीं. देने वाले तो प्रेम से दे जाते हैं. इसके लिए थोड़ी-बहुत हेरा-फेरी तो करनी पड़ती है, जैसे क़ानून कायदों को अपने हित में तोड़-मोड़ लेना, अफसरों को भी अपनी ओर मिलाना वगैरह-वगैरह."
कुछ दिन और बीत गए सरिता सोचती रही. एक दिन उसने रंजन कुमार के सामने प्रस्ताव रखा कि वह भी नौकरी करना चाहती है. सुनते ही रंजन कुमार की तो बांछे खिल गई. बोला, "सरिता, तुमने तो मेरे मुंह की बात छीन ली. तुम नौकरी करने लगी तो ऊपरी आमदनी के सारे गुर तुमको सिखा दूं. फिर तो मज़ा आ जाए ज़िंदगी में."
सरिता ने उसका मज़ा और बढ़ाने के लिए कहा, "फिर तो हम क़ीमतों के बढ़ने से पहले ही टी.वी. और फ्रिज़ ले आएंगे... क्यों?"
"बिल्कुल सही कहा तुमने." रंजन कुमार के तिकड़मी मस्तिष्क को तत्काल कोई तरकीब सूझ गई. बोला, "देखो, मैं कल ही सुरेश एण्ड सुरेश कम्पनी के पर्सनल ऑफिसर से मिलूंगा. यह कम्पनी हमारी सप्लायर है. वहां कई लोगों से मेरा अच्छा परिचय है. उनके कई उल्टे-सीधे बिल मैंने पास कराए है. वे लोग तुम्हारे लिए किसी न किसी नौकरी की व्यवस्था कर ही देंगे."
इतना कहकर रंजन कुमार आराम कुर्सी पर बैठ गया और भविष्य की सुनहरी कल्पनाओं में खो गया. सरिता ने उसे कुरेदते हुए पूछा, "वहां ऊपरी आमदनी की गुंजाइश तो होगी?"
सरिता का वह प्रश्न रंजन कुमार को गुदगुदाने वाला था. उसने झट कहा, "यह हुई न पार्टनर वाली बात. अब मुझे विश्वास हो चला है कि हम दोनों मिलकर..."
"मेरी बात का तो आपने जवाब ही नहीं दिया." सरिता और मज़े लेने लगी, रंजन कुमार ने गंभीर होकर कहा, "ऊपरी आमदनी की गुंजाइश कहां नहीं होती सरिता? यह तो तुम पर डिपेन्ड करेगा कि किसको, कब और कैसे घुमाती हो..?" उसकी बात समाप्त होते ही दोनों एक-दूसरे की ओर देख-देख कर हंसने लगे, अपने-अपने संदर्भ में.
एक सप्ताह की दौड़-धूप के पश्चात् रंजन कुमार ने सरिता को सुरेश एण्ड सुरेश कम्पनी में नौकरी दिला ही दी. इस कम्पनी के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं थी. फिर रंजन कुमार तो उनके बड़े काम के आदमी थे. सरिता के सास-ससुर ने भी जब यह बात सुनी तो बेटे और बहू के आपसी तालमेल में दख़ल देना उन्होंने ठीक नहीं समझा.
सरिता के माता-पिता को भी इस बात की जानकारी मिली. पति और सास-ससुर की अनुमति से किए जाने वाले काम में भला उनको भी क्या लेना-देना था? रामेश्वरी ने तो यह भी कह दिया कि चलो, सरिता की पढ़ाई-लिखाई तो काम आई.
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सुरेश एण्ड, सुरेश कम्पनी तक जाने के लिए पहले दिन भी सरिता ने रंजन कुमार की सहायता नहीं ली. कम्पनी तक समय पर पहुंचने के लिए वह सुबह तड़के उठकर तैयार होती, सबके लिए चाय-नाश्ते का प्रबंध करती, फिर खाना बनाने में जुट जाती. सबको खिला-पिलाकर ही घर से बाहर निकलली. हां, कभी-कभार यह भी होता कि वह सुबह जल्दी न उठ पाती, तब तो वह खाना बनाने का काम अपनी सास के भरोसे छोड़ देती और ख़ुद जाकर कम्पनी के कैंटीन में खाना खाती.
उसकी इस तन्मयता से तो घर के सभी लोग प्रसन्न थे. शाम को यदि वह कुछ देर से भी लौटती तो कोई कुछ न कहता. एक शाम तो वह बहुत देर से लौटी रात्रि के आठ बज गए थे. जब लौटी तो देखा, घर के सभी लोग बड़े चिन्तित थे. बिना
पूछे, आते ही कहने लगी, "आज तो घर लौटना भी मुश्किल था. पड़ोस के मेहता साहब के घर टेलीफोन कर देती कि कम्पनी के डाइरेक्टर साहब के साथ दौरे पर जा रही हूं, पर उनका फोन ख़राब था. अपने घर के आसपास कोई और टेलीफोन भी तो नहीं है, इसीलिए घर चली आई कि कम-से-कम सूचित तो कर दूं, वरना आप लोग नाहक चिन्ता में पड़ जाते. अब आ ही गई हूं तो कुछ कपड़े और दो-एक साड़ियां रख लूं अटैची में... और एक बात तो मैं बताना भूल ही गई मांजी. कल शाम को सेल्स मैनेजर मित्तल साहब के बंगले पर चली गई थी कुछ काग़ज़ात लेकर बड़े उदास उदास से रहते हैं आजकल. जब से उनकी पत्नी का देहान्त हुआ है, दफ़्तर भी नहीं आ रहे हैं ढंग से. मुझे देखकर बड़े ख़ुश हो गए. बात ही बात में मैंने उनके ड्रॉइंगरूम का कालीन देखा तो उसके दाम पूछ लिए. मित्तल साहब जैसा दिलदार आदमी मिलना मुश्किल है मांजी. तुरंत मेरे हाथ पर दो हज़ार रुपए रख दिए उन्होंने... यह रक़म कल ही मैं आपको देने वाली थी, भूल ही गई. घर पर ही रखी है, अभी लाई." कहती हुई सरिता अपने बेडरूम में चली गई. दो मिनट बाद नोटों का एक बंडल लेकर लौटी और मांजी को देती हुई आगे कहने लगी, "सचमुच मांजी, इस नौकरी में ऊपरी आमदनी का बहुत स्कोप है..."
केदारनाथ, राधा देवी तथा रंजन कुमार सब एक-दूसरे को ताकने लगे. रंजन कुमार के हाथ में सरिता द्वारा दिए गए नोट थमाकर राधा देवी तुरंत भीतर चली गईं और उनके पीछे-पीछे केदारनाथ भी चले गए. सरिता ने रंजन कुमार से कहा, "तो मैं चलूं... दौरे की तैयारी करनी है. डायरेक्टर साहब इन्तज़ार करते होंगे."
इतना सुनना था कि रंजन कुमार के तन-बदन में आग लग गई. चेहरा क्रोध से तमतमा उठा. उसने सरिता को डांटा, "बेशर्म, सास-ससुर के सामने यह सब कहते तुम्हें शर्म नहीं आई? तुम्हारी जीभ नहीं कट गई? उस लोफर, गुंडे मित्तल के बंगले पर हो आई तुम? उससे नोट लेते समय तुम्हारे हाथ नहीं कट कर गिर पड़े?"
ग़ुस्से-ग़ुस्से में रंजन कुमार ने नोटों का बंडल सरिता के मुंह पर दे मारा. सरिता ने शांत भाव से झुककर सारे नोट उठा लिए, कहा, "क्यों? मैंने ऊपरी आमदनी शुरू कर दी तो जलने लगे? क्या हमें टी.वी. और फ्रिज नहीं ख़रीदना? मुझे दफ़्तर जाने के लिए स्कूटर भी तो चाहिए, जल्दी नहीं ख़रीदेंगे तो दाम बहुत बढ़ जाएंगे."
रंजन कुमार की नाक पानी के नीचे आ गई. उसका दम घुटने लगा. किसी तरह ऊपर आने की कोशिश करने लगा, "तो क्या तुम अपनी इज़्ज़त बेचकर यह सब ख़रीदोगी? अभी एक हफ़्ता भी नहीं हुआ है तुम्हें नौकरी करते और तुम ऊपरी आमदनी के लिए सब कुछ करने को तैयार हो गई?"

सरिता बोली, "क्या किया है मैंने? कुछ भी तो नहीं. इसमें इतना नाराज़ होने की क्या बात है? आख़िर मेरे सुंदर होने और पढ़ी-लिखी होने का फ़ायदा ही क्या? मैंने भी ठान लिया है कि मैं भी ऊपरी आमदनी करूंगी. इसके लिए मुझे चाहे जो कुछ भी करना पड़े. मैं तो आपका पूरा साथ देना चाहती हूं. स्टेटस बनाने में आपने जो कुछ कसर बाकी रखी है, उसे पूरा करूंगी... अब दो रोज़ डायरेक्टर साहब के साथ रहूंगी तो लौटने पर मुझे कुछ न कुछ तो देंगे ही. बड़े भले आदमी हैं. मुझे बहुत लाइक करते हैं."
रंजन कुमार को सांप सूंघ गया. काटो तो खून नहीं. बड़े ज़ोर से चीखकर बोलना चाहता था, पर आवाज़ ही नहीं निकली. कुछ क्षण यूं ही बीत गए. वह धम्म् से कुर्सी पर बैठ गया. सरिता दौड़कर भीतर गई. एक ग्लास पानी लेकर आई, उसे देने लगी, उसने इन्कार कर दिया, "नहीं चाहिए मुझे पानी, देखो सरिता, तुम अब कही नहीं जाओगी. कोई ज़रूरत नहीं हमें ऐसी ऊपरी आमदनी की, जिसके कारण हमारी इज़्ज़त आबरू पर आंच आती हो."
सरिता ने पानी का ग्लास एक ओर रख दिया. बोलने लगी, "क्या आपने अपनी इज़्ज़त, अपना मान-सम्मान बेचे बगैर ही ऊपरी आमदनी कर ली?
एक मामूली बाबू होकर इतनी सारी जायदाद खड़ी कर ली. क्या यूं ही? जब मैंने भी यही करने की कोशिश की तो मेरे हाथ काटने पर उतारू हो गए? घर-घर जाकर जिन हाथों से आप कलेक्शन कर लाते हैं, उनकी क्या सज़ा है? कभी सोचा आपने? जिन हाथों से आप ऊपरी आमदनी का धन बटोरते हैं, क्या वे काट देने लायक नहीं हैं? आप बरसों से यह सब कुछ कर रहे हैं और इज्ज़तदार बने बैठे हैं. मैंने थोड़ा कुछ किया तो मैं बेइज़्ज़त हो गई? क्यों? चुप क्यों हो गए? जवाब दीजिए, मैं तो आप ही का अनुसरण कर रही हूं."
रंजन कुमार अब क्या जवाब देता? निरुत्तर हो गया, गिड़गिड़ाने लगा, "हाथ जोड़ता हूं तुम्हारे. सरिता, तुमने आज मेरी आंखें खोल दीं, भविष्य में मैं ऊपरी आमदनी का नाम तक नहीं लूंगा."
सरिता ने एक हल्की-सी चोट और की, "तो फिर फ्रिज और टी.वी. का क्या होगा?" रंजन कुमार तो पूरी तरह ढेर हो चुका था. बोला, "बस सरिता बस. आगे कुछ न कहो, मेरी बात मान लो और नौकरी छोड़ दो."
सरिता हंसने लगी. कहने लगी, "उन दो हज़ार रुपयों का क्या होगा, जो मित्तल साहब ने मुझे दिए हैं?" भीतर से केदारनाथ और राधा देवी भी वहीं आ गए. मांजी ने सरिता से कहा, "यह रुपया ले जाकर फेंक आ उस मित्तल के मुंह पर और छोड़ दे नौकरी."
सरिता अत्यंत सामान्य होती हुई बोली, "मैंने नौकरी की ही कब थी, जो छोड़ दूं मांजी? मैं तो सुबह से शाम तक बिमला भाभी के घर स्वेटर बुनती रही इतने दिन. रुपए भी भाभी के ही हैं. फिल्म की फाइनेन्सर भी वही हैं."
फिर वह दौड़कर सास के चरणों पर गिर पड़ी. राधा देवी ने उसे उठाकर गले लगा लिया. केदारनाथ जी ठगे से रह गए. और रंजन कुमार की तो कुछ पूछो मत.
- जी. एस. रामपल्लीवार
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