"हां, कमी है. पति के प्यार की, सहानुभूति की. क्या एक पत्नी को पति सदभावना की आवश्यकता नहीं होती सहयोग सुख, उसके उत्साह, उसकी इच्छा, उसकी आकांक्षा का कोई मतलब नहीं है? उसकी पसंद, उसकी रुचि बेमानी है? क्या पत्नी घर की देखभाल करने और खाना पकाकर खिलाने वाली स्त्री मात्र होती है? इसी के लिए वह अपने मां पिता का घर छोड़कर पति के घर आती है?"
संबंध के निर्माण के लिए कम से कम दो व्यक्ति होने चाहिए, दो से अधिक भी हो सकते हैं, पर दो व्यक्तियों का होना अनिवार्य है. संबंध का निर्माणमनचाहा भी हो सकता है, अनचाहा भी हो सकता है. कभी-कभी संबंध सुंदर भी होते हैं और असुंदर भी, मधुर भी होते हैं और कटु भी. संबंधों से व्यक्तित्व का निर्माण भी होता है. कभी -कभी ये संबंध अनचाहे खेल भी दिखा देते हैं. संबंध का ऐसा ही एक अनचाहा खेल कहानी के दोपात्रों के जीवन में खेला जाता है. यह खेल युद्ध का रूप भी ले लेता है.
पिछले अप्रैल में उसकी मां को डायरिया हो गया. डिहाइड्रेशन का ख़तरा था. वह नगर निगम के आइसोलेशन अस्पताल ले गया, भर्ती कराया. तीन दिन और तीन रात अस्पताल में रहा. दवा, बर्फ़, बिना दूध की कॉफी बराबर देता रहा. स्वयं का खाना-पीना, नहाना-धोना, नींद-आराम, सब कुछ भूल गया. चौथे दिन अस्पताल से मां को छुट्टी मिली, तो घर लाया. अपने हाथ से मूंग की दाल की खिचड़ी पकाकर खिलाई. एक सप्ताह तक कॉलेज पढ़ने नहीं गया.
दीपू कालेज की पढ़ाई के अतिरिक्त घर के सारे काम करता है. अनाज किराना, साग सब्ज़ी तथा अन्य आवश्यक वस्तुएं बाज़ार जाकर ख़रीद लाता है. घर की सफ़ाई स्वयं करता है. बर्तन-कपड़े आदि के लिए एक नौकरानी रखी है सखुबाई. पिछले पंद्रह वर्षों से वह काम कर रही है. कभी-कभी दीपू सखुबाई के साथ बैठकर गप्पें भी मारता है. सखुबाई से पूछता है, "तुम्हारे पति ने दारू पीना छोड़ा या नहीं, तुम्हारा लड़का पढ़ाई में ध्यान देता है या नहीं. घर गृहस्थी का गुज़ारा कैसे हो जाता है?" कभी-कभी बड़े प्यार से कहता है, "बहुत दिनों से उसने लाल मिर्च और लहसुन की चटनी नहीं खिलाई."
दीपू के लिए उसकी मां ही सब कुछ है. मां की सेवा में उसका जीवन आहुति बन गया है. मां ही उसके लिए पिता है, बंधु है, सखा है, विद्या है, धन है और ईश्वर भी.
मोहल्ले के लोग दीपू की तारीफ़ करते अघाते नहीं हैं. पड़ोसी अपने बच्चों से कहते हैं, "दीपू को देखो, अपनी मां की कैसी सेवा करता है. पिता भी नहीं है. पिता था भी तो डाकघर का एक मामूली बाबू ही न? फिर भी लड़का कितना आज्ञाकारी है. उसकी मां कभी शिकवा-शिकायत करती है उसकी? और तुम लोग देखो छोटा सा काम बताया तो कहते हो फ़ुर्सत नहीं है. ज्यादा ही हुआ तो पढ़ाई का बहाना बना लेते हो."
परंतु मोहल्ले के लड़के दीपू को घोंचू कहते हैं, घरघुसा भी कहते हैं, "मां का भगत बनता है, कभी खेलने नहीं आता, पिक्चर देखने नहीं आता. कॉलेज और घर के सिवा उसके लिए है भी कुछ?"
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दीपू इस साल बी.ए. फाइनल की परीक्षा देगा. मांकहती है, "मेरी इतनी चिंता करना छोड़ और अपनी पढ़ाई कर, प्रथम श्रेणी मिलेगी तो नौकरी भी अच्छी मिल जाएगी. फिर मैं राज करूंगी. तेरे लिए एक सुंदर सी गुड़िया जैसी बहू ले आऊंगी."
मां की बात सुन दीपू कहता है, "क्या मां, बुढ़ापे में लोग ज़्यादा बोलते हैं? अरे हां, याद आया, मेरा वो दोस्त है ना, जॉन हैरिस, एक बार आया था अपने घर?"
"हां रे, बोल ना. क्या बात है?" मां कहती हैं.
"उसकी मां डॉक्टर है और पिता रिटायर हो चुके हैं. पिछले दिनों उनके घर एक पादरी आया था आयरलैंड से यह जानने-समझने कि भारत के लोगों को ईसाई धर्म की शिक्षा कैसे दी जाए, पर यहां आकर उसने देखा, हरेक घर में बूढ़े मां-बाप की सेवा उसके घर के लोग कितनी अच्छी तरह करते हैं. उनका ध्यान रखते हैं. उस पादरी ने जाते वक़्त कहा कि जिस देश में बूढ़े मां बाप की इतनी सेवा की जाती है, उस देश के लोगों को वह धर्म की शिक्षा क्या देगा. कुछ समझी, मां?"
"हां रे, समझी, पर अभी खाना खा और पढ़ाई कर. एक महीने के लिए अपनी मां को भूल जा. पढ़ाई को याद रख. जा जल्दी जा. हाथ मुंह धो, मैं तेरे लिए खाना लगाती हूं." मां ने दीपू से अपना पिंड छुड़ाया.
दीपू ने बी.ए. की परीक्षा दी और पास भी हो गया, पर द्वितीय श्रेणी में. मां ने कहा भी कि उसने जान बूझकर पढ़ाई में उतना ध्यान नहीं दिया. मां की सेवा में लगा रहा. चलो अच्छा हुआ जो भी हुआ.
मां को अब दीपू की नौकरी की चिंता हुई. भाग्य से दूसरी गली में रहने वाले नारायण बाबू को वे जानती थीं. उन्होंने दीपू की मां से कहा,-"चिंता की कोई बात नहीं है. मेरे दफ़्तर में ही एक जगह खाली हुई है. दीपू से कहना कि पहले वह रोज़गार दफ़्तर में अपना रजिस्ट्रेशन करवा ले. बाकी मैं देख लूंगा."
दूसरे दिन दीपू रोज़गार दफ़्तर गया. एक सप्ताह बाद नारायण बाबू की मदद से दीपू को नौकरी भी मिल गई. नियुक्ति पत्र भी आ गया. दीपू इतना ख़ुश हुआ कि मां से लिपट गया. कहने लगा, "मां, तूम्हारा बेटा किसी लायक बना कि नहीं?"
दीपू की बात सुन मां की आंखें भीग आईं.
दीपू ने नौकरी पर जाना आरंभ कर दिया पहली पगार जिस दिन मिली, दफ़्तर से लौटते हुए वह बाज़ार गया. दो सुंदर सी साड़ियां और दो जोड़ी चप्पलें ख़रीदीं और ढेर सारी मिठाइयां लेकर घर पहुंचा, मां ने पूछा भी, "इतना सारा क्या ख़रीद कर ले आया, रे दीपू ?"
"मां, आज कुछ पूछना भी मत और मुझे रोकना भी मत्. यह देखो कितनी सुंदर साड़ी लाया हूं तुम्हारे लिए!" मां को साड़ी देते हुए दीप ने कहा.
मा अपलक नेत्रों से देखती भर रही.
"यह दूसरी साड़ी सखुबाई के लिए बहुत दिनों से तुमने उसे कुछ दिया नहीं है ना. हर समय शिकायत करती रहती है और तुम उसे डांटकर चुप करती रहती हो."
"अच्छा अच्छा, बहुत होशियार हो गया है न तू नौकरी पाकर."
"ये एक जोड़ी चप्पल तुम्हारे लिए और दूसरी सखुबाई के लिए, कल से तुम वह फटी चप्पल नहीं पहनोगी, समझी?"
"अच्छा-अच्छा, ठीक है."
"ये हैं मिठाइयां और बाकी बची पगार."
"पहले हाथ-मुंह धो, देवी के आगे दीया जला, भोग लगा और फिर ये मिठाइयां मुहल्ले में बांट आ."
"मां, यह काम तुम करोगी मैं बहुत थक गया हूं."
आज दीपू का विरोध करने की शक्ति मां में नहीं थी.
दूसरे दिन सुबह सखुबाई घर के काम निबटकर जाने लगी, तो मां ने उसे रोक कर कहा, "ऐ सखु सुन, कल दीपू की पहली पगार मिली है. देख, तेरे लिए क्या लाया है?"
मां ने पहले उसे मिठाई दी और बाद में साड़ी और चप्पल की जोड़ी.
सखुबाई ने ख़ुश होकर कहा, "मालकिन, भगवान करे, दीपू भइया का ब्याह जल्दी हो जाए."
दीपू ने जब यह सुना, तो बोल उठा, "क्यों सखुबाई, जो तुम्हें मिठाई खिलाए, साड़ी और चप्पल कीजोड़ी दे, उसे ब्याह जल्दी हो जाने का आशीर्वाद देती रहेगी?"
"हम गरीबों के पास सिवाय आशीर्वाद के और होता ही क्या है, दीपू भउया?" और सखुबाई आंचल से अपनी आंखें पोंछने लगी.
दीपू ने कहा, "तेरा लड़का घर पर पढ़ाई करता है या नहीं? शाम को सात बजे मेरे पास भेज दिया कर. मैं उसे पढ़ा दिया करूंगा."
"नहीं दीपू भइया, आप क्यों बेकार तकलीफ़ उठाएंगे? गरीब का लड़का है, किसी तरह पढ़ ही लेगा." सखुबाई ने कहा.
"क्या ख़ाक़ पड़ेगा. बाप दारू पिएगा, मां दूसरों के घरों में बर्तन मांजने का काम करेगी और बेटा ख़ुद पढ़ेगा... कल से ठीक सात बजे कॉपी-किताब लेकर भेज देना उसे. समझी कि नहीं?"
"ठीक है, दीपू भइया, आप कहते हैं तो भेज दिया करूंगी." और सुखबाई चली गई.
दीपू को नौकरी मिल जाने पर मां की एक चिंता तो मिट गई, पर दूसरी चिंता ने जन्म लिया. अब मां सोचने लगी, दीपू की शादी जल्दी हो जाए. उसे अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए अधिक समय तक रुकना भी नहीं पड़ा. कानपुर से उसकी फुफेरी बहन की चिठ्ठी आई. लिखा था. उसके रिश्ते में एक विवाह योग्य लड़की है, सुंदर और सुशील, बी.ए. पास है. घर परिवार भी ठीक है. वह चाहे, तो कानपुर आकर देख जाए. मां ने यह बात दीपू को बताई तो उसने कहा, "मां, तुम्हीं जाकर देख आओ न. तुम्हें पसंद आएगी, तो मुझे भी पसंद आ जाएगी." इस पर मां को कहना पड़ा, "ना, बाबा ना, बाद में तू मुझे कोसता रहेगा. कैसी लड़की से मैंने तेरा ब्याह करा दिया! नया ज़माना है. लड़की तुझे ही पसंद करनी पड़ेगी."
"तो ठीक है, देख आएंगे." दीपू ने बात ख़त्म की.
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दीपू का विवाह भी हो गया. मध्यमवर्ग के परिवार में जैसा विवाह होता है, उसी तरह से. यहां से दीपू के जीवन का सच्चा संघर्ष शुरू हुआ. विवाह समस्याओं का अंत साबित होने की बजाय अनेक समस्याओं का प्रारंभ करने वाला साबित हुआ. मां चाहती थी कि दीपू अपनी नवविवाहिता पत्नी को लेकर हनीमून के लिए महाबलेश्वर या माथेरान जाए, पर दीपू ने 'ना' कर दी. उसका तर्क था कि दस पंद्रह दिनों तक वह मां को अकेली छोड़कर कहीं नहीं जाएगा. उसकी अनुपस्थिति में मां को कुछ हो जाए तो? मां बीमार हो जाए तो. उसका यह तर्क मां को और उसकी पत्नी को भी पसंद नहीं आया.
घर में पत्नी के आने पर दीपू में फ़र्क़ तो ज़रूर आया. वेशभूषा पर अब वह विशेष ध्यान देने लगा. कपड़ों के चुनाव में भी फ़र्क़ आ गया. खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, उठने-बैठने तथा काम करने के तौर तरीक़ों में भी सुधार आ गया. पहले का ढीला-ढाला दीपू अब एक स्मार्ट युवक बना गया. पड़ोसी कहने लगे यह सब उसकी पत्नी, उमा का कमाल है. बात किसी हद तक सही भी थी. यह सब होने पर भी दीपू मां की सेवा में पहले जैसा ही लगा रहा. मां सुंदर और सुशील बहू पाकर स्वयं को धन्य समझने लगी. वह अपनी नवविवाहिता बहू का ख़ूब ध्यान रखती. बदले में बहू भी अपनी सास का पूरा ख़्याल रखती. लेकिन मां के मन में एक बात हरदम खटकती रहती कि दीपू उमा का उतना ध्यान नहीं रखता, जितना अपनी मां का रखता है. बात सच भी थी. उमा चाहती थी वह अपने पति के साथ घूमने जाए, बाज़ार जाए, पिक्चर देखने जाए. उसकी पसंद की चीज़ें उसका पति ख़रीद कर लाए. उसका पति उसकी आशाएं, आकांक्षाएं, सपने और कल्पनाएं समझे और उसका पूरा ध्यान रखे, पर दीपू यह सब नहीं कर पाया. दफ़्तर से लौटकर उससे पूछे कि दिन कैसे कटा? दिन में क्या-क्या काम किया उसने ? परंतु दीपू घर लौटकर कुछ भी न पूछता. पूछता तो केवल एक ही बात कि मां कहां है, क्या कर रही है, दोपहर की चाय और नाश्ता मां को दिया था कि नहीं? उमा के विषय में कुछ भी न पूछता.
मां का सोने का समय होने पर उसे दूध दिया कि नहीं-उमा से पूछे बगैर न रहता. कभी-कभी तो रात में उठकर मां के कमरे में जाता और देखता-मां सोई है या नहीं. चादर ओढ़ी है या नहीं. पानी का लोटा और ग्लास रखा है या नहीं. जब चुपचाप दबे पांव दीपू लौटता, तो उमा पूछती, "मां की इतनी ही सेवा करनी थी, तो मुझे ब्याहकर क्यों लाए हो? मां की सेवा में ही जीवन बीता देते. हर बार मां मां करते रहते हो."
उमा की बात दीपू को अच्छी नहीं लगती. फिर भी बिना बौखलाए, बिना संतुलन खोए वह कहता, "उमा, ऐसा नहीं है. तुम तो जानती हो, मेरा कोई भाई-बहन नहीं है, न काका, न मामा, न फूफा, न मौसा. मेरे लिए बचपन से ही सब कुछ मां ही रही है. उसी के साए में पला हूं. मेरी सारी भावनाएं मां में ही केंद्रित होकर रह गई हैं. मां से मन हटने में कुछ तो समय लगेगा ही. तुम्हारा मन दुखाना मेरा उद्देश्य नहीं है. फिर मां का भी इस दुनिया में कौन है?
"क्यों? बहू नहीं है क्या?"
"अरे, तुम तो अभी आई हो."
"छोड़ो इन बातों को. एक बात कहूं? आज पड़ोस से राधा आई थी अपने घर, शर्मा जी की बहू. उसकी, धारियों वाली साड़ी कितनी अच्छी थी. मुझे भी ला दो न वैसी ही साड़ी."
"एक तारीख़ को पगार मिलने पर अवश्य ला दूंगा."
"तो मुझे एक तारीख़ तक रुकना पड़ेगा?"
"हां, रुकना तो पड़ेगा ही. अच्छा अब सो जाओ." दीपू ने साड़ी ख़रीदने का हल ढूंढ़ लिया.
चाहकर भी दीपू मां की ओर से अपना ध्यान नहीं हटा सका. मां की सेवा में कोई कमी न ला सका. फलतः उमा के प्रति अपने व्यवहार में उतना लगाव, आसक्ति, प्रेम नहीं ला सका, जिसकी अपेक्षा एक पत्नी को अपने पति से होती है. दीपू उमा के प्रति उदासीन और निरपेक्ष बना रहा. मां चाहती कि वह पत्नी के प्रति अपने कर्तव्यों को, अपनी ज़िम्मेदारियों को समझे, पर ऐसा हो न सका. शाम को पिक्चर देखने का, घूमा लाने का, बाज़ार जाने का वायदा करके भी दीपू ठीक समय पर घर नहीं लौट सका. उसी दिन दफ़्तर में ज़्यादा काम निकल आता. एक इतवार को रामटेक की पहाड़ी और खिंडसी तालाब ले जाने की पूरी योजना बनाई गई. बस में दो सीटों का रिजर्वेशन भी करा लिया गया, खाने पीने की सारी सामग्री भी उमा ने बड़े उत्साह से बना कर रख ली, पर शनिवार की रात दीपू को बुखार हो आया. सारा प्रोग्राम जहां का तहां धरा रह गया. उमा मन मसोसकर रह गई. मां इन बातों को बड़ी जागरूकता से देखती-परखती रही. बहू के सुख के लिए क्या करे, एक नवविवाहिता की आशाओं-आकांक्षाओं को कैसे पूरा करे, दीप के मन और स्वभाव को कैसे बदले, ये सारी चिताएं मां के मन को घेर लेतीं. यह बात नहीं थी कि उनके कारणों को वह जानती नहीं थी. सबकी तहों में वह स्वयं ही थी. उमा की अवस्था, लाचारी, परेशानी वह अपनी आंखों से देखती रहती, अनुभव करती रहती. कोई निर्णय लेती भी, तो कुछ सोचकर उसे बदल देती. ऐसा मां के साथ कई बार हुआ, पर अब तो पानी सिर के ऊपर जा रहा था. मां ने पक्का निर्णय लिया. बहू को उसका हक़ दिलवा के रहेगी, चाहे कुछ भी हो जाए. उमा का उदास चेहरा और अधिक समय तक देख पाना उसके लिए असंभव हो गया.
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एक दिन शाम को उमा पड़ोस की राधा के घर गई थी. मां ने दीपू को अपने कमरे में बुलाया और बैठने को कहा. दीपू ने पूछा, "क्या बात है, मां?"
"बहुत दिनों से एक बात कहना चाहती थी."
"फिर कहो न. क्या बात है?"
"तू उमा को ख़ुश नहीं रख सकता?"
"ये कैसी बात कर रही हो मां? क्या तक़लीफ है उसे? खाने पीने, पहनने ओढ़ने को सब कुछ तो मिलता है. क्या कमी है उसे? सब कुछ तो है उसके पास. किसी चीज़ की कमी है इस घर में उसके लिए?"
"हां, कमी है. पति के प्यार की, सहानुभूति की. क्या एक पत्नी को पति सदभावना की आवश्यकता नहीं होती सहयोग सुख, उसके उत्साह, उसकी इच्छा, उसकी आकांक्षा का कोई मतलब नहीं है? उसकी पसंद, उसकी रुचि बेमानी है? क्या पत्नी घर की देखभाल करने और खाना पकाकर खिलाने वाली स्त्री मात्र होती है? इसी के लिए वह अपने मां पिता का घर छोड़कर पति के घर आती है?"
"यह सब क्या उमा ने कहा तुमसे?"
"उसे कहने की ज़रूरत ही क्या है? मैं देखती नहीं, समझती नहीं? तुझे तो मां के सिवाय कुछ सूझता ही नहीं है. मेरी समझ में यह बात नहीं आती है कि क्यों तू मेरा इतना ख़्याल रखता है, मेरी इतनी सेवा करता है? किसी दूसरे बेटे को मैंने आज तक नहीं देखा विवाह के बाद अपनी मां की इतनी सेवा करते हुए."
"क्या मां के प्रति एक बेटे का कोई कर्तव्य नहीं होता?"
"होता होगा, पर इतना नहीं, जितना तू समझता है."
"क्या तुम मेरी मां नहीं हो?"
"नहीं, तू मेरा बेटा नहीं है."
"क्रोध में आने पर मां-बेटे का रिश्ता टूट जाता है?"
"जब मैं तेरी मां ही नहीं हूं, तब रिश्ता टूटने का सवाल ही नहीं उठता.'
"तो मैं किसका बेटा हूं? मेरी मां कौन है?"
"मुझे नहीं मालूम."
"फिर किसे मालूम है?"
"मर गया वह आदमी, जिसे मालूम था. जगन्नाथ बुधवारी के शंकरजी के मंदिर का पुजारी, उसी के पास से मैं तुझे लाई थी."
"एक बार कह दो मां कि यह सब झूठ है."
"जो सच है, उसे कैसे कह दूं कि झूठ है?"
"तो यह सच है कि मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूं."
"हां, यही सच है."
"फिर इतने दिनों तक चुप क्यों रही?"
"इसलिए कि तुझे मां की ज़रूरत थी और मुझे बेटे की."
"भले ही सच हो. मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूं, पर तुम्हें अपने मुंह से कहने की ज़रूरत क्यों पड़ गई?"
"ज़रूरत पड़ गई, इसलिए तो कह रही हूं."
"जान सकता हूं मैं वह कौन सी ज़रूरत है?"
"तू उमा का बिल्कुल ध्यान नहीं रखता. इसलिए ज़रूरत पड़ गई."
"अगर मैं उमा का ध्यान रखूं, तो यह बात तुम किसी से नहीं कहोगी, वचन देती हो मुझे?"
"हां, वचन देती हूं."
"उमा से भी नहीं?”
"हां, उमा से भी नहीं कहूंगी."
"अब एक बात बताओ. तुम मां होकर भी इतनी कठोर कैसी बन गई?"
"उमा की ख़ातिर."
"इतनी प्यारी हो गयी बहू? बेटे का ख़्याल नहीं रहा कि उस पर क्या गुज़रेगी?"
"मेरे पास दूसरा इलाज ही नहीं था." मां ने अपनी बात पूरी की.
इसी बीच उमा पड़ोस से लौट आई. दीपू ने कहा, "उमा, जल्दी से कपड़े बदलो और तैयार हो जाओ. बाहर जाना है. पंचशील थिएटर में आज बड़ी अच्छी पिक्चरलगी है. पिक्चर के बाद खाना भी बाहर ही किसी होटलमें खाएंगे."
उमा केवल देखती ही रही. उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था. उसने दीपू से पूछा, "आख़िर बात क्या है? मैं भी तो कुछ सुनू."
"सवाल करना मना है. जल्दी तैयार हो जाओ. वही धारीवाली साड़ी पहनना." दीपू के स्वर में अधिकार की भावना थी और एक अद्भुत उमंग भी. मां ने संतोष की सांस ली, पर उमा अनजान थी. उसके लिए आज घर में कितना बड़ा संबंध का युद्ध हुआ था. यह युद्ध कितना भयंकर था, इसकी कल्पना भी उसे न थी. कौन जीता और कौन हारा, यह भी उसे पता नहीं था.
