तेजी से आगे बढ़ीं और बगैर किसी खौफ़ के दरवाज़ा खोल दिया, पर दरवाज़ा खोलते ही आंखें फटी की फटी रह गईं. लगा वृद्ध, कमज़ोर शरीर अब थरथरा कर ज़मीन पर लुढ़क जाएगा. लेकिन किसी तरह अपने आपको सम्हाल लिया अनुपमा देवी ने. स्वयं को न सम्हालतीं तो उस सामनेवाले के कंपकंपाते शरीर का संबल कैसे बन पातीं?
रात के एक बज गए थे. अनुपमा देवी का जी नहीं चाह रहा था कि टी.वी. के पास से उठकर अपने कमरे में चली जाएं, एक-दो बार उन्होंने टी.वी. बंद भी किया, लेकिन घर में व्याप्त शून्यता जानलेवा सिद्ध हो रही थी. बेटी यक्षा अपने पति नवल और पुत्री पिंकी के साथ नवल की बहन की शादी में शामिल होने गांव गई थी. अपनी असहनीय, आंतरिक व्यथा को टी.वी. के शोरगुल में विलीन कराने का अनुपमा देवी का प्रयास लगातार विफल होता जा रहा था, फिर भी वो बड़ी तन्मयता से अपने प्रयास में लगी रहीं, इस बीच ३-४ बार इलाहाबाद फोन भी लगाया था, लेकिन वहां कोई फोन उठा नहीं रहा था. फोन लग जाता तो अपने पति योगेन्द्र से अपनी व्यथा बताकर इस पीड़ा के बोझ को थोड़ा-सा तो हल्का कर लेतीं. बेटा सुदेश और बहू विद्या पोते को लेकर आगरा गए हैं, फिर वहां से ऊटी जाएंगे, यह अनुपमा देवी को पता था और इसीलिए वे यह भी जानती थीं कि इस वक़्त योगेन्द्र जी घर पर अकेले ही होंगे, तभी तो उनकी फोन पर बात करने की इच्छा हो आई थी.
लेकिन योगेन्द्र जी द्वारा फोन न उठाए जाने से अनुपमा देवी विचलित-सी हो गई थीं. दक्षा द्वारा छले जाने की व्यथा से भी गहरी थी उनकी यह चिंता कि योगेन्द्र जी द्वारा फोन न उठाए जाने का भला क्या कारण होगा?
योगेन्द्र जी की आंखें तो कमज़ोर हो ही चली हैं, कहीं अब सुनाई भी तो कम नहीं देने लगा उन्हें. फोन बज रहा हो और वे निश्चिंत सो रहे हों. पांच वर्ष के अंतराल में जाने कितनी तब्दीलियां आई होंगी योगेन्द्र जी में.
पिछले वर्ष जब दिसंबर मास में सुदेश ने योगेन्द्र जी का मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाया था, तब अनुपमा देवी इलाहाबाद जाने के लिए हठ कर बैठी थीं. और दक्षा ने भी जैसे उनके इस हठ को बाल हठ से अधिक कुछ न समझा था, बोली,
"मां, मोतियाबिंद का ऑपरेशन कोई बड़ा ऑपरेशन नहीं. आधुनिक तकनीक से तो चंद मिनटों में ही ऑपरेशन हो जाता है और मरीज़ घर भी चला जाता है."
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"वह सब कुछ ठीक है बेटी, लेकिन मैं उन्हें देखना चाहती हूं."
"ठीक है मां, मैं नवल से बात करती हूं." दक्षा ने सुबह उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा था और शाम को फ़ैसला सुनाते हुए बोली, "मां, नवल कह रहे थे, अभी पैसे की बड़ी तंगी है. मुंबई से इलाहाबाद आने-जाने में क़रीब ७ सौ रुपये तो लग ही जाते हैं और फिर तुम अकेली भी कहां जा पाओगी? मुझे और नवल को तो अभी छुट्टी मिल ही नहीं सकती. यदि तुम जाना ही चाहती हो तो गर्मी तक रुक जाओ, तब तक पिंकी की परीक्षा भी ख़त्म हो जाएगी, तब उसे अपने साथ ले जाना."
दक्षा द्वारा घुमा फिरा कर मना कर देने के बाद अनुपमा देवी ख़ामोश हो गई थीं, क्योंकि ख़ामोश हो जाने के अलावा उनके पास और कोई चारा भी तो नहीं था.
दक्षा वैसे ही अनुपमा देवी के स्नेह पर सदैव सशंकित रहती है, इसीलिए उसकी बात न मानकर अनुपमा देवी उस संशय को और गहरा नहीं करना चाहती थीं.
अनुपमा देवी ने कभी बेटे-बेटी में कोई फ़र्क़ नहीं किया था. लेकिन बेटे सुदेश के पास जाने की उनकी इच्छा का पता चलते ही बेटी दक्षा तिलमिला जाती और बड़ी बेहयाई से उन पर यह आरोप जड़ देती कि वे बेटी के पास रहने में शर्म महसूस करती हैं इसीलिए सुदेश के पास जाना चाहती हैं.
वृद्धावस्था में अनुपमा देवी अपने पति के जिस वियोग को सह रही थीं, उस वियोग पर दक्षा का आरोप ऐसे लगता, जैसे किसी ने जले पर नमक छिड़क दिया हो.
सुदेश के पास जाने के बहाने अपने आराध्य पति के दर्शन की अपनी सहज लालसा और उनके सामीप्य को ललकती कोमल आकांक्षा को यदि बेटी के आगे व्यक्त करने में अनुपमा देवी संकोच करती थीं, तो ग़लत कहां थीं? बल्कि, ग़लती तो बेटी की उस कुंठित मानसिकता में थी, जिसकी बदौलत वह अपने माता-पिता के आत्मीय रिश्ते को समझने की जगह, माता के स्नेह पर संदेह व्यक्त करती थी.
लेकिन चुप रह जाने के अलावा अनुपमा देवी के सामने कोई चारा भी नहीं रह जाता था. बच्चों के अधीन, उनकी इच्छा के अनुरूप जीवन बिताने को वे दोनों वृद्ध पति-पत्नी विवश थे.
गर्मी की छुट्टियां आई, तो दक्षा की ननद की शादी की सूचना भी आ गई. शादी में जाना दक्षा के लिए बेहद ज़रूरी था. परंतु अनुपमा देवी का योगेन्द्र जी से मिलने जाना भी कम महत्वपूर्ण कहां था? लेकिन क्या अधिक महत्वपूर्ण है, यह तय करने का निर्णय वृद्ध होने के बाद शायद माता-पिता को नहीं रहता, अतः इस बार भी अनुपमा देवी आंसू के घूंट पीने को विवश हो गई.
योगेन्द्र जी से मिलने की लालसा अनुपमा देवी में इतनी अधिक थी कि वे तो अकेली ही चली जाने को भी तैयार थीं, पर दक्षा ने वह भी नहीं होने दिया, बोली, "नहीं मां, पहली बात तो यह है कि तुम्हें अकेले भेजने का ख़तरा मैं मोल नहीं ले सकती. दूसरे, आजकल घर पर ताला लगाकर कहीं जाना भी ग़लत हो जाता, चोरियां कितनी हो रही हैं, तुम तो जानती ही हो. पहले मैं जाकर आ जाती हूं, फिर देखूंगी."
लेकिन अनुपमा देवी उस 'देखूंगी' का अर्थ अच्छी तरह से जानती हैं. गांव से लौटते ही दक्षा पैसे का रोना रोने लगेगी, तब अपने जाने की बात करना अनुपमा देवी के लिए असंभव ही हो जाएगा, अपने पति से पांच वर्ष दूर रह कर, वह लोगों की मानसिकता को समझने में सक्षम हो गई हैं.
बच्चे बड़े हो जाने के बाद माता-पिता की स्वतंत्रता पर पाबंदी लग जाती है, ऐसा अनुपमा देवी को बार-बार उन्हें याद दिलाते हुए, उनके हृदय के बोझ को हर बार कुछ अधिक गहरा बना जाने में रत्ती भर भी संकोच नहीं करते.
अपने धन का स्वेच्छा से इस्तेमाल कर योगेन्द्र जी बच्चों की नज़र में गुनहगार सिद्ध हो गए थे. बच्चों के अनुसार शायद माता-पिता के खून-पसीने की कमाई पर उनसे अधिक बच्चों अधिकार रहता है. माता-पिता का अधिकार तो कदाचित बच्चों के पैदा होते ही समाप्त हो जाता है और शेष रह जाता है कर्त्तव्य पालन का दायित्व.
योगेन्द्र जी को जब सेवानिवृत्ति के उपरांत प्रोविडेंट फंड और ग्रैचुइटी की राशि कुल २ लाख रुपए मिले, तब उन्होंने उसमें के ५० हज़ार अपने घर के आधे-अधूरे काम को पूरा करने में लगा दिए और बाकी के पैसे अनुपमा देवी के नाम पर बैंक में डलवा दिए.
बेटा सुदेश और बेटी दक्षा दोनों ही विवाह के बाद भी रुपयों के प्रति निश्चिंत थे. उन दोनों के बीच धन का बंटवारा करते समय बाबूजी कोई भेदभाव नहीं बरतेंगे, लेकिन, इस बीच घटी एक सहज घटना ने बच्चों को विद्रोही बना दिया. योगेन्द्र जी की छोटी बहन ने अपने बेटे के मेडिकल में एडमिशन होने की बात कहते हुए अपने भैया से सहायता की अपील की और योगेन्द्र जी ने बगैर बच्चों से इस संबंध में कोई विचार-विमर्श किये अपनी बहन को ५० हज़ार रुपए दे दिए.
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५-६ महीने तक तो योगेन्द्र जी की इस सहायता की किसी को ख़बर भी नहीं हुई. लेकिन जब सुदेश को कार ख़रीदने के लिए पैसों की ज़रूरत हुई और उसने पापा से बड़े अधिकार के साथ एक लाख रुपए की मांग की तब उस वास्तविकता का पता चला. जब वह बैंक से १ लाख रुपए का ड्राफ्ट बनवाने गया, तब उसे पता चला कि ५० हज़ार रुपए कम हैं. और, सच्चाई का पता चलते ही पहली बार सुदेश बाबूजी पर बरस पड़ा, "बाबूजी, इतनी बड़ी रकम देने के पूर्व एक बार मुझसे पूछ तो लिया होता. आजकल के ज़माने में बगैर लिखा-पढ़ी के भी भला कोई किसी को कुछ देता है. आपने तो ऐसे ही पैसे देकर बेवकूफ़ी की हद कर दी. जिस पैसे पर हमारा अधिकार था, उसे उठाकर दूसरों में बांट दिया, अब आपको क्या लगता है कि वे आपके पैसे लौटा देंगे?"
"बेटा... मैंने जिसे पैसे दिए हैं, वह मेरी छोटी बहन है. भाई-बहन के रिश्ते विश्वास के रिश्ते होते हैं. मेरे लिए मेरी छोटी बहन वैसी ही है, जैसी तुम्हारे लिए दक्षा, क्या दक्षा को पैसे देते समय तुम स्टैम्प पेपर पर उससे हस्ताक्षर करवाओगे?"
"हां बाबूजी, यदि दान में पैसे दे रहे हों तो कोई बात नहीं अन्यथा मैं तो हस्ताक्षर करवाऊंगा."
"तुम लोग जैसे जी चाहे करना, मैंने अपनी छोटी बहन को पैसे एक नेक काम के लिए दिए हैं. यदि उसमें इंसानियत होगी तो वह पैसे लौटा देगी."
"और... यदि इंसानियत नहीं हुई तो? तब तो हम बर्बाद ही हो जाएंगे ना?"
"ऐसा क्यों कह रहे हो सुदेश? क्या उस ५० हज़ार के अलावा और कुछ नहीं है तुम्हारे पास?"
"है तो बाबूजी. पर, दक्षा भी तो अपना बराबरी का हिस्सा मांग रही है."
सुनकर स्तब्ध रह गए अनुपमा देवी और योगेन्द्र जी, इतना गहरा आघात लगा उन्हें कि न बच्चों पर क्रोध आया न बड़े होने के अधिकार से उन्हें उनकी बदतमीजी का एहसास कराने की इच्छा ही हुई. एक तो बेटे के शब्दों से दोनों में अपराधबोध की भावना भर गई थी, दूसरे यह विचार उन्हें पीड़ित किए जा रहा था कि जिन बच्चों को वे एकदम विशिष्ठ समझ रहे थे, वे तो सामान्य से भी नीचे दर्जे के निकले.
जब तक बच्चे माता-पिता के अधीन थे, तब तक उन्होंने उनकी आज्ञा का बोझ उठाया, लेकिन, अपने पैरों पर खड़े होते ही आज्ञाकारिता के आवरण को बड़ी बेदर्दी से उतार फेंका और अपने असली रूप में आ गए.
अनुपमा देवी और योगेन्द्र जी निरीहता से सिर झुकाए बैठे रहे और बेटी दक्षा चेहरे पर मुस्कान भाव लादे अपलक अपने साहसी व स्पष्टवादी भैया को निहारे जा रही थी.
"दक्षा, अब मेरा मुंह क्या देख रही हो? बाबूजी से कहती क्यों नहीं कि तुम्हें जायदाद का हिस्सा चाहिए."
"भैया, यदि मेरी शादी में मुझे दहेज मिला होता, तो मैं अपने हिस्से की मांग कभी न करती. लेकिन मेरी कोर्ट मैरेज और रिसेप्शन लड़केवालों ने रखा, बाबूजी को मेरे लिए कुछ भी ख़र्च नहीं करना पड़ा. मायके से खाली हाथ जानेवाली दुल्हन को ससुराल में रत्ती भर भी इज़्ज़त नहीं मिलती, यह तो तुम जानते ही हो, इसीलिए बराबरी का हिस्सा तो मुझे चाहिए."
"जो तुम्हारा अधिकार है, वह तो तुम्हें मिलेगा ही दक्षा, लेकिन, क्या सिर्फ़ अधिकार की मांगें उचित हैं? यदि तुम्हें धन दौलत में हिस्सा चाहिए, तो ज़िम्मेदारियों को भी बांटना चाहिए."
"कौन-सी ज़िम्मेदारी भैया? आप जो भी ज़िम्मेदारी देंगे, उसे में ज़रूर उठाऊंगी."
"तो फिर ठीक है, मैं मां को अपने पास रखूंगा. उनकी देखभाल, दवा-दारू, कपड़े-लत्ते सब कुछ मेरी ज़िम्मेदारी होगी, तुम बाबूजी को अपने साथ ले जाओ."
"ठीक है भैया, पर, मैं मां को अपने साथ ले जाना चाहती हूं. तुम तो जानते ही हो मुंबई में एक आदमी की आमदनी से घर चलाना कितना कठिन होता है, इसीलिए मैं नौकरी तलाश रही हूं. यदि नौकरी मिल गई तो मां के भरोसे पिंकी को छोड़ कर मैं आसानी से काम पर जा सकूंगी."
"ठीक है, तुम मां को ले जाओ."
बच्चों ने बगैर माता-पिता की राय या अनुमति लिए उनके बंटवारे का निर्णय ले लिया. बच्चों का यह अनपेक्षित व्यवहार माता-पिता की आकांक्षाओं पर एक प्रहार से कम नहीं था इसीलिए तो वे जैसे किसी आघात का शिकार हो सोचने-समझने की शक्ति ही खो बैठे और विवेकशून्य बैठे रहे.
इस बंटवारे के कोई नियम और क़ानूनी दांव-पेंच नहीं थे, लेकिन धन-दौलत के बंटवारे में लिखा-पढ़ी होने में काफ़ी समय लगा. धन-दौलत की तुलना में माता-पिता कहीं कम महत्वपूर्ण सिद्ध हो गए थे.
जिस रोज़ दक्षा के साथ अनुपमा देवी को मुंबई जाना था, उसके पूर्व रात्रि को योगेन्द्र जी के कंधे से लगकर अनुपमा देवी सिसक पड़ी थीं.
"इस उम्र में यह जुदाई? मैं तो किसी तरह सह लूंगी, लेकिन तुम... इस उम्र में तो तुम्हारी अच्छी देखभाल होनी चाहिए थी और मैं तुमसे दूर जा रही हूं."
"शायद मेरी ग़लती की उन्होंने यही सज़ा तय की है."
"पता नहीं अब कब मिलना होगा."
"क्यों चिंता करती हो? दक्षा छुट्टियों में आती रहती है, तब तुम भी चली आना, जब सुदेश आएगा, तब मैं वहां आ जाऊंगा, ठीक है ना?"
"क्या ठीक है जी? मैं तो तुम्हारी फ़िक्र में घुलती रहूंगी, कभी-कभी फोन कर लिया करूंगी."
"नहीं अनु... फोन मत करना, बच्चों को पता चल गया तो?"
"जब पता चलेगा, तब देखेंगे, पर, मैं तो फोन करूंगी, तुम्हें देख नहीं पाने का दर्द तुमसे बात करके कुछ तो कम होगा?" विकलता से भरकर अनुपमा देवी ने योगेन्द्र जी की बांहों को कसकर थाम लिया.
"अनु... अब हम बच्चों के अधीन हो गए हैं. उनकी इच्छा जाने बगैर मैंने अपना धन ख़र्च किया, शायद इसीलिए उनका हम पर से विश्वास उठ गया. अब ऐसा कुछ मत करना जिससे उनसे हमारी दूरी बढ़े,"
लेकिन दक्षा के सोने के पिंजरे में क़ैद अनुपमा देवी योगेन्द्र जी के कथन का मान नहीं रख पाई. दक्षा के फ्लैट में जब उस बेबस पक्षी का मन फड़फड़ाने लगता, तब वे मौक़ा पाते ही इलाहाबाद का फोन घुमा देतीं.
योगेन्द्र जी के प्रति अनुपमा देवी के हृदय में असीम चिंता भाव था. दक्षा तो बेटी होकर भी कई बार अनुपमा देवी से इतना कड़वा कह जाती कि वे दंग रह जातीं. तब रह-रह कर यह विचार मन में कुलबुलाने लगता कि जाने योगेन्द्र जी को बहू से क्या कुछ सुनना पडता होगा,
जब कभी भी दक्षा और सुदेश की फोन पर बातचीत होती, अनुपमा देवी दक्षा के पास जाकर खड़ी हो जातीं, इस विश्वास से कि आज तो बेटी मां की भावना को समझेगी और उन्हें अपने पति से बात करने का अवसर देगी, लेकिन ऐसा कभी न होता. पूरी बातचीत के उपरांत अंत में दक्षा बड़ी औपचारिकता से भरकर पूछ लेती, "बाबूजी कैसे हैं?"
निःसंदेह, दो टूक जवाब यही होता होगा कि अच्छे हैं और जवाब पाकर दक्षा एवज में कह देती, "मां भी ठीक है." और फोन रख दिया जाता.
कई बार अनुपमा देवी बेटी की निष्ठुरता पर अंदर-ही-अंदर तिलमिला उठतीं, उन्हें इस बात पर आश्चर्य होता कि कैसे इतनी सहजता से दक्षा अपनी आशा से तकती मां को नज़रअंदाज़ कर जाती है? फोन पर जो भी बातें होतीं, उसका कोई भी अंश अनुपमा देवी को नहीं बताया जाता, शायद दक्षा अनुपमा देवी को इस योग्य नहीं मानती थी कि उनसे अपनी बातों को बांटें.
जिन्हें उंगली पकड़कर चलना सिखाया, जिनकी उंगलियों को अपनी उंगली का सहारा देकर लिखना सिखाया, जिनकी तुतलाहट में स्वर्गीय सुख सा आनंद पाया, जिनके लिए रात-रात भर जागने के बाद भी कभी माथे पर शिकन न आने दी, वे ही बच्चे अब कितने बेगाने हो गए थे, अपने माता-पिता की भावनाओं के प्रति भी और उनके अस्तित्व के प्रति भी.
अनुपमा देवी ने पुनः अपनी व्यथित आंखों से घड़ी की ओर देखा. अब तीन बज चुके थे और भोर होनेवाली थी. काफ़ी सोचने और चिंताग्रस्त रहने से सिर भारी सा रहने लगा था. इच्छा तो हो रही थी कि फिर से एक बार इलाहाबाद का नंबर डायल करके देख लें, लेकिन शरीर साथ नहीं दे पाया, इसीलिए निस्तेज-सी वहीं ड्रॉइंगरूम के सोफे पर लुढ़क गई और तत्काल उन्हें नींद भी आ गई.
अचानक, कॉलबेल की आवाज से अनुपमा देवी हड़बड़ाकर उठ बैठीं. घड़ी में देखा, तो सवा चार बज गए थे. "इस वक़्त कौन होगा?" वे मन-ही-मन बुदबुदाई.
"कौन है?" अपनी कोमल, कंपकंपाती आवाज़ में थोड़ा-सा भारीपन लाने का असफल प्रयास करते हुए उन्होंने पूछा, पर कोई जवाब नहीं. कॉलबेल पुनः बजी.
सहम गई अनुपमा देवी. आजकल मुंबई में चोरियां बहुत हो रही हैं. घर में औरत के अकेले रहने का पता चलते ही, चोर घर में घुस जाते हैं और मारपीट कर चोरी कर भाग जाते हैं.
लेकिन अनुपमा देवी को तत्काल लगा कि वे क्यों डरें? पति के वियोग को सहन करते हुए जो उद्देश्यहीन जीवन वे जी रही थीं, उस जीवन से मोह स्वयं ही असंगत-सा लगता है.
तेजी से आगे बढ़ीं और बगैर किसी खौफ़ के दरवाज़ा खोल दिया, पर दरवाज़ा खोलते ही आंखें फटी की फटी रह गईं. लगा वृद्ध, कमज़ोर शरीर अब थरथरा कर ज़मीन पर लुढ़क जाएगा. लेकिन किसी तरह अपने आपको सम्हाल लिया अनुपमा देवी ने. स्वयं को न सम्हालतीं तो उस सामनेवाले के कंपकंपाते शरीर का संबल कैसे बन पातीं? जो सालों बाद आंखों के आगे आया था उनका अपना योगेन्द्र. पूरी रात योगेन्द्र जी की चिंता ने उन्हें पीड़ित कर रखा था और अब भोर होते ही जैसे सारी पीड़ा छूमंतर हो गई. ख़ुशी के आंसू बह निकले उनकी आंखों से.
स्वागत के लिए अपना स्नेहिल, थरथराता दामन पसार दिया योगेन्द्र जी की तरफ़ और पूछ बैठी, "तुम यहां कैसे जी?"
"जितना बर्दाश्त कर सकता था कर लिया. अब दूरी मेरे बर्दाश्त के बाहर है." तेजी से अंदर प्रवेश करते हुए योगेन्द्र जी ने अपने कांपते शरीर में कस लिया अपनी धर्मपत्नी को.
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अनुपमा देवी सिसक पड़ी. दुर्बल हो गया था, योगेन्द्र जी का सीना... एकदम मांसरहित, जैसे सिर्फ़ हड्डियां ही शेष रह गई थीं. देर तक अनुपमा देवी अपने पति के स्पर्श को आत्मसात करती रहीं.
"कुछ खाते नहीं थे क्या? बिल्कुल दुबले हो गए हो?" नीर भरे नयनों को पोंछते हुए अनुपमा देवी ने पूछा.
"खाने-पीने की कोई कमी नहीं थी. पर मन ही नहीं लगता था. हर चीज़ से जैसे जी उचट गया था. बस... तुम्हारी बहुत याद आती थी."
"याद है... जब साथ रहते थे तब लगभग हर रोज़ मुझसे लड़ा करते थे."
"हां अनु... सब याद है. उन्हीं यादों ने तो इन पांच वर्षों तक मुझे सम्हाले रखा था. जानती हो अनु, सुदेश ने मुझसे कहा था कि इस बार गर्मी की छुट्टियों में तुम्हें और दक्षा को ज़रूर बुलवाएगा. लेकिन जब दक्षा ने फोन पर अपनी ननद की शादी में जाने की बात की, तब सुदेश ने भी अपने हिल स्टेशन जाने का प्रोग्राम बना लिया."
"तुम्हें साथ चलने को नहीं कहा?" उत्साहपूर्वक योगेन्द्र जी को ताकती हुई अनुपमा देवी ने पूछा.
"कहा तो था, लेकिन मैं हिल स्टेशन क्यों जाऊं? मैं तो तुमसे मिलना चाहता था. जब मैंने सुदेश से अपने मन की बात कही तो बोला, "क्या करोगे वहां जाकर? दक्षा तो वहां है नहीं, जब दक्षा लौट आएगी तब चले जाना." सुनकर लगा कितने स्वार्थी हो गए हैं हमारे बच्चे, हमारे रिश्ते को जैसे जान-बूझकर नकारते रहते हैं. तुमसे मिलने को मैं कितना लालायित हूं, क्या वह नहीं समझ पाता होगा?"
"समझ क्यों नहीं पाता होगा जी. बस उन्हें अब हमारी फ़िक्र नहीं रही. उन्हें हम दोनों सिवाय एक विवश इंसान के और कुछ भी नहीं लगते."
"अनु... एक बात कहूं तो मानोगी?"
"तुम्हारी बात टाली है आज तक?"
"मैंने इलाहाबाद के एक वृद्ध आश्रम में हम दोनों के लिए बात कर ली है. अब बची हुई जिंदगी हम लोग हम जैसों के संग रहकर काटेंगे... एक साथ."
"लेकिन, क्या इससे बच्चों का अपमान नहीं होगा?"
"अनु, जिंदगी अब थोड़ी-सी बची है. उसे क्यों न ख़ुशी-ख़ुशी व्यतीत करें. तुम्हें याद होगा, हमारी शादी के दो साल बाद ही सुदेश पैदा हो गया था, फिर दो साल बाद दक्षा, बच्चों की देख-रेख के बीच हम दोनों एक-दूसरे के लिए वक़्त ही कहां निकाल पाते थे. अब... हम पर कोई बोझ नहीं और न हमें किसी पर बोझ बनना है. इसलिए क्यों न हम जीवन के अंतिम दिनों को एक दूसरे के साथ बिताएं... हंसते हुए."
"ठीक है."
"और हां... अनु, मुझे मेरी बहन ने ५० हजार रुपए लौटा दिए हैं. जब पैसे लौटाए गए तब सुदेश नहीं था. २५ हज़ार दक्षा को दे जाएंगे और २५ हजार सुदेश को दे देंगे. पैसे पाने के बाद शायद उनकी नाराज़गी भी दूर हो जाएगी और वे हमें साथ-साथ जीने का हक़ भी दे देंगे."
"दक्षा परसों लौटेगी... उसके बाद हम चलेंगे? है ना?"
"हां... मैंने यहां आने की ख़बर भी सुदेश को नहीं दी थी. शायद उससे पूछने का साहस नहीं था. तुम नहीं थीं अनु तो मैं बेहद कमज़ोर हो गया था शरीर से भी, मन से भी. लेकिन अब तुम साथ हो तो भला पूछने में कैसी हिचक?"
"मेरा भी वही हाल है... मेरे शरीर में भी जैसे अब शक्ति का संचार हो रहा है. तुम बैठो मैं चाय बना लाती हूं." मुस्कुराते हुए अनुपमा देवी ने कहा तो उनका झुर्रियों वाला चेहरा स्नेहलिप्त हो दहकने लगा, सालों पहले सी चपलता जैसे रोम-रोम से प्रस्फुटित होने लगी थी.
एक बार फिर से योगेन्द्र जी के साथ जीवन बिता पाने की ख़ुशी ने उनमें एक नई नवेली दुल्हन-सी नज़ाकत भर दी थी और चेहरे पर स्थापित हो चुकी थी एक न मिटने वाली, चिर मुस्कुराहट.
- निर्मला सुरेंद्रन
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