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काव्य- मन तीर्थ स्थल बन गया (Kavya- Mann Trith Sthal Ban Gaya)

मन के घेरे में

किसी की यादें

परिक्रमा लगाने लगीं

मन पवित्र तीर्थ स्थल बन गया

अंतःकरण के वन में

किसी की प्रेमगंध

बिखर गई

अंतस सुंगंधित उपवन बन गया

दुख के सांचे में

किसी ने अपने सारे सुख

ढाल दिए

जीवन सुख का आधार बन गया

अतीत के बिखरे टुकड़ों को

किसी ने जोड़ लिया

अपने वर्तमान से

और अतीत पुनः जीवित हो गया

बुझते दीप में

किसी ने अपनी आशाओं का

घृत डाल दिया

वह घृत दीप का विश्वास बन गया...

- डॉ. अनिता राठौर 'मंजरी'

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