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कहानी- आज का कृष्ण (Short Story- Aaj Ka Krishan)


डॉ. अनिता राठौड़ मंजरी

“अपने कृष्णा को भूल जाएगी तू?” वह भावुक स्वर में बोला, तो मेरी आंखें भी नम हो गईं.
“कृष्णा, मैं तुझे कभी भी नहीं भूलूंगी. तू मेरे बचपन का साथी जो है.”
और सच में, मैं उसे आज तक नहीं भूली. शादी के बाद जब भी मायके जाती मेरी निगाहें उसे ढूंढ़तीं...

“दीदी, इस सावन पर आपको आना है. खुशी ने कहा है वह अपना पहला सावन मायके में मनाएगी. उसने अपनी बचपन की सभी सहेलियों को बुलाया है.” भाभी ने फोन पर बताया, तो मैं प्रसन्नता और आश्‍चर्य से भर उठी.
खुशी मेरी भतीजी जिसकी शादी अभी हाल ही में हुई है, वह और उसका पति विराट दोनों ही बैंगलुरू में बहुराष्ट्रीय कंपनी में उच्च पदों पर आसीन हैं.
इस सुखद समाचार से मैं अभिभूत और रोमांचित हो उठी. जब वेदांत को बताया, तो वह हंस पड़े और छेड़ते हुए बोले, “बुढ़ापे में सावन मनाने मायके जाओगी, झूला झूलते व़क्त ध्यान रखना. कहीं गिर ना पड़ो और दांत ना टूट जाएं तुम्हारे.”
दांत टूटने की बात सुनकर अचानक अपने बचपन में पहुंच गई मैं. सावन आते ही घर-घर में झूले पड़ जाते थे. हमारे घर में झूला लगाने की कोई व्यवस्था नहीं थी, इसलिए मैं अपनी बुआ के साथ अपनी बस्ती के पास ही एक बहुत बड़े चौक में झूला झूलने जाती थी. जहां एक बहुत बड़े पेड़ पर झूला डाला जाता था और सभी को बारी-बारी से झूला झुलाया जाता था. झूलते व़क्त हम सभी सखियां गाना गाते थे- झूला तो पड़ गए अमुवा की डाल पे जी...
एक सुंदर और सांवला हमउम्र लड़का कृष्णा बहुत लंबे-लंबे झोंके देता था. मैं डर से चिल्लाती, “कृष्णा, मैं गिर जाऊंगी. मेरे दांत टूट जाएंगे.”
“कोई बात नहीं राधा, तेरे दांत टूट गए, तो मैं नए दांत लगवा दूंगा.” कहते हुए वह और तेज़ी से झोके देता.
और सच में एक दिन मैं झूले से गिर पड़ी और आगे का एक दांत टूट गया. खून की धारा बहने लगी. कृष्णा ने तुरंत अपनी टी-शर्ट उतार कर खून साफ़ किया और मेरा टूटा हुआ दांत अपनी पैंट की जेब में रख लिया और बोला, “तेरा दांत मैं लगाऊंगा.”
यह सुनकर सभी हंस पड़े. मेरी बुआ बोली, “पगले टूटा दांत दोबारा थोड़ी लगता है. यह तो इसके दूध के दांत हैं, दोबारा आ जाएंगे. जब बुढ़ापे में दांत टूटते हैं तब नकली दांत लगाए जाते हैं.”
“सच बुआ.” आश्‍चर्य से कृष्णा बोला.
“तेरी मेरी कट्टी कृष्णा, तेरी वजह से मेरा दांत टूट गया.” मैंने रोते हुए कहा.
“राधा, मुझे माफ़ कर दे. मैं तेरा दांत जोड़ दूंगा.” रुआंसे स्वर में वह बोला.
यह सुनकर दर्द का तीव्र एहसास होते हुए भी मैं ज़ोर से हंस पड़ी और बोली, “राधा कृष्ण की कट्टी कभी हुई है भला?”
फिर से हमारी दोस्ती हो गई. हर सावन में वह झूला झुलाता. यौवन की दहलीज़ पर पांव रखते ही मेरे विवाह की बात वेदांत से चली, तो मैंने कोयल की तरह चहकते हुए उसे बताया, “कृष्णा, मेरी शादी की बात चल रही है. इस फागुन में मेरा ब्याह हो जाएगा. तू मेरी शादी में ज़रूर आना. तुझे वेदांत से मिलवाऊंगी. वह बैंक में बाबू है. उसने मेरी भाभी को बताया है कि वह शादी के बाद मुझे घुमाने शिमला, कुल्लू-मनाली ले जाएगा. सच, मुझे तो पहाड़ों पर जाने की सोच कर ही मन में एक मीठी सी सिहरन और गुदगुदी हो रही है.”

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“अपने कृष्णा को भूल जाएगी तू?” वह भावुक स्वर में बोला, तो मेरी आंखें भी नम हो गईं.
“कृष्णा, मैं तुझे कभी भी नहीं भूलूंगी. तू मेरे बचपन का साथी जो है.”
और सच में, मैं उसे आज तक नहीं भूली. शादी के बाद जब भी मायके जाती, मेरी निगाहें उसे ढूंढ़तीं, लेकिन वह कभी नहीं मिला.
फिर वह मायके वाला शहर भी छूट गया, क्योंकि भइया की नौकरी अलीगढ़ लग गई और वहीं पर सब सेटल हो गए.
“इस सावन पर आपके मायके जाने के लिए रिज़र्वेशन हो गया है.” वेदांत ने कहा तो मैं वर्तमान में लौट आई.
अलीगढ़ रेलवे स्टेशन पर भइया-भाभी को देखकर आंखें भर आईं मेरी. भइया ने स्नेह से गले से लगा लिया, “चल पगली, रोती क्यों है? घर चल, तेरी पसंद की हर चीज़ मिलेगी तुझे, घर पर बनाई गई सेवईर्ं और कुंजीलाल का मलाईदार घेवर.”
मलाईदार घेवर सुनकर मुंह में पानी आ गया. बचपन में हम भाई-बहनों में कितनी लड़ाई होती थी घेवर को लेकर. छोटा भाई तो घेवर की मलाई ही खा जाता था. मां डांटती थीं, “थोड़ा बहुत तो छोड़ दे. बुआ को भी तो खिलाना है.” बुआ लाड़ से कहतीं, “भाभी, कोई बात नहीं मेरे भतीजे-भतीजी ने खा लिया, तो समझो मैंने भी खा लिया.”
उनकी तो जान ही बसती थी हम भाई-बहनों में. सावन पर जब भी आतीं, तो हम बहनों के लिए बालों के सुंदर-सुंदर क्लिप, चूड़ियां और माला लातीं. भाइयों के लिए ढेरों खिलौने. हम सब बुआ से ही चिपके रहते. एक दिन मां बुआ से रसोई में कह रही थीं, “जीजी क्या बात है? आज बहुत उदास हो. क्या जीजाजी की याद आ रही है?”
“हां भाभी, उनकी बहुत याद आ रही है. उनकी चिट्ठी आई है. वह भी मुझसे मिलने को तड़प रहे हैं. यहां आना चाहते हैं, लेकिन मेरी खडूस सास उन्हें यहां आने की इजाज़त नहीं दे रहीं.”
“जीजी, मेरी भी खड़ूस सास इन्हें मेरे मायके नहीं जाने देती.” मां ने हंसकर कहा, तो बुआ बोली, “अच्छा भाभी, मेरी मां को खडूस कह रही हो. अभी शिकायत करती हूं तुम्हारी भइया से.”            
“सोच लो जीजी, मैं भी शिकायत कर दूंगी जीजाजी से आपकी.” कहकर दोनों ज़ोर से खिलखिलाकर हंस पड़ीं तो दादी ज़ोर से चिल्लाईं, “तुम ननद-भौजाई खी-खी करके इतनी ज़ोर से क्यों हंस रही हो. शर्म-लिहाज़ है कि नहीं?”
“मां, कुछ नहीं, बस भाभी आपकी तारीफ़ कर रहीं थीं.” कहकर बुआ ने मां को कुहनी मारी, तो दोनों मुंह पर हाथ रख कर ज़ोर से हंस पड़ीं.
“दीदी, आप कहां खो गईं?” भाभी ने कहा, तो मैं फिर से वर्तमान में आ गई और जल्दी-जल्दी क़दम बढ़ाने लगी.
कार में बैठते ही भइया बोले, “खुशी भी शाम तक आ जाएगी. साथ में विराट भी आ रहे हैं.”
सुन कर मन ख़ुश हो गया. घर पहुंचते ही ख़ूब आदर-सत्कार हुआ मेरा. शाम को खुशी भी आ गई, “बुआ...” कहते हुए गले लगी, तो आंसू ना रोक सकी मैं.
रात में पूरे पूरे हाथों में मेहंदी लगाई. अगले दिन रक्षाबंधन था. पास वाल पार्क में झूला डलवाया गया था. खुशी को देखकर आश्‍चर्यचकित रह गई मैं. बनारसी हरे रंग की साड़ी, मांग में भरा सिंदूर, कलाइयों में दर्जनभर खनकती चूड़ियां, पैरों में छम-छम करती पायल और महावर...  उसका उमंग-उत्साह देखते ही बन रहा था.
“खुशी, तू तो लग ही नहीं रही कि इतनी बड़ी कंपनी में ऊंचे पद पर है. तू तो ऑफिस जींस-टॉप और सलवार-कमीज में जाती है. तूने इतनी भारी साड़ी संभाल कैसे रखी है?”
“बुआ, अपना हर त्योहार हमें पूरी आस्था, परंपरा, उत्साह और उल्लास से मनाना चाहिए. यह स़िर्फ एक त्योहार है कहकर उन्हें औपचारिक ढंग से मनाने में ऐसा लगता है जैसे यह एक बोझ है और उसे अनमने ढंग से उतार रहे हैं. बुआ, माना आज हमारे पास समय नहीं है. हम बहुत व्यस्त हैं, पर क्या हम अपने व्यस्त जीवन से कुछ पल अपने मन की ख़ुशी और इच्छाओं के लिए नहीं निकाल सकते? स़िर्फ पैसों के लिए बेतहाशा भागना और हरदम व्यस्तता का रोना रोकर ख़ुद ही अपने अच्छे भले जीवन को तनावग्रस्त बना लेते हैं और हर पल टेंशन में जीते हैं.”

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खुशी की यह सकारात्मक सोच मेरे मन में गहरे उतर गई. खुशी की ज़्यादातर सहेलियां आई हुई थीं. सभी पूरी मौज-मस्ती और हर्षोल्लास से झूला झूल रही थीं. यह सब देखकर लगा ही नहीं कि त्योहारों का अस्तित्व ख़त्म हो रहा है. खुशी को विराट झुला रहा था. सभी मुझसे भी झूला झूलने की ज़िद करने लगे, तो मैंने हंस कर कहा, “अरे मैं कहां बुढ़ापे में झूला झुलूंगी.”
“बुआ, मनुष्य का मन कभी बूढ़ा नहीं होता. बूढ़ी होती है उसकी नकारात्मक सोच.”
“खुशी ठीक कह रही है. कम ऑन बुआजी, आप आइए आपको झोंके मैं दूंगा.” विराट ने जोश से कहा, तो मैं झूला झूलने के लिए राज़ी हो गई.
लेकिन डर की वजह से मैं अपना संतुलन खो बैठी और झूले से धड़ाम से गिर पड़ी और मेरे आगे का एक दांत टूट गया. मैं दर्द से कराह उठी. विराट मुझे तुरंत ही दांतों के डॉक्टर के पास ले गया. मेरा खून रुक ही नहीं रहा था.
डॉक्टर ने बजाय कॉटन के अपने रुमाल से खून साफ़ किया, तो उसे देखकर मैं अवाक रह गई, “कृष्णा तुम?”
“हां राधा मैं. बचपन में तुम्हारा दांत टूटा था, तो मैं तुम्हारे पास था और आज भी तुम्हारे पास हूं. और तुम्हारा वह दांत आज भी मेरे पास सुरक्षित है.” कहते हुए अपनी मेज़ की दराज़ से ख़ूबसूरत डिब्बी मुझे खोलकर दिखाई, जिसमें मेरा दांत रखा हुआ था.
“कृष्णा, फेंक दो इसे. इतने सालों से क्यों संभाल कर रखा है?”
“नहीं राधा, इसे नहीं फेंक सकता मैं.”
“क्यों नहीं फेंक सकते इसे?”
“बस कह दिया ना, नहीं फेंक सकता. और हां... आज एक वादा भी पूरा करना है. तुम्हारा दांत लगाना है.”
“हां मुझे पता है. तुम नकली दांत लगा दोगे.” मैं हंस पड़ी.
“हां, लगाऊंगा तो नकली ही, लेकिन लगेगा बिल्कुल असली. तुम जब भी दर्पण देखोगी, तो उस दांत को देखकर मुझे ज़िंदगीभर याद करोगी.”
“क्या स़िर्फ इसलिए ही दांतों के डॉक्टर बने थे.” मैंने चुहल की.
“हां राधा, जिस दिन बचपन में तुम्हारा दांत टूटा था, तो मैंने ठान लिया था कि मैं दांतों का डॉक्टर बनूंगा और तुम्हारा दांत लगाऊंगा.”
“कृष्णा, कब तक मेरा दांत लग जाएगा? मुझे जाना भी है.”
“बस सप्ताह भर लगेगा, परंतु तुम चिंता मत करो ऐसा फिक्स कर दूंगा कि तुम्हारे बैंक बाबू भी नहीं पहचान पाएंगे कि यह नकली दांत है.” वह हंसकर बोला.
“अब वह बैंक बाबू नहीं बैंक मैनेजर हैं.” मैं इतरा कर बोली.
“बधाई हो!” कहकर उसने मेरा ट्रीटमेंट शुरू कर दिया. कुछ ही दिनों में उसने नकली दांत लगा दिया. सचमुच लग ही नहीं रहा था कि वह नकली है. फीस पूछी तो उदास लहज़े में बोला, “तुम इतने दिन इलाज के बहाने मेरे सानिध्य में रहीं, यही मेरी फीस है.”
यह सुनकर भावुक हो उठी मैं.
“कृष्णा, अपनी पत्नी से तो मिलवाओ. मैं कल ही वापस जा रही हूं. पता नहीं फिर कब आना हो.”
“राधा, मैं ज़रूर मिलवाता उससे, पर इस सावन पर वह अपने मायके गई है.”
केबिन से निकलते ही दो मरीज़ बात कर रहे थे, “बहुत भले डॉक्टर हैं. शादी नहीं की. सुना है बचपन से ही किसी से प्यार करते थे. इनकी वजह से उसका दांत टूट गया था, तभी से दांतों का डॉक्टर बनने की ठान ली थी. वाह प्यार हो तो ऐसा.”
यह सुनकर मैं उल्टे पांव दौड़ पड़ी केबिन में, “कृष्णा, तुमने मुझसे झूठ बोला. सच बताओ, तुम ने शादी क्यों नहीं की?”
“क्योंकि मैं राधा से प्रेम करता था.”
“लेकिन कृष्ण ने तो रुक्मणी से विवाह किया था...”
“मैं आज का कृष्ण हूं जिसने स़िर्फ राधा से प्रेम किया था, आज भी करता हूं और आख़िरी सांस तक करता रहूंगा. किसी रुक्मणी से विवाह का प्रश्‍न ही नहीं उठता.” मैं फूट-फूट कर रो पड़ी. सभी मरीज़ों व तीमारदारों ने मुझे घेर लिया, “क्या हुआ मैडम?”
“कुछ नहीं दांत में बहुत दर्द है.”
 “डॉक्टर साहब से दवा ले लो. दर्द जल्दी ठीक हो जाएगा.”
“अब यह दर्द मेरा साथी है...” मन ही मन बुदबुदाते हुए मैं क्लीनिक से बाहर आ गई.

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“मैं आज का कृष्ण हूं जिसने सिर्फ़ राधा से प्रेम किया था, आज भी करता हूं और आख़िरी सांस तक करता रहूंगा. किसी रुक्मणी से विवाह का प्रश्‍न ही नहीं उठता.” मैं फूट-फूट कर रो पड़ी.

“हां राधा मैं. बचपन में तुम्हारा दांत टूटा था, तो मैं तुम्हारे पास था और आज भी तुम्हारे पास हूं. और तुम्हारा वह दांत आज भी मेरे पास सुरक्षित है.”


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